कुँवर नारायण की कविताएँ




कल 15 नवंबर 2017 को 90 साल की उम्र में कुंवर नारायण जी का निधन हो गया. अभी हम उनकी कविताओं पर कुछ कहने-लिखने की स्थिति में नहीं हैं. आज पहली बार ब्लॉग पर अपने प्रिय कवि को नमन करते हुए प्रस्तुत हैं उनकी कुछ ऐसी कविताएं जो मुझे बहुत प्रिय हैं .



कुँवर नारायण की कविताएँ

एक अजीब सी मुश्किल

एक अजीब सी मुश्किल में हूँ इन दिनों-
मेरी भरपूर नफरत कर सकने की आदत
दिनोंदिन क्षीण पड़ती जा रही

अंग्रेजों से नफ़रत करना चाहता
जिन्होंने दो सदी हम पर राज किया
तो शेक्सपियर आड़े आ जाते
जिनके मुझ पर अब तक न जाने कितने एहसान हैं। 

मुसलमानों से नफ़रत करने चलता
तो सामने ग़ालिब आ कर खड़े हो जाते। 
अब आप ही बताइये किसी की कुछ चलती है
उनके सामने?

सिखों से नफ़रत करना चाहता
तो गुरुनानक आँखों में छा जाते
और सर अपने आप झुक जाता।

और ये कंबन, त्यागराज, मुत्तुस्वामी...
लाख समझाता अपने को
कि वे मेरे नहीं
दूर कहीं दक्षिण के हैं
पर मन है कि मानता ही नहीं
बिना इन्हें अपनाए

और वह प्रेमिका
जिससे मुझे पहला धोखा हुआ था
मिल जाए तो उसका खून कर दूँ!
मिलती भी है मगर
कभी मित्र
कभी माँ
कभी बहन की तरह
तो प्यार का घूँट पी कर रह जाता।

हर समय
पागलों की तरह भटकता रहता
कि कहीं कोई ऐसा मिल जाए जिससे भरपूर नफरत कर के
अपना जी हल्का कर लूँ।

पर होता है ठीक इसका उलटा
कोई-न-कोई, कहीं-न-कहीं, कभी-न-कभी
ऐसा मिल जाता
जिससे प्यार किए बिना रह ही नहीं पाता।
दिनोंदिन मेरा यह प्रेम-रोग बढ़ता ही जा रहा
और अब इस वहम ने पक्की जड़ पकड़ ली है
कि वह किसी दिन मुझे
स्वर्ग दिखा कर ही रहेगा।
(यह कविता पहले ‘प्रेम-रोग’ शीर्षक से छपी थी।)
 
सम्मेदीन की लड़ाई

ख़बर है
कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध
बिल्कुल अकेला लड़ रहा है एक युद्ध
कुराहा गाँव का ख़ब्ती सम्मेदीन

बदमाशों का दुश्मन
जान गवाँ बैठेगा एक दिन
इतना अकड कर अपने को
समाजसेवी कहने वाला सम्मेदीन

यह लड़ाई ज्यादा नहीं चलने की
क्योंकि उसके रहते
चोरों की दाल नहीं गलने की
एक छोटे से चक्रव्यूह में घिरा है वह
और एक महाभारत में प्रतिक्षण
लोहूलुहान हो रहा है सम्मेदीन
भरपूर उजाले में रहे उसकी हिम्मत
दुनिया को खबर रहे
कि एक बहुत बड़े नैतिक साहस का नाम है सम्मेदीन

जल्दी ही वह मारा जाएगा।
सिर्फ़ उसका उजाला लड़ेगा
अंधेरों के ख़िलाफ़... खबर रहे

किस-किस के खिलाफ लड़ते हुए
मारा गया निहत्था सम्मेदीन

बचाए रखना
उस उजाले को
जिसे अपने बाद
जिन्दा छोड़ जाने के लिए
जान पर खेल कर आज
एक लड़ाई लड़ रहा है
किसी गाँव का कोई खब्ती सम्मेदीन   
    

मैं अस्पताल गया लेकिन वह जगह अस्पताल नहीं थी

मैं अस्पताल गया
लेकिन वह जगह अस्पताल नहीं थी
वहाँ मैं डाक्टर से मिला
लेकिन वह आदमीं डाक्टर नहीं था
फिर वहाँ एक नर्स आयी
उसने डाक्टर से कुछ कहा
लेकिन वो भी दरअसल कोई और थी
फिर हम आपरेशन रूम में गए
वहाँ बेहोश करने वाला डाक्टर
पहले से मौजूद था। 
       
अबकी अगर लौटा तो

अब की बार लौटा तो
बृहत्तर लौटूंगा
चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं
कमर में बांधें लोहे की पूँछे नहीं
जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को
तरेर कर न देखूंगा उन्हें
भूखी शेर -आँखों से

अबकी बार लौटा तो
मनुष्यतर लौटूंगा
घर से निकलते
सड़को पर चलते
बसों पर चढ़ते
ट्रेनें पकड़ते
जगह बेजगह कुचला पड़ा
पिद्दी सा जानवर नहीं-

अगर बचा रहा तो
कृतज्ञतर लौटूंगा

अबकी बार लौटा तो
हताहत नहीं
सबके हिताहित को सोचता
पूर्णतर लौटूंगा



 
मैं कहीं और भी होता हूँ
 
मैं कहीं और भी होता हूँ
जब कविता लिखता

कुछ भी करते हुए
कहीं और भी होना
धीरे-धीरे मेरी आदत-सी बन चुकी है

हर वक़्त बस वहीं होना
जहाँ कुछ कर रहा हूँ
एक तरह की कम-समझी है
जो मुझे सीमित करती है

ज़िन्दगी बेहद जगह मांगती है
फैलने के लिए

इसे फैसले को ज़रूरी समझता हूँ
और अपनी मजबूरी भी
पहुंचना चाहता हूँ अन्तरिक्ष तक
फिर लौटना चाहता हूँ सब तक
जैसे लौटती हैं
किसी उपग्रह को छू कर
जीवन की असंख्य तरंगें... 
  
दुनिया की चिन्ता

छोटी सी दुनिया
बड़े-बड़े इलाके
हर इलाके के
बड़े-बड़े लड़ाके
हर लड़ाके की
बड़ी-बड़ी बन्दूकें
हर बन्दूक के बड़े-बड़े धड़ाके

सबको दुनिया की चिन्ता
सबसे दुनिया को चिन्ता।


अयोध्या 1992 

हे राम,
जीवन एक कटु यथार्थ है
और तुम एक महाकाव्य !

तुम्हारे बस की नहीं
उस अविवेक पर विजय
जिसके दस बीस नहीं
अब लाखों सर - लाखों हाथ हैं,
और विभीषण भी अब
न जाने किसके साथ हैं.

इससे बड़ा क्या हो सकता है
हमारा दुर्भाग्य
एक विवादित स्थल में सिमट कर
रह गया तुम्हारा साम्राज्य

अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं
योद्धाओं की लंका है,
'
मानस' तुम्हारा 'चरित' नहीं
चुनाव का डंका है !

हे राम, कहां यह समय
कहां तुम्हारा त्रेता युग,
कहां तुम मर्यादा पुरुषोत्तम
कहां यह नेता-युग !

सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ
किसी पुरान - किसी धर्मग्रन्थ में
सकुशल सपत्नीक....
अबके जंगल वो जंगल नहीं
जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक !


जख़्म

इन गलियों से
बेदाग़ गुजर जाता तो अच्छा था
और अगर
दाग ही लगना था तो फिर
कपड़ों पर मासूम रक्त के छींटे नहीं
आत्मा पर
किसी बहुत बड़े प्यार का जख़्म होता
जो कभी न भरता





एक अजीब दिन

आज सारे दिन बाहर घूमता रहा
और कोई दुर्घटना नहीं हुई
आज सारे दिन लोगों से मिलता रहा
और कहीं अपमानित नहीं हुआ
आज सारे दिन सच बोलता रहा
और किसी ने बुरा न माना
आज सबका यकीन किया
और कहीं धोखा नहीं खाया

और सबसे बड़ा चमत्कार तो यह
कि घर लौट कर मैंने किसी और को नहीं
अपने को ही लौटा हुआ पाया


मेरे दुःख

मेरे दुःख अब मुझे चौकाते नहीं
उनका एक रिश्ता बन गया है
दूसरों के दुखों से
विचित्र समन्वय है यह
कि अब मुझे दुःस्वप्नों से अधिक
जीवन का यथार्थ विचलित करता है

अखबार पढ़ते हुए घबराहट होती-
शहरों में बस्तियों में
रोज यही हादसा होता-
कि कोई आदमखोर निकलता
माँ के बगल में सोयी बच्ची को
उठा ले जाता –
और सुबह-सुबह जो पढ़ रहा हूँ
वह उस हादसे की खबर नहीं
उसके अवशेष हैं  

     
बाकी कविता

पत्तों पर पानी गिरने का अर्थ
पानी पर पत्ते गिरने के अर्थ से भिन्न है

जीवन को पूरी तरह पाने
और पूरी तरह दे जाने के बीच
एक पूरा मृत्यु चिन्ह है

बाकी कविता
शब्दों से नहीं लिखी जाती,
पूरे अस्तित्व को खींच कर एक विराम की तरह
कहीं भी छोड़ दी जाती है...
    
सवेरे-सवेरे

कार्तिक की एक हँसमुख सुबह
नदी तट से लौटती गंगा नहा कर
सुवासित भीगी हवाएँ
सदापावन
माँ सरीखी
अभी जैसे मंदिरों में चढ़ा कर खुशरंग फूल
ठण्ड से सीत्कारती घर में घुसी हो
और सोते देख कर मुझको जगाती हों –

सिरहाने रख कर एक अंजलि फूल हरसिंगार के,
नर्म ठण्डी उँगलियों से गाल छू कर प्यार से,
बाल बिखरे हुए तनिक संवार के...


लापता का हुलिया

रंग गेहुआँ ढंग खेतिहर
उसके माथे पर चोट का निशान
कद पाँच फुट से कम नहीं
ऐसी बात करता कि उसे कोई गम नहीं
तुतलाता है.
उम्र पूछो तो हजारो साल से कुछ ज्यादा बतलाता है
देखने में पागल सा लगता है – है नहीं
कई बार उंचाईयों से गिर कर टूट चुका है

इसलिए देखने पर जुड़ा हुआ लगेगा
हिन्दुस्तान के नक़्शे की तरह

       
तटस्थ नहीं

तट पर हूँ
पर तटस्थ नहीं

देखना चाहता हूँ
एक जगमगाती दुनिया को
डूबते सूरज के आधार से

अभी बाकी हैं कुछ पल
और प्यार का भी एक भी पल
बहुत होता है

इसी बहुलता को
दे जाना चाहता हूँ पूरे विश्वास से
इन विह्वल क्षणों में
कि कभी-कभी एक चमत्कार हुआ है पृथ्वी पर
जीवन के इसी गहरे स्वीकार से।  

अपठनीय

घसीट में लिखे गये
जिन्दगी के अन्तिम बयान पर
थरथराते हस्ताक्षर
इतने अस्पष्ट
कि अपठनीय

प्रेम-प्रसंग
बचपन से बुढापे तक इतने परतों में लिपटे
कि अपठनीय

सच्चाई
विज्ञापनों के फुटनोटों में
इतनी बारीक और धूर्त भाषा में छपी
कि अपठनीय

सियासती मुआमलों के हवाले
ऐसे मकड़जाले
कि अपठनीय

अखबार
वही खबरें बार-बार
छापों पर इतनी छापें
सबूत की इतनी गलतियाँ
भूल-सुधार इतने संदिग्ध
कि अपठनीय

हर-एक के अपने-अपने-अपने ईमान-धरम
इतने अपारदर्शी
कि अपठनीय

जीवन वस्तु जितनी ही भाषा-चुस्त
उतनी ही तरफों से इतनी एक-तरफ़ा
कि अपठनीय

सुई की नोक बराबर धरती पर लिखा
भगवद्गीता का पाठ
इतना विराट
कि अपठनीय

और अब
जबकि जाने की हड़बड़ी
आने-जाने के टाईम-टेबल में ऐसी गड़बड़ी
कि छूटने का वक्त
और पहुँचने की जगह
दोनों अपठनीय





प्यार की भाषाएँ

मैंने कई भाषाओं में प्यार किया है

पहला प्यार ममत्व की तुतलाती भाषा में...
कुछ ही वर्ष रही वह जीवन में :

दूसरा प्यार
बहन की कोमल छाया में
एक सेनेटोरियम की उदासी तक :

फिर नासमझी की भाषा में
एक लौ को पकड़ने की कोशिश में
जला बैठा था अपनी ऊंगलियाँ :

एक परदे के दूसरी तरफ
खिली धूप में खिलता गुलाब
बेचैन शब्द
जिन्हें होठों पर लाना भी गुनाह था

धीरे-धीरे जाना
प्यार की और भी भाषाएँ हैं दुनिया में
देशी-विदेशी
और विश्वास किया कि प्यार की भाषा
सब जगह एक ही है
लेकिन जल्दी ही जाना
कि वर्जनाओं की भाषा भी एक ही है :

एक से घरों में रहते हैं
तरह-तरह के लोग
जिनसे बनते हैं
दूरियों के भूगोल...

अगला प्यार
भूली बिसरी यादों की
ऐसी भाषा में जिसमें शब्द नहीं होते
केवल कुछ अधमिटे अक्षर
कुछ अस्फुट ध्वनियाँ भर बचती हैं
जिन्हें किसी तरह जोड़ कर
हम बनाते हैं
प्यार की भाषा

  
पालकी

काँधे धरी यह पालकी
है किस कन्हैया लाल की?

इस गाँव से उस गाँव तक
नंगे बदन, फेंटा कसे
बरात किसकी ढो रहे?
किसकी कहाँरी में फँसे
यह कर्ज पुश्तैनी अभी किश्तें हजारों साल की
काँधे धरी यह पालकी है किस कन्हैया लाल की?

इस पाँव से उस पाँव पर,
ये पाँव बेवाई फटे :
काँधे धरा किसका महल?
हम नींव पर किसकी डटे?
यह माल ढोते थक गयी तकदीर खच्चर हाल की
काँधे धरी यह पालकी है किस कन्हैया लाल की?

फिर, एक दिन आँधी चली
ऐसी कि पर्दा उड़ गया!
अन्दर न दुल्हन थी न दूल्हा
एक कौवा उड़ गया...
तब भेद जा कर यह खुला – हमसे किसी ने चाल की
काँधे धरी यह पालकी ला ला अशर्फी लाल की!


नदी के किनारे

हाथ मिलाते ही
झुलस गयी थीं ऊँगलियाँ

मैंने पूछा ‘कौन हो तुम?’

उसने लिपटते हुए कहा ‘आग!’

मैंने साहस किया –
खेलूँगा आग से

धूप में जगमगाती हैं चीजें
धूप में सबसे कम दिखती है
चिराग की लौ

कभी-कभी डर जाता हूँ
अपनी ही आग से
जैसे डर बाहर नहीं
अपने ही अन्दर हो

आग में पकती रोटियाँ
आग में पकते मिट्टी के खिलौने

आग का वादा – फिर मिलेंगे
नदी के किनारे
हर शाम
इंतजार करती है आग
नदी के किनारे 


घर रहेंगे

घर रहेंगे, हमीं उनमें रह न पाएँगे :
समय होगा, हम अचानक बीत जाएँगे :
अनर्गल ज़िंदगी ढोते किसी दिन हम
एक आशय तक पहुँच सहसा बहुत थक जाएँगे

मृत्यु होगी खड़ी सम्मुख राह रोके,
हम जगेंगे यह विविधता, स्वप्न खो के,
और चलते भींड में कन्धे रगड़ कर हम
अचानक जा रहे होंगे कहीं सदियों अलग हो के

प्रकृति औ’ पाखण्ड के ये घने लिपटे
बंटे ऐंठे तार-

जिनसे कहीं गहरा, कहीं सच्चा,
मैं समझता- प्यार,
मेरी अमरता की नहीं देंगे ये दुहाई,
छीन लेगा इन्हें हमसे देह – सा संसार

राख सी सांझ, बुझे दिन की घिर जाएगी :
वही रोज संसृति का अपव्यय दुहाराएगी

रोते हँसते

जैसे बेबात हँसी आ जाती है
हँसते चेहरों को देख कर
जैसे अनायास आंसू आ जाते हैं
रोते चेहरों को देख कर
हँसी और रोने के बीच
काश, कुछ ऐसा होता रिश्ता
कि रोते-रोते हँसी आ जाती
जैसे हँसते-हँसते आंसू !




अंतिम ऊँचाई

कितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलब
अगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं
हमारे चारो ओर नहीं।
कितना आसान होता चलते चले जाना
यदि केवल हम चलते होते
बाकी सब रुका होता।

मैंने अक्सर इस ऊल-जुलूल दुनिया को
दस सिरों से सोचने और बीस हाथों से पाने की कोशिश में
अपने लिए बेहद मुश्किल बना लिया है।
शुरू-शुरू में सब यही चाहते हैं
कि सब कुछ शुरू से शुरू हो,
लेकिन अंत तक पहुँचते पहुँचते हिम्मत हार जाते हैं
हमें कोई दिलचस्पी नहीं रहती
कि वह सब कैसे समाप्त होता है
जो इतनी धूमधाम से शुरू हुआ था
हमारे चाहने पर।

दुर्गम वनों और ऊँचे पर्वतों को जीतते हुए
जब तुम अंतिम ऊँचाई को भी जीत लोगे –
तब तुम्हें लगेगा कि कोई अंतर नहीं बचा अब
तुममें और उन पत्थरों की कठोरता में
जिन्हें तुमने जीता है –
जब तुम अपने मस्तक पर बर्फ का पहला तूफ़ान झेलोगे
और कांपोगे नहीं –
तब तुम पाओगे कि कोई फर्क नहीं
सब कुछ जीत लेने में
और अंत तक हिम्मत न हारने में।  

ये पंक्तियाँ मेरे निकट


ये पंक्तियाँ मेरे निकट आईं नहीं
मैं ही गया उनके निकट
उनको मनाने,
ढीठ, उच्छृंखल अबाध्य इकाइयों को
पास लाने :
कुछ दूर उड़ते बादलों की बेसंवारी रेख,
या खोते, निकलते, डूबते, तिरते
गगन में पक्षियों की पांत लहराती :
अमा से छलछलाती रूप-मदिरा देख
सरिता की सतह पर नाचती लहरें,
बिखरे फूल अल्हड़ वनश्री गाती...
... कभी भी पास मेरे नहीं आए :
मैं गया उनके निकट उनको बुलाने,
गैर को अपना बनाने :
क्योंकि मुझमें पिण्डवासी
है कहीं कोई अकेली-सी उदासी
जो कि ऐहिक सिलसिलों से
कुछ संबंध रखती उन परायी पंक्तियों से !
और जिस की गांठ भर मैं बांधता हूं
किसी विधि से
विविध छंदों के कलावों से।   


आवाजें


यह आवाज़

लोहे की चट्टानों पर

चुम्बक के जूते पहन कर

दौड़ने की आवाज़ नहीं है

यह कोलाहल और चिल्लाहटें

दो सेनाओं के टकराने की आवाज़ है,


यह आवाज़

चट्टानों के टूटने की भी नहीं है

घुटनों के टूटने की आवाज़ है

जो लड़ कर पाना चाहते थे शान्ति

यह कराह उनकी निराशा की आवाज़ है,

जो कभी एक बसी बसाई बस्ती थी

यह उजाड़ उसकी सहमी हुई आवाज़ है,


बधाई उन्हें जो सो रहे बेख़बर नींद

और देख रहे कोई मीठा सपना,

यह आवाज़ उनके खर्राटों की आवाज़ है,


कुछ आवाज़ें जिनसे बनते हैं

हमारे अन्त:करण

इतनी सांकेतिक और आंतरिक होती है


कि उनके न रहने पर ही

हम जान पाते हैं कि वे थीं


सूक्ष्म कड़ियों की तरह

आदमी से आदमी को जोड़ती हुई

अदृश्य श्रृंखलाएं 


जब वे नहीं रहतीं तो भरी भीड़ में भी

आदमी अकेला होता चला जाता है


मेरे अन्दर की यह बेचैनी

ऐसी ही किसी मूल्यवान कड़ी के टूटने की
आवाज़ तो नहीं? 
   

इतना कुछ था


इतना कुछ था दुनिया में
लड़ने झगड़ने को
पर ऐसा मन मिला
कि ज़रा-से प्यार में डूबा रहा
और जीवन बीत गया
अच्छा लगा
पार्क में बैठा रहा कुछ देर तक
अच्छा लगा,
पेड़ की छाया का सुख
अच्छा लगा,
डाल से पत्ता गिरा- पत्ते का मन,
''अब चलूँ'' सोचा,
तो यह अच्छा लगा... 

प्यार के बदले

कई दर्द थे जीवन में :
एक दर्द और सही, मैंने सोचा-
इतना भी बे-दर्द होकर क्या जीना !
अपना लिया उसे भी
अपना ही समझ कर
जो दर्द अपनों ने दिया
प्यार के बदले...



(इस पोस्ट में प्रयुक्त चित्र गूगल इमेज के सौजन्य से.) 

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