आनन्द बहादुर की कहानी 'गुस्ताख'
![]() |
| आनन्द बहादुर |
जीवन में हर व्यक्ति की अपनी विशिष्ट भूमिका होती है और वह अपने तरीके से उसका निर्वहन भी करता है। उस विशिष्ट व्यक्ति की अपनी एक जगह होती है जिसे सिर्फ और सिर्फ वही भरता है। कोई और उस जगह को भर नहीं पाता। गुस्ताख़ कहानी में आनन्द बहादुर एक ऐसे पात्र को सामने ले कर आते हैं जो आवाजों की नकल हू ब हू उतारा करता है। दो मित्रों के बीच की दूरी को अपनी नकली आवाज से न केवल पाटता है बल्कि दोनों के जीवन के उन रहस्यों को भी जान लेता है जो दोनों के दिलों दिमाग में हैं। यह उन दिनों की बात है जब घरों में लैंड लाइन फोन हुआ करते थे और जिसे एक अलग अंदाज में डायल किया जाता था। अब तो स्मार्टफोन का जमाना है जिसमें ट्रू कालर कॉल करने वाले व्यक्ति के बारे में सब कुछ बता देता है। यह कहानी दो मित्रों की उस मनोस्थिति की बात करते हुए भी उस व्यक्ति की उपस्थिति को करीने से दर्ज करती है जो सिर्फ आवाजों की नकल किया करता था। आज आनन्द बहादुर का जन्म दिन है। उन्हें जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए इस अवसर पर आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं आनन्द बहादुर की कहानी 'गुस्ताख'।
कहानी
'गुस्ताख'
आनन्द बहादुर
उन दिनों फोन करने के अलग ही मजे हुआ करते थे। तब घरों में डब्बेनुमा फोन हुआ करते थे जो कोई नम्बर डिस्प्ले नहीं करते थे। इससे हमें मौका मिल जाता था कि हम एक-दूसरे की नकल कर एक दूसरे को चौंका सकें, और सचमुच, हम इसका बहुत मजा उठाते भी थे। इसके चलते सभी मित्रों के बीच लगातार एक छेड़छाड़ जैसी चलती रहती। कभी न कभी, कोई न कोई दोस्त इसका शिकार बनता रहता, ओर फिर, इसके किस्से चटखारे ले ले कर हफ्तों सुने-सुनाए जाते।
इस काम में वह नकलची बिल्कुल जीनियस ही था। वह अक्सर मुझसे फोन पर मेरे मित्र की आवाज में बातें करता था। बिल्कुल वही आवाज वही लहजा वैसा ही अनुभव पैदा करता हुआ वह मुझे बिल्कुल हैरत में डाल देता था। मैं सिर से पाँव तक संदेह से भर-भर जाता। और जब संदेह का बादल छूटता, और मैं विश्वास करने लगता कि यह दरअसल मेरा मित्र ही था, जिसने फोन किया था, तो वह ठहाका मार कर हँस पड़ता और अपना भेद खोल देता कि दरअसल वह मेरा मित्र नहीं, मित्र की आवाज की नकल करने वाला मित्र था। वह जिसे मैं अंदर ही अंदर अपना मित्र नहीं मानता था। मगर मेरे मित्र की तरह ही वह भी बचपन की मेरी उस परिधि में था जिसके बारे में आप तय नहीं कर सकते कि वह मित्रता है या कुछ और।
जिस काम को हम लोग, अपने मनबहलाव के लिए, थोड़ी-बहुत सफलता के साथ अंजाम दिया करते, उसे उसने मानो कला की ऊँचाई पर पहुँचा दिया था। उसमें आवाजों की नकल करने की बेमिसाल क्षमता थी, और आज जब मैं उसके बारे में सोचता हूँ तो मुझे हल्का अफसोस जैसा होता है कि उसने अपना वह असाधारण टेलेंट बेकार ही हम लोगों को बेवकूफ बनाने में जाया किया, उसे फिल्म लाइन या इन्टरटेंमेंट इंडस्ट्री में नहीं आजमाया। ऐसा होता, तो वह एक स्टेपनी जैसा जीवन जीने के बजाए करोड़ों में खेलने वाला शख्स होता।
वैसे तो वह हम दोनों में से किसी के अधिक करीब नहीं था, मगर वह कई-कई बार जबरन हमें अपना शिकार बनाता रहता। वह हम दोनों, यानी, मेरे और मेरे दोस्त की आवाजों की हूबहू नकल उतारा करता। कभी वह मेरा दोस्त बन कर मुझे फोन करता, तो कभी मेरी आवाज में मेरे दोस्त को। उसके इस खिलवाड़ से हम दोनों अजीब चक्कर में पड़े रहते। मगर हम उसके सामने बेबस थे। क्योंकि जब हम इस बाबत अपनी नाराजगी उससे जाहिर करते, तो वह और भी ज्यादा गुस्ताखी करने लगता। और तो और वह हमें बताना तक बंद कर देता कि यह वह था जो हमें फोन कर रहा था, जैसा वह अमूमन किया करता था। तब हमारी मुश्किलें और बढ़ जातीं, क्योंकि अंत तक हमें पता ही नहीं चलता। मुझे लगता है कि अपना यह टेलेंट वह हमारे अलावा अन्य कई लोगों पर भी आजमाता होगा। हालाँकि हमने कभी इसकी तस्दीक नहीं की क्योंकि आपस में ऐसी गुस्ताखियाँ करने की आदत हमारे कई दोस्तों की थी। अपने दोस्तों के साथ प्रैक्टिकल जोक्स करना, लेग पुलिंग करना, या जिसे अंग्रेजी में प्रैक करना कहते हैं। यह सब उन दिनों दोस्तों के बीच चलता ही रहता था। आज की तरह नहीं कि हर कोई स्मार्ट फोन से अपनी तस्वीर खींचने और सोशल मीडिया पर लोड करने में मश्गूल है।
कहना न होगा कि हमें टारगेट करने की अपनी इसी आदत के चलते वह हम दोनों के काफी करीब आ गया था, और एक तरह से, हमारा मित्र ही बन गया था। हालाँकि तब भी, यह जरूर ध्यान में रखा जाना चाहिए, कि हम दोनों वास्तविक मित्रों की मित्रता के बीच वह एक तरह की अड़चन, या झंझट ही था। कहाँ हमारी गाढ़ी दोस्ती, कहाँ उसका छिछला संग-साथ। एक तरह से, वह एक विचित्र रकीबनुमा दोस्त था। इसलिए उससे हमारी मुलाकात बिल्कुल नहीं के बराबर होती थी। दूसरी ओर हम थे, कि बिना एक दूसरे से मिले बेचैन हो जाया करते। हम सुबह-शाम एक दूसरे को खोजते रहते, और जब तक मिल न लें, चैन से नहीं बैठते।
बचपन बीतने के बाद जब हम तीनों अलग अलग शहरों में रहने लगे तब भी आपस में हमारी बातचीत का सिलसिला जारी रहा। मेरा मित्र तो मुझे फोन किया करता ही, साथ ही, वह नकलबाज भी अक्सर फोन करता रहता। हमेशा की तरह वह शुरू-शुरू में मुझे कुछ देर तक छकाता, फिर मुझे गेस करने कहता, फिर खुद ही थोड़ा-बहुत झेंपता हुआ, मान लेता कि वह मेरा जान का प्यारा वह दोस्त नहीं, उसकी आवाज की नकल कर सकने वाला परिचित भर है जो मुझ पर थोड़ा-बहुत दोस्त जैसा हक रखने लगा है। बातचीत के दरमियान वह बेहद फराखदिल हो कर मान लेता कि वह मेरा अभिन्न मित्र तो नहीं बन सका, मगर हमारी दोस्ती में ताक झाँक कर सकने की अपनी सिफत के जरिये ही, उसे यह अच्छी तरह एहसास तो हो ही पाया कि किस तरह दो गहरे दोस्त एक दूसरे पर जान छिड़कते हैं। हल्के अफसोस के साथ, वह यह भी कहता कि काश उसका भी कोई ऐसा ही करीबी दोस्त होता। मगर उसकी तकदीर में यह नहीं लिखा हुआ है, इसलिए एक नकली दोस्ती के जरिए ही, कम से कम, वह उस दोस्ती का एक हिस्सा अपने जीवन में उतार तो पाया। वह हमेशा कहता कि वह हमारी दोस्ती का कद्रदान था, जो कि उसकी नज़र में दुनिया की सबसे पूज्य वस्तु थी।
फिर एक दिन मेरे मित्र ने फोन किया और बताया कि मेरे उस दूर के मित्र की, उस अय्यार की, जो हम दोनों की आवाज की नकल कर हमेशा हमें धोखा दिया करता था, एक हादसे में मौत हो गई थी। उसकी मौत की खबर ने मुझे अजीब ढंग से प्रभावित किया। मुझे दुख, या शॉक तो बहुत लगा, जैसा कि हम किसी भी परिचित के गुजर जाने पर महसूस करते हैं, साथ ही पहली बार मुझे लगा कि उसने मेरे मन में वास्तव में अपने लिए एक जगह बन ली थी, और मैं उसे महज अपने मित्र की आवाज की नकल करने वाला ही नहीं मान सकता था। मेरे लिए उसकी एक अपनी शख़्सियत भी थी। इस बात पर गौर करके मुझे भीतर ही भीतर एक सुखद एहसास भी हुआ, और मैंने इस बात को अपने मित्र के साथ शेयर भी किया।
मगर उस मक्कार की अचानक मौत का नतीजा यह निकला, कि हम तीनों के बीच जो एक खेल-खिलवाड़ बचपन से चल रहा था, उसका सिलसिला बंद हो गया। अब हमारा वह रकीबनुमा दोस्त हमें फोन करने के लिए इस दुनिया में नहीं था, बल्कि मेरा मित्र ही मुझे कभी-कभी फोन कर लिया करता, और बातों के दरमियान बीच-बीच में उस शख्स के बारे में चर्चा कर लिया करता, जो उसकी आवाज की नकल कर मुझे परेशान किया करता था, जो अब इस दुनिया में नहीं था। इस तरह हम दोनों अक्सर उस नकली दोस्त को याद कर लिया करते।
उस नौटंकीबाज की मौत के बाद, एक बात मैंने गौर की, कि अब मेरे मित्र का फोन बहुत कम आने लगा। इससे मेरे मन में ये खयाल आने लगा कि जब तक वह शख्स जिंदा था, तो हो न हो मित्र की तुलना में वही मुझे अधिक फोन किया करता होगा। वह मैं जो समझता था कि मेरा मित्र मुझसे खूब बात करता है, वह बात कहीं गलत तो नहीं थी? एक दिन बात ही बात में मैंने इस बात की चर्चा भी अपने मित्र से की। मेरे इस प्रकार बोलने पर मेरा ख्याल है, मेरे मित्र को झुंझला जाना चाहिए था, मगर उसने तो इसे बिल्कुल ही स्पोर्ट्समैन स्पिरिट में लिया। बल्कि मुझे तो लगा कि वह अंदर ही अंदर, एक अबूझ तरीके से, थोड़ा-बहुत खुश-सा हुआ था।
इसके बाद मेरे मित्र में एक बदलाव आ गया। मैंने गौर किया कि अब वह मुझे अक्सर फोन करने लगा। इस तरह बहुत लंबे समय तक मैं और मेरा मित्र लगातार फोन पर बातें करते रहे। इस लगातार फसानेबाजी के चलते हम दोनों की दोस्ती और अधिक प्रगाढ हो गई, और ऐसा लगता कि हम आपस में बात किए बिना जिंदा ही नहीं रह सकते। सच कहूँ तो इतने करीब तो हम उस समय भी नहीं थे जब हम एक ही शहर में रहते थे और एक दूसरे से मिले बिना बेचैन हो जाया करते थे। धीरे-धीरे मेरे मित्र और मेरे बीच फोन पर इतनी ज्यादा बातचीत होने लगी कि लगता हम एक दूसरे में खो गए हों। हम अक्सर घंटों बातचीत करते, अपना सुख-दुख कहते-सुनते। इस दरमियान हम अनेक पुरानी बातों को, खासकर उस समय को याद करते जब हम दोनों साथ थे। साथ ही बीच-बीच में हम उस व्यक्ति को याद करना कभी नहीं भूलते, जो हम दोनों की आवाज की नकल किया करता था।
मेरा मित्र चूँकि मुझसे बहुत दूर के शहर में रहने लगा था और हम दोनों अपने-अपने काम-धंधे, कारोबार रोज़गार में इतने व्यस्त हो गए थे कि वर्षों तक हमें एक दूसरे के शहर में आ कर मिलने की फुर्सत नहीं मिली। ऐसा कोई ख़ास मौका भी जीवन में नहीं आ रहा था कि मैं उसे खासतौर पर बुलाऊँ और वह अपने सारे कामकाज छोड़ कर चला आए और मेरे साथ कुछ दिन बिताए। फिर, चूँकि हम लोग लगातार बातें कर ही रहे थे इसीलिए मैंने या उसने, इस बात की कोई खास जरूरत भी नहीं समझी कि हम आमने सामने मिलें। आखिर हम मिल के करते भी तो क्या करते? बात ही ना? तो वह तो हम कर ही रहे थे। एक तरह से फोन हमारी सारी जरूरतों को पूरा कर रहा था।
इसी बीच एक बार मैंने अपनी बेटी की शादी में उसे बुलाया भी और वह हमारे शहर आने को तैयार भी हो गया, लेकिन ऐन वक्त पर उसने फोन किया कि बिल्कुल आखिरी समय गाड़ी कैंसिल हो जाने के चलते वह नहीं आ पाएगा और जब शादी में भाग ही नहीं ले पा रहा है, तो फिर बेहद जरूरी कामकाज को छोड़ कर मेरे पास आने का कोई तुक नहीं था, और फिर हम लोग लगातार बातें तो कर ही रहे थे। इतना कह कर वह अपने उस खास अंदाज में हँसा जिसके लिए मैं अपने मित्र का कायल था। और हम लोग एक बार फिर बचपन की यादों में डूब गए।
बचपन की बहुत सारी बातें मैं भूल चुका था जिनके बारे में वह मुझे अक्सर याद दिलाया करता था। सच बात तो ये थी कि अगर मेरा दोस्त मुझे लगातार फोन पर याद नहीं दिलाता रहता, तो मैं बचपन और उसके बाद जवान होने तक की ज्यादातर बातों को भूल चुका होता। मुझे इस बात पर बहुत हैरत होती थी। मैंने उससे एक बार पूछा कि उसे इतनी छोटी-छोटी बातें इतनी साफ-साफ याद कैसे रहती थीं, तो इसका क्रेडिट उसने हमारे उसी म्यूचुअल मित्र को दिया जो आवाजों की नकल किया करता था, और जो अब इस दुनिया में नहीं था। उसने बताया कि उस नक्काल को उसकी या मेरी आवाज की नकल कर के उसे या मुझे हैरान करने का शौक इस कदर जुनून की हद तक था, कि वह फोन कर के हमारे बीच घटी एक-एक बात को घंटों खोद-खोद कर पूछता रहता था, ताकि फिर उनमें से कुछ बातें अपनी बातों में मिला-जुला कर मुझे सुना कर हैरान-परेशान कर सके। इस तरह उसके सवालों का जवाब देते देते कुछ ऐसा होता गया कि मेरे मित्र को बहुत सी ऐसी बातें कंठस्थ याद हो गईं, जिन्हें वह कब का भूल गया होता। फिर मेरे मित्र ने इस मामले में एक और बेहद हैरतअंगेज़ बात बताई।
उसने बताया कि उस बहुरुपिये को दरअसल बहुत सी ऐसी बातों का भी पता चल गया था, जिनके बारे में खुद मित्र को भी पता नहीं था। ऐसा इस तरह हुआ कि मेरे मित्र की आवाज की नकल कर कर के उसने बहुत सी ऐसी बातें मुझसे भी जान ली थीं, जो मेरे मित्र को पता नहीं हो सकती थीं। यानी बहुत सारे मुद्दों और मसलों के बारे में वह मेरी सोच और मेरे पक्ष को मेरे मित्र से बेहतर जानने लगा था, और हकीकत यह थी कि मेरे बारे में उसी ने मेरे मित्र को एक समझ दी थी, जो बाद में चल कर हमारी गाढ़ी मित्रता की नींव बनी। फिर उसने मुझे एक और संगीन बात से अवगत कराया।
उसने बताया कि जैसे वह मुझसे मेरे मित्र के बारे में बातें कर कर के बहुत कुछ जान गया था जो मेरे मित्र को भी पता नहीं था, वैसे ही हो सकता है मेरे मित्र से मेरे बारे में बात कर कर के वह बहुत कुछ ऐसा भी जान गया हो जिसका अता-पता मुझे भी नहीं रहा हो। यानी तय था कि वह हम दोनों के बारे में, हम दोनों से कहीं अधिक जानता था। और न जाने अभी और कितना अधिक जान जाता, कि तभी एक सड़क हादसे में उसकी मौत हो गई, और उसका वह खेल ही खत्म हो गया। इतना कह कर मेरा मित्र बहुत जोर से ठठा कर हँसा। मैंने भी जोर से हँसते हुए उसका साथ दिया। मैं दरअसल इस सारी गुफ्तगू से कुछ डर-सा गया था और अंदर ही अंदर महसूस करने लगा था कि ऐसे व्यक्ति का दुनिया से विदा हो जाना ही ज्यादा अच्छा था, जो दूसरों के बारे में उनसे अधिक जान गया हो, और जिस जानकारी पर उसका कोई हक नहीं हो।
मैं क्या कहूँ, मुझे यह एक तरह का ट्रेसपास जैसा लग रहा था। नहीं समझे? मतलब जब कोई आपके आहाते में बिना आपकी इजाजत के घुस आता है, तो आप उसे ट्रेसपास कहते हैं। आप उसके अंदर घुस आने के संदेह की दृष्टि से देखते हैं, और चाहते हैं कि वह व्यक्ति जल्द से जल्द वहाँ से चला जाय। आपका सारा अनुभव आपको बताता है कि ऐसे ममलों में ट्रेसपास करने वाला अक्सर कोई न कोई खुराफात करने की मंशा रखता है। यहाँ भी मेरे मन में यही संदेह उठ रहा था और मैंने इसके बारे में अपने मित्र को बताया। इस पर वह और जोर-जोर से हँसने लगा। मैं पूछता ही रह गया कि आखिर उसमें हँसने की क्या बात थी? आखिर जब देर तक हँसने के बाद वह रुका, तो उसने कहा कि वह बहुत मजेदार बात थी। और वह फिर से हँसने लगा। झल्ला कर मैंने फोन रख दिया।
आप समझ सकते हैं क्यों मुझे अपने मित्र पर इस कदर कस कर गुस्सा आ रहा था। मैं जानता था कि हमारा वह गुनाहगार अब इस दुनिया में नहीं था और किसी मृतक के सारे अपराधों को माफ कर देना दुनिया का दस्तूर है। एक मृतक की सबसे बड़ी सज़ा ही यही है कि वह मृतक हो चुका है जबकि हम अभी जीवित हैं। इतना जानने के बावजूद, सच कहूँ तो मेरा मन कर रहा था कि मैं जाऊँ और कहीं से उसे पकड़ लाऊँ और जोर का एक थप्पड़ मारूँ, या उसका मूँ ही नोंच लूँ। मगर ऐसा करना संभव नहीं था क्योंकि वह तो मर कर उस सारी क्रिया-प्रतिक्रिया के परे हो चुका था।
उस दिन तो मेरा मित्र मेरे गुस्से पर हँसता रहा, मगर उसके बाद उसमें एक बदलाव-सा आ गया। मैं जब भी उस से बात करता, तो वह जानबूझ कर मुझसे पूछता कि उसकी आवाज में बात करने वाने उस नकलची कमीने ने मुझसे उसके बारे में और क्या-क्या पूछा था, कि उसे उसके बारे में और क्या-क्या पता था। साथ ही वह उसे छूट कर गाली दिया करता, मुझे अपने मित्र की यह प्रतिक्रिया बड़ी अजीब लगती। वह खुद ही गालियाँ देता और फिर खुल कर हँसने लगता। अब यह मेरा कर्तव्य हो गया कि मैं उसे ऐसा करने से रोकूं। इसलिए मैं सावधान हो गया। ऐसा प्रसंग उठने पर मैं ध्यान रखता कि अपनी तरफ से कोई अपशब्द नहीं बोलूँ। बल्कि अब मैं परोक्ष रूप से उसकी तारीफ भी करने लगा। मैं अपने मित्र को अक्सर समझाने लगा कि अपने तरीके से उस चार सौ बीस ने हम दोनों को एक-दूसरे को जानने-समझने का बेहतर मौका दे कर हमारी मदद ही की थी कि हमें उसका शुक्रगुजार होना चाहिए।
मगर ऐसा लगत्ता है मेरी यह बात उसे बरछी की तरह चुभ जाती थी। उसके अनुसार उसे समझ में नहीं आता था कि मैं एक मृत व्यक्ति का इतना पक्ष क्यों ले रहा हूँ, जबकि इससे उसे, एक जिंदा व्यक्ति को परेशानी हो रही है। वह मुझसे कहता कि क्या मैं कुछ देर के लिए उस नामाकूल शख्स का जिक्र छोड़ नहीं सकता? हार कर मैं कभी-कभी उसकी बात मान भी जाता और कुछ समय के लिए उस नकल करने वाले को भूल जाता। नहीं, यह कहना गलत होगा, सरासर गलत। भूलता तो मैं भी उसे कभी नहीं था, मगर जानबूझ कर उसका जिक्र करने से बाज़ आता था। मगर मैंने देखा कि मेरा मित्र खुद उसके शिकंजे में बुरी तरह फँस चुका था। कुछ ही दिन बीतते न बीतते वह खुद अनायास उसका जिक्र छेड़ देता। और फिर मामला उसी पुरानी लीक पर लौट आता। हम उसको ले कर फिर लड़ने-झगड़ने लगते।
आप देख सकते हैं कि हमारा वह रकीबनुमा दोस्त एक तरह से मरने के बाद हम दोनों पर बुरी तरह हावी हो गया था। हम जीवित थे और वह मर चुका था, मगर ऐसा लगता था कि वही जिंदा था और हम दोनों मर चुके थे। कि हम मर कर बेजान कठपुतलियों में बदल गए थे, जिन्हें वह अपने अदृश्य धागों पर नचा रहा था। धीरे-धीरे उसका व्यक्तित्व हम दोनों से बड़ा होता जा रहा था। हम दोनों बार-बार एक दूसरे से वादा करने लगे कि अब हममें से कोई उस नटवर लाल का कोई जिक्र नहीं करेगा। मगर कभी न कभी कोई न कोई उस वादे को तोड़ ही देता।
मेरा ख्याल था कि ऐसा ज्यादातर मैं नहीं, मेरा मित्र कर रहा था। मगर मेरा मित्र अड़ जाता कि यह मैं ही था जो हर बात में जानबूझ कर उसका ज़िक्र ले आता था। ऐसा वह इस तरह सबूतों के साथ सुसज्जित कर के करता कि मुझे उसकी बात पर यकीन करना पड़ता और मैं अपने-आपको लानत भेजने लगता। ऐसे में मित्र बीच-बचाव की मुद्रा में आ जाता।
न जाने क्यों, जब मेरा मित्र बीच-बचाव की मुद्रा में आ जाता तो मुझे आवाज की नकल करने वाले ढोंगी की बहुत याद आती। शुरू में तो मुझे इस बात का बहुत हल्का-सा आभास जैसा था कि वह क्या बात थी जिसके चलते मुझे उसकी याद आ जाती थी। मगर धीरे धीरे मुझे याद आने लगा कि हमारी मित्रता के शुरूआती दिनों में कई बार उस शख्स ने अपने उस टेलेंट का इस्तेमाल कर हम दोनों के बीच मनमुटाव पैदा किया था। होता यह था कि वह बिल्कुल मित्र की आवाज और लहजे में कोई बेहद चुभने वाली बात कह देता, और मैं मित्र से बेहद नाराज हो जाता। फिर वह हम दोनों के मनमुटाव का जम कर लुत्फ उठाता, और जब देखता कि बात बढ़ गई है, तो खुद ही मित्र के रूप में फोन कर उसे सुलझा भी देता। मैं यह नहीं कह सकता कि बिल्कुल ऐसा ही होता होगा, मगर बाद में चल कर मुझे ऐसा शक-सा होने लगा था। मगर मेरे पास इसका पर्दाफाश करने का कोई जरिया नहीं था, क्योंकि वह इतनी उम्दा नकल करता कि किसी को पता ही नहीं चल पाता कि हकीकत में कौन था जो फोन के दूसरे सिरे पर था। मित्र, या मित्र की आवाज की नकल करने वाला।
मैं कई-कई बार तंग आ कर उसे इस हरकत पर डाँटने भी लगता था, मगर मुझे खुद पता नहीं होता था कि मैं हकीकत में किसे डाँट रहा हूँ। सच्चाई तो तब सामने आती, जब मैं और मेरा मित्र आमने-सामने मिलते। मगर उसके बाद फिर, अपने-अपने घर वापस आते ही हम एक बार फिर उसकी जादूई मुट्ठी में कैद होते थे।
जैसा मैंने पहले ही बताया है, जब हमारी पढ़ाई पूरी हो गई तो हम अलग-अलग शहरों में रहने लगे। किस्मत ने मुझे मेरे मित्र से इतनी दूर ला फेंका, कि हमारा मिलना-जुलना बिल्कुल बंद हो गया। हाँ, हमारे टेलिफोन के नंबर एक दूसरे के पास थे। और किस्मत का खेल देखिये, हमारे नंबर हमारे उस शरारती मित्र के पास भी थे। मैंने तो, सच कहूँ, जानबूझ कर अपना नंबर उसे नहीं दिया था, मगर उसने बड़ी ही चालाकी से मेरे मित्र से उसका पता कर लिया। मैंने हालाँकि उसे ऐसा करने से मना भी किया, और इसके कारण भी गिनाए, मगर मेरा मित्र निहायत भोला-भाला है, वह किसी साजिश जैसी बात को इतनी दूर तक सोच-समझ ही नहीं सकता। नतीजा, उसने मेरा नंबर उसको दे दिया। उसके पास मेरा नंबर पहुँचना था, कि एक बार फिर हम दोनों उसके करतबों के जमूरे थे।
हालाँकि जैसा आप जानते हैं, इसके कुछ ही दिनों के बाद हम दोनों की तकदीर ने करवट ली, और हमें उससे सचमुच की मुक्ति मिल गई। हुआ यह कि अचानक एक दिन मित्र ने फोन किया और यह दुखद खबर दी कि एक भयानक सड़क हादसे में हम दोनों के उस शोषक, एक तरह से कहिये, ब्लैकमेलर की मौत हो गई थी। शायद इसी वजह से, मेरा मित्र उसकी मौत पर, वो क्या कहते हैं, कुछ खास जेनुइनली दुखी नहीं था। उसने बस उसकी मौत की खबर सुना भर दी, जैसे रेडियो या टीवी के समाचार-वाचक लोगों की मौत की खबरें सुनाया करते हैं। और जब मैंने, दिखावे के लिए ही सही, दुखी होने का नाटक किया, तो वह तो बिल्कुल बेलाग हो कर सामने आ गया। उसने बिल्कुल हल्के लहजे में उसकी मौत की व्याख्या की, और कहा कि जाने ऐसे कितने लोग हर मिनट मरते हैं। अब हम किसका कितना दुख मनाएँ?
सच तो यह है कि मुझे उसके इस नज़रिये से हल्का झटका-सा लगा था। ऐसा नहीं कि मैं उस व्यक्ति से गहरा स्नेह करता था। बस इतना भर है कि मैं दिखावे में यकीन रखने वाला इंसान हूँ और मेरा मानना है कि इंसान को अपनी सही भावनाओं का भेद कभी नहीं खोलना चाहिए। दूसरी जिस बात पर मैं और अधिक शॉक्ड था, वो ये कि उसकी मौत को इतने हल्के-फुल्के ले कर मेरे मित्र ने बिल्कुल मेरी अपनी ही भावनाओं को प्रतिबिंबित किया था। मुझे ऐसा लगा कि उस मौत को ले कर हम दोनों एक जैसा ही फील कर रहे थे। इससे मुझे पता लग रहा था कि हम दोनों एक दूसरे से इतनी दूर रहते हुए भी ख्यालों के मामले में एक दूसरे के कितने करीब थे। तभी तो हम इतने पक्के मित्र थे। मुझे हमारी मित्रता पर गर्व हो आया। मगर मैंने इस बात को अपने मित्र से छुपा लिया।
और हमारी आवाज की नकल करने वाले उस शख्स की मौत के बाद, मामला इसलिए इकहरा होने से बचा रह गया, क्योंकि मेरा मित्र अक्सर जाने-अनजाने बातचीत के दरमियान उसकी चर्चा कर डालता था, और फिर उसकी यादों का पिटारा खुल जाता था। इस तरह वह न हो के भी पूरी आन-बान-शान के साथ हमारे दरमियान मौजूद था। दूसरी तरफ, मुझे लगता कि हम हो के भी उससे कमतर साबित हो रहे हैं। इस बात से हम दोनों कुछ-कुछ चिढ़ने भी लगे थे। मैं कह नहीं सकता कि हम दोनों में कौन ज्यादा चिढ़ता था। मगर महसूस होता था कि कभी वह कभी मैं, बारी-बारी से कुपित हो लेते थे।
इस तरह मेरे मित्र की आवाज की नकल करने वाले शख्स की मृत्यु के बाद न जाने कितने वर्ष बीत गए हैं। हम दोनों धीरे-धीरे बूढ़े होते चले गए है। नया जमाना आ गया है। यह बहुत तेजी से आया है, और सब कुछ को बदलता चला गया है। न वो पहले वाली दुनिया रही न पहले वाली मुहब्बतें और शरारतें। इसी बीच वह पुराना चक्के के अन्दर कैद नम्बरों वाला टेलिफोन कूड़े में बदल गया है। उसकी जगह मोबाइल फोन ने ले ली है जिसके अंदर नंबर पहले से छप कर आता है। अगर हमारे जमाने में यह फोन मौजूद रहा होता तो आवाज की नकल करने वाला वह शरारती हमारे एकांत में कभी घुसपैठ नहीं कर पात्ता। अब तो आलम यह है कि इस नई दुनिया में पूरी तरह मिसमैच, बीते जमाने की याद को सहेजे-सहेजे अपनी जिंदगियों को रेंग-रेंग कर पार करते हम दोनों मित्र पूरी तरह एक दूसरे के भरोसे हो कर रह गए है। मैंने तो, सच कहूँ, नए जमाने के हिसाब से चलना सीख भी लिया है, और एक मोबाइल फोन खरीद लिया है, जिसे मैंने आज के युवाओं की चपलता और उन जैसी कुटिलता के साथ तो नहीं, मगर अपने हिसाब से काफी होशियारी से चलाना भी सीख लिया है। अब हाल ये है कि पुराने मोबाइल फोनों का भी पत्ता साफ हो गया है। उसकी जगह स्मार्ट फोन आ गया है, जिसे धोखा देना आसान नहीं है। यह तो आदमी का नाम पता कामधाम-सब कुछ एक झटके में बता देता है। जहाँ तक मेरा सवाल है, मैं स्मार्ट फोन-वोन से घबराता हूँ, न जाने उसमें क्या-क्या पेचीदगियाँ होती होंगी! मैंने तो बस एक साधारण-सा बटन वाला मोबाइल फोन रख लिया है, जिसे चलाना आसान है। यह लगभग पुराने डिब्बेदार फोनों का ही बेहतर रूप लगता है जो मुझे चलते-फिरते बात करने की सुविधा भर देता है।
बहरहाल बात मेरे मित्र की हो रही थी, फोन की नहीं। बात यह है कि मेरे मित्र को आधुनिक बनने का कोई शौक नहीं है। जब मोबाइल फोन आया तो उसने उसे लेने से साफ इंकार कर दिया। मेरे बहुत समझाने के बावजूद वह बा-दस्तूर अपने लैंडलाइन से फोन करता रहा। उसके लैंडलाइन का एसटीडी कोड नम्बर मुझे सूचित करता रहता कि वह हमारे उसी पुराने छोटे से गाँव में रह रहा था जहाँ वह रिटायर होने के बाद वापस आ गया था। और अब ऐसा लगता है कि एक उससे भी बड़ा तफका मेरी दुनिया में आ चुका है।
और अब ऐसा लगता है कि एक उससे भी बड़ा तफ्रका मेरी दुनिया में आ चुका है। अचानक उसका फोन आना बंद हो गया है। न तो फोन आता है, न उस तरफ से कोई फोन उठाता ही है। इस तरह, अचानक, उसका फोन आना बंद होने पर मुझे तो पता ही नहीं चल पा रहा कि वह बीमार है या ऊपर वाले ने उसे अपने पास बुला लिया। मैंने उसके नंबर पर कई बार कोशिशें की हैं, मगर उसका नंबर अजीब तरीके से बंद मिलता है। कभी-कभी वह चालू भी हो जाता है, मगर वह बजता रहता है और कोई उसे उठाने की जहमत नहीं करता। लगता है उसकी आवाज उस घर की खला में देर तक गूँज कर खामोश हो जाती है। अब तो लगातार यह आलम है कि लगता है वह फोन हमेशा के लिए सो गया है, जैसे वह भी चिर-निद्रा में चला गया हो।
एकाएक, इस तरह से, अपने मित्र से बातचीत बंद होने का मेरी सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। ऐसा लगता है, एक तरह से मैं उसकी गुफ्तगू के सहारे ही जी रहा था। उससे बात करना मेरे लिए खाने-पीने सोने-जागने से कहीं अधिक जरूरी हो गया था। मगर अब, एक बहुत बड़ा शून्य मेरे सामने है जिसे मैं पार नहीं कर पा रहा हूँ। मेरी हालत इतनी बुरी हो गई है कि मेरे लड़के ने आज ही मेरी तरफ से उन लोगों से सम्पर्क करने की केशिश की है।
मैं तो साधारण फोन रखता हूँ, मगर मेरे बेटे के पास स्मार्ट फोन है। उसके फोन में ट्रू-कॉलर नामक ऐप है जो नंबर के सहारे उस ओर के आदमी का नाम, शहर, राज्य इत्यादि बता देता है। आज सुबह जब उसने उस नंबर पर फोन लगाया तो ट्रू-कॉलर ने डिस्प्ले में मेरे मित्र के नाम की जगह किसी और आदमी का नाम दिखाना करना शुरू कर दिया। जब उसने यह बात मुझे बताई तो मैंने कहा कि उसके बेटे या किसी भाई या रिश्तेदार का नंबर होगा। मगर फिर मैंने यूँ ही उस आदमी का नाम पूछ लिया।
जवाब में बेटे ने आवाज की नकल करने वाले उस पुराने गुस्ताख़ का नाम बताया।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
सम्पर्क
मोबाइल : 8959877201



टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें