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संतोष पटेल का आलेख "राष्ट्रवाद की कलई खोलती रवींद्रनाथ टैगोर की कृति: ‘घरे बाइरे’ "

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'राष्ट्र' और 'राष्ट्रवाद' क्या है, इसे ले कर कई सवाल मन में सहज ही उठ खड़े होते हैं। आज दुनिया भर में राष्ट्रवाद का शोर कुछ ज्यादा ही है। दरअसल यह भी एक तरह का उन्माद है जिसे उन लोगों द्वारा समय समय पर इसे इसलिए हवा दी जाती है कि जो सत्ता पर येन केन प्रकारेण अपनी पकड़ बनाए रखना चाहते हैं। राष्ट्रवाद अपने आप में बुरा नहीं है लेकिन उग्र राष्ट्रवाद हमेशा भयावह होता है। हालांकि तात्कालिक रूप से यह उन्माद लोगों को एकबद्ध करता है लेकिन इतिहास गवाह है कि यह राष्ट्र को दूरगामी नुकसान पहुंचाता है। दुनिया ने अब तक जो दो विश्व युद्धों की भयावहता देखी है उसके शुरू होने में इस उग्र राष्ट्रवाद की बड़ी भूमिका रही है।  1857 के पश्चात भारत में कई कारकों की वजह से राष्ट्रवाद की भावना जागृत हुई जिसने आगे चल कर अंग्रेजों के उपनिवेशवाद के समक्ष कड़ी चुनौती प्रस्तुत की। राष्ट्रवाद पर गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर का अपना अलग और खुला नजरिया था। उन्होंने अपनी रचनाओं और लेखों में बार-बार कहा था कि " 'राष्ट्र' (Nation) की अवधारणा मूल रूप से एक पश्चिमी आयात है जो यांत्रिक और शोषणकारी है...

संतोष पटेल का आलेख 'ज़ुबिन गर्ग : संगीत के सम्राट और मानवता के दूत'

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  ज़ुबिन गर्ग जुबिन गर्ग (18 नवम्बर 1972 – 19 सितम्बर 2025) असम के प्रख्यात गायक थे। वे संगीत निर्देशक, गीतकार, संगीतकार, फिल्म अभिनेता, निर्माता, निर्देशक, वादक, कवि के साथ साथ सामाजिक कार्यकर्ता भी थे। उन्होंने असमीया, हिन्दी, बंगाली, बोड़ो, राजबंशी (कमतापुरी/गोलपारिया), चाय बागानी भाषा, हाजोंग, मिशिंग, कार्बी, गारो, राभा, डिमासा, आहोम, देउरी, नेपाली, भोजपुरी, विष्णुप्रिया मणिपुरी, ककबरक, उड़िया, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, अंग्रेजी, मलयालम, मराठी, संस्कृत, सिन्धी, उर्दू आदि अनेक भाषाओं में गीत गाए।  जुबिन गर्ग ने तीन साल की उम्र से ही गाना शुरू कर दिया था। उनकी पहली गुरु उनकी माँ थीं, जहाँ से उन्होंने गाना सीखा और फिर उन्होंने पंडित रॉबिन बनर्जी से 11 साल तक तबला सीखा। गुरु रमानी राय ने उन्हें असमिया लोक से परिचित कराया। गर्ग अपने स्कूल के दिनों से ही गीतों की रचना कर रहे थे और गायकों को गाने के लिए देते थे। 19 सितम्बर 2025 को सिंगापुर में स्कूबा डाइविंग दुर्घटना के बाद जुबीन गर्ग का निधन हो गया। पानी के नीचे उन्हें सांस लेने में दिक़्क़त हुई, वहाँ से बचाने के बाद कार्ड...

संतोष पटेल का आलेख 'भिखारी ठाकुर का नाटक गंगा स्नान'

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  कल शरद पूर्णिमा थी। गुरुनानक जी के अवतरण का दिन। इस दिन समूचे उत्तर भारत में नदियों में सामूहिक स्नान की परम्परा रही है। देश में तमाम नदियां हैं लेकिन गंगा का भारतीय लोक परम्परा में खासा महत्त्व है ऐसे में नदी स्नान को आमतौर पर गंगा स्नान भी कहा जाता है। भिखारी ठाकुर का एक नाटक ही 'गंगा स्नान' नाम से है। भिखारी ठाकुर ने अपने नाटकों में उन रूढ़ियों पर कड़ा प्रहार किया है जिसने सामाजिक समरसता की राह में पग पग पर बाधाएं खड़ी की हैं। गंगा की जो दुर्दशा हमने कर डाली है कि वह नहाने की तो बात ही छोड़िए छूने लायक नहीं रह गई है। कवि संतोष पटेल ने भिखारी ठाकुर के नाटक 'गंगा स्नान' के बहाने कुछ महत्त्वपूर्ण बातें की हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  संतोष पटेल का आलेख 'भिखारी ठाकुर का नाटक गंगा स्नान'। 'भिखारी ठाकुर का नाटक गंगा स्नान' संतोष पटेल भिखारी ठाकुर के लिखे नाटक 'गंगा असनान' को आज खूब तन्मयता से पढ़ा। यह नाटक उनकी रचनावली में दर्ज है। इस नाटक के पढ़ने के उपरांत साहित्य अकादमी से प्रकाशित डॉ. तैयब हुसैन पीड़ित की पुस्तक 'भिखारी ठाकुर'...

संतोष पटेल की कविताएं

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  संतोष पटेल परिचय डॉ संतोष पटेल जन्म - 4 मार्च, 1974, बेतिया, बिहार पिता : डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना माता: श्रीमती चिंता देवी शिक्षा : पीएच-डी (विषय: भोजपुरी साहित्य में दलित चेतना के स्वर, इग्नू नई दिल्ली) अंग्रेजी,  हिंदी, भोजपुरी, बुद्धिज्म और ट्रांसलेशन स्टडीज में एम. ए., अंग्रेजी में एम. फिल.  संपादक - भोजपुरी ज़िन्दगी,  साथ ही पूर्वांकुर (हिंदी - भोजपुरी),  डिफेंडर (हिंदी- इंग्लिश-  भोजपुरी), रियल वाच (हिंदी), उपासना समय (हिंदी) और झेलम न्यूज़ के सम्पादन से भी जुड़े हुए हैं। भोजपुरी कविताएँ एम. ए. (भोजपुरी पाठ्यक्रम, जे पी विश्वविद्यालय) में चयनित " भोजपुरी गद्य-पद्य संग्रह-संपादन - प्रो शत्रुघ्न कुमार  सदस्य - भोजपुरी सर्टिफिकेट कोर्स निर्माण समिति, इग्नू, दिल्ली। प्रकाशन -  भोजपुरी  भोर भिनुसार,  अदहन, अछरंग (भोजपुरी कविता संग्रह) और 'अपने देसवा निक बा' भोजपुरी कहानी संकलन हिंदी  काव्य संग्रह शब्दों की छाँव में,  जारी है लड़ाई, नो क्लीन चिट, कारक के चिन्ह...