विनोद दास का संस्मरण 'लासानी : गुलशेर खान शानी'
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| गुलशेर खान शानी |
भारतीय मुसलमान की वास्तविक गाथा को जानने के लिए हमें काला जल को आवश्यक तौर पर पढ़ना पड़ेगा। यह उपन्यास शिद्दत से आज के मुस्लिम परिवेश को ईमानदारी से उभारता है। आम तौर पर भारतीय मुसलमानों को शासक, नवाब, दरबारी और सुसंस्कृत अभिजात वर्ग की तरह पेश (चित्रित) किए जाने की परम्परा रही है। लेकिन वह जमाना अब बीती बात हो गई। शानी ने अपने उपन्यास “काला जल’’ में मुसलमानों को उसी रुप में दिखाया है जो वो हैं। आज भारतीय मुसलमान संशय के दायरे में पहले से कहीं अधिक हैं। इसीलिए वह सशंकित भी है। उसे अपनी राष्ट्रीयता लगातार साबित करनी पड़ती है। इस क्रम में वह आज भी जद्दोजहद कर रहा है। शानी साक्षात्कार और भारतीय समकालीन साहित्य जैसी दो महत्वपूर्ण पत्रिकाओं के संस्थापक सम्पादक थे। जन्मदिन पर हम उन्हें नमन करते हुए पहली बार पर विनोद दास का संस्मरण प्रस्तुत कर रहे हैं 'लासानी : गुलशेर खान शानी'।
शानी के जन्मदिन पर
'लासानी : गुलशेर खान शानी'
विनोद दास
यह वह समय था जब दिल्ली के सांस्कृतिक हृदय मण्डी हाउस स्थित रवींद्र भवन के साहित्य अकादमी परिसर में हिन्दी साहित्य की दो विभूतियाँ साहित्य की दो आँखों की तरह एक दूसरे के पड़ोस में बैठती थीं। एक थे हमारे समय के सबसे विवादास्पद और प्रखर कवि अनुवादक विष्णु खरे। दूसरे थे कस्बाई ज़िन्दगी और मुस्लिम समाज की विडम्बनाओं के मर्मस्पर्शी और प्रामाणिक कथाकार गुलशेर खान शानी। दोनों जन अविभाजित मध्यप्रदेश के पिछड़े इलाकों से थे। एक छिन्दवाड़ा से, दूसरे जगदलपुर से। दोनों के बीच मैत्री का तन्तु शायद इन कस्बों की मिलती-जुलती धूल-मिट्टी और पसीने की गंध से जुड़ा रहा होगा।
वह कौन सी दोपहर थी, ठीक से याद नहीं, पर वह कुछ वैसी ही थी जैसी हर सरकारी दफ्तर में होती है। जब मैंने शानी जी का कक्ष खोला तो वह अपनी मेज़ पर लंच कर रहे थे। मैं उलटे पाँव लौट आया। इस बीच पानी लेने गया उनका चपरासी बेधड़क उनके कक्ष में चला गया। जब वह चपरासी पानी उनके कक्ष में रख कर लौटा तो गलियारे में रखी कुर्सी की ओर इशारा करके मुझे इन्तज़ार करने को कहा। उस सूखी गर्म दोपहर में मैं उनकी बुलावे की बाट जोहने लगा। कुछ देर बाद शानी दरवाज़े से बाहर नमूदार हुए। हमें अपने कक्ष के भीतर आने की दावत दी।
चौड़ा माथा, दरम्याना क़द, साँवला रंग, गुप्तचर की तरह भेदती आँखों पर चढ़ा मोटा चश्मा, घुँघराले बाल। चेहरे पर आत्मविश्वास का तेज़। पहली नज़र में मेरे लिए यह शानी थे। साफ़, मँजी हुई संयत मुस्कान के साथ उन्होंने हाथ मिलाया। उनकी गदोलियों में स्वागत की गर्माहट थी। इससे पेश्तर कि मैं कुछ कह पाता, मेरे कानों में सुनायी दिया, “कहिए! क्या काम है? “यह सवाल मुझे उन दिनों ऐसी अँधेरी घाटी में पहुँचा देता था जिसके आगे मैं ठिठक जाता था। मुझ जैसे अज्ञात कुलशील नवांकुर लेखक के लिए इसका उत्तर देना वाकई धुँध में कुछ खोजने जैसा होता। फिर इसकी परिणति एक अजीब असहाय मुस्कराहट में होती।
अक्सर मैं सोचता हूँ कि ऐसी हालत उन तमाम तरुणों के लिए ज़्यादा बड़ी होती होगी जिनके झोले में छपाने के लिए न तो कोई अपनी रचना होती है और न ही इसके लिए कोई तृष्णा, मगर वह एक पत्रिका के ऐसे सम्पादक की कुर्सी के सामने मुसलसल मौजूद होता है जिसके लेखन के प्रेम में गिरफ़्तार हो कर वह उससे मिलना चाहता है। वैसे एक सम्पादक की यह विवशता होती है कि कई बार उसके पास प्रकाशनाधीन इतनी अल्लम-गल्लम सामग्री जमा होती है कि वह अपने पास आने वाले हर व्यक्ति को एक ऐसे लेखक की तरह बरतता है जैसे वह उसके पास अपनी रचनाओं को छपाने के लिए आकुल-व्याकुल हो कर आया है जबकि सम्पादक के पास पत्रिका में इतनी ज़गह नहीं होती हैं। सम्पादकों के इस तरह का रूखा बर्ताव एक तरह से अपने को सुरक्षित रखने का एक कवच होता है।
शानी तो फिर जाने माने सम्पादक थे। मध्य प्रदेश साहित्य परिषद की पत्रिका साक्षात्कार के संस्थापक सम्पादक के रूप में उनकी कीर्ति की सुगन्ध साहित्यिक हलकों में फ़ैल चुकी थी। परिषद से इस्तीफा दे कर दिल्ली आये थे। उन दिनों नवभारत टाइम्स अखबार के सम्पादक अज्ञेय थे। अज्ञेय जी के साथ जब वह नवभारत टाइम्स दैनिक समाचारपत्र के रविवारीय परिशिष्ट “रविवार्ता” का सम्पादन कर ही रहे थे, तभी केन्द्रीय साहित्य अकादमी ने अपनी हिन्दी पत्रिका “समकालीन साहित्य” को निकालने का निर्णय लिया और उसके सम्पादन का दायित्व शानी के अनुभवी हाथों में सौंप दिया गया।
“बस आपसे मिलने आया हूँ।” एक झपाके से शानी से बिना आँख मिलाये मैंने कहा और राहत की गहरी साँस ली।
फिर उनसे उनके उपन्यास “काला जल” की बात छेड़ दी। मैंने उनसे “काला जल” उपन्यास के शिल्प की प्रशंसा की कि किस तरह उपन्यास का कथा नायक बब्बन शबेबरात पर फातिहा पढ़ते हुए अपने परिजनों को याद करता है। इस तरह उपन्यास की पूरी कथा बयान की जाती है। यही नहीं, सल्लो आपा के साहसिक चित्रांकन का भी उनसे जिक्र किया जो पुरुषों का वेश धारण कर के मोहसिन से मिलती है और धड़ल्ले से सिगरेट फूँकती है। शानी के चेहरे पर गर्व और खुशी के अनगिनत रंग बिखर गये। किसी भी रचनाकार के दिल के करीब पहुँचने का यह सबसे शार्टकट रास्ता है कि आप उनकी रचनाओं की चर्चा करें। हर रचनाकार के दिल को अपनी रचना की बात उसी तरह छूती है जैसे अपने बच्चे की नटखट शरारतों को सुन कर माँ मन ही मन मुदित होती है।
शानी के लेखन के प्रति मेरे आकर्षण का एक बड़ा कारण यह भी था कि कई बरस बाराबंकी के मुस्लिम बहुल मोहल्ले पीरबटावन में रहने के बावजूद मुझे मुस्लिम जीवन के बारे में उतना भी नहीं पता था जितना किसी खिड़की से पड़ोस के घर में झाँकने से उनके जीवन के बारे में पता चल जाता है। यह कितनी बड़ी विडम्बना थी कि मैं उनकी ज़िन्दगी के अतरे-कोनों को किस्सों-अफ़वाहों के मार्फ़त जानता था जबकि वे सब सब जिन्दा हाड़-माँस की तरह साँस ले रहे थे। उससे बड़ी विडम्बना यह थी कि हिन्दी में मुस्लिम ज़िन्दगी के प्रामाणिक अनुभवों को चन्द मुस्लिम कथाकार ही रूपायित कर रहे थे। इनमें शानी, राही मासूम रज़ा, बदीउज्ज्मा, मेहरुनिस्सा परवेज़ प्रमुख थे।
शानी के उपन्यास “काला जल” और राही मासूम रज़ा के उपन्यास “आधा गाँव” में तो मुस्लिम समाज के अनुभवों को सघन सान्द्रता से व्यक्त किया गया था जबकि कथाकार बदीउज्ज्मा के काफ़्काई अन्दाज़ में दफ़्तर की लालफ़ीताशाही को चूहे के रूपक के जरिये उघाड़ा गया था। कथाकार मंज़ूर एहतेशाम, असगर वज़ाहत, नासिरा शर्मा और अब्दुल बिस्मिल्लाह हिन्दी दृश्यपटल पर तब तक प्रमुखता से उभर कर नहीं आये थे।
बदीउज्ज्मा साहब मेरे पिताजी के दफ़्तर केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो में वरिष्ठ अधिकारी थे। पिता जी के साथ कई बार घर भी आ चुके थे। बेहद शालीन और नर्म। कुछ चुप्पे से। दुबले-पतले सुकुड़े। वह खुद भी एक मासूम चूहे से लगते थे। उनका उपन्यास “छाको की वापसी” तब तक प्रकाशित हो चुका था। उन्होंने उसे पढ़ने के लिए मुझे दिया भी था। मुस्लिम समाज का ताना-बाना बदीउज्ज्मा ने अपने उपन्यास “छाको की वापसी के कथा-विन्यास में जिस महीन रेशे से गूँथा है, उससे उनकी सम्वेदना और सोच का नया धरातल उजागर होता है। उस समय तक उनके उपन्यास “एक चूहे की मौत” की तुलना में “छाको की वापसी” की चर्चा हिन्दी संसार में कम थी जबकि वह उनकी अपने अनुभवों की ज़मीन थी और आज़ादी के बाद के भारतीय मुस्लिम समाज को समझने का एक जरूरी दस्तावेज़ भी। बदीउज्ज्मा का उपन्यास “छल प्रपंच” भी शिल्प और कथ्य की दृष्टि से अनोखा उपन्यास है जिसके बारे में हिन्दी में गहरी चुप्पी रही है। सच तो यह है कि कथाकार बदीउज्ज्मा के साथ हिन्दी कथा आलोचना ने उचित न्याय नहीं किया।
हिन्दी परिदृश्य में राही मासूम रज़ा के “आधा गाँव” की तुलना में “काला जल” की नोटिस कम ली गयी है, इसका जिक्र करने पर शानी भरे बादल से गम्भीर हो गये। उनका मानना था कि आधा गाँव शिया-सैयदों के ज़मींदारों के गाँव की कथा है जबकि काला जल में एक परिवार के माध्यम से मध्यवर्गीय मुस्लिम की अभिशप्त ज़िन्दगी को उकेरा गया है।
बहरहाल उस दिन शानी जी से मुलाक़ात प्रीतिकर रही। उनको भी राहत मिली होगी कि इतनी बातचीत के बाद उनकी मेज़ पर चुपके से छपने के लिए कोई रचना रख कर मिमयाते हुए उनसे किसी ने यह नहीं कहा कि इसे देख लीजियेगा। हालाँकि उन्होंने उस दिन रस्मी लफ़्ज़ों में कहा था, “मिलते रहियेगा।”
तब मुझे क्या मालूम था कि उनसे अगली मुलाक़ात ज़ल्दी ही होगी। दरअसल उन दिनों हिन्दी की लोकप्रिय कथा पत्रिका “सारिका” का कार्यालय मुम्बई से दिल्ली आ गया था। उसके सम्पादक कन्हैयालाल नन्दन बन चुके थे। नन्दन जी मूलतः गीतकार थे। कथा साहित्य से उनका कोई प्रत्यक्ष नाता नहीं था। धर्मयुग में काम करने का उन्हें लम्बा अनुभव था। यही नहीं, सारिका के गौरवपूर्ण इतिहास से वे भली-भाँति परिचित थे। उनकी कोशिश थी कि सारिका का एक स्तर बना रहे। उन्होंने विदेशी कथाकारों पर कई महत्त्वपूर्ण अंक निकाले थे। काफ्का पर केन्द्रित अंक के लिए पिता के नाम चिठ्ठी का अनुवाद करने का काम मुझे भी उपसम्पादक सुरेश उनियाल ने सौंपा था। सारिका को लोकप्रिय बनाने और लेखकों के अन्तरंग जीवन से पाठकों को परिचित कराने की दृष्टि से नन्दन जी ने पत्रिका में कुछ विशिष्ट कथाकारों की श्रृंखला भी शुरू की थी। नन्दन जी से इसी श्रृंखला के लिए शानी के इंटरव्यू करने की अनुमति हमने माँगी। सुखद यह रहा कि उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार भी कर लिया।
शानी जी से दूसरी मुलाक़ात संक्षिप्त और प्रयोजनमूलक थी। इंटरव्यू देने के लिए वह बाख़ुशी राज़ी हो गये। जहाँ तक मुझे स्मरण है, उनका दिल्ली में यह पहला इंटरव्यू था। उन्होंने शनिवार की शाम अपने घर आने का निमन्त्रण दिया।
अपने ठिकाने पर साफ़ धुले कुर्ते-पैजामें में शानी जी ने अपनी भेदती आँखों और चमकती मुस्कान के साथ स्वागत किया। फिर माफ़ी माँगते हुए उन्होंने बताया कि उनकी यह पक्की रिहायश नहीं है, इसलिए अभी सोफ़ा आदि तमाम सामान नहीं खोला है। ज़मीन पर बैठने की व्यवस्था थी। बैठ कर उनसे बातचीत की भूमिका मैं बाँध ही रहा था कि उनके चेहरे पर एक अज़ीब सी लहर उठी। वह सहसा बोले कि बातचीत कुछ रूक कर करते हैं। चलो! पहले बाज़ार हो आते हैं। उनका स्कूटर एक वाइनशॉप पर रुका! दुकान से लौटने के बाद उन्होंने अखबार में लिपटी एक बोतल उन्होंने मुझे पकड़ा दी।
चाय के साथ विस्तार से बातचीत हुई। एक लेखक को हम दो दृष्टियों से देखते हैं -एक जो सामने होता है चलता-फिरता, बोलता-बतियाता। दूसरा, वह जो हम उसकी रचनाओं से अपनी कल्पना में सृजित करते हैं।
उस दिन शानी के दोनों रूपों से मुलाक़ात हो रही थी। उनकी बातों में कहीं भी उलझनों की सिलवटें नहीं थीं। उनकी कहानी युद्ध और एक कमरे का घर पर लगे साम्प्रदायिकता के आरोप के सवाल पर एक लतीफ़ सी झुँझलाहट उनके चेहरे पर कौंध गयी। उन्होंने कहा “अगर दस-पाँच पीढ़ियों से हमारा परिवार हिन्दुस्तान में रह रहा है तो मैं उतना ही राष्ट्रीय हूँ जितने कि आप। फिर क्या जरूरी है कि आप तभी मुझे अपनायेंगें जब मैं आपके कानों में राष्ट्रीयता का झुनझुना बजाऊँ। यदि मैं साम्प्रदायिक हूँ तो आप मुझसे ज़्यादा साम्प्रदायिक हैं जिन्होंने मुझे साम्प्रदायिक बनाया हैं।” इस इंटरव्यू में विनय दास भी साथ थे। उन्होंने भी कुछ सवाल पूछे।
शानी जी के इस वक्तव्य के साथ तमतमाये हुए उनके चेहरे की आँच मेरी आत्मा को झुलसा रही थी। “सारिका” पत्रिका में उनके इस वक्तव्य को ही मुख्य शीर्षक दे कर छापा गया।
छोटी पत्रिकाओं में मेरी कहानियाँ और लेख छप चुके थे लेकिन किसी बड़ी पत्रिका में यह मेरी पहली दस्तक थी। कहना न होगा कि यह इंटरव्यू बेहद चर्चित रहा। शानी जी की साफ़गोई की इसमें बड़ी भूमिका थी। इसकी तस्दीक तब हुई जब मैं कुछ दिनों बाद हंस प्रकाशन से प्रकाशित कोई किताब लेने उसके दफ़्तर गया। कथाकार राजेन्द्र यादव ने तब तक “हंस” पत्रिका का सम्पादन शुरु नहीं किया था। वह मेरा नाम पूछने के बाद सहसा बोल पड़े, “क्या तुम वही हो जिसने शानी से इंटरव्यू लिया था। तुम्हारा इंटरव्यू शानदार था।” उन्होंने फिर तत्कालीन हिन्दी कथा परिदृश्य पर विस्तार से चर्चा की। चाय भी पिलायी। चलते समय अपनी आलोचना पुस्तक हस्ताक्षर करके उपहार में भी दी। शानी के इंटरव्यू का यह अविस्मरणीय बोनस था।
सारिका में प्रकाशित उनका इंटरव्यू देने जब मैं उनके नए मकान पर गया तो उनके परिवार से मुलाकात हुई।
दिल्ली से पटना चले जाने के बाद शानी जी से मिलने का सिलसिला कम हो गया। एक बार पटना से दिल्ली गया तो वह उसी गर्मजोशी से मिले। मैंने उनसे पूछा कि आपका लिखना कुछ कम हो गया है तो उनका उत्तर था कि लिखने के लिए जीवनानुभव चाहिए। दिल्ली में इसके अवसर कम हैं। दफ्तर आने-जाने में ही सारा समय सर्फ़ हो जाता है। दिल्ली में आम लोगों से मिलना-जुलना कम होता है। सामाजिकता के अभाव में लिखने का कच्चा माल नहीं मिलता। हालाँकि कुछ अरसे बाद उनका कहानी संग्रह “जहाँपनाह जंगल” आया। उन दिनों कवि-कला समीक्षक प्रयाग शुक्ल जी नवभारत टाइम्स का परिशिष्ट रविवार्ता देख रहे थे। उन्होंने समीक्षा के लिए वह किताब मुझे सौंप दी। पटना प्रवास के कारण छपी समीक्षा पर शानी जी की राय पता नहीं चली। वैसे भी अखबारी समीक्षा अधिकतर किताब के प्रकाशन की सूचना होती है, उसकी राय का कोई ख़ास मतलब नहीं होता।
सूखी दोपहर में साहित्य अकादमी के कक्ष में शानी जी से मिलना, उनके घर में ज़मीन पर बिछे गद्दे पर बैठ कर उस शाम सारिका के लिए की गई बातचीत, गर्मजोशी से उनका हाथ मिलाना, चश्में के मोटे फ्रेम से उनकी भेदती हुई आँखें आदि ऐसे अनेक बिम्ब हैं जिनसे मैं उनका अक्स अक्सर बनाता हूँ लेकिन असफल रहता हूँ। मुझे स्वीकार करने में कोई झिझक नहीं है कि मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं है कि किसी व्यक्ति खासतौर से किसी लेखक को शब्दों से मूर्त कर सकूँ, वह तो फिर लासानी शानी थे।
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| विनोद दास |
सम्पर्क
मोबाइल : 9867448697




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