हर्ष पाठक की रपट
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| संजीव कौशल |
रपट
'संजीव कौशल की कविताएँ पाठकों को गहरे मानवीय बोध से जोड़ती हैं – हरीश चन्द्र पांडे
रिपोर्ट : हर्ष पाठक
चार मई 2026 का दिन, यानी पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम का निर्णायक दिन। राजनीतिक चुनावी निर्णय के बरअक्स इलाहाबाद की साहित्यिक उर्वरता के बीच बाल भारती स्कूल के सभागार में एक ऐसी शाम का आयोजन हुआ जहाँ शब्द केवल संवाद का ही नहीं, बल्कि संवेदना और प्रतिरोध की आवाज़ बन कर उभरे। जनवादी लेखक संघ, इलाहाबाद के तत्त्वाधान में इस दौर के युवा कवि एवं इंदिरा गांधी शारीरिक शिक्षा एवं खेल विज्ञान संस्थान, दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर और विश्व साहित्य (जर्मनी, ऑस्ट्रिया इत्यादि) के महत्त्वपूर्ण कविताओं के अनुवादक संजीव कौशल के कविता संग्रह 'फूल तारों के डाकिए हैं' जो कि लोकभारती प्रकाशन से प्रकाशित है, पर परिचर्चा और काव्यपाठ आयोजित हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता शहर के वरिष्ठ कवि हरीश चंद्र पाण्डेय ने की, वहीं कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। यह कार्यक्रम केवल काव्य–परिचर्चा एवं कविता–पाठ तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इसने बंद किए जा रहे प्रतिरोध के स्वर और कविता में दुरूहता के बीच सरलता सार्थक संवाद भी था।
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| प्रदीप्त प्रीत |
कार्यक्रम का सूत्रपात करते हुए प्रदीप्त प्रीत ने आगंतुक वक्ताओं का स्वागत किया और कवि संजीव कौशल के कृतित्व से सभा को अवगत कराया। उन्होंने कार्यक्रम की रूपरेखा स्पष्ट करते हुए बताया कि 'फूल तारों के डाकिए हैं' संजीव जी का तीसरा काव्य संग्रह है। इस संग्रह में कुल 121 कविताएँ हैं जो लगभग 147 पृष्ठों में विस्तृत हैं।
तालियों के शोर के बीच संजीव कौशल मंच पर आए और सर्वप्रथम उन्होंने बसंत त्रिपाठी सर एवं मनोज पाण्डेय जी का इस आयोजन के लिए शुक्रिया अदा किया और बताया कि उनका इलाहाबाद में यह पहला कार्यक्रम है और अपनी ख़ुशी ज़ाहिर की। बिल्कुल भी फ़िज़ूल का समय बरबाद न करते हुए उन्होंने कविताएं पढ़ना शुरू किया। काव्यपाठ के दौरान अपनी पहली कविता 'फासला' जिसमें उन्होंने सामाजिक हिप्पोक्रेसी को कविता में स्थान दिया है। धर्म के नाम पर हिंसा और नफ़रत को ‘समय' नामक कविता के माध्यम से प्रस्तुत करते हुए कहते हैं
गुंडों के हाथ में
कुछ भी हो
चाहे ईश्वर का नाम ही क्यों न हो
वे उसे इस तरह लहराते हैं
कि ईश्वर का नाम भी
हथियार बन जाता है
हिंसा और नफ़रत से भरा हुआ
यह समय
ईश्वर को गुंडों से बचाने का समय है।
और भी कई कविताएं जैसे 'कबूतर', 'भगत सिंह', 'घोंसले', 'फ़िक्र', 'रसोई', 'खेद', 'हम चुप रहे', 'देखते जाइए', 'सैर', जैसी छोटी कविताएं और 'एडहॉक', 'मिर्चें' जैसी लंबी कविताओं का पाठ किया। उनकी कविताएँ अपनी निर्मिति में सरल एवं मार्मिक अनुभूति की बानगी प्रस्तुत करती हैं। 'एडहॉक' कविता पर बात करते हुए संजीव जी कहते हैं कि ये दरअसल सच्चाई है और बहुत सी क्रूरताएं हैं जो हम सोचते हैं कि शायद पढ़ा–लिखा इंसान अपने अंदर इंसानियत का विस्तार थोड़ा अधिक रखता होगा किन्तु जब हम इंस्टीट्यूशन में देखते हैं तो वहाँ हालात बहुत खराब हैं।
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| लक्ष्मण गुप्ता |
आगे मंच के संचालक ने प्रथम वक्ता डॉ० लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता को संजीव जी की ही एक कविता के साथ आमंत्रित किया। लक्ष्मण जी ने विचार 'इंसानों को न सही चीज़ों को दुनिया की फ़िक्र है' शीर्षक से लिखित वक्तव्य के माध्यम से प्रस्तुत किए। उन्होंने संजीव कौशल को 'छोटी कविताओं का उस्ताद' कहा और बताया कि अपने आसपास की अति साधारण चीज़ें उनकी कविताओं में एक नए अर्थ वैभव और गरिमा के साथ नमूदार होती हैं। इसी में आगे जोड़ते हुए लक्ष्मण जी ने कहा कि दरअसल हम कविताओं के ऐसे दौर में हैं जब लंबी कविताओं का चलन ज़्यादा है। ऐसी स्थिति में छोटी कविताओं का पाठ धैर्य से पढ़े जाने और बार–बार पढ़े जाने की माँग करते हैं। यह काम और मुश्किल हो जाता है जब आपका कवि भाषा को बहुत ही सहजता से बरतता है। उन्होंने कहा कि अपने स्वभाव से भी बेहद सुकुमार संजीव का पूरा व्यक्तित्व उनकी रचनाओं में बोलता दिखाई पड़ता है।
डॉ० लक्ष्मण ने बताया कि इस संग्रह में शामिल कविताओं का आधा हिस्सा स्त्री के आसपास है। जहां वे शुरुआत में स्त्री जीवन की विसंगतियों और विडंबनाओं को कविता बनाते हैं, वहीं स्त्री के होने के एहसास को भी कविता के बिना किसी बनावट के दर्ज़ करते हैं। घर से बाहर की स्त्री, घर में अपना जीवन खपा चुकी स्त्री, घर को घर बनाती हुई स्त्री सभी माकूल जगह पाते हैं, कवि की दुनिया में। कवि कभी स्त्री को कठपुतलियों से जोड़ कर देखता है और इस तथ्य के साथ कि कठपुतले नहीं होते, होती हैं कठपुतलियां जिन्हें कोई और ही नियंत्रित करता है। लक्ष्मण जी कहते हैं कि कवि अपनी भाषा का श्रेय भी स्त्री को देता है।
इस हिस्से के बाद कवि बाहरी संसार का रुख करता है। इस बाहरी संसार में कवि के सहचर हैं गिलहरियां, बिल्लियां, मुर्गा, कबूतर, नदियां, जिन्हें कवि सिर्फ़ कविता का विषय नहीं बनाता बल्कि इनके बहाने हमारी दुनिया की विसंगतियों को ठीक करने का सुझाव पेश करता है, प्रेम और प्रतिरोध का स्वर हासिल करता है। हमारे समय के आदमी की बेहद बारीक पड़ताल करते हुए कवि अपनी बिरादरी अर्थात् पढ़े–लिखे लोगों (खाए–अघाए लोगों) के षड्यंत्र को हमारे ही सामने लाता है। कुछ कविताओं 'खेल', 'हत्या', 'चौपाया' आदि की पंक्तियों में इसे देख सकते हैं। कवि की 'एडहॉक' और 'गेस्ट टीचर' जैसी कविताएं तो संस्थानों की क्रूरताओं को सीधे सीधे उजागर करती हैं। अंत में लक्ष्मण जी कहते हैं कि उनकी भाषा के पास कविता को बरतने का शउर है। हां कुछ कविताएं बनते–बनते रह गई हैं जिनमें 'कैसा दौर है', 'समय', 'ग़रीब होना' शामिल हैं।
अगले क्रम में कवि एवं लेखक बसंत त्रिपाठी जी ने अपना वक्तव्य विस्तार से रखा। सबसे पहले तो उन्होंने 21 वीं सदी की हिन्दी कविता का ज़िक्र करते हुए बताया कि इस दौर की कविताओं में घटनाएं अधिकतर छूटती चली गईं। घटनाओं की जगह उससे जन्मी मनोवृत्तियों ने ले लिया। शास्त्रीय भाषा में अगर कहा जाए तो विभाव की जगह अनुभाव ने ले लिया। लेकिन जिन कवियों ने इस रास्ते से कुछ अलग रहते हुए अपनी कविता की राह चुनी और स्थितियों की क्रूरताओं को घट रही घटनाओं के माध्यम से रखा, उसके महत्त्वपूर्ण कवियों में हरीश चंद्र पाण्डेय हैं और वे संजीव कौशल को भी इसी परम्परा का कवि मानते हैं। संजीव की कविताएं सीधी और सहज हैं। तनाव या अंतर्विरोध भाषा में नहीं है बल्कि उन घट रही घटनाओं में है जिन्हें कविता में प्रस्तुत किया गया है। कवि बसंत त्रिपाठी जोर देकर कहते हैं कि 'संजीव कौशल घटनाओं की व्याख्या के नहीं बल्कि घटनाओं के कवि हैं।'
आगे वे कहते हैं कि उनकी कविता में घटना दो तरह से आती हैं—एक तो सीधे और दूसरा संकेतों द्वारा। संजीव की कविताओं के विषय की लक्षित करते हुए बसंत त्रिपाठी कहते हैं कि उनकी कविताओं के मुख्य विषय हैं — स्त्री, प्रेम, व्यक्ति मन की कश्मकश, राजनीतिक विसंगतियां, कला और मानवीय संबंध।
वे कहते हैं कि संजीव की कविता में स्त्री मध्यवर्गीय स्त्री के अलावा निम्न मेहनतकश वर्ग की श्रमशील स्त्रियां हैं। जिसके लिए उन्होंने 'मिर्चें' और 'कठपुतलियां' का उदाहरण दिया। संजीव कौशल की कविता में मेलोड्रामा के तत्व नहीं हैं बल्कि स्थिति की नाटकीयता को वे लगभग सपाट भाषा में साधते हैं। बसंत जी ने संजीव कौशल के काव्य-शिल्प को 'बतकही' की संज्ञा दी। उन्होंने बताया कि यह संवाद की वह शैली है जो 80 और 90 के दशक के कवियों जैसे राजेश जोशी, विनय दुबे और भगवत रावत में दिखाई देती थी। संजीव इस विस्मृत होते जा रहे शिल्प को पुनः स्थापित करते हैं, जिससे पाठक को ऐसा महसूस होता है जैसे कवि उससे सीधे संवाद कर रहा है। इस संवाद में तल्खी और आरोप तो हैं, लेकिन एक 'संवाद आकुलता' और उम्मीद भी बनी रहती है। बसंत त्रिपाठी के अनुसार, संजीव कौशल का कौशल यह है कि उनकी कविता एक 'स्ट्रोक' की तरह आती है। वे घटना को पाठक के सामने रख देते हैं और कविता समाप्त हो जाती है, लेकिन वह घटना पाठक के भीतर देर तक यात्रा करती है। उन्होंने 'किसान आंदोलन' और 'सैर' जैसी कविताओं के माध्यम से बताया कि कैसे छोटी-छोटी संरचनाओं में बड़े राजनीतिक और सामाजिक विमर्श समाहित हैं। उन्होंने संग्रह के विभिन्न विषयों—स्त्री, प्रेम, व्यक्ति-मन की कशमकश और राजनीतिक विसंगतियों—पर विस्तार से बात की। उन्होंने गौर किया कि जब संजीव प्रेम पर लिखते हैं, तो बिंब प्रकृति से लेते हैं, लेकिन राजनीतिक कविताओं में वे सीधे और सपाट हो जाते हैं।
'बाईपास' कविता का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे विकास की अंधी गति ने हमारे पुराने शहरों, स्वादों और यहाँ तक कि प्रेम को भी संकुचित कर दिया है। 'अर्थ' कविता के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट किया कि संजीव के लिए कविता की प्रासंगिकता उसकी 'आदिम स्मृतियों' में नहीं, बल्कि 'नई परिस्थितियों' द्वारा गढ़े गए नए अर्थों में है। अंत में, उन्होंने संजीव की 'कविता' शीर्षक वाली रचना का पाठ करते हुए बताया कि उनके लिए कविता क्या है। उनके अनुसार, संजीव की दृष्टि में कविता मनुष्य की रोजमर्रा की चीजों—स्वाद, गंध, हौसला, मायूसी और रोटी—को सहेजने का हुनर है। वे कविता को मनुष्यता के अत्यंत निकट देखते हैं और इसीलिए छोटी-छोटी घटनाओं को दर्ज करने के आग्रही हैं। उन्होंने अपने वक्तव्य का समापन यह कहते हुए किया कि संजीव कौशल की कविताओं के बारे में सुनने से कहीं अधिक आनंद उन्हें स्वयं पढ़ने में है।
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| प्रणय कृष्ण |
प्रणय कृष्ण का वक्तव्य संजीव कौशल की कविताओं के दार्शनिक, पारिस्थितिकी और राजनैतिक आयामों को गहराई से उजागर करता है। प्रणय जी ने अपने वक्तव्य की शुरुआत समकालीन कविताओं की प्रासंगिकता और उनके राजनैतिक दायित्व से की। उन्होंने संजीव कौशल की कविताओं को 'हारे हुए लोगों की कविता' और 'देश की तंदुरुस्ती का पैमाना' बताया। उन के अनुसार, संजीव की कविताएँ सूक्ष्म पर्यवेक्षण और बोध से निर्मित हैं।
संजीव कौशल के कविता की रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए प्रणय जी ने स्पष्ट किया कि ये कविताएँ जितनी सरल और समझने योग्य दिखती हैं, इनकी रचना प्रक्रिया उतनी ही जटिल है। किसी महानगर में रहते हुए देखी हुई चीजों को संवेदना से विचार तक ले जाना और पर्यवेक्षण का धैर्य बनाए रखना ही इन कविताओं की विशेषता है। उन्होंने अज्ञेय द्वारा दिए गए शब्द 'सृष्टि दर्शन' के माध्यम से संजीव की प्रकृति-चेतना की व्याख्या की। कवि ने मानवीय स्थितियों के दृष्टांत के लिए प्रकृति और पशु जगत को भाषा के रूप में चुना है। यह दृष्टिकोण 'एंथ्रोपोसेंट्रिक' (मनुष्य-केंद्रित) विश्व दृष्टि का निषेध करता है। जहाँ आदिवासियों के लिए प्रकृति जीवंत स्मृति है, वहीं संजीव जैसे नगरीय कवि के लिए प्रकृति को भाषा के रूप में बरतना एक संकल्प है, जो छूटे हुए संस्कारों को पाने की माँग करता है। 'आसिफा के लिए' कविता में चाँद का उपयोग और 'मरुस्थल' में बारिश का अभाव, मानवीय त्रासदियों को व्यक्त करने के लिए प्रकृति के प्रतीकों का सफल प्रयोग है। प्रणय जी ने प्रेम को ले कर कवि के संकोच और उसकी व्यापकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि संजीव के यहाँ प्रेम केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि समूची जिंदगी पर असर डालने वाली उपस्थिति है, जो जीवन को 'पूर्ण काम' बना देती है। 'ब्रश स्टैंड' और 'मेट्रो में प्रेम' कविताओं के माध्यम से उन्होंने दिखाया कि कैसे आधुनिक जीवन में लोग शारीरिक रूप से निकट होकर भी एक-दूसरे से अजनबी बने रहते हैं। 'लोग लोग नहीं थे, पेड़ थे'—यह बिंब इस अजनबीपन की पराकाष्ठा है। उन्होंने रेखांकित किया कि संग्रह की एक तिहाई कविताएँ स्त्रियों पर केंद्रित हैं, जो उनके वस्तुकरण और दोहरी चक्की में पिसने की कहानी कहती हैं। कवि ने स्त्रियों की उस मेहनत और समर्पण को कविता में दर्ज किया है जो सामान्यतः 'स्वाद' (भोजन) के पीछे छिप कर अदृश्य हो जाती है। उन्होंने बताया कि कैसे पुरुष का दिमाग 'पुराने टीवी के डब्बे' की तरह हो गया है, जो स्त्री की अस्मिता को समझने में सुस्त और बेसुरा है।
वक्तव्य के अंत में उन्होंने 'कठपुतलियां' कविता के माध्यम से राजसत्ता के दमनकारी स्वरूप की व्याख्या की। पूँजी और राजसत्ता ने इंसानों को मशीनों और कठपुतलियों में बदल दिया है। यह व्यवस्था समूची विविधतापूर्ण कायनात को एक ही रंग में रंग देने की कोशिश करती है, जहाँ अस्मिताएँ खत्म हो जाती हैं और लोग स्वामियों के आदेशों की प्रतीक्षा में सर झुकाए रहते हैं। प्रणय ने संजीव कौशल की कविताओं को 'करुण और हाहाकारी स्थितियों का शांत विवेकीकरण' बताते हुए उनके संयम और स्थिरता की सराहना की।
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| हरीश चन्द्र पाण्डे |
वरिष्ठ कवि और आलोचक हरीश चन्द्र पांडे ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए संजीव कौशल के काव्य-शिल्प की सूक्ष्मताओं और उनके दार्शनिक आधारों पर एक अत्यंत गंभीर और सारगर्भित वक्तव्य दिया। हरीश चन्द्र पांडे ने संजीव कौशल की लेखन शैली को समकालीन कविता के परिदृश्य में एक विशिष्ट 'मिजाज' और 'शिल्प' के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने संजीव कौशल की कविताओं को उनके लघु आकार के कारण 'कैप्सूल कविता' या 'संपुट कविता' की संज्ञा दी। उन्होंने कहा कि इस संग्रह में अधिकांश कविताएँ मात्र कुछ पंक्तियों की हैं, लेकिन कैप्सूल की तरह इनमें अद्भुत 'वेधक शक्ति' है। उन्होंने 'दुख', 'आग', 'जाति', 'ब्रश स्टैंड' और 'मरुस्थल' जैसी कविताओं को अत्यंत मारक और गहरी संवेदना वाली रचनाएँ बताया। अध्यक्ष जी ने कवि की 'सहज भाषा' पर विशेष टिप्पणी करते हुए इसे कविता की आत्मा से जोड़ा। उन्होंने तर्क दिया कि 'मरुस्थल' या 'ब्रश स्टैंड' जैसी कविताओं में यदि कवि संस्कृतनिष्ठ या चमकदार उर्दू शब्दावली का प्रयोग करता, तो वह भाव-भूमि ही नष्ट हो जाती। उनके अनुसार, भारी-भरकम शब्द एक 'हरित प्रदेश' तो रच सकते थे, लेकिन जो 'उजाड़' और 'अवसाद' इन कविताओं की जान है, वह पैदा नहीं हो पाता। संजीव की सहजता ही उनके काव्य-सत्य को उजागर करती है। अध्यक्ष महोदय ने एक बहुत ही मौलिक प्रश्न उठाया कि कवि के यहाँ स्त्री का इतना अधिक विस्तार क्यों है? उन्होंने स्वयं व्याख्या की कि शायद स्त्रियों में ही 'मनुष्यता के अवयव' सबसे अधिक पाए जाते हैं, इसलिए कवि बार-बार स्त्रियों के पास जाता है। उन्होंने एक कविता का जिक्र किया जहाँ कवि अपने बेटे में 'स्त्री के लक्षण' ढूँढता है। उनके अनुसार, कवि मानता है कि पुरुष की झूठी जकड़न टूटने और उसमें स्त्री की रंगत आने से ही वह 'मनुष्य' बन पाएगा। हरीश चन्द्र पांडेय जी ने 'एडहॉक' (अस्थाई) और 'गेस्ट टीचर' श्रृंखला की कविताओं पर विशेष बल दिया। उन्होंने रेखांकित किया कि इन कविताओं में एक गहरा 'पैराडॉक्स' (विरोधाभास) है—जहाँ एक अध्यापिका ऑपरेशन के पाँचवें दिन ही कॉलेज पहुँच जाती है ताकि उसकी नौकरी न चली जाए। एक जगह कवि कहता है कि वह शादी इसलिए नहीं करेगा क्योंकि शादी 'स्थाई' होती है और उसका जीवन 'अस्थाई' (एडहॉक) है। पांडे जी ने इसे आधुनिक समय की एक बहुत बड़ी व्यंजना माना। हरीश चन्द्र पांडे ने संजीव की कविताओं में प्रयुक्त बिंबों की नवीनता की सराहना की। उन्होंने 'जुगनू की टोकरी को आसमान पर उड़ेल देने' वाले बिंब को बहुत सुंदर बताया। 'नदियाँ पृथ्वी की बाँसुरी हैं' जैसे रूपकों को उन्होंने कवि की मौलिक दृष्टि का प्रमाण माना। उन्होंने 'स्माइली' पर आधारित कविता का उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे यह आधुनिक समय में शब्दों को अपदस्थ करने का एक तरीका बन गया है। हरीश चन्द्र पांडे जी ने संजीव कौशल को इस विशिष्ट शिल्प में कविताएँ रचने के लिए बधाई दी और कहा कि उनकी कविताएँ पाठकों को तमाम जगहों पर टहलाती हैं और एक गहरे मानवीय बोध से जोड़ती हैं।
अंत में, कवि और कथाकार मनोज पांडेय ने सभी वक्ताओं का आभार व्यक्त करते हुए इस आयोजन को एक 'दुर्लभ दृश्य' बताया क्योंकि सभी वक्ताओं ने गहन अध्ययन के साथ लिखित वक्तव्य प्रस्तुत किए थे। यह चर्चा स्पष्ट करती है कि संजीव कौशल की कविताएं अपनी सहजता के बावजूद गहरी राजनीतिक और सामाजिक चेतना से लैस हैं।
इस अवसर पर प्रो० संतोष भदौरिया, निधि सिंह, अंशु मालवीय, कवि-पत्नी प्रो. प्रतिभा, सीमा आज़ाद, विश्वविजय, डॉ० वीरेंद्र मीणा, डॉ० प्रेमशंकर, अनिता, गोविन्द निषाद, पूजा, आशुतोष प्रसिद्ध, अरविन्द शर्मा, सचिन गुप्ता, अनुराग तिवारी, रंजीत कुमार, महुआ, शशि भूषण, प्रकाश चौबे, स्नेहा पटेल, प्रांजल पटेल, ज्योत्सना, शशांक आनन्द, प्रभाकर, आयुश यादव, इशांत, आर्यन, प्रिंस, विकास, साक्षी आदि बड़ी संख्या में शोधार्थी, छात्र–छात्राएं और शहर के अन्य साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।








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