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दिविक रमेश से महेश पुनेठा की बातचीत

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  दिविक रमेश  भारत विभिन्न बोलियों, भाषाओं, संस्कृतियों का देश है। गांवों का देश होने के कारण यहां लोक की व्याप्ति हर स्तर पर देखी, सुनी और महसूस की जा सकती है।  कथाएं, काव्य, गीत और उक्तियां लोक के साथ कुछ ऐसी घुली मिली हैं कि इन्हें आम तौर पर लोक कथाएं, लोक काव्य, लोक गीत, लोकोक्तियाँ ही कहा जाता है। इस लोक में खेती किसानी से जुड़े हर काम के लिए गीत है। हर तीज, त्यौहार, मौसम और संस्कार के लिए गीत हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश आज की शिक्षा का स्वरूप कुछ इस तरह का है कि बच्चे अपने समाज की लोक कथाओं, लोक काव्य, लोक गीत आदि से लगातार दूर होते जा रहे हैं। अपनी जड़ों से कट कर ये जीवन के बारे में कितना जान समझ पाएंगे, यह एक यक्ष प्रश्न है। कवि महेश पुनेठा ने वरिष्ठ साहित्यकार दिविक रमेश के साथ शैक्षिक दखल के लिए "लोक जीवन और शिक्षा" को ले कर एक लंबी बातचीत की है जो काफी महत्त्वपूर्ण है। यह बातचीत 'शैक्षिक दखल' पत्रिका के जनवरी-जुलाई, 2025 अंक में प्रकाशित हुआ है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  दिविक रमेश से महेश पुनेठा की बातचीत। साक्षात्कार ...

महेश चन्द्र पुनेठा की कविताएं

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  महेश चन्द्र पुनेठा  रोटी, कपड़ा और मकान किसी भी व्यक्ति की आधारभूत जरूरत होती है। मकान इसमें सबसे जटिल संरचना होती है। इसे बना पाना मुश्किल भरा होता है। अपनी जरूरतों में कटौती काट कर एक व्यक्ति जैसे तैसे घर बनाता है। मकान बनाने से पहले व्यक्ति स्थितियों परिस्थियों को देख समझ कर निर्णय लेता है। लेकिन आज की परिस्थितियां कुछ इस तरह की हैं कि घर में धूप और हवा तक मिल पाना सपना हो जाता है। इस तरह आम आदमी का सपना कभी पूरा हो ही नहीं पाता। महेश पुनेठा गझिन संवेदनाओं के कवि हैं। आस पास की सामान्य सी दिखने वाली घटनाओं को जिस सहज तरीके वे अपने कविताओं के विषय रूप में ढालते हैं, वह उतना आसान होता नहीं है। आज महेश का जन्मदिन है। पहली बार की तरफ से प्रिय कवि को बधाई। आइए इस अवसर पर आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं महेश चन्द्र पुनेठा की कविताएं। महेश चन्द्र पुनेठा की कविताएं एक टुकड़ा धूप सालों तक  सीलन भरे मकानों में रहते-रहते  एक धूप भरा मकान उसका सपना बन गया।   न खा, न लगा कर  उसने अपना एक मकान खड़ा किया  उसने कुछ नहीं देखा  उस जगह पर मकान बनाने से पहले  सि...

महेश चंद्र पुनेठा का आलेख 'तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी'

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महेश चन्द्र पुनेठा  पहली बार का आर्काइव देखते हुए कुछ ऐसी सामग्री मिली जिसका हम अपरिहार्य कारणों से तत्काल प्रकाशित नहीं कर पाए थे। आगे से हम हर महीने  आर्काइव की कोई एक सामग्री आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगे। इस कड़ी की शुरुआत हम कर रहे हैं महेश चन्द्र पुनेठा की इस पोस्ट से। महेश चन्द्र पुनेठा न केवल एक बेहतर कवि हैं बल्कि वे एक बेहतर आलोचक भी हैं। इधर महेश ने कई महत्वपूर्ण आलेख लिख कर इस तथ्य को सच साबित किया है। इसी कड़ी में प्रस्तुत है महेश का कबीर पर यह  सारगर्भित आलेख - तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी। जिसमें इन्होने अपने तर्कों द्वारा यह बात रखी है कि कबीर क्यों हमारे लिए आज भी जरू री  हैं।       'तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी' महेश चन्द्र पुनेठा      छः सौ साल से अधिक व्यतीत हो चुके  हैं पर आज भी कबीर  जिंदा हैं। न केवल किताबों में बल्कि लोकमन में भी। उनकी ऐेसी अनेक पंक्तियाँ हैं जो पढ़े-लिख...

महेश चन्द्र पुनेठा की कविताएँ

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  महेश चन्द्र पुनेठा विकास एक ऐसा शब्द है, जो तमाम तरह के भ्रम पैदा करता है। एक सवाल यह भी है कि आखिरकार वह विकास किस काम का जो हमारी पृथिवी, जो हमारी प्रकृति को ही नुकसान पहुंचा ता है। हम सबका अस्तित्व इस पृथिवी और इस प्रकृति से ही है। ताज्जुब की बात तो यह है कि हम इस हरी भरी धरती को विनाश के कगार पर ले जा रहे हैं जबकि अपने रहने के लिए अंतरिक्ष में ठिकाने ढूंढ रहे हैं। उत्तराखंड में पंचेश्वर बांध बनना प्रस्तावित है जो दुनिया का दूसरा सबसे ऊँचा बाँध होगा। इस बाँध से होने वाले विस्थापन पर महेश ने कुछ उम्दा कविताएँ लिखी हैं। हाल ही में महेश पुनेठा का नया कविता संग्रह 'अब पहुँची हो तुम' प्रकाशित हुआ है। कवि को बधाई देते हुए आज हम पहली बार पर प्रस्तुत कर रहे हैं महेश चन्द्र पुनेठा की कविताएँ। महेश चन्द्र पुनेठा की कविताएँ   उड़भाड़   कितना बुरा होता है उड़भाड़ होना यदि जाड़ों की रात हो तो और भी बुरा  पूरा शरीर पसीना-पसीना हो जाता है  ओढ़ा बिस्तर फेंक दो  तो ठण्ड से कंपकपी छूटने लगती है  आंखों से नींद लापता करवट बदलो  पर किसी भी करवट नींद नहीं बार-बार मोबाई...