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कमलेश भट्ट कमल का आलेख 'नये मिज़ाज की ग़ज़ल के शायर बशीर बद्र'

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बशीर बद्र  बीते 28 मई 2026 को नामचीन शायर बशीर बद्र का निधन हो गया। बशीर बद्र ऐसे शायर थे जिनकी लिखी पंक्तियां लोगों के जुबान पर बस गईं हैं। ऐसा सौभाग्य कम रचनाकारों को प्राप्त हो पाता है कि वे जब अपनी पढ़ाई करने के लिए जाएं तो उनकी रचनाएँ  खुद उनकी कक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल हों। बशीर साहब को यह सम्मान प्राप्त था। उनकी लिखी पंक्तियां 'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में/ तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में' उस संवेदनशीलता को दर्शाती हैं जो एक आम आदमी से शिद्दत से जुड़ी हुई हैं। बद्र साहब को अपने लेखन पर इस कदर यकीन था कि उस जमाने की मशहूर पत्रिका शबे खून के सम्पादक शम्सुर्रहमान फारूखी ने जब अपनी पत्रिका में उनकी गजलों को प्रकाशित नहीं किया तो बद्र साहब ने किसी से कहा था कि 'क्या समझते हैं उनके रिसाले में नहीं छपेगा तो बशीर बद्र शायर नहीं बन पाएगा?' उनके लेखन के दम खम से आज दुनिया परिचित है। उनके पहले संग्रह पर लिखते हुए कवि रामेश्वर शुक्ल अंचल ने लिखा था- 'डॉ. बशीर बद्र की गजलों का यह संकलन भाषा और भाव दोनों की दृष्टि से पारंपरिक उर्दू-गजल से हट कर है। भाषा में सरल...

रवि रंजन का आलेख "कोरोना-कालीन यथार्थ और मानवीय संवेदना : संतोष दीक्षित की ‘काल कथा’ "

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संतोष दीक्षित  कोरोना महामारी मनुष्यता के लिए एक बड़ी आपदा ले कर आई। सामान्य तौर पर देखा जाए तो इस महामारी ने पूरे समाज को व्यापक तौर पर प्रभावित किया। लेकिन निम्न मध्यम वर्ग, रोजमर्रा का काम करने वाले, किसान और मजदूरों पर इस महामारी का व्यापक असर पड़ा। इसने इन वर्गों की रीढ़ तोड़ कर रख दी। वरिष्ठ आलोचक रवि रंजन लिखते हैं 'महामारी भले ही सार्वभौमिक थी, किन्तु उसके अनुभव वर्ग, पेशा, संसाधन, निवास-स्थान और सामाजिक स्थिति के अनुसार भिन्न थे। एक ओर समाज का वह वर्ग था जो घरों में सुरक्षित रह कर डिजिटल माध्यमों की सहायता से अपने जीवन को अपेक्षाकृत व्यवस्थित बनाए रखने में सक्षम था; दूसरी ओर विशाल श्रमजीवी समुदाय जीविका, भोजन, आवास और अस्तित्व के संकट से जूझ रहा था। इस प्रकार कोरोना-काल ने भारतीय समाज के भीतर विद्यमान वर्गीय, आर्थिक और सांस्कृतिक अंतर्विरोधों को और अधिक स्पष्ट रूप में सामने ला दिया।' इस महामारी के दौरान मजदूरों का व्यापक पैमाने पर माइग्रेशन हुआ। भारत के विभाजन के बाद इतने व्यापक पैमाने का माइग्रेशन इस महामारी के दौरान ही दिखाई पड़ा। प्रख्यात कथाकार संतोष दीक्षित ने इस ...