राकेश कुमार गुप्त का आलेख 'भगत सिंह आज क्यों जरूरी हैं?'
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| भगत सिंह |
'भगत सिंह आज क्यों जरूरी हैं?'
राकेश कुमार गुप्त
“भगत सिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति की सजा आज भी तुझे मिलेगी फाँसी की।”
गीतकार शैलेन्द्र की ये पंक्तियाँ पहली बार सुनने में भले ही एक काव्यात्मक अतिशयोक्ति लगें, लेकिन स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक अनुभवों के बीच इन्हें पढ़ें तो इनमें एक गहरी चेतावनी सुनाई देती है। सत्ता बदलती है, सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक दल बदलते हैं, कानून बदलते हैं, लेकिन सत्ता और असहमति के बीच तनाव का प्रश्न बना रहता है। कौन-सा विरोध देशहित है और कौन-सा देशविरोध? सरकार की आलोचना कहाँ तक नागरिक का अधिकार है और कहाँ से वह कानून की दृष्टि में अपराध बन जाती है? क्या राष्ट्र और सरकार एक ही चीज हैं? क्या सत्ता से असहमति राष्ट्र से असहमति है? और क्या देशभक्ति का प्रमाण सत्ता के प्रति निष्ठा है या देश के नागरिकों, संविधान और न्याय के प्रति निष्ठा?
भगत सिंह की जयंती इन प्रश्नों को पूछने का अवसर है, क्योंकि भगत सिंह केवल एक शहीद नहीं थे; वे प्रश्न पूछने वाले, पढ़ने वाले, लिखने वाले और अपने समय की स्थापित धारणाओं को चुनौती देने वाले युवा थे। 28 सितंबर 2026 को उनकी जन्मतिथि के 119 वर्ष पूरे हो रहे हैं। उनका जन्म 28 सितंबर 1907 को बंगा, लायलपुर जिले में हुआ था, जो अब पाकिस्तान के फैसलाबाद क्षेत्र में है। 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में उन्हें राजगुरु और सुखदेव के साथ फाँसी दे दी गई। वे केवल 23 वर्ष के थे।
लेकिन भगत सिंह की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं कि उन्होंने कम उम्र में मृत्यु को स्वीकार किया; उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने कम उम्र में विचार करना शुरू कर दिया था। उनके व्यक्तित्व को केवल साहस से नहीं समझा जा सकता। उसमें अध्ययन था, जिज्ञासा थी, संगठन की क्षमता थी, साहित्य के प्रति रुचि थी, राजनीतिक विश्लेषण था, वैज्ञानिक दृष्टिकोण था और सबसे बढ़ कर अपने ही विश्वासों को पुनः परखने का साहस था। यही कारण है कि भगत सिंह की विरासत को केवल शौर्य की कथा में बदल देना उनके वास्तविक व्यक्तित्व को छोटा कर देना है।
उनका जन्म ऐसे परिवार में हुआ था जिसमें औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राजनीतिक चेतना पहले से मौजूद थी। उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध सक्रिय थे। जन्म के समय भी परिवार का राजनीतिक वातावरण कारावास और औपनिवेशिक दमन से जुड़ा हुआ था। बचपन में ही जलियाँवाला बाग हत्याकांड, पंजाब का राजनीतिक वातावरण और क्रांतिकारी साहित्य जैसी घटनाओं ने उनके मानस को प्रभावित किया। भारत सरकार के अभिलेखों में भी उनके बचपन पर पारिवारिक राजनीतिक वातावरण, 1919 के जलियाँवाला बाग और करतार सिंह सराभा जैसे क्रांतिकारी प्रभावों का उल्लेख मिलता है।
लेकिन यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि भगत सिंह केवल जन्म से क्रांतिकारी थे। उनकी असली कहानी उनके वैचारिक परिवर्तन की कहानी है। आरंभिक राष्ट्रवादी भावनाओं से आगे बढ़कर उन्होंने इतिहास, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीति और विश्व की क्रांतिकारी धाराओं का अध्ययन किया। जेल में उनके लेखन और बची हुई सामग्री से उनके व्यापक अध्ययन का पता चलता है। भारत सरकार के डिजिटल अभिलेख के अनुसार, कारावास के दौरान उन्होंने साहित्य, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और इतिहास सहित अनेक विषयों का गंभीर अध्ययन किया।
यही वह बिंदु है जहाँ भगत सिंह को दूसरे अनेक लोकप्रिय शहीद-चरित्रों से अलग समझना चाहिए। वे केवल कार्रवाई करने वाले युवक नहीं थे; वे कार्रवाई के पीछे विचार की तलाश करने वाले युवक थे। उन्होंने संगठन बनाए, घोषणा पत्रों पर काम किया, लेख लिखे, राजनीतिक कार्यकर्ताओं को पत्र लिखे और अपने समय के प्रश्नों पर लगातार बहस की। उनके उपलब्ध लेखन की सूची में “The Problem of Punjab’s Language and Script”, “Beware, Ye Bureaucracy”, “Why I am an Atheist”, “To Young Political Workers”, “On the slogan of Long Live Revolution”, जेल से लिखे पत्र, भूख हड़ताल से संबंधित दस्तावेज और अदालत के वक्तव्य शामिल हैं।
1926 में 'नौजवान भारत सभा' का निर्माण इसी संगठनात्मक और वैचारिक विकास का महत्वपूर्ण चरण था। भारत सरकार के डिजिटल अभिलेखों के अनुसार, इसका उद्देश्य युवाओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को संगठित करना तथा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राजनीतिक चेतना विकसित करना था; इसके काम में छात्रों, मजदूरों और किसानों तक राजनीतिक विचार पहुँचाना शामिल था। अमृतसर क्षेत्र में सभा ने युवाओं, किसानों और मजदूरों को राजनीतिक रूप से सक्रिय करने तथा न्याय और समानता का संदेश फैलाने के लिए सभाएँ और प्रचार गतिविधियाँ कीं।
इस तथ्य को आज के संदर्भ में समझना जरूरी है। भगत सिंह का मॉडल केवल “एक महान व्यक्ति” का मॉडल नहीं था; वह संगठन और राजनीतिक शिक्षा का मॉडल भी था। आज सोशल मीडिया के दौर में राजनीति का बड़ा हिस्सा कुछ सेकंड के वीडियो, वायरल संदेश, मीम और नारे में बदल जाता है। भगत सिंह का तरीका इसके विपरीत था—पढ़ो, समझो, संगठन बनाओ, जनता के बीच जाओ और विचारों को बहस के लिए रखो। आज यदि भगत सिंह होते तो शायद वे केवल पोस्ट लिखने वाले युवक नहीं होते; वे पढ़ने और पढ़ाने वाले राजनीतिक कार्यकर्ता होते।
1928 में 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' का नाम बदल कर 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' किया जाना उनके वैचारिक विकास की दिशा को समझने में महत्वपूर्ण है। “सोशलिस्ट” शब्द उनके लिए सजावटी शब्द नहीं था। उनका चिंतन धीरे-धीरे इस निष्कर्ष की ओर बढ़ रहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी जब समाज में आर्थिक शोषण और सामाजिक असमानता के प्रश्न को भी संबोधित किया जाए। उनके राजनीतिक लेखन में मजदूर और किसान इसलिए बार-बार दिखाई देते हैं क्योंकि उनके लिए स्वतंत्रता केवल अंग्रेजी सत्ता से मुक्ति नहीं बल्कि शोषण से मुक्ति भी थी।
इसीलिए भगत सिंह को केवल राष्ट्रवादी कह देना भी उनके विचारों को अधूरा पढ़ना होगा। वे राष्ट्रवादी थे, लेकिन उनका राष्ट्रवाद सामाजिक न्याय से जुड़ा था। वे क्रांतिकारी थे, लेकिन उनके अंतिम राजनीतिक लेखन में क्रांति का अर्थ व्यापक सामाजिक परिवर्तन की ओर बढ़ता है। वे साम्राज्यवाद के विरोधी थे, लेकिन केवल विदेशी शासक को हटाना उनका अंतिम लक्ष्य नहीं था। वे उस समाज की कल्पना कर रहे थे जिसमें मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण समाप्त हो।
उनके विचारों का एक दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष था—सांप्रदायिकता का विरोध। यह तथ्य आज विशेष रूप से प्रासंगिक है। नौजवान भारत सभा के कार्यक्रम और भगत सिंह के लेखन में धार्मिक आधार पर राजनीतिक विभाजन के प्रति स्पष्ट विरोध दिखाई देता है। उनके लेखन में “सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज” तथा “अछूत का सवाल” जैसे विषयों पर विचार मिलता है। उनके लिए धर्म व्यक्तिगत विश्वास का विषय हो सकता था, लेकिन सांप्रदायिक राजनीति समाज को विभाजित करने वाली शक्ति थी।
यहाँ भगत सिंह की आधुनिकता समझ में आती है। वे उस दौर में सांप्रदायिकता को केवल धार्मिक विवाद के रूप में नहीं बल्कि राजनीतिक समस्या के रूप में देख रहे थे। आज जब किसी व्यक्ति की नागरिकता, देशभक्ति या राष्ट्रवाद को उसके धार्मिक परिचय के आधार पर परिभाषित करने की प्रवृत्तियाँ सार्वजनिक बहस में दिखाई देती हैं, तब भगत सिंह का यह आग्रह याद आता है कि मनुष्य को पहले मनुष्य और नागरिक के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके लिए राष्ट्र का निर्माण धार्मिक पहचान की प्रतिस्पर्धा से नहीं बल्कि साझा राजनीतिक उद्देश्य से होना था।
इसी क्रम में “अछूत का सवाल” विशेष महत्व रखता है। भगत सिंह ने सामाजिक असमानता को केवल विदेशी शासन की समस्या नहीं माना। वे समझते थे कि यदि भारतीय समाज अपने भीतर जातिगत अपमान और भेदभाव को बनाए रखता है तो केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं होगी। आज जब संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है और समानता भारतीय गणराज्य का मूल सिद्धांत है, तब भगत सिंह के सामाजिक प्रश्नों को पढ़ना केवल इतिहास पढ़ना नहीं, बल्कि यह देखना भी है कि स्वतंत्रता का सामाजिक अर्थ कितना पूरा हुआ है।
उनके व्यक्तित्व की सबसे असाधारण विशेषताओं में से एक थी—स्वतंत्र चिंतन। “मैं नास्तिक क्यों हूँ” इसका सबसे प्रसिद्ध प्रमाण है। अक्टूबर 1930 में जेल में लिखे गए इस लेख में भगत सिंह ने अपने नास्तिक होने का कारण किसी व्यक्तिगत अहंकार में नहीं माना। उन्होंने अपने विश्वास की बौद्धिक व्याख्या की और यह भी बताया कि कठिन परिस्थितियों में अपने विचार पर टिके रहना आसान नहीं होता। यह लेख उनके धार्मिक मत से सहमत या असहमत होने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण इसलिए है कि वह व्यक्ति को अपने विश्वासों की आलोचनात्मक जाँच करने की चुनौती देता है।
आज के समय में इस लेख का महत्व और बढ़ जाता है। हम ऐसे समय में रहते हैं जहाँ सोशल मीडिया पर लाखों लोग बिना जाँच किए किसी संदेश को सच मान लेते हैं। राजनीतिक प्रचार और तथ्य के बीच अंतर करना कठिन होता जा रहा है। झूठी खबरें भावनाओं को भड़काती हैं और भावनात्मक उत्तेजना अक्सर तर्क को पीछे धकेल देती है। भगत सिंह का जीवन हमें इसके विपरीत रास्ता दिखाता है—विश्वास करो, लेकिन प्रश्न भी करो; किसी बात को इसलिए सही मत मानो कि उसे कोई लोकप्रिय व्यक्ति कह रहा है; विचार को उसकी प्रसिद्धि से नहीं, उसके तर्क और प्रमाण से परखो।
यही बात उनके राजनीतिक जीवन में भी दिखाई देती है। वे अपने प्रिय नेताओं की भी आलोचना कर सकते थे। उनके लिए किसी व्यक्ति की लोकप्रियता उसे आलोचना से ऊपर नहीं बनाती थी। यह लोकतांत्रिक संस्कृति का मूल तत्व है। आज यदि कोई नागरिक सरकार की आलोचना करता है तो उसके विचार से असहमत हुआ जा सकता है, उसके तर्क का उत्तर दिया जा सकता है, उसके तथ्य की जाँच की जा सकती है; लेकिन उसे केवल इसलिए राष्ट्र-विरोधी कहना कि उसने सरकार की आलोचना की, लोकतांत्रिक बहस को कमजोर करता है।
यहाँ शैलेन्द्र की पंक्तियाँ फिर हमारे सामने लौटती हैं—“देशभक्ति की सजा आज भी तुझे मिलेगी फाँसी की।” इन पंक्तियों का अर्थ आज किसी व्यक्ति को शाब्दिक रूप से फाँसी मिलने की भविष्यवाणी करना नहीं है। इनका गहरा अर्थ यह है कि सत्ता और राष्ट्र को एक समझने की भूल से बचना चाहिए। ब्रिटिश शासन में सरकार का विरोध औपनिवेशिक शासन का विरोध था। स्वतंत्र भारत में सरकार और राष्ट्र का संबंध अलग है। लोकतंत्र में सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी संस्था है; वह राष्ट्र का पर्याय नहीं है।
इसीलिए “देशद्रोह” और “राजद्रोह” जैसे शब्दों के इस्तेमाल में विशेष सावधानी आवश्यक है। वर्तमान भारतीय आपराधिक कानून में पुरानी IPC धारा 124A उसी रूप में नहीं रखी गई है। Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 में धारा 152 भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कुछ कृत्यों के संबंध में प्रावधान करती है। इसलिए सरकार की आलोचना, राजनीतिक असहमति, कठोर भाषण और संप्रभुता या अखंडता के विरुद्ध वास्तविक आपराधिक कृत्य—इन सबको एक ही श्रेणी में डाल देना विधिक रूप से उचित नहीं है।
यहाँ भगत सिंह की प्रासंगिकता किसी एक राजनीतिक पक्ष को सही ठहराने में नहीं बल्कि लोकतांत्रिक विवेक की कसौटी उपलब्ध कराने में है। यदि कोई व्यक्ति सरकार की नीति की आलोचना करता है तो उसके कथन को तथ्य और कानून के आधार पर परखा जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति वास्तव में हिंसा, अलगाव या देश की संप्रभुता और अखंडता के विरुद्ध अपराध करता है तो उसके विरुद्ध कानून लागू होना चाहिए। लेकिन दोनों स्थितियों के बीच अंतर मिटा देना नागरिक स्वतंत्रता और कानून के शासन दोनों के लिए खतरनाक होगा।
भगत सिंह स्वयं इस अंतर की जटिलता से बाहर नहीं थे। उनका जीवन औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध सशस्त्र क्रांतिकारी कार्रवाई से जुड़ा था। सांडर्स की हत्या में उनकी भूमिका और 8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय विधान सभा में बम फेंकने की घटना इतिहास के निर्विवाद हिस्से हैं। भारत सरकार के एक आधिकारिक विवरण में भी सांडर्स की हत्या को लाला लाजपत राय की मृत्यु के प्रतिशोध की योजना से जोड़ते हुए यह दर्ज है कि लक्ष्य स्कॉट था लेकिन सांडर्स मारे गए।
लेकिन Assembly Bomb Case में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने गिरफ्तारी से बचने की कोशिश नहीं की। भारत सरकार के अभिलेख के अनुसार उन्होंने दो ऐसे विधेयकों के विरोध में केंद्रीय विधानसभा में बम फेंका जिन्हें वे दमनकारी मानते थे और गिरफ्तारी दी। बाद के लेखन और वक्तव्यों में उन्होंने अपनी कार्रवाई की राजनीतिक व्याख्या की।
इतिहास को ईमानदारी से पढ़ने का अर्थ यही है कि भगत सिंह को केवल रोमांटिक नायक या केवल हिंसक क्रांतिकारी की एक पंक्ति में सीमित न किया जाए। उनके जीवन में सशस्त्र क्रांतिकारी कार्रवाई थी, लेकिन उनके अंतिम वैचारिक विकास में राजनीतिक शिक्षा, जनसंगठन, समाजवाद, तर्कवाद और सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा भी थी। उनके व्यक्तित्व की जटिलता को स्वीकार करना ही उन्हें समझना है।
उनकी जेल-यात्रा भी इसी वैचारिक संघर्ष का महत्वपूर्ण अध्याय है। भूख हड़ताल और राजनीतिक बंदियों की स्थिति को लेकर उनका संघर्ष व्यक्तिगत सुविधा का संघर्ष नहीं था। उन्होंने जेल में राजनीतिक कैदियों के साथ व्यवहार के प्रश्न को सार्वजनिक राजनीतिक मुद्दा बनाया। जेल उनके लिए निष्क्रिय प्रतीक्षा का स्थान नहीं बनी; वह अध्ययन, लेखन, बहस और राजनीतिक चिंतन का स्थान भी बनी। उनके उपलब्ध दस्तावेजों की बड़ी संख्या इसी काल से आती है।
और फिर आता है वह पत्र, जो किसी भी राजनीतिक घोषणा पत्र से अधिक मानवीय है—छोटे भाई कुलतार सिंह के नाम 3 मार्च 1931 का पत्र।
“अजीज कुलतार,
आज तुम्हारी आँखों में आँसू देख कर बहुत दुख हुआ। आज तुम्हारी बातों में बहुत दर्द था, तुम्हारे आँसू मुझसे सहन नहीं होते।
बरखुर्दार, हिम्मत से शिक्षा प्राप्त करना और सेहत का ख्याल रखना। हौसला रखना और क्या कहूँ!
उसे यह फ़िक्र है हरदम नया तर्ज़े-ज़फा क्या है,
हमे यह शौक़ है देखें सितम की इन्तहा क्या है।
दहर से क्यों खफ़ा रहें, चर्ख़ का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू सही, आओ मुकाबला करें।
कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहले-महफ़िल,
चराग़े-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ।
हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली,
ये मुश्ते-ख़ाक है फानी, रहे रहे न रहे।
अच्छा रुख़सत।
खुश रहो अहले-वतन; हम तो सफ़र करते हैं। हिम्मत से रहना।
नमस्ते।”
इन पंक्तियों में भगत सिंह का पूरा व्यक्तित्व जैसे एक साथ दिखाई देता है—भाई के आँसू से विचलित होने वाला संवेदनशील युवक, मृत्यु को सामने देख कर भी भय से मुक्त क्रांतिकारी, शिक्षा को महत्व देने वाला विचारक और अपने शरीर की क्षणभंगुरता को समझने वाला व्यक्ति। “मुश्ते-ख़ाक” अर्थात मिट्टी की मुट्ठी समाप्त हो सकती है, लेकिन “ख़याल की बिजली” बनी रह सकती है। यही उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।
आज जब युवा राजनीति का बड़ा हिस्सा तात्कालिक लोकप्रियता, डिजिटल छवि और सोशल मीडिया की दृश्यता के इर्द-गिर्द घूमता है, भगत सिंह की यह विरासत अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे लोकप्रिय हुए, लेकिन लोकप्रियता के लिए नहीं जिए। उन्होंने अपने जीवन को किसी चुनावी पद, राजनीतिक पुरस्कार या व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के लिए नहीं बनाया। उनका लक्ष्य राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन था। इसलिए आज उनके नाम का इस्तेमाल करने वालों से अधिक महत्वपूर्ण यह देखना है कि उनके विचारों में से कितना वास्तव में हमारे सार्वजनिक जीवन में मौजूद है।
क्या आज का युवा पढ़ रहा है? क्या वह संविधान पढ़ता है? क्या वह इतिहास को कई स्रोतों से पढ़ता है? क्या वह विरोधी विचारधारा की किताब पढ़ने को तैयार है? क्या वह अपने नेता के गलत होने की संभावना स्वीकार करता है? क्या वह सोशल मीडिया की वायरल सूचना को प्रमाणित करता है? क्या वह जाति और धर्म से परे मनुष्य को नागरिक के रूप में देखता है? क्या वह गरीब, मजदूर, किसान और वंचित के प्रश्न को अपने राष्ट्रवाद का हिस्सा मानता है? इन प्रश्नों का सामना करते हुए भगत सिंह केवल अतीत के नायक नहीं रह जाते; वे वर्तमान के शिक्षक बन जाते हैं।
उनकी प्रासंगिकता का एक और आयाम है—राजनीतिक चेतना। भगत सिंह समझते थे कि केवल भावनात्मक राष्ट्रवाद पर्याप्त नहीं है। जनता को राजनीतिक रूप से शिक्षित करना आवश्यक है। नौजवान भारत सभा का काम केवल युवाओं को उत्तेजित करना नहीं था; वह उन्हें राजनीतिक विचारों से परिचित कराने का प्रयास भी था। आज लोकतंत्र में यह काम और महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि मतदाता के सामने सूचनाओं की कमी नहीं बल्कि विश्वसनीय और अविश्वसनीय सूचनाओं में अंतर करने की समस्या है।
आज एक वीडियो लाखों लोगों तक पहुँच सकता है, लेकिन एक गलत सूचना भी उतनी ही तेजी से फैल सकती है। ऐसे समय में भगत सिंह का “पढ़ो और सोचो” वाला व्यक्तित्व किसी भी नारे से अधिक प्रासंगिक है। उनकी क्रांति का सबसे आधुनिक रूप शायद यही है कि नागरिक अपने मस्तिष्क को प्रचार का निष्क्रिय माध्यम न बनने दें।
उनकी विरासत हमें यह भी बताती है कि राष्ट्रवाद और सामाजिक न्याय को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करना ऐतिहासिक रूप से अधूरा दृष्टिकोण है। भगत सिंह के लिए राष्ट्र की स्वतंत्रता का अर्थ जनता की मुक्ति से जुड़ा था। इसलिए आज जब आरक्षण, जातिगत भेदभाव, बेरोजगारी, शिक्षा, श्रम-अधिकार, किसान, सामाजिक असमानता और आर्थिक विषमता जैसे प्रश्न सामने आते हैं, तो भगत सिंह को केवल “भारत माता की जय” के नारे तक सीमित कर देना उनके सामाजिक चिंतन को अदृश्य कर देना होगा।
उनकी दृष्टि में क्रांति कोई एक दिन की घटना नहीं थी। वह चेतना में परिवर्तन की प्रक्रिया थी। यही कारण है कि उनका जीवन हमें बताता है कि लोकतंत्र में परिवर्तन केवल चुनाव से नहीं आता। कानून बनते हैं, संस्थाएँ काम करती हैं, नागरिक संगठित होते हैं, पत्रकार प्रश्न पूछते हैं, विद्यार्थी बहस करते हैं, किसान और मजदूर अपनी माँग रखते हैं, न्यायपालिका कानून की व्याख्या करती है और जनता अंततः सत्ता को जवाबदेह बनाती है। यह सब लोकतांत्रिक परिवर्तन की अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं।
भगत सिंह को आज के समय में जीवित रखने का अर्थ इसलिए किसी एक विचारधारा को उनका प्रमाणपत्र देना नहीं हो सकता। उन्हें दक्षिणपंथ, वामपंथ, राष्ट्रवाद, समाजवाद या किसी अन्य राजनीतिक खाँचे में पूरी तरह कैद कर देना उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को छोटा करना होगा। उनके जीवन का सबसे बड़ा सबक शायद यही है कि व्यक्ति किसी तैयार विचारधारा का केवल अनुयायी न बने; वह पढ़े, सोचे, तर्क करे और अपनी समझ विकसित करे। और शायद इसी कारण भगत सिंह आज भी सत्ता के लिए असुविधाजनक प्रश्न और नागरिक के लिए प्रेरक प्रश्न दोनों बने रह सकते हैं। वे पूछते हैं—स्वतंत्रता किसके लिए? राष्ट्र किसका? विकास किसके लिए? कानून किसके लिए? न्याय किसके लिए? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या नागरिक को सवाल पूछने का अधिकार है?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर लोकतांत्रिक और संवैधानिक ढंग से खोजे जाएँ तो भगत सिंह की प्रासंगिकता किसी एक सरकार के समर्थन या विरोध में नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय की निरंतर खोज में दिखाई देगी।
आज उनके जन्म दिवस पर उन्हें याद करने का सबसे आसान तरीका उनकी तस्वीर पर माला चढ़ाना है। उससे थोड़ा कठिन है “इंकलाब जिंदाबाद” बोलना। लेकिन सबसे कठिन है उनके जैसा पढ़ना, अपने विचारों को बदलने की क्षमता रखना, लोकप्रिय धारणाओं पर प्रश्न करना, सांप्रदायिकता का विरोध करना, सामाजिक अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना और अपने विचारों की कीमत चुकाने का साहस रखना।
भगत सिंह ने अपने अंतिम पत्र में लिखा था—“खुश रहो अहले-वतन; हम तो सफ़र करते हैं।” उनका सफर समाप्त हो गया, लेकिन उनका विचार आज भी हमारे बीच है। उनकी देह 23 वर्ष में समाप्त हो गई, लेकिन उनकी बौद्धिक यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है। शायद इसलिए कि उन्होंने स्वयं अपने शरीर और विचार के बीच अंतर समझ लिया था—
“हवा में रहेगी मेरे ख़याल की बिजली,
ये मुश्ते-ख़ाक है फ़ानी, रहे रहे न रहे।”
इसलिए भगत सिंह की जयंती पर असली सवाल यह नहीं है कि हम उन्हें कितना पूजते हैं। असली सवाल यह है कि हम उनके विचारों को कितना आत्मसात करते हैं और उनसे कितना सीखते हैं।
क्योंकि भगत सिंह की सबसे बड़ी विरासत उनका बलिदान नहीं, केवल उनका साहस भी नहीं; उनकी सबसे बड़ी विरासत है—स्वतंत्र मस्तिष्क।
वह मस्तिष्क जो सत्ता से प्रश्न कर सके, अपने प्रिय से भी असहमति कर सके, धर्म को निजी आस्था और राजनीति को सार्वजनिक उत्तरदायित्व के रूप में समझ सके, जाति और सांप्रदायिकता से ऊपर मनुष्य को देख सके, शोषण के विरुद्ध खड़ा हो सके और देशभक्ति को सरकार की प्रशंसा नहीं बल्कि देश के लोगों के प्रति जिम्मेदारी समझ सके।
शायद इसी अर्थ में शैलेन्द्र की वे पंक्तियाँ आज फिर हमारे सामने खड़ी हैं—
“भगत सिंह है इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति की सजा आज भी तुझे मिलेगी फाँसी की।”
लेकिन आज की लोकतांत्रिक चुनौती यह है कि किसी भगत सिंह को फिर फाँसी तक पहुँचने की नौबत ही क्यों आए। ऐसी लोकतांत्रिक संस्कृति बने जिसमें सरकार की आलोचना को देशद्रोह समझने के बजाय उसका उत्तर तर्क और तथ्य से दिया जाए; जहाँ नागरिक को प्रश्न पूछने के लिए देशभक्ति का प्रमाण न देना पड़े; जहाँ विरोधी विचार रखने वाला व्यक्ति शत्रु नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संवाद का सहभागी माना जाए। तभी भगत सिंह को याद करना वास्तव में सार्थक होगा। क्योंकि भगत सिंह को जीवित रखने का अर्थ उनकी प्रतिमा को जीवित रखना नहीं, उनके प्रश्नों को जीवित रखना है।
और जब तक भारत में कोई नौजवान यह पूछता रहेगा कि “अन्याय क्यों है?”, “असमानता क्यों है?”, “सत्ता जवाबदेह क्यों नहीं है?”, “नागरिक को प्रश्न पूछने से डरना क्यों चाहिए?”—तब तक भगत सिंह केवल इतिहास में नहीं, भारत के वर्तमान में भी जीवित रहेंगे।
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| राकेश गुप्त |

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