स्वप्निल श्रीवास्तव का आलेख 'कहाँ रहती है कवि की कविता'
विनोद कुमार शुक्ल एक सवाल अक्सर उठता है कि कविता रहती कहां है जिसे कवि उठा कर अपनी कविताओं में दर्ज कर लेता है। किसी कवि के लिए यह सवाल जितना आसान होता है उतना ही परेशान करने वाला भी होता है। गंभीरता से देखा जाए तो यह समूची सृष्टि ही कविता की तरह है। सृष्टि में अपनी यह पृथिवी एक भाषा की तरह है तो पृथिवी पर जीवन एक शिल्प की तरह। यानी कि हमारे चारो तरफ कविता ही कविता है। बस जरूरत होती है उस सूक्ष्म दृष्टि की जो उसे महसूस कर कविता में दर्ज करे। विनोद कुमार शुक्ल ऐसे ही कवि हैं जिनकी कविता में उनके आस पास की आहटें करीने से दर्ज हैं। जहां तक आरोपों की बात है दुनिया का कोई भी कवि इससे मुक्त नहीं। आरोपमुक्त होना एक ऐसा छद्म है जिसे तमाम लोग ओढ़े रहते हैं। हमें यह तो मानना ही होगा कि यह दुनिया, यह जीवन बहुत बड़ा है। और हर कवि की अपनी सीमाएं होती हैं। विनोद कुमार शुक्ल के पुरस्कार मिलने पर तमाम बातें कुछ लोगों द्वारा उठाई गई हैं। ऐसे लोगों को उनकी कविताएं गौर से देखनी चाहिए जिसमें छत्तीसगढ़ का जीवन भरा पड़ा है। कविताओं की पंक्तियों और उनकी पंक्तियों के बीच दर्ज उस संघर्ष को पढ़ना चा...