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पीयूष कुमार का आलेख 'डॉ अंबेडकर और स्त्री सशक्तिकरण'

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पुरुष की सहचर होते हुए भी स्त्रियाँ समाज में वह स्थान प्राप्त करने के लिए हमेशा संघर्षशील दिखीं जिसकी वे हकदार थीं। नवजागरण के पश्चात कुछ ऐसे लोग सामने आए जिन्होंने स्त्रियों की बेहतरी के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए। राजाराम मोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, ज्योतिबा फुले के साथ साथ महात्मा गांधी और भीम राव अम्बेडकर ने भी कई ऐसे प्रयास किए जिससे स्त्रियों के जीवन में आमूलचूल बदलाव आए। कोलम्बिया विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई के दौरान अपने पिता के एक मित्र को पत्र में उन्होंने लिखा था, “हम एक बेहतर कल की कल्पना स्त्रियों को शिक्षित किये बिना नहीं कर सकते। ऐसा पुरुषों के समान स्त्रियों को शिक्षित कर के ही संभव है”।  आज अंबेडकर जयंती पर हम उनकी स्मृति को नमन करते हैं। आइए इस अवसर पर आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  पीयूष कुमार का आलेख 'डॉ अंबेडकर और स्त्री सशक्तिकरण'। डॉ अंबेडकर और स्त्री सशक्तिकरण पीयूष कुमार  समाज मे एक आदर्शवादी कामना के रूप में स्त्री का महिमामंडन तो बहुत है पर वास्तविकता बहुत उलट है। आज स्त्रियों की जो भी सकारात्मक स्थितियां हमे दिखती हैं, उसमें डॉ भीमराव अंबेड...

पीयूष कुमार का आलेख 'नौ कहानियों में नौ दिनों की नौ रातें'

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पीयूष कुमार  जैसे जैसे हम विकास की राह पर आगे बढ़ रहे हैं वैसे वैसे दिक्कतें बढ़ती जा रही हैं। साहित्य अपने समय के सरोकारों को बारीकी से दर्ज करने का काम करता है और इस क्रम में इन दिक्कतों को भी हमारे समय के कहानीकार दर्ज कर रहे हैं। विधा के अन्तर्गत देखें तो कहानियों में यह अभिव्यक्ति और सार्थक रूप में दिखाई पड़ती है। बया के हालिया प्रकाशित कहानी केंद्रित अंक ने एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। इस अंक में कुल सत्ताइस कहानियाँ शामिल है। पीयूष कुमार ने इन कहानियों में से नौ कहानियों को आधार बनाते हुए यह आलोचनात्मक आलेख लिखा है। ये नौ कहानीकार हैं : मधु काँकरिया, महेश दर्पण, रत्न कुमार सांभरिया, रामजी यादव, अंजलि देशपांडे, धनेश दत्त पांडेय, समीना खान, ममता शर्मा और सुमन शेखर। खुद पीयूष कुमार लिखते हैं "यह कहानियाँ जीवन सरोकार की कहानियों के लिहाज से चयनित की गई हैं जिनमें जीवन की कथा निराशा, टूटन, कायरता, जानलेवा संघर्ष, भय और सामाजिक-आर्थिक पराजय के रूप में नजर आती है। यह इस समय की प्रतिनिधि कहानियाँ हैं ऐसे में क्या यह मान लेना चाहिये कि उम्मीद और सुखांत का जीवन अब समाप्त हो गया...

पीयूष कुमार का आलेख 'मुक्तिबोध के पत्रों में जीवन और साहित्य'

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  मुक्तिबोध एक जमाना हुआ करता था जब लोग एक दूसरे को पत्र लिखा करते थे। इन पत्रों में अपनत्व की खुशबू होती थी। अक्षरों का सान्निध्य रोमांचित करता था। मोबाइल कल्चर ने पत्र लेखन की इस विधा को लगभग समाप्त कर दिया। रचनाकार भी तब इस पत्र लेखन के जरिए ही अपनी अभिव्यक्ति कर पाते थे। हिन्दी के कालजई कवि रचनाकार मुक्तिबोध के पत्रों का संसार व्यापक है। आई पत्रों से कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं। उनके पत्रों में साहित्य के अलावा कला, संस्कृति, समाज, शिक्षा, राजनीति, आंदोलन और वैश्विक मुद्दों पर विमर्श के तमाम विषय विस्तार से मिलते हैं। आज मुक्तिबोध के जन्मदिन पर  उनकी स्मृति को नमन करते हुए आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं पीयूष कुमार का आलेख 'मुक्तिबोध के पत्रों में जीवन और साहित्य'। 'मुक्तिबोध के पत्रों में जीवन और साहित्य' पीयूष कुमार गजानन माधव मुक्तिबोध को समझने में उनका पत्र साहित्य उतना ही उपयोगी है जितना उनका रचनात्मक साहित्य। मुक्तिबोध के पत्रों का संसार बड़ा था। उनके पत्रों में साहित्य के अलावा कला, संस्कृति, समाज, शिक्षा, राजनीति, आंदोलन और वैश्विक मुद्दों पर विमर्श क...

पीयूष कुमार का आलेख 'लोहे से बुनी तरल कामनाओं का कवि'

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  रजत कृष्ण  हमारे देश का किसान आज भी अपनी खेती के लिए पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है। प्रकृति ने साथ दिया तो जीवन जैसे तैसे साल भर चल जाता है। लेकिन प्रकृति ने कभी अपनी त्यौरियाँ चढ़ा लीं तो उनका जीवन कष्टकारी हो जाता है। सीधे सादे किसान सत्ताओं के आसान शिकार होते हैं। सभी उसे नोचने खसोटने में लगे रहते हैं। इसीलिए बतौर पीयूष कुमार ' रजत कृष्ण की जनपदीय चेतना में कुव्यवस्था के विरुद्ध धीमी सुलगती आग हैं। इस आग में तप कर उनकी कविताएँ कुंदन होने की यात्रा करती हैं। वे बहुस्तरीय और बहुआयमी जीवन की जटिलता को देख पाने और जाहिर कर सकने वाले कवि हैं। रजत कृष्ण की विशेषता है कि वे छोटी संवेदना का एकत्रीकरण कर विराट संदर्भों को पकड़ते हैं। उनकी कविताएँ महानगरीय भावबोध और जीवन से इतर लोक की सुदीर्घ यात्रा का प्रतिफल हैं। उनकी सभी कविताओं में लोक, जंगल और आम आदमी की व्यथा सरल सहज रूप में व्यंजित हुई हैं।' आज रजत कृष्ण का जन्मदिन है। पहली बार की तरफ से उन्हें जन्मदिन की बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए इस अवसर पर हम पहली बार पर पढ़ते हैं रजत कृष्ण पर केन्द्रित  पीयूष कुमार का आलेख 'लोहे ...