संतोष पटेल का आलेख "राष्ट्रवाद की कलई खोलती रवींद्रनाथ टैगोर की कृति: ‘घरे बाइरे’ "



'राष्ट्र' और 'राष्ट्रवाद' क्या है, इसे ले कर कई सवाल मन में सहज ही उठ खड़े होते हैं। आज दुनिया भर में राष्ट्रवाद का शोर कुछ ज्यादा ही है। दरअसल यह भी एक तरह का उन्माद है जिसे उन लोगों द्वारा समय समय पर इसे इसलिए हवा दी जाती है कि जो सत्ता पर येन केन प्रकारेण अपनी पकड़ बनाए रखना चाहते हैं। राष्ट्रवाद अपने आप में बुरा नहीं है लेकिन उग्र राष्ट्रवाद हमेशा भयावह होता है। हालांकि तात्कालिक रूप से यह उन्माद लोगों को एकबद्ध करता है लेकिन इतिहास गवाह है कि यह राष्ट्र को दूरगामी नुकसान पहुंचाता है। दुनिया ने अब तक जो दो विश्व युद्धों की भयावहता देखी है उसके शुरू होने में इस उग्र राष्ट्रवाद की बड़ी भूमिका रही है। 1857 के पश्चात भारत में कई कारकों की वजह से राष्ट्रवाद की भावना जागृत हुई जिसने आगे चल कर अंग्रेजों के उपनिवेशवाद के समक्ष कड़ी चुनौती प्रस्तुत की। राष्ट्रवाद पर गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर का अपना अलग और खुला नजरिया था। उन्होंने अपनी रचनाओं और लेखों में बार-बार कहा था कि " 'राष्ट्र' (Nation) की अवधारणा मूल रूप से एक पश्चिमी आयात है जो यांत्रिक और शोषणकारी है। ‘घरे बाइरे’ में वे संदेश देते हैं कि राष्ट्र कोई भौगोलिक टुकड़ा या मिट्टी का ढेर नहीं है, बल्कि वह वहाँ रहने वाले मनुष्यों के चरित्र और उनके आपसी संबंधों से बनता है।" संतोष पटेल ने गुरुदेव के विचारों के हवाले से राष्ट्रवाद पर एक महत्त्वपूर्ण आलेख लिखा है जो वर्तमान समय में समीचीन है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं संतोष पटेल का आलेख "राष्ट्रवाद की कलई खोलती रवींद्रनाथ टैगोर की कृति: ‘घरे बाइरे’ "।


विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर को स्मरण करते हुए, उनकी पावन स्मृतियों को नमन करते हुए मैं यह साझा करना चाहता हूँ कि वर्ष 2006 में मैंने अंग्रेज़ी विषय में एम.फिल. किया था। मेरा शोध-विषय था— “Problems of Translating Rabindranath Tagore’s The Home and the World”. अनुवाद-प्रक्रिया को समझने के लिए मैंने पहले मूल बांग्ला कृति 'घरे-बाइरे' तथा उसके अंग्रेज़ी रूपांतर 'The Home and the World' का अध्ययन किया। इस क्रम में सुरेन्द्र नाथ टैगोर द्वारा किया गया अनुवाद विशेष रूप से उल्लेखनीय लगा, जो इंटरएक्टिव ट्रांसलेशन का एक अनूठा उदाहरण है। दरअसल, इस अंग्रेज़ी अनुवाद में स्वयं टैगोर ने सुरेन्द्र नाथ टैगोर के साथ मिल कर कार्य किया था—अर्थात् मूल लेखक और अनुवादक की साझी उपस्थिति इसे विशिष्ट बनाती है। इसके अतिरिक्त, मैंने हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में कार्यरत प्रो. निवेदिता सेन द्वारा अनूदित संस्करण का भी अध्ययन किया, जो मूल कृति के अत्यंत समीप प्रतीत होता है। इस पर विस्तार से चर्चा फिर कभी करूँगा। वस्तुतः, इस उपन्यास के अध्ययन से विश्वकवि की व्यापक दृष्टि और गहन वैचारिकता को समझने का अवसर मिला। प्रस्तुत आलेख उसी शोध-कार्य पर आधारित है।

संतोष पटेल 


"राष्ट्रवाद की कलई खोलती रवींद्रनाथ टैगोर की कृति: ‘घरे बाइरे’ "


संतोष पटेल


रवींद्रनाथ टैगोर केवल एक कवि या साहित्यकार ही नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे दृष्टा थे जिन्होंने अपने समय से बहुत आगे जा कर मानवता और राष्ट्रवाद के अंतर्संबंधों की व्याख्या की थी। 1916 में प्रकाशित उनका कालजयी उपन्यास ‘घरे बाइरे’ (घर और बाहर) राष्ट्रवाद की उस अवधारणा पर प्रहार करता है, जो कट्टरता, उन्माद और संकीर्णता की नींव पर खड़ी होती है। यह उपन्यास आज के वैश्विक परिदृश्य में और भी प्रासंगिक हो जाता है, जहाँ राष्ट्रवाद अक्सर 'दूसरे' के प्रति घृणा और हिंसा का रूप लेता दिखाई देता है।


 ऐतिहासिक और वैचारिक पृष्ठभूमि

‘घरे बाइरे’ की रचना उस समय हुई थी जब भारत में स्वदेशी आंदोलन और बंग-भंग विरोधी लहर चरम पर थी। टैगोर स्वयं आरंभ में स्वदेशी आंदोलन से जुड़े थे, लेकिन जब उन्होंने देखा कि यह आंदोलन धीरे-धीरे धार्मिक कट्टरता, गरीब किसानों के शोषण और हिंसा की ओर बढ़ रहा है, तो उन्होंने इससे दूरी बना ली। यह उपन्यास उसी मोहभंग और वैचारिक संघर्ष की उपज है। उपन्यास के तीन मुख्य पात्र—निखिलेश, बिमला और संदीप—मानव स्वभाव और राजनीतिक विचारधाराओं के तीन अलग-अलग ध्रुवों का प्रतिनिधित्व करते हैं।


निखिलेश: मानवीय राष्ट्रवाद और विवेक का प्रतीक

निखिलेश इस उपन्यास का सबसे धैर्यवान और दार्शनिक पात्र है। वह एक जमींदार है, लेकिन उसका हृदय उदारवादी और मानवतावादी है। निखिलेश का मानना है कि 'सत्य' किसी भी राष्ट्रवाद से बड़ा है। वह अपनी पत्नी बिमला को घर की चहारदीवारी से निकाल कर बाहरी दुनिया के अनुभवों से रूबरू कराना चाहता है, ताकि उसका व्यक्तित्व स्वतंत्र रूप से विकसित हो सके।


निखिलेश के माध्यम से टैगोर यह तर्क देते हैं कि यदि राष्ट्रवाद के नाम पर हम अपनी नैतिकता और सत्य का त्याग कर देते हैं, तो वह राष्ट्रवाद अंततः विनाशकारी ही होगा। निखिलेश कहता है, "मैं अपने देश को प्रेम करता हूँ, लेकिन मेरा प्रेम इतना संकुचित नहीं है कि वह सत्य और मानवता की बलि चढ़ा दे।" वह स्वदेशी आंदोलन के उस तरीके का विरोध करता है जहाँ विदेशी सामान जलाने के नाम पर गरीब गरीब दुकानदारों और किसानों को प्रताड़ित किया जाता है। निखिलेश का राष्ट्रवाद आत्म-सुधार और रचनात्मकता पर आधारित है, न कि विध्वंस पर।


संदीप: उग्र राष्ट्रवाद और पाखंड का चेहरा

संदीप निखिलेश का मित्र है, लेकिन वैचारिक रूप से उसका धुर विरोधी। वह उग्र राष्ट्रवाद का चेहरा है, जिसके लिए साध्य (आजादी) ही सब कुछ है, साधन की पवित्रता का उसके लिए कोई महत्व नहीं है। संदीप एक कुशल वक्ता है और भीड़ को उकसाने में माहिर है। वह राष्ट्र को एक 'देवी' (भारत माता) के रूप में पूजने की वकालत करता है, ताकि लोगों की भावनाओं को भड़का कर उन्हें तार्किक रूप से सोचने से रोका जा सके।


संदीप का राष्ट्रवाद वास्तव में उसकी अपनी महत्वाकांक्षा और अहंकार का विस्तार है। वह मानता है कि अन्याय के बिना महान कार्य सिद्ध नहीं किए जा सकते। टैगोर ने संदीप के माध्यम से उस 'छद्म राष्ट्रवाद' की कलई खोली है, जो अक्सर व्यक्तिगत लाभ और सत्ता की भूख को देशभक्ति के लबादे में छिपाए रहता है। वह युवाओं को विदेशी वस्तुओं को जलाने के लिए उकसाता है, भले ही इसका सबसे बुरा प्रभाव समाज के सबसे निचले तबके पर पड़ता हो।



बिमला: 'घर' और 'बाहर' के बीच का द्वंद्व

बिमला इस उपन्यास की धुरी है। वह 'घर' (पारंपरिक मूल्य और आंतरिक जगत) और 'बाहर' (आधुनिकता और राजनीतिक उथल-पुथल) के बीच फंसी हुई है। निखिलेश उसे स्वतंत्रता देना चाहता है, लेकिन वह संदीप के जादुई और भड़काऊ राष्ट्रवाद की ओर आकर्षित हो जाती है। संदीप उसे 'देश की शक्ति' और 'महारानी' कह कर संबोधित करता है, जिससे बिमला के भीतर का अहंकार जाग उठता है।


बिमला का भटकाव दरअसल उस आम जनता का भटकाव है, जो उग्र नारों और भावनात्मक भाषणों के बहकावे में आ कर विवेक खो देती है। लेकिन धीरे-धीरे उसे अहसास होता है कि संदीप की देशभक्ति के पीछे क्रूरता और स्वार्थ छिपा है। उपन्यास के अंत तक बिमला का मोह भंग होना यह दर्शाता है कि सत्य की राह कठिन जरूर है, लेकिन वही एकमात्र स्थायी विकल्प है।


राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता:

टैगोर ने इस उपन्यास में बहुत ही सूक्ष्मता से दिखाया है कि कैसे उग्र राष्ट्रवाद अंततः सांप्रदायिकता की ओर मुड़ जाता है। जब स्वदेशी आंदोलन के दौरान विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया जाता है, तो मुस्लिम व्यापारी और गरीब तबका—जो सस्ता कपड़ा खरीदता है—सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। संदीप जैसे नेता इसे हिंदू बनाम मुस्लिम का रंग दे देते हैं।


टैगोर आगाह करते हैं कि जब राष्ट्रवाद समावेशी होने के बजाय बहिष्करण पर आधारित हो जाता है, तो वह समाज को विभाजित कर देता है। उपन्यास के अंत में होने वाले दंगे और निखिलेश का घायल होना उस राष्ट्रवाद की परिणति है, जो घृणा की खाद से सींचा गया था।


घरे बाइरे' का संदेश: राष्ट्रवाद बनाम मानवतावाद

टैगोर ने अपनी रचनाओं और लेखों में बार-बार कहा था कि 'राष्ट्र' (Nation) की अवधारणा मूल रूप से एक पश्चिमी आयात है जो यांत्रिक और शोषणकारी है। ‘घरे बाइरे’ में वे संदेश देते हैं कि राष्ट्र कोई भौगोलिक टुकड़ा या मिट्टी का ढेर नहीं है, बल्कि वह वहाँ रहने वाले मनुष्यों के चरित्र और उनके आपसी संबंधों से बनता है।


निखिलेश का यह कथन कि "मैं राष्ट्र के ऊपर सत्य को रखूँगा", टैगोर का अपना दर्शन है। वे स्पष्ट करते हैं कि यदि हम राष्ट्र को ईश्वर बना लेते हैं, तो हम उसके दोषों को देखना बंद कर देते हैं। और जब कोई समाज अपने दोषों के प्रति अंधा हो जाता है, तो उसका पतन निश्चित है।


निष्कर्षत: आज के दौर में जब 'राष्ट्रवाद' की परिभाषा अक्सर शोर-शराबे, हिंसा और असहमति को दबाने के पर्याय के रूप में देखी जा रही है, तब टैगोर की ‘घरे बाइरे’ एक मशाल की तरह काम करती है। यह उपन्यास हमें सिखाता है कि सच्ची देशभक्ति दूसरों के प्रति घृणा करने में नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर की बुराइयों को दूर करने और मानवीय मूल्यों को सुरक्षित रखने में है।


मेरे शब्दों में, 'घरे बाइरे' मात्र एक प्रेम त्रिकोण या राजनीतिक उपन्यास नहीं है, बल्कि यह मनुष्य की आत्मा की पुकार है जो राष्ट्रवाद की संकीर्ण सीमाओं को तोड़कर सार्वभौमिक सत्य की खोज करती है। टैगोर ने संदीप के माध्यम से जिस उग्रता की चेतावनी दी थी, वह आज भी हमारे समाज के दरवाजे पर दस्तक दे रही है। यदि हमें एक स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण करना है, तो हमें संदीप के उन्माद को छोड़ कर निखिलेश के विवेक और मानवता की राह चुननी होगी।


राष्ट्रवाद की कलई खोलता यह उपन्यास केवल इतिहास का दस्तावेज नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है।


संतोष पटेल 


सम्पर्क 


मोबाइल : 09868152874

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