स्वप्निल श्रीवास्तव का आलेख 'यादों के उजाले'


बशीर बद्र 


नामचीन शायर बशीर बद्र नहीं रहे। 28 मई 2026 को बशीर बद्र का इंतकाल हो गया। उनकी दो लाइनें पढ़ कर एक दौर मैं उनका मुरीद बन गया था।

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में 

तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।

अपनी कविता की डायरी के पहले पन्ने पर मैंने इसे दर्ज़ किया था। कहीं न कहीं हमारे कवि की निर्मिति में इन दो पंक्तियों का बड़ा प्रभाव रहा है। दरअसल 1987 के मेरठ दंगों में दंगाईयों ने बशीर बद्र का घर आग के हवाले कर दिया। किसी भी घर का जलना सिर्फ एक घर का जलना नहीं होता। उस घर से जुड़ी तमाम स्मृतियां होती हैं। उस घर को बनाने मेंखून पसीने की कमाई लगी होती है। बशीर बद्र के इस घर के जलने के साथ है उसमें उनकी यादें, किताबें, बरसों के लिखे कागज और पूरी ज़िंदगी की जमा-पूंजी राख हो गई। वह सदमा उन्हें भीतर तक तोड़ गया। लंबे अरसे तक वे अवसाद में रहे। फिर उन्होंने भोपाल को अपना मुकाम बना लिया और आजीवन वही रहे। तो इन पंक्तियों को लिखने में उनका अपना तिक्त अनुभव था। 

बद्र साहब के भतीजे अमीन बताते हैं कि दंगों की आग में उनकी हज़ारों अप्रकाशित पंक्तियाँ भी जल गई थीं। करीब चार से पाँच हज़ार अशआर, जो बद्र साहब को ज़ुबानी याद थे। फिल्मकार विशाल भारद्वाज मेरठ कॉलेज में उनके शागिर्द थे और उन्हें पिता की तरह मानते थे। बद्र साहब अक्सर उन्हें नई गज़लें सुनाया करते। दंगों के बाद जब वे बिखर गए, तब विशाल ने अपनी याददाश्त के सहारे उनकी कई गज़लें दोबारा लिख कर उन्हें लौटाईं। इसके बाद विशाल ने उन्हें हज भी कराया। यह रिश्ता महज़ उस्ताद-शागिर्द का नहीं, दो इंसानों की मुहब्बत का था।

उर्दू शायरी को आसान और बोलचाल की भाषा में नई पहचान देने वाले बशीर बद्र ने पारंपरिक अंदाज़ से अलग अपनी शैली विकसित की थी। उनका एक और शेर देखिए।

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से 

ये नए मिज़ाज का शहर है जरा फासले से मिला करो..!

एक शायर की ही यह ताकत है कि वह सरहद की सीमाओं को स्वीकार नहीं करता। उन्मुक्त परिन्दों की भाँति वह विचारों की उड़ान भरता है जो किसी के दिल को कहीं भी छू सकता है। 1971 में भारत पाकिस्तान के बीच भीषण लड़ाई हुई। लड़ाई के अन्त में दोनों देशों के नेता शिमला समझौते के लिए एक मेज पर साथ बैठे। इसी दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने इंदिरा गांधी को एक शेर अर्ज़ किया.

"दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, 

जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिंदा न हों।"

यह सुनकर इंदिरा गांधी ने हाजिरजवाबी का परिचय देते हुए कहा था 'हमारा शेर हमीं को अर्ज़ कर रहे हैं।' यह वह जमाना था जब सियासतदां साहित्यिक सांस्कृतिक सरोकारों से जुड़े होते थे। बशीर साहब की ग़ज़लों में जिंदगी के कई शेड्स मिलते हैं।मोहब्बत, तन्हाई, रिश्तों और रोज़मर्रा की जिंदगी के अनुभव उनके शेरों में सहज ही दिखाई पड़ते हैं।

बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 में उत्तर प्रदेश के आंबेडकर नगर ज़िले के बुकियां गांव में हुआ था। इनका जीवन संघर्षों से भरा हुआ था। जब ये दसवीं में ही थे, तो इनके पिता का इंतकाल हो गया। ऐसे में इनकी पढ़ाई छूट गई। घर परिवार चलाने और छोटे भाई-बहनों का पालन पोषण करने के लिए इन्हें नौकरी करनी पड़ी। स्थिति थोड़ी सम्हलने पर खुद अपनी पढ़ाई भी शुरू कर दी। और 1969 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। इन्हीं दिनों का एक दिलचस्प वाकया है। यूनिवर्सिटी के सिलेबस में उन्हीं का लिखा शेर पढ़ाया जा रहा था। प्रोफेसर ने कक्षा में उनसे ही इस शेर का मतलब पूछ लिया। शेर इस प्रकार था -

"अब मिले हम तो कई लोग बिछड़ जाएंगे,

इंतज़ार और करो अगले जनम तक मेरा।"

बद्र साहब ने जवाब दिया, लेकिन प्रोफेसर उनके जवाब से संतुष्ट नहीं हुए और अपनी इस शेर की अलग तरह से व्याख्या की। इस तरह शायर का शेर, उसके शायर से बड़ा हो गया था।

इसके बाद 1974 में मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में बतौर लेक्चरर नियुक्त हुए और 1990 तक वहां पढ़ाया। मेरठ में रहते हुए ही दंगे में इनका घर जला दिया गया जिससे इनका मन उचट गया। साहित्य जगत में 1974 से 1990 के बीच का दौर उनके रचनात्मक जीवन का अहम समय माना जाता है। इसी दौरान उनकी शायरी ने देश और विदेश में पहचान बनाई। 'इकाई', 'इमेज', 'आमद', 'आहट', 'आस' और 'कुल्लियाते बशीर बद्र' उनकी चर्चित किताबें हैं। 'आजादी के बाद उर्दू ग़ज़ल का तनक़ीदी मुताला' और 'बीसवीं सदी में ग़ज़ल' जैसी उनकी किताबों को उर्दू साहित्य में मील का पत्थर माना जाता है।

आज जब हालात मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। हमारे बीच प्यार और विश्वास की जगह नफ़रतों ने ले ली है ऐसे में बद्र साहब की ये पंक्तियाँ मनुष्यता के लिए एक सबक की तरह हैं।

सात संदूक़ों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें

आज इंसाँ को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत।

बशीर साहब की उपस्थिति हम जैसों के लिए एक बड़ा संबल थी। उनका जाना आज ऐसा खालीपन छोड़ गया है जिसकी भरपाई मुश्किल है। कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने बशीर बद्र को अपने आलेख में शिद्दत से याद किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं स्वप्निल श्रीवास्तव का आलेख 'यादों के उजाले'।



'यादों के उजाले' 

   

स्वप्निल श्रीवास्तव 


    

उजाले उनकी यादो के हमारे साथ रहने दो 

न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये

  

बशीर बद्र का यह शेर बहुत मकबूल हुआ था। यह शेर प्रसिद्ध अभिनेत्री मीना कुमारी की डायरी में लिखा पाया गया था। इस शेर का उपयोग विविध भारती द्वारा अपने कार्यक्रम 'उजाले उनकी यादों के' नाम से किया जाता है जिसके अंतर्गत मशहूर हस्तियों से बातचीत की जाती  है। उनके शेर उन लोगों की डायरी में मिल सकते हैं जिसका उपयोग प्रेमपत्र लिखने के लिए लोग करते थे। अब प्रेम पत्र लिखने की रवायत खत्म हो चुकी है। मोबाइल की संस्कृति के चलते हमारे जीवन की इबारतें गायब हो रही हैं। यह भी कि इश्क में वह शिद्दत नही रह गयी है, न शेर डूब कर लिखे जाते हैं। शायरी की दुनिया बदल चुकी है। प्रसिद्ध शायर इकबाल ने कहा था – 


अब इश्क में रही गर्मियां, न हुस्न में रही शोखियां 

न गजनी में तड़प रही, न खम में है जुल्फ-ए-आयज में 


एक अजब सा सन्नाटा छा गया है। मुशायरों के भी मिजाज बदल चुके हैं। वे व्यवसायिक हो चुके हैं। गज़लों में पहले जैसा वजन नही रह गया है। गजलकारों की गज़लों में पहले जैसा आवेग नही रह गया है। अब मुशायरों में ऐसी ग़ज़लें सुनाई जाती हैं जिनका जिंदगी की मसाइल से कोई ताल्लुक नही रह गया है।

  

सातवें और आठवें दशक में मुशायरों में अलग रौनक होती थी वह अब धूमिल हो गयी है। नयी नस्ल के गजलकारों में वह शिद्दत नही रह गयी है। वे शब्दों की जिस दुनिया को रचते हैं उन पर यकीन नहीं किया जा सकता। मुझे अपने छात्र जीवन की याद है जब मुशायरों में सुधी श्रोता पहुंचते थे। उन्हें उर्दू अदब की जानकारी रहती थी और वे जो दाद देते थे उनमें उनकी समझ दिखाई देती थी।

  

मुझे उस वक्त के मुशायरे याद है जब लोग मुशयारों में अंत तक टिके रहते थे। ऐसे मंचों में हिन्दी और उर्दू के अदीब शामिल रहते थे। उन्हीं मुशायरों में मैंने बशीर बद्र को सुना है। उनके गजल की अदायगी अदभुत होती थी। उसे हम गुनगुनाते हुए लौटते थे। उनकी गजलें हमारी जुबान पर चढ़ जाती थीं। बद्र मुशायरे के लोकप्रिय शायर थे। उनके शेर का जिक्र पक्ष विपक्ष के नेता अपनी तकरीर में किया करते थे। उनकी गजलों को याद करने की जहमत नहीं उठानी पड़ती थी। वे तुरंत जुबान पर चढ़ जाती थीं। 


यह देखना मौजू होगा कि बशीर बद्र हमारे समय के शायरों से कितने अलहदा है। उर्दू की दुनिया में बहुत मशहूर शायर पैदा हुए हैं जिनकी फेहरिस्त तबील है। मीर, गालिब, जौक, फिराक और फैज ने बेशक उर्दू साहित्य को मालामाल किया है। उनका साहित्य श्रेष्ठ साहित्य है लेकिन उनकी पहुँच आम आदमी तक नही थी। उसे पढे -लिखे लोग ही समझ पाते हैं। जैसे कि हिन्दी में मुक्तिबोध बड़े कवि है लेकिन वे आम पाठकों की पहुँच से बाहर हैं। बल्कि नागार्जुन जैसे कवि उनकी अपेक्षा आम लोगों में लोकप्रिय हैं। इनमें इन कवियों का दोष नही है। हम जिस तरह के समाज में रहते हैं उसमें साहित्य के लिए जगह नहीं बची है। हमारा समाज एक लेखक की बजाय एक हत्यारे को अधिक जानता है। समाज में शायरों के प्रति लोगों की धारणा बेहद गलत है। उसे गैर जिम्मेदार और शराब के शौकीन के रूप में जाना जाता है। यह समाज में प्रचलित छवि बन गयी है। कई अधकचरे लोग गालिब और फिराक का उदाहरण देते हैं लेकिन इस आधार पर उनका मूल्यांकन नही किया जा सकता। उर्दू साहित्य में क्या योगदान है, इस आधार पर उनकी भूमिका तय होगी। हाँ, उन्हें साहित्य से बेदखल करने के लिये उनकी कमियाँ ढूँढी जा सकती हैं, यह आसान काम है।

  

बशीर बद्र की गजले मैं अरसे से पढ़ता रहा हूँ लेकिन उनसे गोंडा प्रवास में मुलाकात हुई थी। उस समय वे बलरामपुर के एक मुशायरे में शिरकत करने आये थे। बलरामपुर से लखनऊ कोई सीधी ट्रेन नहीं जाती थी। बलरामपुर छोटी लाइन पर स्थित था इसलिये लखनऊ जाने के लिये गोंडा से ट्रेन पकडनी थी। मुझे डी एम बलरामपुर का संदेश मिला कि मैं उन्हें लखनऊ जाने वाली ट्रेन पर बैठा दूँ। भारतीय रेलें कहां समय से आती हैं इसलिये उनके साथ एक घंटे गुफ्तगू करने का समय मिल गया और रेलवे की इस गलती के लिये शुक्रगुजार हुआ। मुझे अपने महबूब शायर से मिलने का मौका मिला। गोंडा में जिगर मुरादाबादी को सुपुर्द ए खाक किया गया था। उनकी असगर गोंडवी से अच्छी दोस्ती थी।अदम गोंडवी गोंडा के मकबूल शायर थे। बद्र साहब ने बताया कि उनका जन्म अविभाजित फैजाबाद में हुआ था। वे वर्तमान अंबेडकर नगर जनपद के मौजा बकिया हँसवर में पैदा हुए थे।यह याद रखा जाना चाहिए कि फैजाबाद में सौदा जैसे उर्दू शायर थे जो नबाब फैजाबाद के दरबार में रहते थे। चकबस्त को कौन भूल सकता है। मेराज फैजाबादी भी इस फेहरिस्त में शामिल हैं। बेगम अख्तर को कौन भूल सकता है जिन्होंने मशहूर गजलकारों की गज़लों को गाया है और उनके नाम को अमर किया है। जब मैंने उनसे पूछा क्या आपको अपने वतन फैजाबाद की याद नहीं आती? मेरे इस सवाल पर उदास होते हुए बोले – 'मिया एक बार वतन छूट गया तो छूट गया। जिंदगी लौटने की मोहलत नही देती'।

  

बशीर बद्र का मूल नाम सैयद मुहम्मद बशीर था लेकिन शायरी की दुनिया में वे बशीर बद्र नाम से मकबूल हुए। बद्र का अर्थ पूर्णिमा (फुल मून) होता है। उन्होंने अपने इस नाम को सार्थक किया और अपनी शायरी की रोशनी को दूर दूर तक फैलाया। उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय वह था जब वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय में पढ़ रहे थे। अलीगढ़ साहित्य का बड़ा मरकज था। राही मासूम रजा और शहरयार जैसे बड़े शायर वहाँ मौजूद थे। अलीगढ़ का अदबी माहौल बहुत अच्छा था। अलीगढ़ और वहाँ के शायरों की सोहबत में उनका विकास हुआ। उसके बाद उन्होंने जो परवाज भरी, उससे हम सब वाकिफ हैं। अलीगढ़ विश्वविद्यालय में उन्होंने कुछ दिनों तक पढ़ाया उसके बाद वे मेरठ कालेज में अध्यापन करने लगे।


कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बंधा हुआ 

वो गजल का लहजा नया नया, न कहा गया न सुना  गया 

  

यह शेर उनकी शायरी की तर्जुमानी करता है।उनके शेर करने का लहजा जुदा है। बहुत सारी बातें मासूमियत के साथ कही जा सकती हैं, उसके लिये तूफान उठाने की जरूरत नही है। उनकी भाषा बेहद सहज है उसमें कोई लाग लपेट नही है। वे आसान लब्ज में बड़ी बात कहने के कायल हैं। उसके लिये वे अलंकृत भाषा का उपयोग नहीं करते। वे बोलचाल की भाषा में अपनी बात कहने का हुनर जानते हैं। इस मामले में वे अपने हमसफर शायरों से अलग हैं। निदा फाजली जैसे शायरों को उनके करीब खड़ा किया जा सकता है। वे भी बशीर बद्र की तरह जटिल भाषा के प्रयोग से बचते थे। बद्र रोमांटिक शायरी के उस्ताद थे। यह शेर देखे 


न जी भर के देखा न कुछ बात की 

बहुत आरजू थी मुलाकात की 

  

कुछ इसी तरह फ़िराक ने अपने इस शेर में अपनी बात की है 


तुम मुखातिब भी हो और करीब भी हो 

तुम्हें देखें या तुमसे बात करें। 


इस दोनों शेरो में एक प्रेमी के असमंजस की बात कही गयी है। यानी हम उन पर फ़िदा होते है जिसे हमने देखा ही नहीं है। बशीर बद्र की शायरी में इश्क और जुदाई के अनेक शेड है। यह शेर देखें 


सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा

इतना मत चाहो वो वेवफा हो जायेगा


उर्दू शायरी के रंग वक्त के साथ बदलते रहे हैं। उसके प्रतीक और रूपक भी बदले हैं। जिन्दगी की हकीकतें भी बदली हैं। उनका वास्ता नयी चुनौतियों से पड़ा है। उसकी कल्पना की उड़ान कम हो गयी है।

  

बशीर बद्र अपनी शायरी में सियासत की भी बात करते हैं लेकिन उनका रूप उग्र नहीं है। भारत पाकिस्तान जंग पर उनका यह शेर बहुत मशहूर हुआ था।


  दुश्मनी जम कर करो लेकिन यह गुंजाइश रहे 

  जब कभी हम दोस्त बन जाये तो शर्मिंदा न हों 

  

यह केवल दो देशों के मामले में  लिखा शेर नहीं है बल्कि यह सामाजिक ताने-बाने पर भी लागू होता है। कोई भी तब्दीली समाज के एक हिस्से में नहीं होती वह अपनी  सम्पूर्णता में बदलता है। सामाजिक ढांचा इतना बिखर गया है कि अब दोस्ती दुश्मनी में कोई फर्क नहीं रह गया है। यह बदलाव आजादी के बाद से हुआ लेकिन उसकी रफ्तार 1992 के बाद उसकी रफ़्तार तेजी से बढी है। वैश्विक स्तर पर पूंजी की आवाजाही देखी जा रही है। जब समाज में पूंजी का वर्चस्व बढ़ता है तो मानव मूल्य गौण हो जाते हैं। 

  

नवें दशक से देश में द्रुत गति से शहरीकरण हुआ है। गाँव शहर के जद में आ गये हैं। इस आधुनिक संस्कृति का प्रभाव लोक संस्कृति पर पड़ा है। यह प्रभाव हमारे आपसी रिश्तों को संकट में डाल रहे हैं। इस आधुनिकीकरण ने समाज को कई हिस्से में बाट दिया है। आदमी की पहचान इस बात से नहीं होती कि वह कितना काबिल और पढ़ा–लिखा है बल्कि उसकी माली हैसियत क्या है? लोगों के मिजाज अचानक नहीं बदले हैं। उन्हें पूंजी ने बदल दिया है। ऐसे लोगों के बारे में बशीर बद्र का यह शेर बहुत मौजू है –

 

कोई हाथ न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से 

ये नए मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो

   

इस शेर के पीछे का कारण संभवत:  समाज में आदमी का अजनवी हो जाना है। एक जमाने में मुहल्ले की संस्कृति रही है। लोग मिल–जुल कर रहते थे। एक दुसरे के सुख–दुःख में शरीक रहते थे। जब से शहर शहर में कालोनिया बनी हैं लोगों के बीच फासले बढ़ गये हैं। प्रेम की जगह नफरत ने ले ली है। जबकि बद्र साहब कहते हैं –

  

सात समुन्दरों में भर कर दफन कर दो नफरतें 

आज इंशा को मुहब्बत की जरूरत है बहुत 

   

बशीर बद्र का यह शेर – 


मुसाफिर हैं हम भी मुसाफिर हो तुम भी 

किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी


इस शेर को पढ़ कर मुझे शैलेन्द्र की इस पंक्ति की सहज याद आ जाती है। उसका मुखड़ा इस तरह का है – 


छोटी सी है दुनिया, पहचाने रास्ते हैं 

कभी तो मिलोगे, कहीं तो मिलोगे 

तो पूछेंगे हाल। 


शैलेन्द्र भी बशीर बद्र की तरह आसान भाषा का इस्तेमाल अपनी शायरी में करते थे।

  

बशीर बद्र ने समाज के कई  ढोंग को उजागर किये हैं। समाज का एक वर्ग बहुत प्रभावी हो गया है। भले ही उसने अकूत सम्पत्ति अर्जित कर ली हो लेकिन उसके भीतर आदमियत की कमी हो गयी है। आप किसी कालोनी में घूम आइये आपको इसका प्रमाण मिल जाएगा। शहरों  में समृद्ध कालोनियों का जाल बिछा हुआ है। उनकी कोठियां अहंकार से भरी हुई है। उनके आसपास सामान्य लोग नहीं दिखाई देंगे। उनकी कोठी पर जंजीर से बंधे कुत्ते होंगे। घंटी बजने पर मकान मालिक नहीं कुत्ते स्वागत करने को तत्पर होंगे। उन भव्य मकानों पर बड़े बड़े नाम और ओहदे लिखे रहते हैं। बद्र साहब लिखते हैं।


 घरों पे नाम हैं नामों के साथ ओहदे हैं 

 बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला 


या


 यहाँ लिबास की कीमत है आदमी की नहीं 

 मुझे बड़े गिलास दो, शराब कम कर दें 


ऐसे कई हकीकतों से बशीर बद्र दो चार होते रहते हैं। इधर साहित्य के संसार में बड़ी मारामारी है। जीते जी अमर होने के लिये बाजार में कई पैकेज हैं। सभी लोग शिखर की तरफ अग्रसर हो रहे हैं। यह खुशफहमी आज का असाध्य  रोग बन चुकी है। इसमें मीडिया और नेटवर्किंग की गहरी भूमिका है। बशर बद्र लिखते हैं – 


शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है 

जिस डाल पर बैठे हो वह टूट भी सकती है।


  लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में 

  तुम तरस नही खाते बस्तिया जलाने में 

 

यह शेर बशीर बद्र ने उस समय लिखा था जब मेरठ में दंगा हुआ था। उस दंगे में उनका घर जला दिया गया था। उसमें उनका घर नही उनकी ग़ज़लें भी खाक हो गयी थी। वह उनके जीवन का बड़ा हादसा था। इस घटना के बाद उन्होंने मेरठ शहर को छोड़ कर भोपाल में बस गये थे। जिन शहरियों के लिये उन्होंने बेहतरी के कसीदे गढे थे उन्हें उनका इनाम इस शक्ल  में दिया गया था। यह एक शायर के जीवन की बड़ी ट्रेजिडी थी।

  

उनका उत्तर जीवन सुखी नही था। उन्हें अंतिम दिनों में डीमेशिया यानी स्मृति लोप की बीमारी हो गयी थी। उन्होंने जो लिखा था उसे भूलने लगे थे। हमे अपनी शायरी से मुतासिर करनेवाले बशीर बद्र अपने जीवन के अँधेरे में चले गये थे और हम उनके ग़ज़लों की रोशनी से नहा रहे थे। उनकी गजले हमें उनकी याद दिलाती रहेगी। हम उनकी यादों के उजालें से रोशन होते रहेंगे। उन्होंने अपनी गजलों में हमारी ही बात कही थी। प्रसिद्ध शायर इब्न ए-इंशा ने मीर के बारे यह शेर कहा था, यह बशीर बद्र के ऊपर भी लागू होता है।


 अल्लाह करे मीर का जन्नत में हो मकां 

 मरहूम ने हर बात हमारी ही बयां की है 



स्वप्निल श्रीवास्तव 



सम्पर्क 


स्वप्निल श्रीवास्तव 

510, अवधपुरी कालोनी 

अमानीगंज 

फैजाबाद – 224001 


मोबाईल – 9415332326


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