प्रदीप सक्सेना का संपादकीय आलेख 'कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है!'


प्रदीप सक्सेना 


1857 का संग्राम अनियोजित होते हुए भी भारतीय स्वतंत्रता के लिए किया गया पहला संग्राम था। दुनिया में जितनी भी क्रांतियां हुई हैं उन सबमें इस संग्राम का नाम भी आदर के साथ लिया जाता है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि अंग्रेजों ने भारत पर जो जुल्मो सितम ढाया, वह पहले के सारे जुल्मो सितम से अलग और तीव्रगामी था। प्रदीप सक्सेना लिखते हैं कि लन्दन में रहते हुए ही कार्ल मार्क्स तुलनाओं के माध्यम से इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि जिस 1857 की क्रांति को ब्रिटिश नौकरशाही महज़ फौजी बगावत या गदर कह रही है "वह भारतीय जनगणों का प्रथम स्वाधीनता संग्राम है।" महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह क्रांति घटित भारत में हो रही थी लेकिन उसका चरित्र जिसका अन्तर्राष्ट्रीय था। 'उद्भावना' ने समय समय पर कई महत्वपूर्ण अंक प्रकाशित किए हैं। उद्भावना का एक अंक 'अधिकार और क्रांति' पर केन्द्रित था जिसके अतिथि सम्पादक की भूमिका प्रदीप सक्सेना ने निभाई। प्रदीप सक्सेना एक प्रतिबद्ध आलोचक हैं। आज उनका जन्मदिन है। पहली बार की तरफ से उन्हें बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रदीप सक्सेना का संपादकीय आलेख 'कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है!'


कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है!'


प्रोफेसर प्रदीप सक्सेना


उपर्युक्त भावना-वाक्य में शायद गेटे का यह अनुभूत-कथन अन्तर्भुक्त है- "सारे सिद्धांत बेरंग हैं। केवल जीवन का वृक्ष हरा है"। कभी अक्तूबर क्रांति भी ऐसा ही जीवन-वृक्ष थी। एक विश्व-वृक्ष। पारिजात-वृक्ष। सिद्धांत उस पर फलते थे। यहाँ तक कि दर्शन तक पुष्पित-पल्लवित हुए थे।

कुछ समय पहले 'टाइम्स' के एक सर्वेक्षण में मार्क्स को 'सहस्राब्दी मस्तिष्क' घोषित किया गया था। अब ऐसा प्रतीत होता है कि उनके पास प्रसिद्ध मान्यताओं का असिद्ध समुच्चय मात्र था। 'हीगेल को उन्होंने सिर के बल खड़ा पाया था और लेनिन ने मार्क्स को।' इस समय विज्ञान-भवन में जो मान्यताएं पक रही हैं उससे विश्व चमत्कृत है। पुराण इतिहास में बदल रहा है और इतिहास, पुराण में। कहना न होगा, ज्ञान अब साधना नहीं रहा, साधन बन चुका है और साधन जिनके पास हैं, ज्ञान वहीं विश्राम कर रहा है।

यों वैज्ञानिकता को भी सदैव परिभाषित करना पड़ता है। स्थायी सिर्फ अमूर्तता हो सकती है। सापेक्षताएं ही ज्ञान-सरणियां हैं। इतिहासकारों की पेशेगत ज़रूरतों और जिन्दगी की ज़रूरतों के बीच अनेक 'वैज्ञानिक इतिहास' पर्याप्त अवैज्ञानिक पाये गये हैं। मार्क्सवादी इतिहास-लेखन के संदर्भ में भी यही सच है। तब के 'वैज्ञानिक इतिहासों' का पता नहीं लग रहा है। 'राष्ट्रीय धाराएं उन्हें बहाये लिये जा रही हैं। हमारे 'गदर' के नाम से विख्यात 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को प्रतिक्रियावादी मानने वाले और उसे फ्रेंच क्रांति के समकक्ष जानने वाले-दोनों ने ही 'वैज्ञानिक इतिहास' लिखे हैं। दोनों का आधार वही एक दर्शन-मार्क्सवाद है- 'वैज्ञानिक विश्व दृष्टि।'

आज की नहीं, तब की बात है जब समाजवाद का सूरज तप रहा था। गांधी जी 'बापू' के रूप में विश्व मान्य हो चुके थे। देश उन्हें 'राष्ट्रपिता' की उपाधि दे चुका था। लेकिन सोवियत संघ के एक बेहूदे मूल्यांकन में उन्हें साम्राज्यवाद का एजेंट और पूंजीपतियों का दलाल और सामंतवाद का चाकर ठहराया जा रहा था। क्या यह 'वैज्ञानिक इतिहास' था? 

लेकिन तब ही गांधी जी के उपर्युक्त मूल्यांकन के विपरीत भारतीय मार्क्सवादी चिंतक ई.एम. एस. नंबूदिरिपाद ने 'न्यू एज' में गांधी जी के महत्व को प्रतिष्ठित करते हुए एक लेखमाला लिखी थी - 'गांधी जी और उनका वाद'। यह वैज्ञानिक हस्तक्षेप था जो निरंतर पुष्ट होता गया और इस मूल्यांकन से मार्क्सवाद समृद्ध हुआ। आज सत्ता भी नतमस्तक है गांधी जी के सामने!! गांधी जी ने कभी सोचा न होगा कि एक दिन हत्यारे भी अपने राजनैतिक लाभ के लिए उनके नाम का जाप करेंगे।

प्रश्न है-क्या आत्मकथाएं इतिहास नहीं होतीं? अगर वे इतिहास नहीं हैं तो फिर वे क्या हैं? क्या उनमें प्रामाणिकता का इतिहास तत्व नहीं है? लेकिन हमारे वैज्ञानिक इतिहासों में कम्युनिस्ट आत्मकथाओं का उपयोग कब, कहाँ और कितना हुआ? आत्मकथाओं में अत्यंत मूल्यवान तथ्य निहित थे लेकिन पार्टी-तथ्यों के विपरीत वे व्यक्तिगत माने गये। व्यक्तिवादी भी। उन पर विचार करने और उनका उपयोग करने का कोई प्रयत्न नहीं दिखायी देता। जब पार्टी के बाहर न कोई तथ्य है, न तर्क, न सत्य, फिर आत्मालोचन या आत्मसंघर्ष का स्कोप कहाँ रहेगा? स्पेस ही नहीं अन्य और भिन्न के लिए।

पूरन चंद्र जोशी-द्वितीय यानी हमारे समाज-विज्ञानी जोशी जी ने हिन्दी में पर्याप्त और स्तरीय लेखन किया और वाम-चिन्तन को समृद्ध किया लेकिन बहस के केंद्र में वे नहीं रहे। क्योंकि वे साहित्य और आलोचना की दुनिया के आदमी नहीं थे। हम अपनी ही दुनिया के आदमी के चिंतन को अपना समझते हैं-जैसे कि रामविलास जी के चिंतन को। जोशी जी ने एक बहुत अच्छी किताब पेश की 2009 में- "यादों से रची यात्रा।" यह विकल्प की तलाश थी। विकल्प जो अक्तूबर क्राति ने पूरी दुनिया के सामने रखा था। उसकी भूमिका में उन्होंने कहा है कि "विश्व के प्रथम समाजवादी विकल्प की प्रयोग भूमि रूस महान बोल्शेविक क्रांति के बाद से ही विश्व भर के प्रबुद्ध और साधारण जन दोनों का आकर्षण केंद्र और प्रेरणास्रोत रहा है।" क्योंकि इस प्रयोग ने उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में गंभीर संकटग्रस्त पूंजीवादी व्यवस्था का जो कारगर विकल्प प्रस्तुत करने का साहस किया था "वह अभावग्रस्त तथा निराशा के अंधकार से त्रस्त उत्पीड़ित मानवता के लिए उम्मीद की किरण बन गया था और विश्व भर के प्रबुद्ध जनों के लिए प्रत्यक्ष दर्शन, गहरी जाँच-पड़ताल, अध्ययन और मूल्यांकन का आमंत्रण।" पश्चिम और पूर्व, यूरोप और एशिया से कितने ही मनीषी, कार्यकर्ता, क्रांतिकारी, राजनेता और सुधारक अपने अध्ययनों और यात्रा-वृत्तांतों से उन चमत्कारी संभावनाओं और महनीय उपलब्धियों का परिचय देने निकल पड़े थे। कहना न होगा कि तभी से समाजवाद केवल एक स्वप्न, एक आदर्श न रह कर एक संभव नयी दुनिया, एक व्यवहार्य कार्यक्रम, एक विश्व प्रोजेक्ट एक सर्वदेशीय अभियान बन गया। यह प्रभु की नहीं इतिहास की प्रभुत्व लीला थी। घटना भले ही किसी देश में घटित हुई लेकिन प्रभाव और चिन्ताएं विश्वव्यापी रहीं। वह न एकल थी, न आकस्मिक; बल्कि सकल थी और संपूर्ण। जन-प्रभंजन। जिसे पांच अमरीकियों ने आंखों देखा और कानों सुना और लिपिबद्ध कर विश्व की धरोहर बना दिया। जॉन रीड, बेस्सी बेट्टी, लुइस ब्रायन, एलेक्स गाम्बोर्ग और अलबर्ट रीस विलियम्स जिन्होंने अक्तूबर क्रांति का वह ताजमहल खड़ा किया जिसके चौक में लेनिन महान की विशालकाय प्रतिमा स्थापित की गई। उन बिम्बों को विश्व की प्रतिक्रियावादी शक्तियां अब भी खुरच रही हैं। 'विचारधारा के अंत' के औज़ारों से तोड़ रही हैं उन मूर्तियों को जो विचारधारा के इस्पात से ढली हैं।

भारतीय चिंतकों ने मार्क्स को "महर्षि" और लेनिन को "महात्मा" कहा है। ये राष्ट्रीय आंदोलन के हिन्दू चिंतक थे, न कि आज के सत्तावादी जिनके पास राष्ट्रीय आंदोलन का सर्वश्रेष्ठ नहीं- एक ऐसा राष्ट्रवादी घोल है जिसमें मानव-मुक्ति का स्वप्न गल रहा है।

मार्क्सवाद और सोवियत मार्क्सवाद के घोर आलोचक अलेक्जेंडर सोल्झेनित्सिन- समाजवादी शिविर और समाजवादी स्वप्न के शत्रुओं के कंठहार-सोल्झेनित्सिन ने भी इतनी वस्तुनिष्ठता प्रदर्शित की कि बोल्शेविक क्रांति और उसके सूत्रधार पर 'लेनिन इन ज्यूरिख' जैसी रचना की और यह निष्कर्ष निकाला कि "लेनिन ने पूर्व की सभी क्रान्तियों का बारीकी से अध्ययन किया था, क्योंकि वे क्रांति के लिए ही जन्मे थे और क्रान्ति के लिए ही जी रहे थे।" और अलेक्जेंडर ने क्रांति के बारे में यह टिप्पणी दर्ज की "रूस की बोल्शेविक क्रांति, रूस का सही आंदोलन था, जिसकी जड़ें आम जनता में कम और बौद्धिकों में ज्यादा थीं। इनमें तल्सतोय, दॉस्तोएव्स्की और तुर्गनेव जैसे विश्व प्रसिद्ध कुलीन लेखक भी थे। इसके अलावा प्राध्यापक, विद्यार्थी, व्यापारी और किसान भी आमूल परिवर्तन के समर्थक थे।" और "व्लादीमीर लेनिन, जिन्होंने बोल्शेविक पार्टी का निर्माण, क्रांति के हरावल दस्ते के रूप में किया था, रूस के नये भाग्यविधाता बने।" अलेक्जेंडर सोल्झेनित्सिन तो बोल्शेविक नहीं थे। लेकिन क्रांति जो भी थी, जैसी भी उसका मूल्यांकन आलोचना के लिए करते हुए भी उसकी महनीय और विश्वप्रभावी भूमिका को उन्होंने रेखांकित किया। उनकी नज़र तक में उसका चरित्र अन्तर्राष्ट्रीय था। विश्व प्रेरक था। आज सोवियत संघ के विघटित हो जाने से क्रांति के ऐतिहासिक व्यक्तित्व को नकारना दरिद्र इतिहास बोध, मानव मुक्ति के प्रथम स्वप्न और प्रयत्न को दबाने और झुठलाने के माध्यम से प्रतिक्रिया की सेवा में अग्रसर होना है। जिस तरह प्रगति का दौर इतिहास की भेंट थी, वैसे ही प्रतिक्रिया का दौर भी है। मनुष्य शोषण के किले को एक बार अगर ध्वस्त कर चुका है तो आगे ऐसा क्यों नहीं कर सकेगा? भले ही उसका रूप अपनी अन्तर्वस्तु के अनुसार सोवियत संघ जैसा न हो! न होना ही चाहिए।

तुलनाएं सब लंगड़ी होती हैं, क्योंकि हर वस्तु अपना रूप ले कर आती है और वस्तुएं अपने गुण संरक्षित करती हैं। लेकिन तुलनाओं से ही हमारी समझ बनती और विकसित होती है। दुनिया की कोई ऐसी चीज़ नहीं है, जिसकी तुलना न होती हो, या न हो सके। देश काल में फैली ज़रूरतें सब वस्तुओं को समाहित कर लेती हैं। क्रांतियों की भी तुलनाएं होती हैं और देशों की भी। मार्क्स जब भारत पर विचार कर रहे थे तो उनका ध्यान भारत की भू-राजनीतिक विशेषताओं पर इस प्रकार गया-

"हिन्दुस्तान एशियाई आकार का इटली है: एल्प्स की जगह वहां हिमालय है, लोम्बार्डी के मैदान की जगह वहां बंगाल का समप्रदेश है, ऐपिनाइन के स्थान पर दकन है, और सिसिली के द्वीप की जगह लंका का द्वीप है। भूमि से उपजने वाली वस्तुओं में वहां भी वैसी ही सम्पन्नतापूर्ण विविधता है। और राजनीतिक व्यवस्था की दृष्टि से वहां भी वैसा ही विभाजन है। समय समय पर विजेता की तलवार इटली को जिस प्रकार विभिन्न प्रकार के जातीय समूहों में बांटती रही है, उसी प्रकार हम पाते हैं कि जब, उस पर मुसलमानों, मुगलों, अथवा अंग्रेजों का दबाव नहीं होता तो हिन्दुस्तान भी उतने ही स्वतंत्र और विरोधी राज्यों में बँट जाता है जितने कि उसमें शहर, या यहाँ तक कि गांव होते हैं। फिर भी, सामाजिक दृष्टिकोण से, हिन्दुस्तान पूर्व का इटली नहीं, बल्कि आयरलैंड है।"

ये तुलनाएं 1853 में की गयी थीं और ब्रिटिश इतिहासकारों से पूर्णतः भिन्न थीं। साथ ही तुलनाओं से ही मार्क्स इस नतीजे पर पहुंचे कि एक तरफ तो उन्होंने कहा कि "मैं उन लोगों की राय से सहमत नहीं हूं जो हिन्दुस्तान के किसी स्वर्ण-युग में विश्वास करते हैं।" दूसरी और उनका निष्कर्ष रहा- "किन्तु, इस बात में कोई संदेह नहीं हो सकता कि हिंदुस्तान पर जो मुसीबतें अंग्रेजों ने ढायी हैं, वे हिन्दुस्तान ने इससे पहले जितनी मुसीबतें उठायी थीं, उससे मूलतः भिन्न और अधिक तीव्र किस्म की हैं।" इसी अध्ययन, यानी तुलनाओं के माध्यम से मार्क्स इस नतीजे पर पहुंचे कि जिस 1857 की क्रांति को ब्रिटिश नौकरशाही महज़ फौजी बगावत या गदर कह रही है "वह भारतीय जनगणों का प्रथम स्वाधीनता संग्राम है।" मार्क्स पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने इस तरह भारत के प्रति अपनी समझ और संवेदना प्रकट की। प्रेम प्रकट किया और उसकी मुक्ति की कामना की। देखा जा सकता है, क्रांति घटित भारत में हो रही थी लेकिन चरित्र जिसका अन्तर्राष्ट्रीय था। प्रभावित जिससे उपनिवेशवादी यूरोप हो रहा था। इसी तरह अक्टूबर क्रांति घटित रूस में हो रही थी लेकिन प्रभावित जिससे एशिया और यूरोप हो रहा था। प्रतिक्रिया इसे न देखना चाहती है, न रेखांकित करना चाहती है। तुलना के लिए मैं यह कहना चाहता हूं कि 1853 में भारत और इटली और आयरलैंड थे। लेकिन अक्तूबर क्रांति के अभियंता और संगठनकर्ता लेनिन के लिए रूस और पूरब के एशिया के देश थे। भारत और रूस यह समीकरण 1917 में समाजवाद के संदर्भ में उभर आया था।

बाद में अनेक लोगों ने, "भारत और रूस" पर ग्रंथ तैयार किये। और तुलनाएं कीं और समानताएं खोजीं। उनमें से एक अध्ययन को मैंने बहुत दिलचस्प और महत्वपूर्ण पाया। आप भी देखें- सेर्गेई सेरेब्यनि (जनवरी, 1946) मॉस्को में जन्मे और इसी राजधानी-शहर में रहे। विश्व युद्ध के तुरंत बाद की पीढ़ी के वे सदस्य थे। उन्होंने स्टॉलिन को देखा था। बचपन स्टॉलिन के शासन काल में गुज़ारा। तब स्टॉलिन ईश्वर थे। उनकी मृत्यु पर मॉस्को को सदमे में भी देखा। लोग रो रहे थे। लेकिन बाद में उनकी मूर्त्तियां टूटती देखीं; वह भी उनके वारिसों द्वारा ही। उन्होंने 1962-68 के दौरान मॉस्को के प्राच्य भाषा संस्थान से हिन्दी, बांग्ला, संस्कृत और अंग्रेजी में डिग्री प्राप्त की। 1967-68 का वर्ष उन्होंने भारत में गुज़ारा। बीएचयू में। उन्होंने भारत और रूस की तुलना की और ये महत्वपूर्ण समानताएं नोट कीं-

"18वीं-19वीं शताब्दियों में भारत का रूपान्तरण न केवल ब्रिटिशों द्वारा, बल्कि अनेक भारतीयों द्वारा भी किया गया था, जो किसी न किसी तरीके से, विदेशी शासकों के प्रयत्नों में शामिल हो गये थे और/ अथवा उनमें योगदान देते थे। दूसरी ओर रूस का रूपान्तरण न केवल पश्चिमी यूरोप के उदाहरण द्वारा प्रेरित था, बल्कि इस प्रक्रिया में 18वीं तथा 19वीं शताब्दी में भी अनेक पाश्चात्य निवासियों ने कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभायीं।

"पीटर प्रथम ने सन् 1703 में अपने नये साम्राज्य की राजधानी, सेंट पीटर्सबर्ग को नेवा नदी के मुहाने पर निर्माण किया, जिसने मुख्य भूमि को समुद्रों और महासागरों से जोड़ा। लगभग उसी समय , सन 1690 के दशक के अंतिम वर्षों में, ब्रिटिशों ने भारत में अपने साम्राज्य की भावी राजधानी कलकत्ता का (जिसे अब भारत में कोलकाता लिखा जाता है) निर्माण किया। नेवा की तरह, गंगा के, उस नदी के मुहाने पर, जिसने ब्रिटिशों के लिए मुख्य भूमि को समुद्रों एवं महासागरों से जोड़ा।"


पीटर प्रथम 'यूरोप में खिड़की खोलना चाहते थे।' 

ब्रिटिश चाहते थे 'भारत में खिड़की खोलना।'


"-एक विचित्र संयोगवश, दोनों शहर अपने साम्राज्यों की राजधानियों के रूप में बाद में नहीं रहे। लगभग एक ही कालखण्ड में कोलकाता-शासकीय रूप में सन् 1911 में, मगर वास्तविक रूप में 1920 के दशक में यानी सेंट पीटर्सबर्ग 1918 में।"

तुलनाएं अध्ययन का नया आधार प्रदान करती रही हैं। इसे तभी समझा जा सकता है कि अक्तूबर क्रांति पूरब की क्रांतियों से किस प्रकार, कितनी और क्यों भिन्न थी? अल्बर्ट रीस विलियम्स ने अपनी बात शुरू करते हुए ही इसके विराट महत्व को जताने वाले एच. जी. वेल्स के कथन को उद्धृत किया है कि "इस्लाम के उदय के बाद रूसी क्रांति सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना है।" वाशिंगटन के कैथोलिक प्रोफेसर वाल्श के मतानुसार 'रोमन साम्राज्य के पतन के बाद अक्तूबर क्रांति विश्व की सबसे अधिक उल्लेखनीय घटना है।'

अलबर्ट ने सही नोट किया था ढेरों पुस्तकों में से क्रान्ति की मुख्य बात गायब है कि इन पुस्तकों में जनता के बारे में या तो बहुत कम, अथवा कुछ भी नहीं कहा गया है। और वास्तव में यह क्रांति की थी जनता ने ही। मज़दूरों एवं किसानों ने ही। कैसी जनता?

"जिसमें क्रांति को सफल बनाने के सभी अनिवार्य गुण-दृढ़ता, कठोरता, सहनशक्ति, लक्ष्य के प्रति निष्ठा एवं उसके लिए बलिदान हो जाने की तत्परता, नये विचारों तथा कौशल को अपनाने की योग्यता-उसमें थी।" भारत में ऐसी जनता को हमने कब और कहाँ पाया और तैयार किया?

'लेनिन ने उन्हीं पर, रूसी जन समुदाय की इस क्षमता पर भरोसा करते हुए कि इतिहास ने जो महान ऐतिहासिक कार्यभार उन्हें सौंपा है, उसे वे पूरा कर लेंगे, रूस और क्रांति के भविष्य को दांव पर लगा दिया।' हमने तो "जनता-जनता" का अखंड जाप ही पर्याप्त समझा है।

अक्तूबर क्रांति नेता और जनता के अटूट और निर्मल संबंध को स्थापित करती है। सम्पूर्ण विश्व में अप्रतिम उदाहरण।

ये ही बातें थीं जिनसे मैंने अक्टूबर क्रांति पर एक अंक तैयार करने का मन बनाया। केंद्रित किया। औसतन हर 5 वर्ष बाद मैं एक विशेषांक तैयार करता रहा हूं। 2012 में रामविलास शर्मा पर केंद्रित महाविशेषांक के बाद 2017 में सामान्यतः आना ही था। लाना मार्क्सवाद पर चाहता था लेकिन 1917 की अक्तूबर क्रांति का शताब्दी वर्ष सामने ही था। 'उद्भावना' पर अधिकार और क्रांति पर अंक लाने का अजेय भाई का विचार एक दम मूर्त रूप लेने लगा। लेकिन जगत जानता है कि क्रांति का कोई भी काम कभी भी आसान नहीं रहा। जैसे ही दिलो जान से रूपरेखा बनाने और सामग्री जुटाने में लगा, पूर्ण और भीषण हृदयाघात लगा और पूरा वर्ष जीवन बचाने में खर्च हो गया। लेकिन यह संकल्प खलबलाता रहा। 2017 रूपरेखा और सहयोग प्राप्त करने में व सामग्री की छानबीन में निकल गया। पता लगा समाज विज्ञान में दावा करने वाले गंभीर लेखन में असमर्थ रहे। मौलिक चिन्तन के पौधों पर अपढ़ और कुपढ़ होने के ओले गिरने लगे। एक वर्ष पिटी फसल को खड़ी करने में लगा फिर शुरू हो गई अजेय भाई की घरेलू परेशानियां। सामग्री अंतिम रूप से 2018 में तैयार हो गयी थी लेकिन 2018 में सामने न आ सकी। 2019 आ गया। भीषण तनाव रहा। लेकिन लेखक-साथियों ने भी धैर्य रखा और अंक की परिकल्पना में खोये रहे। बस जीवन में पहली बार कोई काम नियत समय पर नहीं हो पा रहा था। है तो रूमानी बात लेकिन दर्ज करना चाहता हूँ-उधर प्रतिक्रिया सत्ता की और भीम डग से बढ़ती जा रही थी, और वाम समाज और दलों और शक्तियों का विघटन होता जा रहा था। उसे केवल संकल्पों, प्रस्तावों और 'देखो और प्रतीक्षा करो' की डोर से बांधा जा रहा था। दिनभर 'आज की चुनौतियाँ और हमारे कार्यभार' पर विचार हो रहा था लेकिन वास्तविक चुनौती यही थी कि जनता प्रतिक्रिया की सेवा में क्यों लगती जा रही है? और वाम नयी पीढ़ी को आकर्षित क्यों नहीं कर पा रहा है? ये चुनीतियां कहाँ थीं सामने? हिन्दी क्षेत्र कब रहा एजेंडे पर? अखिल भारतीय स्तर पर 'लाल' की स्वीकृति कहां थी? यथार्थवाद पर चिन्तन का यथार्थ से कैसा संबंध था? वाम का सामाजिक आधार कहाँ था? कवियों, लेखकों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों से पार्टी के घनिष्ठ रिश्ते टूटे हुए अरसा हो गया। अन्य सांस्कृतिक मोर्चों को भी कब हमने क्रांति में सहायक माना? गलियारे लाल हों या नीले ये अखिल भारतीय प्रक्रियाओं की जगह नहीं ले सकते। जनतांत्रिक व्यवहारों से हीन और नैतिकताविहीन आचरणों को क्रांतिकारी होने का जामा ज़रूर हम पहनाते आये हैं। विचारधारा से व्यक्तिगत लाभ भी हम उठाते रहे हैं। इन्हीं सब चिन्ताओं के बीच इस अंक को तैयार करने का संकल्प आकार लेता रहा है। भारत जैसे और मामलों में 'अद्भुत' है वैसे ही कम्युनिस्ट आंदोलन के मामलों में भी। देश में कई कम्युनिस्ट पार्टियां और वर्किंग ग्रुप हैं। सभी वास्तविक और सच्चे क्रांतिकारी! केवल 2 पार्टियों के विलय की मांग 20 वर्षों से चल रही है, बाकी का क्या होगा? ऐसे में कहना ही होगा प्रतिक्रिया स्वतः संगठित है और वाम विघटित। भयंकर भूलों की माला पहने। इतिहास में भूलों को दुलराया नहीं जाता-उनकी सज़ा मिलती है।

यशपाल ने 'जनवरी, 1940' में अपना, 'विप्लव' का मार्क्स अंक तैयार किया था, जिसका उल्लेख रामविलास जी और उनके स्कूल ने कभी नहीं किया, परस्पर द्वेष और उपेक्षा का यह सिलसिला पूरे ज़ोर से वाम संगठनों में सक्रिय है। ऐसे में इस अंक में तथा हमारे अन्य विशेषांकों में भी सदैव व्यापक वाम को सार्थक माना गया है। सभी वाम छायाएं इस अंक की भी शोभा हैं। ठेकेदार जन यहां नदारद हैं। निष्ठावान और समाजवाद में अब भी आस्था रखने वाले प्रतिबद्ध जन यहाँ हैं। विज्ञान का धर्म है खोज और विचार। वह अमर श्रेणियां नहीं बनाता बल्कि शोध की प्रतिष्ठा करता है।

पुनर्विचार कोई बुरी चीज़ नहीं है। पाठक विचार करें, मार्क्सवाद को सही सिद्ध करने वाली ग़रीबी, शोषण, लूट, जनसंहार, उत्पीड़न और युद्ध क्या दुनिया से विदा हो चुके? कारपोरेट पूंजी इनके विरुद्ध क्या आश्वासन दे रही है? अधिशेष मूल्यों में हमने अपना हिस्सा खाने को ही क्या क्रांति नहीं समझा? संगठनों पर कब्ज़े को ही आंदोलन नहीं कहा? सबका दर्पण है अक्टूबर क्रांति! इसके संदर्भ में मूल्यांकन मालाएं चलायी जानी चाहिए। फिलहाल प्रस्थान के लिए यह प्रयत्न प्रस्तुत है। अंक अपने बारे में स्वयं कहे, मैं क्यों कहूं? आप कहें--कैसा बन पड़ा है!


आपका साथी


प्रदीप सक्सेना

अतिथि संपादक


सम्पर्क 


मोबाइल : 9259017982



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