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राकेश मिश्र की कुम्भ पर कुछ कविताएं

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   राकेश मिश्र  इलाहाबाद में संगम तट पर प्रत्येक वर्ष एक महीने तक कल्पवास किए जाने की धार्मिक परंपरा रही है। इसी क्रम में हर छठवें वर्ष अर्द्धकुंभ और हर बारहवें वर्ष महाकुम्भ का यहां पर आयोजन किया जाता है। हरेक कल्पवासी से उस सात्विकता की अपेक्षा की जाती है, जिसे हम मनुष्यता कहते हैं। सुने को तो अनसुना किया जा सकता है लेकिन देखे की अनदेखी कर पाना या उसे झुठला पाना मुश्किल होता है। महादेवी वर्मा ने कल्पवास करते हुए इस प्रक्रिया को महसूस किया और उस पर अद्भुत संस्मरण लिखा। कवि त्रिलोचन ने 1954 के महाकुम्भ को देखा और जिया ही नहीं बल्कि उसको आधार बना कर छब्बीस कालजई सोनेट्स लिखे। इसी परम्परा में कवि राकेश मिश्र ने कल्पवास करते हुए 2025 के महाकुम्भ पर कुछ कविताएं लिखीं हैं। ये कविताएं इस महाकुम्भ को देखने समझने के लिए आईना हो सकती हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं राकेश मिश्र की महाकुम्भ पर कुछ कविताएं। राकेश मिश्र की महाकुम्भ पर कुछ कविताएं  भगदड़ कुम्भ की भीड़ में था मैं  हर कोई था वहाँ  भीड़ में  कसता जाता था  देहों का घनत्व...

राकेश मिश्र की कविताएं

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  राकेश मिश्र  राजा अपने आप में ही एक निर्मम शब्द है। राज पद को पाने से ले कर इसे बचाए रखने की जुगत में राजा कुछ भी कर सकता है। पहले इस राज पद को देवत्व प्रदान कर लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयास किया जाता था आजकल इसकी जगह 'लाभ' ने ले ली है। इस लाभ का जाल जंजाल कुछ इस तरह का होता है कि इससे पार पाना आसान नहीं। अब राजा शब्द ने भी समय को देखते हुए अपना शाब्दिक चेहरा बदल लिया है और आजकल यह कहीं राष्ट्रपति तो कहीं प्रधानमंत्री के चेहरे में तब्दील हो गया है। इनके इर्द गिर्द सरंजाम वही हैं जो पहले कभी हुआ करते थे। राजा की हुकूमत उसके समर्थकों और लाभार्थियों से पूरी हो जाती है। इसके बावजूद जो दायरे में नहीं आते उन्हें राजा दायरे में समेटने के लिए सारे जोर जुगत लगा डालता है। कवि राकेश मिश्र की नजर इस राजा पर रही है। वे खुद भी एक प्रशासनिक अधिकारी होने के नाते इससे बखूबी वाकिफ हैं। आज पहली बार पर हम राकेश मिश्र की कविताएं प्रस्तुत कर रहे हैं। कवि की कविताओं पर टिप्पणी की है चर्चित आलोचक अजय तिवारी ने। इस पोस्ट का संयोजन कवि केशव तिवारी का है। विडम्बना की दृष्टि  राकेश मिश्र की कविता...

राकेश मिश्र की कविताएँ

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राकेश मिश्र   यह दुनिया आज जो है, उसमें सपनों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। 'सपना' कुदरत द्वारा इंसान को उपलब्ध करायी गयी निहायत खूबसूरत नियामत है। इस सपने को अपने हुनर के दम पर इंसान साकार करता है। रचनाकारों के लिए तो यह सपना एक अनिवार्यता की तरह है। तमाम दिक्कतों, तमाम अवरोधों के बावजूद रचनाकार हमेशा एक बेहतर दुनिया का सपना देखते हैं। वे इस सपने को अपनी रचनाओं में रेखांकित करते हैं। कवि राकेश मिश्र के पास भी इस दुनिया को बेहतर बनाने के तमाम सपने हैं। उनके ये सपने उस धूल से जुड़े हैं जिसमें हम पलते बढ़ते हैं। अपनी कविता में लिखते हैं 'नंगे पाँवों की/ धूल ही थी दोस्त/ घर तक आती/ स्कूल तक जाती'। राकेश जी प्रशासनिक अधिकारी होने के बावजूद कविता से जुड़े हैं। कविता से जुड़ना उस संवेदनशीलता से जुड़ना है, जो हर इंसान को एक इंसान की तरह देखने की दृष्टि देती है। राधाकृष्ण प्रकाशन से आए उनके तीन कविता संग्रहों 'चलते रहे रात भर', 'ज़िंदगी एक कण है' और 'अटक गई नींद' ने हिन्दी कविता में एक सार्थक हस्तक्षेप करते हुए उनके कवि को पुख्ता किया है। आज पहली बार पर ...