परांस - 13 : अरविंद शर्मा की कविताएँ


कमल जीत चौधरी 


आमतौर पर अन्तिम दिन का इंतजार करना कोई नहीं चाहता। किसी विद्यालय का अन्तिम दिन हो या नौकरी का, यह एक समूचे वृतान्त का पटाक्षेप होता है। अन्तिम दिन से कई बातों, कई रूढ़ियों से भी मुक्ति मिल जाती है। वही रूढ़ियां जिनके प्रति कभी एक चिढ़ जैसी होती थी अब अचानक ही मोहसक्त करने लगती हैं। बहरहाल मनुष्य की उस प्रवृत्ति का क्या कहा जा सकता है जिसमें वह हर बीते पल को आगे के लिए सुरक्षित संरक्षित कर लेना चाहता है। इन स्मृतियों के सहारे वह अपने आगे के सफर को बेहतर बनाना चाहता है। यही जीवन है जो विरोधाभासों के बीच भी कदम दर कदम आगे बढ़ता रहता है। जम्मू के कवि अरविन्द शर्मा अपनी कविता 'मोह' में लिखते हैं 'स्कूल के अंतिम दिन,/ आ कर,/ उतारनी थी वर्दी,/ फिर कभी न पहनने के लिए/ उस दिन,/ नहीं उतारी आते ही,/ उतारी ही नहीं गई/ देर शाम, बहुत बोझिल मन से,/ उतारी भी तो बहुत सहेज कर।/ जकड़ लेना उन्हीं बेड़ियों को/ जिनसे छूटने की चाह में जिए/ क्या ऐसा ही होता है/ अंतिम दिन?' अरविन्द की भाषा में टटकापन है। विषय भी अलग किस्म के हैं जो कवि की प्रतिबद्धता को स्पष्ट करता है। अपनी कविताओं के प्रति संशय के चलते अरविन्द छपने से बचते रहे हैं। लेकिन कमल जीत की सदाशयता उन्हें आखिर प्रकाशन की दुनिया में खींच ही लाई। कहीं भी छपने वाली अरविन्द शर्मा की ये पहली कविताएं हैं। एक रचनात्मक जीवन के लिए नवागत कवि को शुभकामनाएं।

अप्रैल 2025 से कवि कमल जीत चौधरी जम्मू कश्मीर के कवियों को सामने लाने का दायित्व संभाल रहे हैं। इस शृंखला को उन्होंने जम्मू अंचल का एक प्यारा सा नाम दिया है 'परांस'। परांस को पहले हम हर महीने के तीसरे रविवार को प्रस्तुत करते थे। अपरिहार्य कारणों से दिसम्बर महीने से यह कॉलम चौथे रविवार को प्रस्तुत किया जाने लगा है। इस कॉलम के अन्तर्गत अभी तक हम अमिता मेहता, कुमार कृष्ण शर्मा, विकास डोगरा, अदिति शर्मा, सुधीर महाजन, दीपक, शाश्विता, महाराज कृष्ण संतोषी, मनोज शर्मा, कुंवर शक्ति सिंह, शेख मोहम्मद कल्याण और निदा नवाज़ की कविताएं प्रस्तुत कर चुके हैं। इस क्रम में आज हम तेरहवें कवि अरविन्द शर्मा की कविताएं प्रस्तुत कर रहे हैं। कॉलम के अन्तर्गत कवि की कविताओं पर कमल जीत चौधरी ने एक सारगर्भित टिप्पणी लिखी है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं अरविन्द शर्मा की कविताएं।


परांस - 13 : 

अँधेरों का भी रंग होता है 


कमल जीत चौधरी


यह सबसे छोटी 'परांस' होगी। कम घेर ले कर ज़्यादा तेज़ चलूँगा। आख़िर अँधेरा होने से पहले इसे भी मेड़ तक ले जाना है। 'परांस-13'; अरविंद शर्मा की कविताओं पर है। जम्मू-कश्मीर की हिन्दी कविता में 2005 से 2010 के बीच कवियों की एक नई पीढ़ी आई। इन कवियों में अरविंद शर्मा भी थे। उस दौर में कुमार कृष्ण शर्मा, योगिता यादव, दीपशिखा, अमिता मेहता, डॉ. शाश्विता, सुधीर महाजन और इस आलेख के लेखक जैसे कवियों ने साहित्यिक परिदृश्य में नई ताज़गी भर दी। जो कवि इनसे कुछ या अधिक पहले लिख रहे थे, उन्होंने भी उस समय नया वितान रचने में एक भूमिका निभाई। इनमें कुंवर शक्ति सिंह, अरुणा शर्मा, कुलविंदर मीत, संजीव भसीन, शेख़ मुहम्मद कल्याण, चंचल डोगरा, अशोक कुमार, मनोज शर्मा, श्याम बिहारी, अग्निशेखर, महाराज कृष्ण संतोषी, निदा नवाज़, सतीश विमल आदि प्रमुख हैं। अरविंद शर्मा लगभग 2009 से 2013 के बीच खूब सक्रिय रहे। एक लम्बी चुपी के बाद वे; 'परांस' के माध्यम से सामने आए हैं। इनकी भेजी लगभग बीस कविताएँ पढ़ीं, जिनमें चार नई हैं, अन्य पुरानी। मुझे खुशी है कि अरविंद ने कहीं भी पहली बार छपने का निर्णय लिया है। वे मेरे शुरुआती साथियों में से हैं, हमने लगभग एक साथ लिखना शुरू किया था। 2014 के बाद हमारा संवाद भंग हुआ, जो स्थगित के शिल्प में हुआ था। यह स्थगन; रद्द होने में इसलिए नहीं बदल सका:


'आह!

और मैं,

अब भी 

एक अंतहीन सड़क पर बढ़ा जा रहा हूँ 

यह देखते हुए कि, 

मैदानों,

पेड़ों-पहाड़ों,

मकानों-दुकानों 

तालाबों और,

और हाय-री नियति 

कि उस कंकाल पर भी 

हल्की वर्षा हो रही है...'


(यात्रा)


यहाँ जिस कंकाल पर बारिश हो रही है, वह कंकाल; कवि-हृदय को समझने का रास्ता है। ऐसे रास्तों को खूब समझता हूँ। इसलिए इस पर इनके साथ हो लिया, और हो कर; इनके अब तक के लेखन पर कुछ स्थापनाओं को दर्ज़ कर रहा हूँ:


● यह ऐसे निजी सुरक्षित घेरे की कविताएँ हैं जो एक हद तक सार्वजनिक सुरक्षित घेरों के लिए चुनौती बन सकती हैं। यह राजनीतिक घेरेबंदी की नहीं, मनुष्य-अस्तित्व के निजी गवाक्ष की कविताएँ हैं।  


● इनकी कविताई को असम्प्रेषणीयता की सम्प्रेषणीयता और और मूक की मुखरता को परिभाषित करते हुए, समझा जाना चाहिए। यह आसान में अलग और कुछ हद तक कठिन होने की कविताएँ हैं। 


● यह प्रकृति की कविताएँ हैं। अरविन्द के भावों में ही नहीं, बल्कि भाषा में भी प्रकृति की महक है। यह प्रकृति मनुष्य-मन की नदी में दिखते चाँद की छवि और इसके किनारे बसे आदिम सभ्यता को दर्शाती है। 


● इनकी कविताओं में कहीं-कहीं सत्ता को चुनौती दी गई है। मगर यहाँ प्रसिद्ध जनपक्ष राजनीतिक विचारधारा का सहारा नहीं लिया गया है। इनका प्रतिरोध; सामूहिक सपने की अपेक्षा अकेले व्यक्ति के अस्तित्व की लड़ाई के लिए है। यहाँ अस्तित्ववादी चेतना है। 


● यह रुदन, अवसाद, अभाव, आत्मसंघर्ष और उस आत्ममुग्धता की कविताएँ हैं, जिनमें मनुष्य द्वारा मनुष्य को न समझे जाने के दु:ख भी शामिल नहीं हैं। यह उस मनुष्य के होने की कविताई है, जो अपने होने को याद करता रहता है कि वह था, है और रहेगा। 


● यह उस प्यार की कविताई है, जिसमें प्यार शब्द नहीं आता। यह परिपक्व प्यार की निशानी है। यह जतलाने और पाने की इच्छा से भरा प्यार नहीं है। यहाँ ऐसे अनुभव हैं, जो हमेशा फलने की कृत्रिम इच्छा से मुक्त हैं।


● यह कविताई अन्दर घटित हो कर कागज़ पर उतरी है। इस पर बाहरी प्रभाव न के बराबर है। यह सृजन मंद गति से स्वयं की गहराई में उतरता है। यहाँ स्थानीय या ग्लोबल की नहीं, बल्कि मन-विशेष की अभिव्यक्त हुई है।


● यह सृजन एक अकेलेपन, अभाव और व्यक्तिगत टीस से उपजा है। इन कविताओं का प्रणेता किसी शिकायत की मुद्रा में नहीं है। वह एक अपने ही घेरे से घिरा है। इस घेरे में एक मुठभेड़ चल रही है। इसे खूब देखने के बाद यह दिखा कि इस घेरे का ध्वंस हो तो यहाँ से कोई बड़ी ख़बर निकल सकती है।  


अरविंद पर बात करने के लिए उपरोक्त बिंदु पर्याप्त और न्यायसंगत हैं। इन में कवि व्यक्तित्व और इनके लेखन का दायरा स्पष्ट दिख जाता है। 'परांस' के लिए दस कविताएँ चुनी हैं, मगर इसमें बिना किसी उद्धरण के उन कविताओं को भी रेखांकित किया गया है, जो यहाँ नहीं हैं। 


शाश्वत सत्य जैसा कुछ तब अनुभव होता है जब जीवन में प्यार घटित होता है। इस आलोक में अरविंद की 'रंग' शीर्षक कविता को देखा जा सकता है। इस कविता के इतर भी इनकी कविता-कला आने-जाने के प्रभाव को दर्शाती है। इनकी समझ प्रकृति के माध्यम से मुखर होती है। इन पर बाहरी प्रभाव कम या न के बराबर हैं। आलोच्य कवि अँधेरों के रंग से परिचित है। यहाँ जीवन बाधित था, जो नया परिवेश पा कर पुनः उस अतीत से जुड़ता है, जहाँ फूलों, ओस और संगीत के वास्तविक रंग हैं। यहाँ रंगों को शोर कहने की व्यंजना एक तंज है, और इन्हें ज़हर बुझे तीर कहना दुख की असंसारिक अभिव्यंजना। रंग शीर्षक यह कविता, 'फिर, तुम आईं' को बीच में रख कर पूरी होती है, और फिर कभी ख़त्म न होने की स्थिति को प्राप्त होती है: 


'रंग,

हमेशा संगीत ही नहीं होते, 

शोर भी होते हैं रंग।

ओस की बूंदे ही नहीं, 

ज़हर बुझे तीर भी होते हैं रंग।

रंग सिर्फ फूलों का ही नहीं होता, 

काँटों, और यहाँ तक कि अँधेरों का भी होता है एक रंग ।


यह शाश्वत सत्य था।


फिर,

तुम आईं,


और मैंने

वर्षों बाद फूलों, ओस और संगीत के रंगों को जिया।'


(रंग)


कवि के पास सार्थक शंका, संशय, अनिर्णय और आकस्मिकता हो तो वह अधिक प्रामाणिक लगता है। अरविंद के पास सवाल हैं, जैसे "क्या ऐसा ही होता है/ अंतिम दिन?" 'मोह' शीर्षक कविता विद्यालय में विद्यार्थियों के अंतिम दिन के भाव को ले कर सृजित हुई है। यहाँ सवाल पर ख़त्म होती कविता कवि का निजी अनुभव भी है। आख़िर इन्होंने भी विद्यालय में अपने अंतिम दिन को महसूस किया होगा। यह अहसास क्षितिज की तरह है, जो है मगर कहीं नहीं है। कवि के पास इस न होने वाले अंतिम दिन को को भी सहेज कर रखने की सलाहियत है। "वर्दी ... झंझट थी" जैसी पँक्ति में कवि-व्यक्तित्व दृष्टिगोचर होता है। अरविंद के पास एक परिपक्व कचास है। इस कचास में करुण, प्रेम और अगाध रस के सघन बिंब हैं:


'तुम्हारे किवाड़ से दूर जाता मेरा हर पग

उधेड़ता चलता है मुझे

और मेरे आँसू

टूटे-फूटे मौन शब्दों से टकरा कर

होंठों पर टँगी रह गई मुस्कान पर आ गिरते हैं'


(विवशता)


'तुम-2' शीर्षक कविता के हवाले से बात करते हुए कहा जा सकता है कि इनकी कविताई का एक कोना सम्बन्धों की पड़ताल के लिए आरक्षित है। यहाँ सम्बन्धों में आर्थिक, सामाजिक तथा व्यक्तिगत पड़ताल है:


'तुम्हारी कमी 

जैसे

नई सिली पतलून टखने तक न पहुँच पाए

खड़ी बारात के सामने, कढ़छी कढ़ाह का तल छू ले

बीच बाज़ार, जेब का भीतरी कपड़ा, बाहर निकल आए।'

(तुम-2)


यहाँ अभाव और उपस्थिति की स्थितियाँ हैं, और यह प्रेमपात्र या पाठक को लुभाने की कोशिश से परे हैं, इनकी कविताई में वह व्यक्ति बयान हुआ है, जो अपने प्रेमपात्र को प्यार दिए जाते रहने की साध में है। यह कविताई; एक कप चाय में आधा चम्मच चीनी की तरह है। यह मिठास कवि-हृदय के तल पर प्यार की तरह रहती है। 


नदी पर लिखे बिना कोई कवि नहीं हो सकता। आलोच्य कवि ने जम्मू शहर की नदी 'तवी' पर एक कविता लिखी है। यह कविता नदी को सखी भाव में प्रकट करती है। कवि उसे सखा रूप में सम्बोधित करता है। मगर यह अनावश्यक विस्तार और नदियों के प्रति व्यक्त प्रचलित भावुकता का शिकार हुई है। नदी को सखी कहने, मृत्यु के बाद इसके किनारे दाह किए जाने और फिर अपनी राख इसी में बहाने की अभिव्यंजना सघनता को प्राप्त नहीं हो सकी है। यह कविता; तीसरी पंक्ति पर ही ख़त्म की जा सकती है। इस कविता का पूरा भाव यही है:


'तवी

वर्षों बिताए हैं मैंने तुम्हारे किनारे

औरों को तुम नदी होगी

मुझे तो सखी हो।'


(तवी के प्रति)


वे अपनी इस सखी को बाढ़ लाने वाली और बोझिल क्षणों को बहा लेने वाली भी मानते हैं। आज नदियों का यथार्थ बहुत भयावह है। जम्मू में खनन माफियाओं और प्रदूषण ने नदियों की स्थिति को बदहाल कर दिया है। यहाँ अन्य समस्याओं के सन्दर्भ में भी अरविंद की कविताई; स्थानीयता को अभिव्यक्त नहीं कर सकी है। इस समय तवी को अन्य जगह से देखे जाने की भी ज़रूरत है। 


अरविंद की भाषा ध्यान आकृष्ट करती है। यह स्वाभाविक रूप से सशक्त की ओर बढ़े, यह श्रेयस्कर है। कोई कवि भाषा में चौंकाने वाला प्रयोग करें तो कुछ अखरता है। अरविंद चमत्कार पैदा करने के ध्येय से तो नहीं, मगर लापरवाही से कहीं-कहीं शब्द चयन में कृत्रिमता के पास चले जाते हैं, जैसे 'खुंज' शब्द का प्रयोग। कुछेक जगह इन्होंने चलते मुहावरों का इस्तेमाल भी किया है, जैसे 'हाँ-हाँ, क्यों नहीं, चुड़ियाँ पहनना मत भूलना'। मगर यहाँ इन्हें स्त्री विरोधी समझने की भूल न की जाए। यह मुहावरा 'विकल्प' शीर्षक कविता में चित्रित 'मैं' को ताना मारने के रूप में लिखा गया है। दरअसल यहाँ हमारे समाज का चरित्र दिखाई देता है। इनकी कुछ कविताओं के शीर्षक ठीक नहीं हैं। 'एकांत' शीर्षक कविता इसका उदाहरण है। इस कविता में एकांत-भंग की इच्छा प्रकट हुई है, जबकि यह अकेलेपन की होनी चाहिए थी। एकांत तो उपलब्धि है। यह शिद्दत से अर्जित किया जाता है, अकेलापन तो व्यवस्था जनित है, यह कुंठा, अवसाद, संत्रास, अजनबीपन को ले कर आता है। कवि लिखता है: 


'किसी की पदचाप की बूँदें

युगों से नहीं बरसीं

अंधकार, पौष की धुंध-सा पसर गया है

नेत्र टंगे रह गए हैं मचान पर

कोई फेंक जाए धूप का एक टुकड़ा भर ही...'


(एकांत)


इनकी कविताई कारागार के छोरों के बीच विचरते उस मनोस्थिति की कविता है, जो एक टुकड़ा धूपभर की इच्छा से भरी है। 


इनकी कुछ कविताओं के शीर्षक उपयुक्त नहीं है, जैसे : 'एकांत', 'मोह', 'अवसाद' आदि। इन कविताओं के शीर्षक हटा कर पढ़ने से यह सार्थक हो जाती हैं। इनकी 'यात्रा' शीर्षक कविता एक विशेष मनोस्थिति का साक्षात्कार है। यहाँ बिंब तो सशक्त है, पर 'प्यासे का तालाब के नज़दीक जा कर मरना' मौलिक रूपक नहीं है। यह किसी व्यक्तिगत या सामाजिक सरोकार से भी नहीं जुड़ता। 'आह', 'हाय-री नियति' जैसी नाटकीयता अनावश्यक है, और 'संयोग था या विडम्बना, कौन जाने?/ अभागे ने चार पग दूर प्राण त्यागे या/ प्राण उसे बस चार पग पहले छोड़ भागे/ कौन जाने?' जैसे सवाल काव्य-संशय नहीं हैं। इनकी कविताओं में कहीं-कहीं छायावादी छवियाँ कौंधती हैं:


'कुछ भी हो

धन्य वह पशु

प्राण छोड़े, दिशा न छोड़ी

निर्जीव, निश्छल

पड़ा रहा प्यासा ही

तालाब से, बस चार पग दूर।'


(यात्रा)


इस कविता में मार्मिक भाव होने के बावजूद, राह चलते हुए 'यूँ ही दिख गया एक तालाब', 'मौका ताकते सियारों की कालजयी भूख की भट्टी', 'वह रह गया एक कंकाल बन कर' और 'एक अंतहीन सड़क पर बढ़ा जा रहा हूँ' में यात्रा, कंकाल, तंज और कवि के दुःख के बीच सूत्रबद्धता नहीं है। कविता के मैं और अन्य चीज़ों के साथ-साथ 'कंकाल पर भी हल्की वर्षा हो रही है।' यहाँ अलग सन्दर्भ में कबीर के 'साईं के सब जीव हैं' की व्यंजना है। नियति के लिए सब बराबर है। जीवन कंकाल हो जाए तो भी व्यर्थताबोध नहीं होना चाहिए। प्राण चले जाएँ, मगर दिशा नहीं छूटनी चाहिए। यहाँ एक मार्मिक व्यथा-कथा है। जो जीवन पानी के अभाव में मरा है, उसके कंकाल पर बारिश हो रही है। 


यह कविताई सामाजिक सरोकारों की कविताई नहीं है। यह मूलतः मनुष्य-मन के अस्तित्व की कविता है, जहाँ समाज के लिए उतनी ही जगह है, जितनी समाज के लिए किसी भावुक बौद्धिकता के लिए:


'मेरी नींद अब खुंज गई है

मैं सोना ही नहीं चाहता

बस एक आसन चाहिए,

फूलों, फूस या काठ का नहीं

अबके मैंने लौह चुना है

सपाट टुकड़ा नहीं

नोकें और धारें चुनी हैं

तुम

या तो चले जाओ

या आँखें मूँद लो

क्योंकि इस काम में 

अब चिंगारियाँ स्वाभाविक हैं।'

 

(विकल्प)


यह अति भावुकता की शिकार कविता है। लोहे के साथ लोहा टकराने पर चिंगारियाँ उत्पन्न होती हैं। फ़िलहाल इनकी कविताई में सामूहिक प्रतिरोध का लोहा नहीं है। यह कविताई धातु की नहीं, बल्कि एक विशेष कुम्भ में भरे जल की है। अरविन्द को लिखते हुए लगभग बाईस साल हो गए हैं। इतने समय में इन्होंने मात्र तीस-एक कविताएँ ही लिखी हैं। अब विशेष जल से भरे इस घड़े को खाली किया जाना ज़रूरी है। मगर कहाँ? यह कवि को तलाशना है। 'मेरे विकल्प सीमित हैं' कह कर कवि अपनी लिखत का दायरा स्पष्ट करता है। यहाँ गहराई की कमी नहीं है, मगर यह स्वयं में उतरने की है। क्रूर सत्ताओं द्वारा बनाए गए नागरिक-दुःख यहाँ नहीं हैं। आगे चल कर इनकी अस्तित्ववादी चेतना व्यापक जगह घेरे यही कामना है: 


'क्या था, ठीक-ठीक नहीं पता,

पर वह झुंड नहीं था

कोल्हू का बैल भी नहीं

उसे भगाया तो जा सकता था

खदेड़ा भी

पर हांका नहीं जा सकता था

न ही जोता जा सकता था।'


(वह)


उपरोक्त काव्यांश 'वह' शीर्षक कविता से है। यह पूरी कविता अरविंद के वैचारिक-मानसिक धरातल और संघर्ष की प्रतिनिधि कविताओं में से है। 'जलना सुनाई देता है', 'अँधेरों का भी रंग होता है', 'कालजयी भूख की भट्टी में' जैसी काव्यपंक्तियों से इनकी काव्य-समर्थता सिद्ध होती है। यह कविता व्यष्टि चेतना से लैस है। यहाँ प्रेमचंद के शब्दों को थोड़ा बदल कर कहूँ तो व्यक्तिगत प्रतिरोध की कोई कमी नहीं है।


'वह' शीर्षक इस कविता का 'मैं'; अपने 'वह' से किसी आईने के आर-पार मिलता है। मगर यह कौन-सा आईना है, स्पष्ट नहीं होता। कवि को यह भान रहे कि यह वक्त ऐसे आईने, प्रतीक और अबूझ तोड़ने का है, जो असहज और असुन्दर को सहज व सुन्दर दिखा रहे हैं। ग्लोबल-ग्लोबल कह कर स्थानीय ख़त्म किया जा रहा है। जम्मू-कश्मीर में भी अनेक समस्याएँ हैं। जन सामान्य सरोकारों के अभाव में हर कला कर्तव्यच्युत है। इस आलोक में आलोच्य कवि के दायित्व बढ़ जाते हैं। इनके निजी अँधेरों से अनुभवजन्य रंग; समष्टिगत इन्द्रधनुष में बदलें, इस कामना के साथ इस संभावनाशील कवि को इससे आगे की कविताई के लिए शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ।

  

सम्पर्क 


कमल जीत चौधरी 

jottra13@gmail.com


अरविन्द शर्मा


कवि-परिचय: 

अरविंद शर्मा

अरविंद शर्मा का जन्म 1990 में जम्मू शहर में हुआ। लेखन की शुरुआत 2005 में हुई। 2010 में जम्मू कश्मीर कला, संस्कृति व भाषा अकादमी, युवा हिन्दी लेखक संघ और समाज जैसी साहित्यिक संस्थाओं और स्व. नीरू शर्मा, स्व. मनोज शर्मा, शेख़ मोहम्मद कल्याण, अशोक कुमार, कमल जीत चौधरी जैसे कवि-लेखकों व संपादकों के सम्पर्क में आए, जिससे इनके लेखन को गति मिली। 2013 के बाद इनका काव्य कर्म मंद पड़ गया। इधर इन्होंने चार-पाँच कविताएँ लिख कर, फिर दस्तक दी है। अरविंद शर्मा कविता को ख्याति का नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति का माध्यम मानते हैं। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद, 2012 से भौतिकी व गणित की ट्यूशन पढ़ाने का कार्य कर रहे हैं। 


अरविंद शर्मा की कविताएँ


रंग


रंग,

हमेशा संगीत ही नहीं होते, 

शोर भी होते हैं रंग।

ओस की बूँदे ही नहीं, 

ज़हर बुझे तीर भी होते हैं रंग।

रंग सिर्फ फूलों का ही नहीं होता, 

काँटों, और यहाँ तक कि अँधेरों का भी होता है एक रंग।


यह शाश्वत सत्य था।


फिर,

तुम आईं,


और मैंने

वर्षों बाद फूलों, ओस और संगीत के रंगों को जिया।


विवशता 


"चले जाओ!"

तुम कहती हो


मेरे शब्द चटक जाते हैं

चुप्पी घुल जाती है हमारे मध्य

अंगारों-सी लाल


बन्द किवाड़ों के सामने पहरों खड़ा रहने के बाद 

मैं 

चल पड़ता हूँ

कभी न लौटने के लिए

पर

तुम नहीं जानतीं

इन किवाड़ों की सांकलें

मुझे बींध कर ही पहुँचती हैं खूंटी पर


तुम्हारी वितृष्णा, मेरी टूटन से लदे मेरे पैर

चल पड़ते हैं

कि चलना

आदेश है तुम्हारा

तुम्हारे किवाड़ से दूर जाता मेरा हर पग

उधेड़ता चलता है मुझे

और मेरे आँसू

टूटे-फूटे मौन शब्दों से टकरा कर

होंठों पर टँगी रह गई मुस्कान पर आ गिरते हैं।



मोह


सख़्त हिदायत थी

स्कूल से आओ, वर्दी उतारो, तह करो 

तब मिलेगा खाना।


वर्दी... झंझट थी।

पहनने में भी, उतारने में भी।


स्कूल के अंतिम दिन, 

आ कर, 

उतारनी थी वर्दी, 

फिर कभी न पहनने के लिए


उस दिन, 

नहीं उतारी आते ही, 

उतारी ही नहीं गई

देर शाम, बहुत बोझिल मन से, 

उतारी भी तो बहुत सहेज कर।


जकड़ लेना उन्हीं बेड़ियों को

जिनसे छूटने की चाह में जिए


क्या ऐसा ही होता है

अंतिम दिन?



एकांत


कारागार के छोरों के बीच विचरते

पगों के मृग, घोंघे हुए।

हर बीतती पूर्णिमा को

रेखाओं में ढाल कर

दीवार पर टाँकते हुए

रोक रखा है नखों को बढ़ कर नुकीला होने से।

समय-सरिता, जेठ माह की तवी-सी,

बह रही है, मौन, निर्बाध।

कानों की धरा, प्यासी है

किसी की पदचाप की बूँदें 

युगों से नहीं बरसीं।

अंधकार, पौष की धुंध-सा पसर गया है।

नेत्र टँगे रह गए हैं मचान पर

कोई फेंक जाए धूप का एक टुकड़ा भर ही...


तुम - 2


तुम्हारी कमी

जैसे

नई सिली पतलून टखने तक न पहुँच पाए

खड़ी बारात के सामने, कढ़छी कढ़ाह का तल छू ले

बीच बाज़ार, जेब का भीतरी कपड़ा, बाहर निकल आए


प्रिये,

मुझे विश्वास है

तुम मुझमें ही हो,

आधा चम्मच चीनी की तरह,

चाय किसी तरह पीने के बाद

कई प्रश्नचिन्ह एवं काश लिए जो,

तल पर मिलती है…


यात्रा


राह चलते,

मैं देख रहा था हल्की वर्षा होते हुए।

देख रहा था, कुछ रह-रह कर बरसती बूंदों को,

दूर से धीरे-धीरे पास आ कर, झट गुज़रते पेड़ों को,

खेतों-खलिहानों को,

पहाड़ों-मैदानों को,

झोंपड़ी-मकानों, मंदिरों और दुकानों को,

और परस्पर साथ चलती 

एक लंबी, सर्पाकार, अंतहीन सड़क को। 


यूँ ही,

दिखा एक तालाब,

जिससे कुछ दूर पड़ा था एक पशु कंकाल 

तालाब का रुख किए।


संयोग था या विडंबना, कौन जाने? 

अभागे ने चार पग दूर प्राण त्यागे 

या 

प्राण उसे बस चार पग पहले छोड़ भागे, 

कौन जाने?


कुछ भी हो,

धन्य वह पशु,

प्राण छोड़े, दिशा न छोड़ी। 

निर्जीव, निश्चल

पड़ा रह गया प्यासा ही, 

तालाब से, बस चार पग दूर। 

बेचारा,

प्राणों के ही साथ छोड़ जाने पर,

कैसे उठाता अपना भारी शरीर?

कुछ हल्का होने को, 

झोंक चुका अपनी मांसल काया 

मंडराते गिद्धों, और मौका ताकते सियारों की कालजयी भूख की भट्टी में,

मांस तो क्या, खाल तक न छोड़ी जिन्होंने।

अपना सर्वस्व लुटा, 

वह रह गया केवल एक कंकाल बन कर 

प्रतीक्षा में,

उस दिन के 

जब वह जा पहुँचे

अपने समाधि स्थल से, केवल चार पग दूर 

तालाब तक


आह,

और मैं,

अब भी 

एक अंतहीन सड़क पर बढ़ा जा रहा हूँ 

यह देखते हुए कि, 

मैदानों,

पेड़ों-पहाड़ों,

मकानों-दुकानों 

तालाबों और,

और हाय-री नियति 

कि उस कंकाल पर भी 

हल्की वर्षा हो रही है...  



तवी के प्रति 


तवी 

वर्षों बिताए हैं मैंने तुम्हारे किनारे 

औरों को तुम नदी होगी 

मुझे तो सखी हो।


कितनी ही शामें 

मैंने बिताईं हैं तुम्हारे किनारे बैठ 

मेरे कितने ही बोझिल क्षण 

तुम बहा ले गई हो 

यूँ ही कलकल करतीं 

सच कहूँ 

बहुत सुन्दर दिखती है यह घाटी तुम्हारे किनारे बैठ 

किसी दालान-सी यह नर्म धूप तपी रेत 

यह मलमल पर मोतियों-सी बिखरी झाड़ियाँ 

नज़र भर दूर वह हरा-भरा झुरमुट 

और इन सब से हट कर गुजरतीं 

तुम 

सच, बहुत सुन्दर लगता है यह सब।


सच मैं जानता हूँ 

सच तो और भी हैं 

जैसे 

यह दालान कुछ नहीं सूखे पथरीले भूखंड के सिवा

यह मोती कंटीली झाड़ियों के सिवा कुछ नहीं 

वह झुरमुट भले ही नज़र भर दूर हो 

एक गहरी जलधार के उस पार है 

और तुम 

सदा यूँ ही बच कर नहीं गुजरतीं 

बाढ़ बन कर भी आती हो 

लेकिन कुछ भी हो प्रिये 

औरों को तुम नदी होगी 

मुझे तो सखी हो 

सचमुच की सखी।


चाहता हूँ आत्मसात् कर लूँ तुम्हें 

पर यही नियति है मेरी 

कि बैठा रहूँ किनारे पर ही 

कायर नहीं हूँ 

तुम्हारा घाट भी फ़र्लांग भर से ज़्यादा दूर नहीं मुझसे 

चाहते ही उतर सकता हूँ तुम में  

पर 

कमर भर से अधिक गहरा नहीं 

कि तुम्हें आत्मसात् कर लेने की चाह जितना ही शाश्वत 

एक सत्य यह भी है कि, 

तैरना नहीं जानता 

और 

मेरे जीवन के सभी सत्यों में अंतिम सत्य एक यह 

कि मेरा दाह संस्कार भी तुम्हारे ही घाट पर होगा 

यहाँ तक कि  

मेरी भस्म भी तुम्हीं में प्रवाहित कर दी जाएगी 

और फिर 

बिना तैरना जाने भी 

अंतत: मैं आत्मसात् कर लूँगा तुम्हें 


प्रिय तवी!

औरों को तुम नदी होगी 

मुझे तो सखी हो 

सचमुच की सखी।



विकल्प


मैं फूलों पर सोना चाहता था,

तुम खिल्ली उड़ाने लगे, 

“हाँ-हाँ क्यों नहीं, चूड़ियाँ पहनना मत भूलना!”

मैंने गद्दे चाहे, तुम दे न सके।

मैंने फिर घास का मन बनाया,

तुमने मुझे पलायनवादी घोषित कर दिया।

मैं काठ ढूँढने लगा,

तुम्हें ठक-ठक से ही पीड़ा होने लगी, 

और तुमने कुल्हाड़ी पर ही पाबंदी लगा दी।

अब 

मेरी नींद ही खुंज गई है 

मैं सोना ही नहीं चाहता 

बस एक आसन चाहिए,

फूलों, फूस या काठ का नहीं 

अबके मैंने लौह चुना है 

सपाट टुकड़ा नहीं 

नोकें और धारें चुनीं हैं 

तुम

या तो चले जाओ 

या आँखें मूँद लो 

क्योंकि इस काम में 

अब चिंगारियाँ स्वाभाविक हैं।



वह


वह 

था:

एक पहाड़ 

एक झरना 

एक फूल 

माचिस का मसाला 

एक युद्ध 

कुछ भी 

कोई भी 

कदाचित

एक व्यक्ति भी।


क्या था, ठीक-ठीक नहीं पता,

पर 

वह झुंड नहीं था 

कोल्हू का बैल भी नहीं 

उसे भगाया तो जा सकता था 

खदेड़ा भी

पर हाँका नहीं जा सकता था 

न ही जोता जा सकता था।


वह 

बहुत कुछ नहीं जानता था 

पर कुछ-कुछ बहुत अच्छे-से जानता था 

इस कुछ-कुछ में एक कुछ 

संघर्ष था।

कुछ और कुछ भी थे 

जैसे 

संघर्ष क्यों? 

कैसे? 

किसलिए? 

कब?

और कब तक?


वह पहले-पहल बोला करता था 

तब आवाज़ नहीं, शोर करता था 

फिर उसने कहना सीखा 

संकरी गलियों में बहना सीखा।

शोर पहले आवाज़ हुआ 

आवाज़ शब्द 

शब्द चिंगारियाँ 

चिंगारियाँ ज्योति 

ज्योति ज्वाला 


वह ज्वलंत था।


उसका जलना सुनाई देता था 

छोटे-बड़े सभी कानों को 

जो बस ‘जी हाँ’ सुनना चाहते थे 

जलना नहीं 

जिन्हें ढोल-मंजीरे तो संगीत थे,

पखावज और वीणा नहीं।


वह जलता रहा।

ज्वाला दावानल घोषित कर दी गई।


मैं जानता हूँ, वह आज भी जलता है 

आज भी, बस कुछ-कुछ ही जानता है 

आज भी उसका एक कुछ संघर्ष है 

यह भी कि कितने अक्षर लगते हैं संघर्ष लिखने में 

कहाँ मात्रा लगती है, कहाँ बिंदी 

पर 

अब उसका जलना सुनाई नहीं देता 

यूँ कहूँ कि कानों को नहीं सुनाई देता 

पेड़-पहाड़, नदियाँ और कानों के अलावा सभी और सब कुछ 

उसे सुनते हैं।


बहुत ढूँढ़ने पर भी 

वह अब नहीं दिखता 

अपनी इच्छा से ही दिखता है 

और

उसके चाहने पर 

किसी आईने के आर-पार 

मैं उससे मिल लेता हूँ।


अवसाद 1 


अक्सर 

घिरा पाता हूँ खुद को 

दोनों कानों के बीच 

एक ऊँची दीवार के सहारे 

एक काले दालान में 

सामने 

सलाखें, माथे की लकीरें।


अलग-सी एक शांति 

बिछी रहती है यहाँ 

गहन शांत कोटर में

सर्वथा एकाकी भी नहीं होता हूँ 

धूप उतरती है 

प्रतिदिन 

उन सलाखों से छितराती हुई 

दालान पर 

मुझ पर 

मेरी पलकों की रजाई हटा देती है 

और एक नादान-सी मुस्कान 

नंगे पाँव दौड़ जाती है

मेरे होंठों के पार 


मैं 

परिचित हूँ 

इन सलाखों के जोड़-जोड़ से 

हर मोड़ से 

कीकर की छाल खुरदरी 

सलाखों से 

मेरे पोर मिलते हैं 

मित्रता के प्रयास में लिपटे।

मेरी भुजाएँ

इन्हें मोड़ तो सकती हैं 

ढाल नहीं सकतीं 

इन लोहे की छड़ों में 

कलियाँ नहीं रोप सकतीं।


मेरे विकल्प सीमित हैं 

मैं 

छितरा नहीं सकता 

फल नहीं सकता 

केवल गहरा सकता हूँ 

और गहराऊँगा भी 

बरगद-सा 

इस अँधेरे के बीचों बीच 

कि मेरी जड़ें 

कण-कण करते 

भेदेंगी इन सलाखों को 

जकड़ लेंगी इन्हें  

बिखेर देने से पहले 

कभी 

कभी 

विस्तार पाऊँगा फिर 

इस दालान से अधिक 

कहीं विशाल 

और फिर छितराऊँगा 

फलूँगा 

कभी 

कभी।


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


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मोबाइल - 8493805403 

टिप्पणियाँ

  1. क्या बात बहुत ही सुन्दर ज्ञानवर्धक लेख है। कमल जीत चौधरी जी हर बार परांस के लिए बेहतरीन और शानदार चयन के साथ आते हैं। लेख तर्कसंगत है। इस लेख को पढ़कर अनुभव होता है कि कमल जीत चौधरी जी ने कविताओं पर सूक्ष्म दृष्टि डाली है, तभी इसमें शब्द - शब्द,अर्थ - अर्थ खुलता नज़र आता है। कमल जीत चौधरी जी को बधाई और शुभकामनाएं , उनकी यह नज़र बनी रहे और आने वाले समय में और अधिक सुंदर संवेदनाओं से परचित करवाते रहें। अरविंद जी को भी बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं। सभी कविताएं जो मैंने यहां पढ़ी, सभी अच्छी कविताएं हैं विशेष रूप से रंग और विवशता कविता।

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  2. क्या बात बहुत ही सुन्दर ज्ञानवर्धक लेख है। कमल जीत चौधरी जी हर बार परांस के लिए बेहतरीन और शानदार चयन के साथ आते हैं। लेख तर्कसंगत है। इस लेख को पढ़कर अनुभव होता है कि कमल जीत चौधरी जी ने कविताओं पर सूक्ष्म दृष्टि डाली है, तभी इसमें शब्द - शब्द,अर्थ - अर्थ खुलता नज़र आता है। कमल जीत चौधरी जी को बधाई और शुभकामनाएं , उनकी यह नज़र बनी रहे और आने वाले समय में और अधिक सुंदर संवेदनाओं से परिचित करवाते रहें। अरविंद जी को भी बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं। सभी कविताएं जो मैंने यहां पढ़ी, सभी अच्छी कविताएं हैं विशेष रूप से रंग और विवशता कविता।

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  3. यह समीक्षा अरविंद की कविताओं के भावलोक भाषा और बिंबों का गंभीर मूल्यांकन करती है
    समीक्षक ने अकेलेपन, प्रतीक्षा और आशा की संवेदना को प्रभावशाली ढंग से रेखांकित किया है
    भाषा की स्वाभाविकता की सराहना के साथ कृत्रिम प्रयोगों की ओर भी संकेत किया गया है।
    अंततः यह लेख कविताओं को “एक टुकड़ा धूप” की मानवीय तलाश की कविता के रूप में स्थापित करती है।
    कवि और समीक्षक दोनों को अनंत शुभकामनाएं

    जवाब देंहटाएं

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