पंकज मित्र की कहानी 'भुईंलोटन का भलेंटाइन'


पंकज मित्र 

हमारा यह समय अजीब समय है। समाज की व्यवस्था को चलाने की जिम्मेदारी उन लोगों ने ले ली है जो खुद अराजकता प्रेमी हैं। वेलेंटाइन डे को दुनिया भर में प्रेम दिवस के रूप में मनाए जाने की परम्परा रही है। अराजकतावादियों की आंखों को यह प्रेम नहीं सुहाता। धर्म के ठेकेदार अब इसे मातृ पितृ भक्ति दिवस के रूप में मनाने की घोषणा कर एक अलग तान छेड़ दी है। हालांकि समाज व्यवस्था को संचालित करने के लिए कुछ कायदे कानून होते हैं जिनके पालन की अपेक्षा सारे नागरिकों से की जाती है। लेकिन जब नैतिकता के नाम पर कोई व्यक्ति या भीड़ नियम कानून को अपने हाथों में लेने की कोशिश करती है तो अराजकता व्याप्त हो जाती है। आजकल धर्म के नाम पर हमारे यहां नियम कानून को अपने हाथ में लेने की कवायदें जोरो पर है। मॉब लिंचिंग की घटनाएँ आम हैं। भाषा, रहन सहन, पोशाक पहनावा आदि के आड़ में अराजक तत्त्व अपना हित साध रहे हैं। पंकज मित्र अपनी कहानी 'भुईंलोटन का भलेंटाइन' में जो परिदृश्य रचते हैं वह काफी कुछ आज के सच सरीखा लगता है। यह अलग बात है कि आज भी भुईंलोटन जैसे कुछ लोग बचे हैं जो मनुष्यता को बचाने की हरचन्द कोशिशों में लगे हुए हैं। हमने यह कहानी वनमाली कथा पत्रिका से साभार ली है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं पंकज मित्र की कहानी 'भुईंलोटन  का भलेंटाइन'।


कहानी

'भुईंलोटन  का भलेंटाइन'


पंकज मित्र


यह वक्त की सितमज़रीफी ही कही जाएगी कि जितना दबंग नाम था उतने ही शर्मीले थे बाबू भुईंलोटन सिंह। वैसे बाबू और सिंह हम लोगों ने प्रत्यय और उपसर्ग की तरह जोड़ दिया था शायद ओरिजिनल नाम में ना भी रहा हो। इतना कम मालूम था उनके बारे में हमें और वह एकदम नहीं चाहते थे कि हम ज्यादा जाने उनके बारे में। इस उम्र में जब हम सब चाहते थे कि लोगों के सामने खुद को बढ़ा चढ़ा कर पेश करें, हर दस मिनट पर अपने बारे में कुछ बखान करें, कोई तस्वीर चेंपें, चाहे वह तस्वीर कटहल के पेड़ पर चढ़ कर कटहल तोड़ने की ही क्यों ना हो। ऐसे बेशर्म समय में बाबू भुईंलोटन सिंह का शर्मीला व्यवहार हमें आश्चर्य में डालता था। क्लास में जब हकलाते हुए उन्होंने अपना नाम पहली बार उचारा था तो हंसी का एक रेला सा उठा था। परिचय सत्र चल रहा था।

- एंड यू द लास्ट बेंचर? योर नेम प्लीज? 

- जी.. बी एल. 

-एंड बी एल स्टैंड्स फाॅर? 

 शर्माते झिझकते हुए-

 - भुईंलोटन.. 

सब की हंसी रुक ही नहीं रही थी और ना भुईंलोटन  का शर्माना रुक रहा था। उसके कान- गाल सब लाल हो गए थे। आंखों में शायद नमी जैसे कुछ भी रही हो। 

-तब बाबू भुईलोटन सिंह! कहां से आए हैं? 

-क्या सर आप भी! सिंह थोड़े हैं हम- सकुचाते हुए उसने कहा था। 

-अरे, आपके नाम के साथ सूट कर रहा है इसीलिए और घर? 

पास ही के किसी गांव का नाम लिया था उसने। गांव के नाम से ही हमें अंदाजा हो गया था कि और कुछ भी हो, सिंह तो नहीं है। लेकिन जब हमने उसके साथ सिंह जोड़ दिया तो चल निकला यही नाम। शरमा कर प्रतिवाद करता था वह लेकिन उसका प्रतिवाद भी तो शर्मीला सा था। कमजोर था। फिर धीरे-धीरे सब को यकीन भी हो गया था कि उसका असल नाम यही है और बाद में उसने भी  प्रतिवाद करना छोड़ दिया था। अपने स्वभाव के विपरीत सबसे जोरदार प्रतिवाद किया था उसने जब क्लास की सबसे मुखर लड़कियों में से एक सुहाना ने छेड़ने के अंदाज में कहा था - 

-तब बाबू भुईंलोटन सिंह! आज मालूम है ना कौन सा दिन है? 

-दिन कोई भी हो, आपने बाबू क्यों कहा? - गुस्से और शर्म दोनों के भाव उसके चेहरे पर थे और अब सकपकाने की बारी सुहाना की थी।

- मतलब सब कहते हैं इसलिए, व्हाट ए बिग डील? 

-बट आई डोंट वांट यू टू  टेल।

- अरे सुनिए! सुनिए, क्या हो गया? यह बाबू तो वह वाला बाबू था- "मेले बाबू ने थाना थाया" वाला- अभिनव के चुटकी लेते ही सुहाना भक्क कर के भाग गई थी। 

खट! खट! हॉस्टल के मेरे कमरे के दरवाजे के बाहर कोई था। 

-ढुक जाओ भाई! नाॅक करने की जरूरत नहीं है। कुंडी ना खड़काओ राजा सीधा अंदर आओ राजा।

पहले नुकीली मूँछें आई, फिर लुंगी बनियान, जो सदाबहार ड्रेस कोड था बाबू भुईंलोटन सिंह का। चेहरे पर वही पुरानी सलज्ज मुस्कान।

-तो आज तो छा गए गुरु! पूरे कॉलेज में हल्ला है कि सुहाना ने बाबू भुईंलोटन को रोज डे पर रोज देने का हिंट दिया। लेकिन... 

-क्या सर आप भी! इ सब ना हमको मालूम है, ना पसंद है... 

-लेकिन किसी को आप पसंद हो तो 

-फिर सर आप खींच रहे हैं। - गंभीर स्वर में बोले थे - सर, हम यहां पढ़ने आए हैं। बाबू जी रात भर जाग कर कभी खेत कभी आम का बगीचा जोगते हैं  तब जा कर... 

-अरे आप तो सीरियस हो गए  भाई! तो आपके नाम के बारे में बताइए, कौन रखा है ऐसा दबंग नाम? 

अपनी पुरानी शर्मीली मुद्रा में लौट आए थे  भुईलोटन - अरे सर! गांव में तो ऐसे ही नाम रखे जाते हैं। खासतौर पर हम लोगों के। हालांकि अब  लोग फैशनेबल नाम भी रखने लगे हैं। माई ने छठी मैया से मांगा था हमको। गांव से घाट तक गई थी लोटते हुए, तभी पड़ गया ये नाम और बचपन में किसी चीज के लिए जिद करते थे  हम तो भुईयां (जमीन) पर लोट लोट कर तो गांव वालों ने भी कह दिया कि यह तो सही में भुईंलोटन है। - चेहरा लाल भभूका हो रहा। कनखियों से मेरी तरफ देख भी रहे थे। आशंका थी उन्हें कि अब मैं बुक्का फाड़ कर हंस पड़ूँगा और कुछ और लड़कों को बुला लूंगा पर कुछ ऐसा करूण स्वर था उनका कि मेरी इच्छा रहते हुए भी यह नहीं कर पाया। 

मुंह अंधेरे नींद खुल गई थी अजीबोगरीब आवाज से जैसे कोई जानवर डकर रहा हो या कोई बड़ा सा सांप फुफकार रहा हो। यह आवाज पास वाले कमरे से आ रही थी। कमरा तो बाबू भुईंलोटन सिंह का है। कहीं  कुछ हो तो नहीं रहा है.. तबीयत वगैरह... खिड़की से झांक कर देखा - चौकी  पर गमछाधारी भुईंलोटन विराजमान थे। खिड़की पर लाल लंगोट सूख रही थी। लगता है स्नान कर चुके थे, कंपकंपी मुझे छूट रही थी। इतनी सुबह और स्नान... अनुलोम-विलोम चल रहा था। रामदेव बाबा को मन ही मन चुनी हुई गालियां देते हुए आवाज लगाई।

- क्या कर रहे हैं महाराज? पूरे हॉस्टल की नींद खराब करने में लगे हैं? 

-अरे सर! वेरी सॉरी सर! आपकी नींद खुल गई? कल से उधर ग्राउंड में चले जाएंगे।

- तो योगा में पहले से इंटरेस्ट है कि सुहाना के बारे में जान कर - सुबह की चुटकी थी। 

-नहीं सर गांवादेवती  की कसम! हम तो बहुत दिन से करते हैं। सुहाना जी भी योग करती है क्या? - बाल सुलभ उत्सुकता से पूछा।

-करती है मतलब? पूरे कॉलेज की योगा गुरु है। जल्दी ही आपको भी सिखाएंगी। जब से कॉलेज के करिकुलम में शामिल हुआ है। जान कोयला कर दिया। एक दिन सप्ताह में सुबह सुबह उठना पड़ता है। 

-अच्छा है सर, कभी सूर्जोदय भी देखना चाहिए चिरई चुनमुन के साथ। 

-अच्छा बेट्टा चुटकी? 

जीभ काटते हुए बोला था - नहीं सर, वह तो ऐसे ही मुंह से निकल गया।



-कोई बात नहीं। हम लोग सूर्जोदय (उसकी नकल में) देखने नहीं जाते। सुहाना को देखने जाते हैं। मस्त तोड़ मरोड़ करती है टाइट ड्रेस में। मजा ही आ जाता है । 

उसकी मुद्रा से लग रहा था कि उसे यह बात पसंद नहीं आई और जोर-जोर से फूं फां करने लगे। 

-अरे भाई, कुछ कल के लिए भी बचा कर रखो। सुहाना के साथ फूं फां करने का मौका मिल जाए। 

पिछले कुछ सालों में हमारा कॉलेज एक अजीबोगरीब जगह में बदल गया था। कहते थे कि सब कुछ नया कर देना है। अजब गजब विषयों पर सेमिनार होते थे। मसलन ऋग्वेद में हेलीकॉप्टर थे, योग करें ज्यादा मार्क्स लायें, इतिहास की मर्मांतक भूलें प्राकृतिक गोबर चिकित्सा के लाभ, गांधी और गोडसे में ज्यादा महान कौन- वगैरह-वगैरह और सप्ताह में एक  दिन योगा कंपलसरी। मतलब  स्पेशल पेपर जिसका मार्क्स भी जुड़ता था  तो कौन बेवकूफ होगा जो छोड़ेगा? योगा टीचर तकरीबन पूरे कपड़े खोलकर योगा कराते और दिल खोल कर मार्क्स देते थे। पर सबसे ज्यादा मार्क्स तो सुहाना को ही लाना था और लाती भी थी। 

-चलिए सर तेजी से, योगा क्लास शुरु हो जाएगा - उनींदी आंखों से देखा बाबू भुईंलोटन तेजी से पीछे-पीछे आ रहे थे। हर बार की तरह योगा टीचर ने टेढ़ी निगाह से देखा और फिर घड़ी देखी। यह उनकी शैली थी हमें बताने कि आज फिर लेट हो गए  बच्चू! पर चेहरे पर एक असीम शांति थी, क्रोध नहीं था। कुछ तो योगा का अभ्यास रहा होगा और कुछ नौकरी की भी चिंता रही होगी कि मरदूद बिदक गए तो स्टूडेंट घट जाएंगे क्लास में और फिर संकट..आखिर कॉन्ट्रैक्ट वाली नौकरी का क्या भरोसा!  सुहाना हमेशा की तरह गुरु जी (योगा टीचर जोर डालते थे कि इसी नाम से उन्हें पुकारा जाए) के पास पद्मासन में बैठी थी। डेस्काॅलर हो कर भी कैसे टाइम से पहुंच जाती थी सुहाना, हम तो हॉस्टल में रह कर भी नहीं पहुंच पाते थे। हर आसन के बारे में गुरु जी बताते और सुहाना डेमो देती थी। यह वही अदा थी जिसके बारे में हम कहते थे कि मस्त तोड़ मरोड़ करती है टाइट ड्रेस में। कनखियों से बाबू भुईंलोटन को देखा, मुग्ध भाव से सुहाना को देखे जा रहे थे। लेकिन इस मुग्धता में  थोड़ा सात्विक भाव था। पवित्रता की उजास थी। हमारी तरह 'वैसा' वाला भाव नहीं था। आज गुरु जी मयूरासन सिखा रहे थे। हमारे कानों में कोई भी सैद्धांतिक बात जा नहीं रही थी। सारी इंद्रियां मिल कर आंख में बदल गई थी- मोर की तरह सुहाना -  किसी ने पीछे से मोर की तरह आवाज भी निकाली - क्वें - क्वें -  सब हंसने लगे। गुरु जी नाराज हो गए। सुहाना हंसने लगी तो मयूरासन  ध्वस्त हो गया।

- आप लोग... मतलब कि होता तो है नहीं आप लोग से। सबको डिस्टर्ब करते हैं। 

अचानक सबकी नजर बाबू भुईंलोटन की तरफ चली गई। वह अभी भी मयूरासन में थे - एकदम परफेक्ट...। कहीं खो गए हो जैसे- इस बाहरी गुलगपाड़े से एकदम बेगाने से - बहुत पुराने अभ्यासी लग रहे थे। गुरु जी की आंखें चमकने लगी - वाह शाबाश! यह होता है  ध्यान - शरीर और मन दोनों का योग। काफी देर से इसी आसन में थे बाबू भुईंलोटन। अचानक उन्हें लगा कि शायद सभी उन्हें ही देख रहे हैं। बस ध्यान भंग हो गया और जब दबी आवाज में हमने कहा - देखिएगा, कहीं मोर की तरह उड़ने मत लगिएगा । धप से बैठ गए बाबू भुईंलोटन। चारों तरफ देखा - सभी सचमुच उन्हें ही देख रहे थे, सुहाना भी। शर्म से चेहरा लाल हो गया - गुरु जी, मेरा ध्यान नहीं था कि आसन का समय  समाप्त हो गया है  इसलिए...।

-अरे, अरे कोई बात नहीं। हम तो सबको कह रहे थे कि ध्यान ऐसा होना चाहिए। सुहाना! देखना तुम्हारा प्रतिद्वंद्वी आ गया है। - कौन आ गया परती क्या ?- सुहाना  ने मुंह बना कर कहा। 

-मतलब... कंपीटीटर... 

दूसरे दिन से डेमो वाले चबूतरे पर दो  लोग बैठने लगे- सुहाना और बाबू भुईंलोटन। हालांकि टाईट ड्रेस में भुईंलोटन अजीब से दिखते थे - सींक सलाई कद काठी पर नुकीली बड़ी मूंछें - और तिस पर टाइट स्किन फिट ड्रेस...।

-सर! इसमें बहुत परेशानी है। असल में आदत है लंगोट पहन कर योग करने की। 

-अब इस शानदार ड्रेस में तो आप नहीं आ पाएंगे ना यहां। सुहाना और दूसरी लड़कियां भी रहती हैं वहाँ। 

-जी... जी... जी वह तो है।-कान लाल हो गए थे उनके। शायद वह दृश्य आंखों के सामने आ गया होगा, सुहाना के बिल्कुल पास वह सिर्फ लाल लंगोट में बैठे हैं - रखवाला प्रतिपाला /वह लाल लंगोटी वाला - बाबू जी का सुबह-सुबह बजरंगबली का नाम लेते हुए खेतों पर जाने का दृश्य भी उनकी आंखों के सामने आ गया था। 

बड़ी मुश्किल से एडमिशन पाने में सफल हुए थे इस कॉलेज में। कॉलेज तो तकनीकी था और योग की पढ़ाई से भी सीधा संबंध नहीं था इसका लेकिन यह अनिवार्य कर दिया गया था। लागू करने वालों के भी अपने तर्क थे - पढ़ाई कोई भी हो, ध्यान तो चाहिए। मान लीजिए बिजली के तारों में आपने पॉजिटिव की जगह नेगेटिव जोड़ दिया - कारण ध्यान भटक गया था ।  एक समय हमारा देश ध्यान के बल पर ही तो विश्व गुरु था। 

हम कुछ कहते तो हमें चुप करा दिया जाता - तुम लोग क्या आईआईटी और इसरो वालों से भी ज्यादा होशियार हो? रॉकेट लॉन्चिंग तक पर नारियल फोड़ा जाता है। पूजा की जाती है क्यों? इतने बड़े बड़े साइंटिस्ट क्या बेवकूफ हैं? तुम लोग बनोगे तो मामूली फिटर और इलेक्ट्रीशियन और नखरे... चुपचाप योगा क्लास में जाओ। 

सब कुछ चुपचाप चलने कहां दिया गया। अखबार में छपी थी खबर कुछ इस तरह - योग के कारण ही भारत विश्वगुरु बना था। फिर से बन सकता है। अल्पसंख्यक लड़की ने योग में पाया 96 परसेंट मार्क्स। सिखाती है योगा भी। 

हम अखबार पढ़ कर बधाई देने की सोच ही रहे थे कि कॉलेज के काॅरिडोर में भुईंलोटन और सुहाना नजर आए। भुईंलोटन की हाथ में अखबार था और चेहरे पर सलज्ज मुस्कान -  पैर के अंगूठे से जमीन कुरेद रहे थे। जैसे पुरानी फिल्मों की हीरोइनें करती थी। सुहाना के चेहरे पर गुस्सा था- भाड़ में गई बधाई! यह अखबार वाले अब बंद करवाएंगे पढ़ाई मेरी। 

-क्यों? 

-अरे जान को बवाल लग गया अब। ऐसे ही कल मौलाना साहब अब्बा को समझा कर गए थे और अब यह.. कंपलसरी पेपर है तो पढ़ना तो पड़ेगा ही ना। अब इसमें भी मजहब का अड़ंगा लगाएंगे तो कैसे चलेगा? 

-मजहब मतलब? 

-अरे बाबू भुईंलोटन! खबर ठीक से नहीं पढ़े? एक अल्पसंख्यक लड़की हो कर भी मतलब नहीं समझे? मैं.. मैं.. गया आपका धरम। कितनी बार मेरी बोतल से पानी पी लिया आपने... सुहाना चुहल के मूड में आ गई थी। 

बाबू भुईलोटन अखबार उसके हाथों में थमा कर हन-हन करते हुए हॉस्टल की तरफ चले गए! शाम तक कोई खोज खबर उनकी नहीं थी। क्लास में भी नहीं आए। हम लोगों का दल शाम में निरीक्षण परीक्षण के लिए निकला - 

-काहे बाबू भुईंलोटन! सांझ  के वेला में भी चद्दर ओढ़ कर पड़े हैं? आज क्लास भी नहीं किए? सुहाना से झगड़ा हुआ क्या? 

-अरे नहीं सर! सुहाना से क्या मतलब हमारा। उ तो अल्पसंख्यक है

- तो क्या हुआ? 

-नहीं। मतलब आप लोग भी तो बताये नहीं ना पहले 

-तो मन में जो नरम कोना बना था, वह कड़ा हो गया क्या? 

-अरे नहीं सर। कोना उना नहीं। बस ऐसे ही... 

-ओहो! जस्ट फ्रेंड्स! 

दूसरे दिन भुईंलोटन योगा क्लास से भी नदारद। सुहाना डेमो चबूतरे पर अकेली थी। गुरु जी भी आश्चर्यचकित! आज तक ऐसा हुआ नहीं था। एक लड़के को भेजा गया - उनको फीवर आ गया। आज नहीं आएंगे। 

-ठीक है आप लोग शुरू कीजिए... और शुरू करने के पहले ही तो हंगामा शुरू हो गया। गेट पर बीस के आस पास मोटरसाइकिलें थी। नौजवान थे- उत्तेजित - गले में एक ही रंग का उत्तरीय था। कोई कोई माथे पर लपेटे था। गेट पर खड़-खड़  करके - बंद करो। बंद करो। धर्म के साथ खिलवाड़ बंद करो। 

कॉलेज के लड़के भी बाहर निकल आए। गेट पर जमा होने लगे। प्रिंसिपल भागते हुए आए - शांति के साथ बात कीजिए। क्या बात है? 

गुटखा थूक कर एक लड़का सामने आया - आपके कॉलेज में धर्म के साथ अन्याय हो रहा है। हिंदू को छेड़िए मत नहीं तो छोड़ेगा नहीं। उसके हाथ में कल का अखबार था, प्रिंसिपल की नाक के सामने  लहरा कर बोला था। 

-अरे भाई आखिर हुआ क्या? 

-अखबार नहीं पढ़े थे कल का? सही कहते हो भाई! आजकल का प्रोफेसर लोग अखबारों नहीं पढ़ता है। 

-तभिए न शिक्छा  बेवस्था जा रहा है भीतरे - 

-आपके कॉलेज में अधर्म हो रहा है। एक मुस्लिम लड़की को योगा गुरु बना रखा है। हम यह बर्दाश्त नहीं करेंगे। बोलो जोर से - अपने धर्म का ऐसा अपमान! 

कोई कुछ नहीं बोला - अबे बोल! नहीं सहेगा हिंदू नौजवान! 

लगता है पहले से बता कर नहीं लाया गया था कि बोलना क्या है। 

-अरे भाई! - जब तक प्रिंसिपल साहब बताना - समझाना शुरू करते खड़ खड़ करता गेट खुल गया था और मोटरसाइकिलें कैंपस में प्रवेश कर गई थी। हम लोग तैयार नहीं थे। सभी हॉस्टलों में तैयारी करने दौड़ पड़े। तब तक मोटरसाइकिलों ने सुहाना को पहचान कर घेर लिया था। उसके चारों तरफ मोटरसाइकिलें घूमने लगी। सुहाना को लगा चक्कर खा कर गिर जाएगी। प्रिंसिपल साहब अपने चेंबर की ओर दौड़े- संभवत पुलिस को इत्तला करने - हम लोग भी चैन, हॉकी स्टिक ले कर आ ही रहे थे कि सब ने देखा एक दुबली पतली काया, नुकीली मूंछें फड़काती हुई सुहाना के सामने आ कर खड़ी हो गई। उसके पीछे पानी में भीगी कबूतरी की तरह कांप रही थी सुहाना।

- कोई आगे बढ़ा तो यही चीर देंगे। - हाथ में एक दाव था। आंखें लाल करके गले के पूरे जोर से चीखा था हमारा बाबू भुईंलोटन सिंह। तब तक तो सौ के आसपास हम भी पहुंच गए। जिसको जो मिला उसी को हाथ में ले कर - मोटर साइकिल की चैन है, बघनखा, हॉकी स्टिकें, क्रिकेट का बल्ला - मोटरसाइकिल वालों ने पलायन करने में ही भलाई समझी। हम लोगों ने पीछे पीछे दौड़ते हुए कुछ दूर तक पीछा भी किया उनका। दूसरे दिन अखबारों में वही तस्वीर छपी - हाथ में दाव और यह युद्ध की मुद्रा में बाबू भुईंलोटन और पीछे डरी सहमी सुहाना। किसी छात्र ने मोबाइल से यह तस्वीर ले ली थी और अखबारों को दे दिया। एकदम दक्षिण भारतीय फिल्मों का सदस्य था। इस दृश्य का असर कई तरह से हुआ। हमें बाबू भी नूतन सिंह को छेड़ने का नया मसाला मिल गया। उसी स्टाइल में लूंगी को आधा लपेट कर हम भी - कोई आ गया तो चीर देंगे, माइंड इट - करने लगे। भुईंलोटन  हमेशा की तरह शर्मा जाते। 

क्या सर आप लोग भी! 

-अरे आप तो छा गए गुरु! 

भुईंलोटन के बाबू जी को भी खबर मिल गई किसी के मार्फत- का जरूरत है ज्यादा हीरो बनने का? गलत का बोल रहा था वो। हम लोगों के धरम का चीज है यह योग ध्यान। उन लोगों को क्या मतलब इ सबसे? अपना नमाज उमाज पढ़े।

बाबू भुईंलोटन समझाने की कोशिश करते  कमजोर आवाज में - अरे! योग ध्यान किसी धर्म का चीज थोड़े हैं? स्वास्थ्य ठीक रहता है। 

-मुर्गी अंडा खा कर उ लोग वैसे ही तंदुरुस्त रहता है। तुम पढ़ने गए हो कि यह सब करने? तीसरे किस्म का असर पड़ा सुहाना के जीवन पर। वह सबसे खराब असर था। किसम किसम के मौलवी मौलाना बड़े बुजुर्गों ने आ कर सुहाना के अब्बा को समझाइश दी जिसका लुबोलुआब था कि सुहाना की पढ़ाई वढ़ाई छुड़वा कर उसका निकाह कर दिया जाए और फिलहाल तो यह योगा वगैरह छोड़ ही दिया जाए। सुहाना की अम्मा ने कहना चाहा - योगा से नुकसान क्या है? उन्हें अलबत्ता फायदा ही महसूस हो रहा है। लेकिन निकाह वाली बात आते ही वह भी खामोश हो गई। नतीजतन सुहाना के अब्बा जिन्होंने कई दिनों तक इन बिन मांगी सलाहों को नजरअंदाज किया था, आखिरकार तो इसी समाज में रहना था। दो दिन, तीन दिन तो भुईंलोटन डेमो चबूतरे पर अकेले के आसनों का प्रदर्शन करते रहे। मगर उनकी उम्मीद भरी नज़रें उस खाली जगह को देखा करती जहाँ सुहाना बैठती थी। जिस ध्यान के लिए उनकी तारीफ गुरु जी ने भी की थी वह भंग हो चुका था। ताड़ासन को भुजंगासन सुनने लगे थे और उसी के अनुसार डेमो भी.. सभी हंस पड़ते, लेकिन उन्हें कुछ जैसे फर्क ही नहीं पड़ रहा था। 

-ठक - ठक - दरवाजे पर कोई था। फिर नुकीली मूछें आई और लुंगी बनियान।

-कहां रहते हैं आजकल? एकदम दर्शन दुर्लभ हो गए। एग्जाम नजदीक है तो थोड़ा ध्यान दीजिए।

- सर कोशिश तो कर रहा हूं। 

-कोशिश तो नजर नहीं आ रही है। सुहानी रात अभी तक नहीं ढली है क्या? 

-क्या सर...। देख कर अच्छा लगा कि वही पुरानी लाज भरी मुस्कान चेहरे पर लौट आई थी। वरना आंखों में एक खालीपन और चेहरे पर उदासी ही दिखती थी उन दिनों। 

-बड़े बूढ़े ठीक कहते है सर। तुरक तोता खरगोश /कभी न मानें पोस 

- मतलब? - प्रोजेक्ट से सर उठा कर पूछा था मैंने। 

-तुरंक मतलब यह लोग - समझ रहे हैं सर? तोता खरगोश इ सब कभी पोस नहीं मानता है। थोड़ा छोड़िये  कि बस फुर्र...।

-काहे आजकल कोई खोज खबर नहीं है क्या सुहाना  की? सुनने में आया है कि बड़ा प्रेशर है उसके फैमिली पर निकाह का। - तो मरे जा कर!  हमको क्या? 

इस किस्म का दबा हुआ क्रोध! भुईंलोटन के लिए स्वाभाविक नहीं था। 

-अरे समझिए उसकी सिचुएशन! जितना रेजिस्ट कर सकती थी  उसने किया। उनके यहां समाज का प्रेशर बहुत ज्यादा रहता है।



-हुँह! - कह कर चले गए। हुँह की गुत्थी सुलझने के बजाय और उलझती जा रही थी। सुहाना ने कॉलेज आना बंद कर दिया था उसके अटेंडेंस का क्या होगा। वैसे तो चार पांच दिन बाद गर्मी की छुट्टियां शुरु हो रही थी। हॉस्टल वाले छुट्टियों में घर जाना शुरू कर चुके थे। प्रोजेक्ट के सिलसिले में मैं रुका हुआ था। 

फिर ठक-ठक- अब ठक ठक का अंदाज़ पहचान गया था - आइए बाबू भुईंलोटन! आपको दरवाजा खटखटा के आने की जरूरत नहीं है।

नुकीली मूँछों में थोड़ी ताब कम थी। चेहरा दुबला तो था पर अब कुछ ज्यादा पीला लग रहा था पर शर्मीलापन बरकरार था। - नहीं सर, आखिर सीनियर - जूनियर भी तो... बहुत देर इधर-उधर देखते रहे। लग रहा था कि कुछ जानना चाहते हैं 

-जो कहना चाहते हैं कहिए। 

-सर! उ सुहाना जी का नंबर होगा?.. बहुत धीमी आवाज में बोले।

- नंबर तो है लेकिन कोई फायदा नहीं है। स्विच ऑफ बता रहा है। अटेंडेंस के लिए फोन किए थे हम भी। लीजिए नंबर शायद आपका लक काम कर जाए। बात हो तो बता दीजिएगा कि कम से कम कोई एप्लीकेशन तो दे दे। वरना एग्जाम में कैसे अपीयर होगी। 

गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही हॉस्टल खाली हो गया। लेकिन बाबू भुईंलोटन जमे रहे जबकि इनका घर ज्यादा दूर भी नहीं था। मेस भी बंद हो चुका था। छुट्टियों के तुरंत बाद परीक्षाएं भी होनी थी। दस दिन के लिए मैं भी जा रहा था। 

-तब बाबू भुईलोटन घर से संन्यास ले लिए क्या? 

-नहीं, सर जाएंगे, घर में पढ़ाई नहीं हो पाता है। बाबू जी के जगह बगीचा जोगने जाना पड़ता है, लेकिन जाएंगे जल्दी। जरूरी काम है, कर लें तब...।

परीक्षा के पहले ही दिन बुर्के में एक लड़की को कॉलेज गेट में घुसते देख कर  सभी चौंक पड़े थे। कौन, क्या, कैसे चल ही रहा था कि बाबू भुईंलोटन ने लजीले स्वर में सूचना दी - सुहाना जी हैं। 

हम लोगों ने सुहाना को घेरना चाहा, लेकिन वह कट कर निकल गई। हमें यकीन नहीं हो रहा था कि सुहाना थी लेकिन पेपर खत्म होते ही सुहाना तेजी से चलती हुई निकल गई। किसी से ना बात न चीत। बाबू भुईंलोटन ने कॉरिडोर में बात करने की कोशिश की, लेकिन नजरअंदाज कर सीधे... गेट पर ही मोटरसाइकिल लिए एक लड़का इंतजार कर रहा था। बैठ कर बस... हम अभी आश्चर्य में डूबे हुए ही थे कि सुहाना को परीक्षा के बारे में किसने... सबकी निगाहें बाबू भुईंलोटन की ओर उठ गई। वह तो ऐसे निगाहें चुरा रहे थे  जैसे कोई अपराध किया हो। सिर झुका कर धीमे से बोला - हां हम गए थे, बताने।

-गए थे मतलब? 

-मतलब फोन नहीं लगा तो लगा परीक्षा छूट जाएगा। 

- मोहल्ला से रगेदा गया वह भी तो बताइए - यह इमरान था। 

-क्या? - सभी सम्मिलित रूप में चौके थे। 

-हां, घर का चक्कर लगा रहे थे कई दिन से। तो एक दिन मोहल्ले के लड़कों ने घेर लिया। फिर सुहाना के अब्बा आए, बातें सुन ली और सख्त हिदायत दी कि फिर इधर नज़र न आएँ।  निकाह होने वाला है सुहाना का। बड़े लोग हैं। बड़ी मुश्किल से रिश्ता मिला है । फिर लड़कों ने इन्हें बाइज्जत रगेद दिया मोहल्ले से। 

-इतनी बात तुम्हें पता थी तो तुमने हमें बताया क्यों नहीं इमरान तुमने? 

- हमें लगा इन्होंने बताया होगा...।

बाबू भुईंलोटन नाखून से फर्श कुरेद रहे थे अब भी। 

-तो इसी जरूरी काम के लिए आप रूके थे हॉस्टल में? 

-नहीं मतलब खबर तो देना चाहिए था ना एग्जाम का...।

-एग्जाम देने वाली को कोई फिक्र ही नहीं, सब का जिम्मा आप ही लिए हैं? निकाह में वलीमा के दावत में भी जाइएगा क्या? तेजी से अपने कमरे की तरफ चले गए बाबू भुईंलोटन। कटे कटे रहने लगे, क्लास भी ठीक से अटेंड नहीं करते, लेकिन योगा क्लास नहीं छोड़ते थे कभी भी। हॉस्टल की छत पर घंटों बिताते। 

-क्या बाबू! छत पर क्या करते रहते हैं? कहीं दूसरे तरह की आदत तो नहीं लग गई? 

-मतलब सर, हम समझे नहीं। 

-इस उमर में जो सब होता है। अपना हाथ जगन्नाथ टाइप । क्या छुपा रहे हैं? 

-कुछ नहीं.. शरमाते हुए बोले।। 

-दिखाइए। दिखाइए भी- एक बायनोक्यूलर था। 

-क्या देखते हैं छत पर जा कर? आसपास के घरों में झाँकते हैं क्या? 

जीभ  काट कर- अरे नहीं सर! तालाब के किनारे बहुत सारी चिड़िया आती है न वही सब।

-अच्छा-अच्छा बर्डवाचिंग। 

लेकिन असली बात बताई अभिनव ने - सर हॉस्टल के पीछे जो तालाब है ना वहां पर बहुत लव बर्ड्स आते हैं। अपने बाबू भुईंलोटन बाइनोक्यूलर से देख देख कर कभी खुश होते हैं और कभी-कभी तो टसुए भी बहाते हैं। 

-अच्छा! गहरे अचरज में डूब गए थे हम और दूसरी बार गहरा अचरज तब हुआ जब इमरान दौड़ता हुआ आया- सर! जल्दी चलिए। बाबू भुईंलोटन बुरी तरह पिटा गये हैं। माथे पर पट्टी बंधवा कर आ रहे हैं। पूरा हॉस्टल कमरे से बाहर निकल आया। किसी जंग से लौटे घायल सिपाही की तरफ गेट से प्रवेश कर रहे थे। सिर पर पट्टी, देह हाथ में भी चोट के निशान। हाथ में वही आदिम अस्त्र- दाव, जिससे बबूल और नीम के दातुन काटते थे वह और एक बार सुहाना की रक्षा के लिए उठाया था। आज फिर...।

-क्या हुआ? 

-कुछ नहीं सर, थोड़ी झड़प हो गई थी लड़कों से। 

कमरे में घुस कर बंद कर लिया था दरवाजा। पूरा वाकया बयान किया एक लड़के ने जो चश्मदीद था।

- सर! पार्क में दाव ले कर यह बैठे हुए थे। वैलेंटाइन डे था तो बहुत सारे लड़के लड़कियां मौजूद थे। तभी मोटरसाइकिलों पर झंडे फहराते, गले में उत्तरीय लपेटे - लड़के आए थे- अपना संस्कार, संस्कृति सब भूल गए हो?  आज मातृ पितृ पूजन दिवस है और मां-बाप को धोखा दे कर यहां यह सब कर रहे हो? जब लड़कियां डर कर चीखने चिल्लाने लगीं तो बाबू भुईंलोटन दाव ले कर कूद पड़े और ललकारा - तुम लोग क्या हो बे! ठेकेदार हो संस्कृति के? प्यार के दुश्मन! आओ सब को देख लेंगे।

तभी किसी ने डंडे से पीछे से सिर पर मार दिया। कोई चिल्लाया था-अरे इ तो वही है जो कॉलेज में भी मियाँइन को बचाने आया था।

थूरो  साले को  - सब मिल कर पीटने लगे थे। हम अकेले क्या करते? आप लोग को फोन लगाया तो लगा नहीं। फिर मरहम पट्टी करवाए। 

यह बाबू भुईलोटन का आखरी दरस-परस था। इसके बाद कॉलेज खत्म हो गए। प्लेसमेंट वगैरह के मकड़जाल में फँसते-छूटते एक कामचलाऊ पैकेज वाली नौकरी मिल गई दूसरे शहर में। जबरदस्त पार्टी दी गई। आखिर इस समय में एक अदद नौकरी पा लेना किसी अजूबे से कम नहीं था। दोबारा जब इस शहर में लौटना हुआ काम के सिलसिले में तो एक अजूबा इंतजार कर रहा था जैसे। लॉकडाउन में मेरे सहित पूरा शहर फँस चुका था। होटल के कमरे से सुनसान सड़कों को ताक रहा था कि - अरे! यह तो वही है! 

चिलचिलाती धूप में एक सींक सलाई काया, नुकीली मूँछें, धूल भरे बाल जैसे किसी अंधड़ से गुजर कर आया हो, गंदे कपड़े, गले में लटका एक बायनाकूलर- जरूर वही है! सड़क के किनारे-किनारे काल्पनिक गाड़ियों से बचता- बचाता, चलता हुआ चला जा रहा है। होटल के कमरे की खिड़की के नीचे पहुंचते ही-ऐ  बाबू भुईंलोटन सिंह! - जोर से आवाज लगाई। एक क्षण को ऊपर देखा। फिर हनहनाता हुआ वह वापस जाने लगा। 

तेजी से नीचे उतरा लेकिन तब तक वह गायब हो चुका था। होटल का वेटर लड़का गेट पर खड़ा हंस रहा था जैसे कोई चुटकुला उधर से गुजरा हो।

-अरे भाई! एक आदमी गया इधर से देखा तुमने? 

-कौन? वो भुईंलोटन मियाँ? अरे सर! सब जानते हैं उसे। लॉकडाउन में और किसकी जुर्रत है  सड़क पर घूमने की और सर आपको भी आज शाम तक खाली करना पड़ेगा होटल कल से बंद हो जाएगा। 

-लेकिन... वह भुईंलोटन तो ठीक है लेकिन मियाँ? 

- जी यही तो नाम बताता है सर! वह जो पुराना मकान दिख रहा है ना अधगिरा सा हसन मंजिल उसी के छत पर एक बरसाती में रहता है कई सालों से। छत पर बैठ कर दूरबीन से इधर उधर देखता रहता है। कई बार पिट भी चुका है लेकिन अब लोग जान गए हैं कि इसका एकाध ईटा घसक चुका है। 

-अच्छा! वो इमरान तो इधर ही रहता था न? 

-कौन इमरान? 

-अरे पढ़ता था हमारे साथ। वेल्डिंग का डिप्लोमा..।

-ओ इमरान भाई? उधर गली के मोड़ पर ही तो वेल्डिंग दुकान है। लेकिन अभी तो बंद है लाॅकडाउन में। 

शाम को गलियों के अंदर चलते हुए इमरान की वेल्डिंग शॉप पर पहुंचा था। शटर गिरा था लेकिन घर उसी के पीछे था। इमरान लिपट गया देखते ही।  बड़ी खातिरदारी की। इसरार कर के सामान भी ले आया। छत पर एक कमरा था। उसी में टिका दिया कहा-जब तक रहना है रहो। बाबू भुईंलोटन की बाकी कहानी उसी से सुन कर जोड़ी गई है...।

पढ़ाई लिखाई से जी उचट  गया था उनका। पास नहीं कर पाया, दो-तीन बार में भी नहीं तो एनएफटी मिल गया। यानी नॉट फिट फॉर टेक्निकल एजुकेशन। हॉस्टल से निकाला गया तो यहां आकर हसन मंजिल में बरसाती दिलवा दी उसको मेरी जमानत पर। दे नहीं रहे थे तो हमने झूठ मूठ कह दिया कि हमारी कौम का ही है। थोड़ा सा खलल पड़ गया है दिमाग में पढ़ाई की वजह से। दिन दिन भर छत पर बैठ कर बायनाकूलर से देखता रहता है इधर उधर। एक दिन भागता हुआ आया और बोला, - मैंने देखा उसे 

-किसे? 

-वही सुहाना जी। एक मकान की छत पर ही योगा कर रही थी। तुम्हें तो पता ही है कि बहुत सारे लोग लॉकडाउन में छतों पर ही योगा करते हैं, वाॅक करते हैं। फिर खुश खुश रहने लगा- रोज देखता हूं। वह भी मुझे देखती है लेकिन खुश नहीं दिखती। उदास सी लगती है। लगता है उसका शौहर ठीक नहीं मिला। 

-सचमुच ऐसा है क्या? 

- पता नहीं यार। निकाह के बाद उसका शौहर उसे कहीं सऊदिया वगैरह कहीं ले गया, कोई खबर नहीं है हमें। एक दिन हाँफता हुआ आया और लगा बिलख बिलख कर रोने। - जानते थे हम! उसका शौहर उसकी टाँग जरूर काट डालेगा। 

-क्या बक रहे हो? 

-हाँ! आज देखा हमने।  योगा करते हुए उसका बैलेंस बिगड़ गया और गिर गई वह । पता है  एक टाँग उसकी नकली है। खुल गई थी। उसके शौहर ने कहा था, यह सब मुझे पसंद नहीं है- सूर्य नमस्कार वगैरह - हम लोगो का तो सर सिर्फ एक अल्लाह के आगे झुकता है। आगे से यह सब देखा तो टाँग काट डालूंगा। मुझे खुद बताया था सुहाना ने। 

-उसकी बात होती थी सुहाना से निकाह के बाद भी? 

यह भुईंलोटन तो हमें रोज नए नए अचरज में डालता रहता है। 

-पता नहीं, लगता तो नहीं है। फिर एक दिन-

 - इमरान भाई! इमरान भाई! बर्बाद हो गई मेरी जिंदगी। अब हम जी के क्या करेंगे? इमरान मेरे भाई! 

-क्या हुआ, क्या बकवास कर रहे हो,? 

-हां सुहाना नहीं रही । हमने खुद देखा। आज ही  ले गए उसे। कई दिनों से छत पर दिख नहीं रही थी। कितनी तकलीफ हुई होगी न? - दम घुट रहा होगा उसका- प्लास्टिक के बैग में लपेट कर ले गए एंबुलेंस में - मैं पीछे-पीछे दौड़ा भी एंबुलेंस के पीछे कुछ दूर तक। लेकिन पुलिस ने भगा दिया।

- लेकिन तूने पहचाना कैसे? आजकल तो रात बिरात हर घर से एंबुलेंस की चीखने की आवाज आती रहती है। अभी बवा में। - नहीं मैंने खुद देखा एंबुलेंस की छत पर रखी थी न... वही टाँग...।

ढह गया था भुईंलोटन। 

-लेकिन मैंने भी उसे खाली हाथ जाने नहीं दिया।.. जाते हुए एम्बुलेंस पर फेंक दिया था एक लाल गुलाब। मिल गया होगा न उसे? वो... आज रोज़ डे था न.. शर्माते हुए बोले थे बाबू भुईंलोटन सिंह...।


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


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