संदेश

भगत सिंह लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

शैलेन्द्र चौहान का आलेख 'मेरी हवाओं में रहेगी, ख़यालों की बिजली'

चित्र
भगत सिंह  भारतीय इतिहास में भगत सिंह एक धूमकेतु की तरह आते हैं। अचानक अपनी चमक बिखेरते हैं और फिर रुखसत हो जाते हैं। भगत सिंह की क्रांतिकारी विचारधारा हालांकि क्षणिक दिखाई पड़ती है लेकिन उसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की दिशा को मोड़ने का महत्त्वपूर्ण काम किया। भारत का हर युवा भगत सिंह की क्रांतिकारी चेतना से प्रभावित हुआ और शीघ्र ही वह वातावरण बनने लगा जिसमें अंग्रेजों के लिए यहाँ लम्बे समय तक टिक पाना दुष्कर हो गया। भगत सिंह प्रबुद्ध थे। वे ऐसे भारत की कल्पना करते थे जिसमें सामाजिक समरसता जैसी वास्तविक स्वतंत्रता हो।  शैलेन्द्र चौहान अपने आलेख में लिखते हैं 'भगत सिंह की राजनीतिक चेतना का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष था—शोषण और असमानता से मुक्त समाज की कल्पना। वे राजनीतिक स्वतंत्रता को अंतिम लक्ष्य नहीं मानते थे। उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ ऐसा समाज भी था जिसमें मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण समाप्त हो। इसीलिए उनकी दृष्टि में राष्ट्रवाद केवल राष्ट्र की सीमाओं तक सीमित विचार नहीं था। उसमें सामाजिक न्याय और आर्थिक बराबरी का प्रश्न भी शामिल था।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शैलेन्द्र चौ...

राकेश कुमार गुप्त का आलेख 'भगत सिंह आज क्यों जरूरी हैं?'

चित्र
  भगत सिंह  भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के कई आयाम थे। एक तरफ गांधी जी जहां अहिंसा को केन्द्र में रख कर अपनी नीतियां बना रहे थे तो वहीं दूसरी तरफ भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी थे जो मानते थे कि बहरों को आवाज सुनाना जरूरी है। आश्चर्य होता है कि इतनी कम उम्र पाने के बावजूद भगत सिंह ने कितना कुछ पढ़ा लिखा था। उनके लेख और विचार पढ़ते हुए हम ताज्जुब से भर जाते हैं कि कितनी कम उम्र में ही वे धर्म की रूढ़ियों से बाहर निकल आए थे। इस क्रम में उनका आलेख 'मैं नास्तिक क्यों हूं' उनकी तार्किक क्षमता और प्रगतिशील सोच का अप्रतिम उदाहरण है। अपने आलेख में राकेश गुप्त लिखते हैं 'क्या राष्ट्र और सरकार एक ही चीज हैं? क्या सत्ता से असहमति राष्ट्र से असहमति है? और क्या देशभक्ति का प्रमाण सत्ता के प्रति निष्ठा है या देश के नागरिकों, संविधान और न्याय के प्रति निष्ठा? भगत सिंह की जयंती इन प्रश्नों को पूछने का अवसर है, क्योंकि भगत सिंह केवल एक शहीद नहीं थे; वे प्रश्न पूछने वाले, पढ़ने वाले, लिखने वाले और अपने समय की स्थापित धारणाओं को चुनौती देने वाले युवा थे।' आज भगत सिंह के जन्मदिन पर हम उनकी स्मृति ...

कनक तिवारी का आलेख 'भगत सिंह के प्रयोग'

चित्र
   जिस समय भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन पर गांधी जी का वर्चस्व था। जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस समाजवादी मूल्यों के साथ जनता से जुड़ने की कोशिश कर रहे थे, उस समय भगत सिंह ने अपने विचारों और कृत्यों से पूरे भारत का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट कर लिया। भगत सिंह का जीवन लगभग साढ़े तेइस वर्षों का था। (28 सितंबर 1907 को जन्मे भगत सिंह को ब्रितानी हुकूमत ने 23 मार्च 1931 को उनके साथी  शिवराम, राजगुरु और सुखदेव सिंह के साथ फांसी दे दी थी।) लेकिन उनके विचार सुचिन्तित और परिपक्व थे। ऐसे युवा पर कोई भी देश फख्र कर सकता है। भगत सिंह के फांसी के मुद्दे पर स्वयं गांधी जी भारतीय जनता की आलोचना के केन्द्र में आ गए। यद्यपि भगत सिंह का रास्ता गांधी जी से अलग था तथापि उनके मन में गांधी जी के लिए पर्याप्त आदर और सम्मान था। आज भगत सिंह का जन्मदिन है। आज का दिन इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि हम अपना मूल्यांकन खुद कर सकें कि जिस भारत का सपना हमारे पुरखे के तौर पर भगत सिंह ने देखा था, क्या हम उस तरफ कुछ कदम भी बढ़ पाए हैं। जयंतियाँ ढोंग रचने के लिए नहीं मनाई जानी चाहिए। जयंतियाँ इसलिए मनाई जानी चाह...

भगत सिंह का आलेख 'युवक!'

चित्र
  भगत सिंह  हमारे राष्ट्र की नींव न जाने कितने युवाओं के खून से तैयार हुई है। आजादी की लड़ाई में युवाओं का योगदान अविस्मरणीय रहा है। इन युवाओं में अग्रणी नायक थे भगत सिंह।  भगत सिंह काफी पढ़ाकू थे और लेख लिखते रहते थे। कई मौकों पर तो उन्होंने अपने आलेख छद्म नाम से लिखे। उन्होंने अपना आलेख 'युवक' बलवन्त सिंह के नाम से लिखा था जो ‘साप्ताहिक मतवाला’ (वर्ष : 2, अंक सं. 36, 16 मई, 1925) में प्रकाशित हुआ था। इस लेख की चर्चा ‘मतवाला’ के सम्पादकीय कर्म से जुड़े आचार्य शिवपूजन सहाय की डायरी में भी मिलती है। लेख से पूर्व यहाँ 'आलोचना’ में प्रकाशित डायरी के उस अंश को भी उद्धृत किया जा रहा है। आज भगत सिंह का शहीदी दिवस है। इस अवसर पर भगत सिंह की स्मृति को हम नमन करते हैं।आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  भगत सिंह का आलेख 'युवक!' इस आलेख को हमने   www.marxists.org से साभार लिया है। 'युवक!' भगत सिंह सन्ध्या समय सम्मेलन भवन के रंगमंच पर देशभक्त की स्मृति में सभा हुई। ... भगतसिंह ने ‘मतवाला’ (कलकत्ता) में एक लेख लिखा था : जिसको सँवार-सुधार कर मैंने ...

भगत सिंह का आलेख धर्म और हमारा स्वतन्त्रता संग्राम'

चित्र
  कोई भी लड़ाई चिन्तन और वैचारिक प्रतिबद्धता के बगैर नहीं लड़ी जा सकती। अमरीकी क्रान्ति हो या फ्रांस की क्रान्ति, बोलशेविक क्रान्ति हो या फिर भारत का स्वाधीनता आन्दोलन इन सबमें एक बात जो समान रूप से सब पर लागू होती है, वह है कि इसके पुरोधा वैचारिक रूप से परिपक्व थे। भगत सिंह एक प्रतिबद्ध क्रान्तिकारी थे। उनके अपने उसूल थे, जिससे वे कभी डिगे नहीं। भगत सिंह बहुत पढ़ाकू थे। समय समय पर वे अपने विचार लेख के रूप में समकालीन पत्र पत्रिकाओं में व्यक्त करते रहते थे। धर्म  ऐसा ही एक मसला है, जो उस समय भारतीय स्वाधीनता संग्राम को भी गहरे तौर पर प्रभावित कर रहा था। इसी क्रम में धर्म पर अपने विचार प्रकट करते हुए भगत सिंह ने स्पष्ट रूप से लिखा 'हमारी आजादी का अर्थ केवल अंग्रेजी चंगुल से छुटकारा पाने का नाम नहीं। वह पूर्ण स्वतंत्रता का नाम है जब लोग परस्पर घुल-मिल कर रहेंगे और दिमागी गुलामी से भी आजाद हो जायेंगे।' भगत सिंह का यह आलेख किरती' नामक पत्र के मई, 1928 संस्करण में प्रकाशित हुआ था। शहीदी दिवस पर नमन करते हुए आज हम पहली बार पर प्रस्तुत कर रहे हैं भगत सिंह का आलेख 'धर्म और हमार...

भगत सिंह का आलेख 'अछूत का सवाल'

चित्र
      पुरातन काल से ही भारत की एक बड़ी समस्या अछूत समस्या रही है। इस समस्या ने देश के सामने कई उलझनें खड़ी कीं तथा  काफी क्षति पहुंचाई। आजादी की लड़ाई के समय भी यह समस्या हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को लगातार परेशान करती रही। इसी क्रम में  काकीनाडा में 1923 में कांग्रेस अधिवेशन में मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने अध्यक्षीय भाषण में दलितों को, जिन्हें उन दिनों 'अछूत' कहा जाता था, हिन्दू और मुस्लिम मिशनरी संस्थाओं में बांट देने का सुझाव दिया। हिन्दू और मुस्लिम अमीर लोग इसे पक्का करने के लिए धन खर्चने को भी तैयार थे। दरअसल दलित प्रश्न स्वराज के व्यापक प्रश्न की अंतर्धारा के रूप में चलता रहा। बहस के इस वातावरण में भगत सिंह ने 'अछूत का सवाल' नामक लेख लिखा जो जून, 1928 के 'किरती' में विद्रोही नाम से प्रकाशित हुआ। इस आलेख को हमने 'क्रान्ति की धार विचारों की सान पर तेज होती है' पुस्तिका से साभार लिया है। इसका संपादन विकास नारायण राय ने किया है और यह साहित्य उपक्रम, फरीदाबाद, हरियाणा से प्रकाशित है। आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं भगत सिंह का आलेख 'अछूत का सवाल...