शर्मिला जालान के उपन्यास पर संजय गौतम की समीक्षा
हमारे समाज में लड़कियों की शादी संस्कार से ज्यादा एक समस्या के रूप में जानी जाती है। जब भी किसी लड़की का पिता शादी के लिए किसी लड़के के दरवाजे पर जाता है तो लड़के वाले आभिजात्य भिखमंगेपन की शुरुआत कर देते हैं। उन्हें लड़की पढ़ी लिखी तो चाहिए ही, सुन्दर भी चाहिए। भले ही लड़के की सूरत जो हो। किसी भी लड़की के लिए त्रासद वह समय होता है जब उसे शादी के लिए लड़के वालों को दिखाया जाता है। उसे त्रासद होता है उसे रिजेक्ट किया जाना। लेकिन लड़की की संवेदनाओं से उन्हें क्या मतलब जो पत्थरदिल होते हैं। वैसे भी हमारे समाज में आज भी लड़कियों को रोज ही जिन स्थितियों का शिकार होना पड़ता है वह भयावह है। सच कहें तो लड़कियों के मामले में हमारी सोच पूरी तरह पारम्परिक और रूढ़िवादी है। शर्मिला जालान के उपन्यास 'शादी से पेशतर' पढ़ते हुए संजय गौतम उचित ही लिखते हैं "फिर वही सवाल सामने आ जाता है कि एक समाज के रूप में क्या हम वहीं ठहरे हैं या कुछ आगे बढ़े हैं, या आगे न जा कर हम कुछ पीछे हो गए हैं, हो रहे हैं, पहले से ज्यादा क्रूर हो रहे हैं। लड़कियां आखिर क्या करें। करियर की ऊँचाई पर होने के बावजूद भी घर-परिवार समाज के लिए अभी वह वही हैं महज एक लड़की, जिसके इर्द-गिर्द फंदे ही फंदे हैं। यह उपन्यास जितना 'लड़की कैसी हो?' सवाल से टकरा रहा है, उससे कहीं ज्यादा 'समाज कैसा है' के सवाल से टकरा रहा है'। किसी भी उपन्यास के लिए इससे बढ़ कर और क्या हो सकता है कि वह अपने छपने के 25 साल बाद भी प्रासंगिक लगे और उसे फिर से पढ़ते हुए एक समीक्षक लिखने के लिए बेचैन हो जाए। तो आइए आज पहली बार बात हम पढ़ते हैं शर्मिला जालान के उपन्यास पर संजय गौतम की समीक्षा 'शादी से पेशतर पढ़ते हुए'।
'शादी से पेशतर पढ़ते हुए'
संजय गौतम
'शादी से पेशतर' उपन्यास पहली बार 2001 में छपा था, यानी उसका रचना काल वीसवीं शताब्दी के आखिरी वर्षों में था। तब उपन्यास की लेखिका शर्मिला 'बोहरा' थीं, यानी लेखिका खुद शादीशुदा नहीं थीं। शादी के लिए इंतजार कर रही लड़कियों का सूक्ष्म पर्यवेक्षण कर रही थीं, उनके जीवन को टटोल रही थीं, उनकी आकांक्षाओं के परों की पहचान कर रही थीं, उनके खिलंदड़ेपन के बीच में शामिल थीं, उनके माता-पिता की दयनीय स्थितियों को देख रही थीं, लेखन के उछाह से भरी हुई थीं और अपने समय के बनते हुए यथार्थ और बुनते हुए सपनों को बड़ी मासूमियत से दर्ज कर रही थीं। इस दर्ज करने में आँखों की नई दृष्टि थी, तरल, सरल और प्रवाहपूर्ण भाषा थी, मर्म को पकड़ने की कला थी, गहरी संवेदनशीलता थी और विचारों का उद्वेलन पैदा करने की क्षमता थी।
उन्नीस सौ नब्बे के बाद एक तरफ दुनिया 'ग्लोबल' हो रही थी। दुनिया का सब कुछ स्थानीय बाजार तक पहुँचाने के लिए ठेलमठेल शुरू हो गई थी। लोगों की आँखों को, दिलों को सपने बेचे जा रहे थे। आँखों के सामने टी. वी. था, जिससे दुनिया घरों में पहुँच रही थी, तरह-तरह के फैशन अपने आप लोगों के दिलों में उतर रहे थे। 'कर लो दुनिया मुट्ठी में' एक नारे की तरह युवा दिलों का सपना बन रहा था। महानगर में पढ़ने वाली लड़कियां भी तरह तरह के नए-नए कोर्सों को देखते सुनते हुए आगे बढ़ने की जद्दोजहद में थीं, लेकिन शादी जैसी समस्या जों की त्यों बनी हुई थी। इस मामले में हमारा समाज अपनी पुरानी शैली में बँधा हुआ था, जहां लड़कियों को देखने छाँटने और दहेज लेने-देने के अपने पैमाने थे, माता-पिता के ऊपर अपने सामाजिक दबाव थे, उनकी अपनी सोच थी। नए सपनों और उस सोच के बीच बहुत अंतर था। एक तरफ नएपन की आकांक्षा का प्रवाह था, उसके अपने अंतर्विरोध थे, तो दूसरी तरफ परंपराओं का दबाव था। सारी अंतर्विरोधी परिस्थितियां मिल कर गहरे भँवर का निर्माण कर रही थीं। इस उपन्यास में उसी गहरे भँवर को पकड़ने का प्रयास किया गया है जिसमें कभी आदमी डूबता हुआ नजर आता है तो कभी उससे उबरता हुआ। शादी के लिए प्रतीक्षारत लड़कियों के बहाने से हमारा पूरा समाज ही कोलाज के रूप में तैरता रहता है और हम स्वयं उस भंवर में डूबते-उतराते रहते हैं। कभी अपराध में शामिल होते हुए, कभी उसे तटस्थ भाव से देखते हुए। उपन्यास एक त्रासद मार्मिकता रचता हुआ अपने समय को हमारे सामने कर देता है और हमें ग्लानि से भर देता है। यह हमें सोचने को मजबूर कर देता है कि एक समाज के रूप में लड़कियों के मामले में हम कहाँ ठहरे हुए हैं। एक तरफ आधुनिकता और बाज़ार का प्रवाह, दूसरी तरफ हमारी सोच का ठहराव हमारे जीवन को कैसे एक त्रासद मर्म में बदल देता है, उसी का मार्मिक दस्तावेज बन गया है यह उपन्यास छब्बीस वर्ष पहले जब यह छपा था, तब भी मैंने पढ़ा था और शर्मिला बोहरा की समय को देखने की ताजी दृष्टि ने विस्मय से भर दिया था। और आज जब इस उपन्यास को पेपरबैक संस्करण के रूप में पुनर्जीवित देख रहा हूँ, तो आह्लाद का अनुभव कर रहा हूँ। कहीं न कहीं उपन्यास के प्रति मन में बसा विश्वास पुनर्जीवन पा रहा है कि इसकी मार्मिक कथा की यात्रा ही नहीं पूरी की, जीवन का एक लंबा दौर पार कर लिया है।
आज भी उतनी ही ताजी है और इसे हर परिवार के बीच पहुंचना चाहिए। अब उपन्यास पर शर्मिला जालान नाम है। उन्होंने 'बोहरा' से 'जालान' तक की यात्रा पूरी हो नहीं की, जीवन का एक लम्बा दौर पार कर लिया है।
अब जब मैं इसे पढ़ रहा हूँ तो स्वयं दो बेटियों का पिता हूँ, जो अपने करियर के लिए संघर्ष कर रही हैं। पढ़ते समय मैं कभी बेटियों को देखता हूँ, कभी खुद को, कभी समाज को कि क्या इसमें कुछ बदलाव हुआ है, क्या हम कुछ आगे बढ़े हैं। इस उपन्यास को पढ़ते समय कुछ घटनाओं की छायाएं भी हैं, जो मेरे सामने अखबार के माध्यम से आई और बेटियों के सामने सोशल मीडिया के माध्यम से। बेटियों ने ही उसकी चर्चा की। आज भी महिला न्यायाधीश के घर में, वकील की पत्नी के रूप में दहेज के लिए मरती हुई लड़की के बारे में देख-सुन कर बेटियां उद्वेलन एवं आक्रोश से भरी हुई चर्चा कर रही थीं। एक बेटी का इस घटना को ले कर गुस्सा इतना ज्यादा था, समाज के प्रति वितृष्णा इतनी गहरी थी कि वह फफक कर रो पड़ी। इस बात पर कि एक लड़की के रूप में, एक महिला के रूप में हम कहाँ है। इस घटना का क्रोध थमा नहीं था कि अपने मंगेतर की पहाड़ से ढकेल कर हत्या करने की घटना सामने आई। मेरी छोटी मनोवैज्ञानिक बेटी माथा पर हाथ धरे कह रही थी, हम कहाँ हैं, क्या कर रहे हैं, हमारे भरोसे का क्या होगा, हो क्या रहा है। मनोविज्ञान का अध्ययन करते हुए भी वह समझ नहीं पा रही है कि हम कहां जा रहे हैं, क्या हो रहा है, कैसे बदलेगा हमारा समाज, कैसे संतुलित होगा हमारा परिवार। मैं देख रहा हूं कि बेटियां हमसे ज्यादा उद्वेलित हैं, चिंतित हैं, आक्रोशित हैं।
उपन्यास का नया संस्करण पढते हुए ये छायाएं भी मन में डोल रही हैं और बराबर मन में यह प्रश्न तैर रहा है कि छब्बीस साल बाद भी क्या हम कहीं आगे बढ़े हैं, खैर!
अभी भी उपन्यास का पाठ मेरे लिए वैसे ही प्रवाहपूर्ण है। इसकी बेचैनियां मुझे वैसे ही बेचैन कर रही हैं। कहानी के बारे में कहीं डॉ. नामवर सिंह जी ने कहा है कि कहानी की एक कसौटी यह भी है कि बेचैनियां शब्दों में न आएं, बल्कि पात्रों की क्रियाओं में प्रकट हों। इस कथा में क्रियाओं में ही बेचैनियां व्यक्त होती रहती हैं। पूर्णिमा और मीता दो सगी बहने ही नहीं हैं, दो अलग-अलग स्वभाव की प्रतिमूर्ति भी हैं। पूर्णिमा बड़ी है, गंभीर है, कम बोलती है, आक्रोश को भी दबा ले जाती है, आकांक्षाओं को भी समय और परिस्थिति के सामने दबा ले जाती है। मीता छोटी है, तुरंत उत्तर देती है, दबती नहीं है, पापा के सामने भी डट कर खड़ी हो जाती है, नई-नई आकांक्षाओं की वाहक है, मम्मी के यथास्थितिवाद एवं भय के प्रति गुस्सा है तो स्नेह भी है।
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| शर्मिला जालान |
वैसे तो कथा पूर्णिमा की शादी तय करने की यात्रा के इर्द-गिर्द चलती है, लेकिन तरह- तरह के परिवारों की तरह-तरह की यात्रा इसमें गुंथी हुई है। जया की अलग यात्रा है तो नीरू की अलग। राजुला की अलग। सबके घरों की अपनी समस्यायें हैं, सबकी अपनी आकांक्षाएं हैं। प्रेम विवाह से ले कर अरेंज मैरेज तक सब कुछ घुला मिला चलता है। सबके अपने विचार हैं और सबकी संतुष्टि के अपने मानक है। जिस तरह समाज में हर तरह के लोग हैं, उसी तरह उपन्यास में भी हैं, लेकिन इसकी धुरी शादी ही है। शादी तय होने के प्रकरण में अभी भी अगुवा, दलाल, पंडित, ज्योतिष, मंदिर, पूजा, व्रत, चढ़ावा उसी तरह अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं, जो समाज के ठहराव और अन्तर्विरोधों को गहराई से दर्ज करते हैं। नाते रिश्तेदारों का दिखावा, समाज का दबाव परिवार पर बोझ बन का कहर ढा रहा है।
पूर्णिमा के इर्द-गिर्द रहते भी तीन पीढ़ियों का जीवन और उनकी शादी की समस्याएं कथा में बड़े रोचक ढंग से पिरोई गई हैं। पूर्णिमा की दादी, बुआ, ताई, मौसी, फूफा का जीवन सामने आता है, जो समाज को पीढ़ियों के अंतराल में और समग्रता से देखने में मदद करता है। नौकर-चाकर, भिखारी-मंदिर, टैक्सी ड्राइवर, नए नए उभरते हुए एपार्टमेंट, उसमें काम करते हुए गार्ड का जीवन, नए-नए जन्म लेते कोर्स- पर्सनल ग्रूमिंग का कोर्स, हिप्नोटिज्म का कोर्स, ब्यूटीशियन का कोर्स, पब्लिक स्पीकिंग का कोर्स और इनसे जुड़े हुए लोगों का जीवन पूर्णिमा और मीता की गतिविधियों के साथ ही उभरता है और समाज का पूरा चित्र हमारी आँखो के सामने दर्ज करता है। पब्लिक स्पीकिंग के कोर्स के बहाने से हमारी राजनीति का चरित्र भी बड़े रोचक तरीके से सामने आता है और लेखकीय चेतना के बहुआयामी होने के प्रति हमारे विश्वास को बढ़ाता है। रोज नए बढ़ते धोखे के धंधे कैसे हमारे जीवन को, हमारी युवा पीढ़ी को अपने माया-जाल में फाँस रहे हैं, यह देखते बनता है। कालेजों की सीढ़ियों पर गप लड़ाती लड़कियों का खिलंदड़ापन, हँसी-मजाक, प्रेम उछाह, जीवन की नई रोशनी के प्रति चमकती हुई आँखे, गर्ल फ्रेंड, ब्याय फ्रेंड का सहज उल्लास और बिछुड़ने की पीड़ा, कहीं पीड़ा से भी तटस्थता हमे अनजाने भावलोक में उतरने का मौका देता है। शर्मिला यौनजन्य ऐंद्रिकता की ओर बढ़ती तो हैं, लेकिन 'बोल्ड' होने की परिधि में न जा कर उसे मार्मिक रूप में संभाल लेती हैं। इस तरह वह अपने को उन लेखिकाओं से अलग कर लेती हैं, जो कथित बोल्डनेस की धारा में पन्ने दर पन्ने यौन चित्रण को बढ़ाती हुई अपने खुलेपन और साहसी होने का प्रमाण देती है। उसका रचनात्मक प्रभाव क्या होता है, यह अलग विचार का विषय है।
पूर्णिमा के परिवार के लिए शादी की प्रतीक्षा एक बेचैन यातना में बदल जाती है। माँ का अपना कष्ट है, जो पिता से अलग कुछ सोच नहीं सकतीं। उन्होंने ऐसे ही अपना जीवन काट लिया है, जैसे हमारे समाज की अधिकांश माएं काट लेती हैं, अपने परिवार के लिए मरते-जीते हुए। पापा के ऊपर पीढ़ियों का संस्कार है, आर्थिक दबाव है, आधुनिक जीवन और लड़कियों के समक्ष उपजती विवशता है। एक ओर वह लड़कियों के लिए तानाशाह हैं, पत्नी के लिए निर्मम पति हैं, तो दूसरी ओर लड़के वालों के सामने विवश दयनीय पिता भी। अपनी बेटी का जीवन अपने संस्कारों के हिसाब से न सँवार पाने वाले क्षोभ से भरे हुए पिता थी। अपनी बेटियों का दर्द समझते हुए भी न प्रकट करने वाली बेचैनी से जूझते हुए, भूख-प्यास खोने वाले पिता, घर से बाहर निकल जाते हुए या गले में तार कसते हुए पिता स्वयं में ही त्रासदी बन जाते हैं। लेकिन यही पिता पूर्णिमा के गहरे अवसाद में होने पर जब चुपचाप भोर में उठ कर उसके सिर पर हाथ फेरते हैं तो उनके त्रास की मार्मिकता और बढ़ जाती है। 'नाक का काँटा' के माध्यम से माँ की बेचैनी और यातना उनकी सारी क्रियाओं और संवादों में प्रकट है।
सभी अध्यायों के शीर्षकों के साथ लिखे गए इस उपन्यास का आखिरी अध्याय 'बगल में छोरा गाँव में ढिंढोरा' पूर्णिमा और मीता के अपनी यातना को, पीड़ा को, अवकुंठा को, खिलंदड़ेपन के साथ मजाकिया लहजे में मौसी ही नहीं, पूरे समाज के प्रति व्यंग्य में तब्दील कर देने के रचनात्मक कौशल, गल्प कला और अभिव्यक्ति की क्षमता के लिए याद रहेगा। अपने बेकार पड़े सामानों को दूसरे के मत्थे सलटाने की कला में प्रवीण होते जा रहे समाज की प्रतिनिधि के रूप में अपनी सगी मौसी उर्मिला का बेटी नीरू के विवाह से बची सामग्री को बहन को देने एवं पैसा वसूलने की नीयत से आने को मीता ने एक अवसर में बदल दिया। विवाह और लड़के के तलाश की चर्चा चलते ही मीता ने नीरू के जुड़वा बेटे होने की कामना के साथ उन्हीं से अपना और पूर्णिमा दीदी के विवाह प्रस्ताव भी रख दिया। दोनों बहने ताल-सुर मिला कर मौसी को जो बनाती है तो बनाती ही चली जाती हैं। अंत में मौसी अपना सामान समेट बिना खाए-पिए जाने को उद्यत होती हैं। कहती हैं तुम लोगों को कुछ तो समझना चाहिए कि हँसी-मजाक की भी एक सीमा होती है। पूर्णिमा ने मौसी की हथेली दबा कर कहा- "ठीक कहती हो मौसी, मौसी हमें समझना चाहिए। अब हम ऐसी बात नहीं करेंगे, पर तुम भी तो समझो"।
पूर्णिमा के कहे गए वाक्य 'पर तुम भी तो समझो' के तुम में सिर्फ मौसी ही नहीं पूरा समाज शामिल है। फिर वही सवाल सामने आ जाता है कि एक समाज के रूप में क्या हम वहीं ठहरे हैं या कुछ आगे बढ़े हैं, या आगे न जा कर हम कुछ पीछे हो गए हैं, हो रहे हैं, पहले से ज्यादा क्रूर हो रहे हैं। लड़कियां आखिर क्या करें। करियर की ऊँचाई पर होने के बावजूद भी घर-परिवार समाज के लिए अभी वह वही हैं महज एक लड़की, जिसके इर्द-गिर्द फंदे ही फंदे हैं। यह उपन्यास जितना 'लड़की कैसी हो?' सवाल से टकरा रहा है, उससे कहीं ज्यादा 'समाज कैसा है' के सवाल से टकरा रहा है। अभी भी इसकी टकराहट की गूंज बनी हुई है। इसे ज्यादा से ज्यादा परिवार तक पहुंचा पाएं तो हमारी सोच में कुछ विचलन होगा, ऐसा विश्वास बनता है। कहने की जरूरत नहीं कि इसकी यह क्षमता, इसकी तरलता, प्रवाह और सही जगह पर मर्म को उभारने के शिल्प कौशल में है, जिससे उपन्यास की निजता बनती है।
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| संजय गौतम |
सम्पर्क
मोबाइल : 9454219233



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