श्री नरेश मेहता के खण्डकाव्य 'महाप्रस्थान' की भूमिका
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| श्री नरेश मेहता |
दूसरे सप्तक के कवि श्री नरेश मेहता की ख्याति ऐसे रचनाकारों में है जो भारतीय संस्कृति, परम्परा और मिथकों के हवाले से भारतीयता की बात करते हैं। संस्कृतनिष्ठ हिन्दी में लिखने वाले कवि नरेश जी का गद्य अनुभवजनित होने के नाते बेजोड़ है। युवा कवि आशुतोष प्रसिद्ध गंभीर अध्येता हैं। हाल ही में अपनी फेसबुक वॉल पर उन्होंने यह टिप्पणी की थी "श्री नरेश मेहता के खण्डकाव्य 'महाप्रस्थान' की भूमिका कई कई बार पढ़ी जानी चाहिए। विवेचना, विचार, शब्द-शिल्प, इतिहास, ऐतिहासिक, संस्कृति, परम्परा, शैथिल्य में चलने की गरिमा और यह जानने के लिए की कला का और गद्य का उत्कर्ष कैसा हो सकता है।" आशुतोष से जब पहली बार के लिए यह उपलब्ध कराने का जिक्र किया तो उन्होंने भूमिका उपलब्ध कराने का श्रमसाध्य कार्य त्वरित गति से किया। इसके लिए हम आशुतोष के आभारी हैं। भारतीय मिथकीय परम्परा और जीवन दृष्टि को जानने के लिए नरेश जी का यह आलेख इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए कि आज सन्दर्भों को विकृत कर प्रस्तुत करने का सिलसिला चल पड़ा है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं श्री नरेश मेहता के खण्डकाव्य 'महाप्रस्थान' की भूमिका।
प्रस्थान-पूर्व
श्री नरेश मेहता
प्रस्तुति : आशुतोष प्रसिद्ध
प्रत्येक मनुष्य के भीतर आरात्रिक रामायण सम्पन्न होती है तो आक्षण अपने परिवेश में वह महाभारत का साक्षात करता है। अपनी प्रकृति, संस्कार, गुण, धर्म तथा स्वत्व के अनुरूप ही इन कथा-गाथाओं में हम अपना पक्ष निर्धारित करते हैं। यह इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है कि ये या इन जैसे अन्य आर्ष ग्रन्थ, भारतीय जीवन की ऐतिहासिकताएँ हैं या नहीं, वास्तविकता तो यह है कि ये ग्रन्थ, हमारी ही नहीं मनुष्य मात्र की शाश्वतताएँ हैं; नियति भी कहा जा सकता है। इतिहास सिवाय काल सम्बन्धी आश्वस्ति से अधिक और क्या है? विचार कालातीत तो होते ही हैं परन्तु मानवीय आश्वस्ति भी होते हैं अतः इतिहास से कहीं अधिक सार्थक, उपादेय एवं महत्त्वपूर्ण भी।
रामायण, वैयक्तिक चक्रव्यूह की करुण-कथा है तो महाभारत, सामाजिक व्यूहों-प्रतिव्यूहों की अनन्त त्रासद महागाथा। एक में दुःख भोगते मनुष्य का एकान्त बाँशीरव है तो दूसरा युद्धकामी मानवों का दुर्धर्ष वाद्यवृन्द। दोनों के केन्द्रों में राज्य है। कैसी विषमता है कि सभ्यता का प्रतापी ग्रह भी राज्य ही है तथा मारकेश भी। राज्य त्याग के बाद राम बनवासी होते हैं तो राज्य प्राप्त होने पर भी भरत आश्रमवासी। राज्य का अर्थ न भोगी, न कांक्षी, किसी के लिए कुछ नहीं रहता। वैसे शालीन भरत ने तो राज्य की कांक्षा भी नहीं की थी। राज्य, यह कैसा प्रतीक-विनायक है जो कि अपने सम्पर्क में आने वाले को केवल झुलसाता ही है। महाभारत में तो यह प्रतीक-विनायक विकसिततम रूप में विद्यमान है। धृतराष्ट्र का अन्धापन एक ऐसा सार्वजनीन सत्य है जिसे केवल चरित्र विशेष नहीं कहा जा सकता। कम-से-कम महाभारत तो मात्र महाकाव्य नहीं लगता। इतिहास की कैसी ही समग्र संज्ञा उसके लिए छोटी ही होगी। वह स्वयं ही अपने में इतना सम्पूर्ण संसार है कि उसकी एकमात्र संज्ञा प्रतिसृष्टि ही सम्भव है। कई बार तो ऐसा लगता है कि महाभारत, काव्य मात्र की भृगुसंहिता है। किसी भी देश-काल में मनुष्य कैसा ही वैयक्तिक अथवा सामाजिक आचरण करे, महाभारत में उसकी प्रतिकृति अवश्य मिल जाएगी। मनुष्य-व्यवहार का यह प्रथम एवं अन्तिम कोष है ।
मनुष्य से अधिक उन्नत एवं संस्पर्शी रचनात्मक वाद्यता सृष्टि में अन्यत्र नहीं। प्रकृति, पदार्थ और चेतना को मिश्रित रूप में इससे अधिक विकसित नहीं प्रस्तुत कर सकती। जैवीयता की पराकाष्ठा है मनुष्य और इसीलिए यह श्रेष्ठ है। यह संस्पर्शी श्रेष्ठता उसके गुणसम्पन्नों की है। जिस दिन मनुष्य गुणसम्पन्न युक्त अपने भागवत-स्वरूप को पहचान लेता है तो वह पूर्ण-पुरुष होने के लिए बाध्य है, परन्तु यह भी उतना ही कटु सत्य है कि मनुष्य से अधिक जड़ भी जड़ नहीं होता। जड़ता और ऊर्ध्वता, दोनों ध्रुवों पर मनुष्य ही है। यह स्वयं पर निर्भर करता है कि आप इस सोपान में अपने को कहाँ स्थित करते हैं। अतः इस अक्षांश-देशान्तर वाली भूमि का जैसा भी और जितना भी दैवीय और क्रूर इति-हास है वह केवल मनुष्य का इतिहास है। शेष सृष्टि चाहे वह पशु-पक्षी की हो या जंगल-मैदान की, सब की हवि दी गयी है।
वस्तुतः हमें अपनी इतिहास-दृष्टि में परिवर्तन करना चाहिए। इतिहास के नाम पर केवल क्रूर पुरुषों को ही इस प्रकार पढ़ाया जाता है जैसे कि वे आदर्श-पुरुष हैं। तलवारों के बल पर भौगोलिकताओं को बदलने वाले इतिहास-पुरुषों को पढ़ाया जाए और अपेक्षा यह की जाए कि हम आचरण उन निरीह सन्तों के जोवन की भाँति करें जिन्हें या तो क्रास पर चढ़ा दिया गया या सूली दे दी गयी या विष दे दिया गया या अन्त में गोली का शिकार होना पड़ा। इस निरर्थक तथा वैषम्यपूर्ण शिक्षा का तनाव मानवीय व्यक्तित्व का, संकल्प का, दिशा का हनन करता है। इतिहास की सबसे बड़ी दुरभिसन्धि यह है कि वह राजनीतिक नृशंसता को सभ्यता की केन्द्रीय शक्ति के रूप में प्रतिष्ठापित तथा गौरवान्वित करता है और मानवीय उदात्तता एवं सद्गुणों को अप्रासंगिक एवं अवान्तर बनाता चलता है, जब तक इस इतिहास-दृष्टि के बारे में आमूल परिवर्तन नहीं होगा तब तक मानवीय कल्पद्रुमता सम्पूर्ण सामाजिक स्तर पर पुष्पित नहीं हो सकती।
मुझे सदा यह लगता रहा है कि जिस देश और जाति के पास जितना बड़ा इतिहास, समुन्नत संस्कृति, धार्मिक उदात्त दृष्टि एवं श्रेष्ठ साहित्य होता है, उसके दो ही परिणाम हुआ करते हैं। या तो हम सामान्य व्यक्ति की भाँति अपने अतीत का गौरव-गान करते हुए अपनी हीनता को छुपाते रहें अथवा अतीत की उस महिमामण्डित महाद्वीपता के समकक्ष अपना भी कोई यशद्वीप समानान्तर रूप से निर्मित करें। अथवा वाला यह कार्य उतना सामान्य नहीं। इसके लिए असामान्य वर्चस्व तथा निर्मम संकल्प की अपेक्षा हुआ करती है। अतीत को वर्तमान बना कर भविष्य के रूप में प्रस्तुत कर देना भगीरथ व्यक्तित्व की माँग रखता है। वैसे तो सभी देशों, जातियों और सभ्यताओं के पास या तो अतीत की पौराणिकता है, या नहीं तो मध्यकालीन ऐतिहासिकता की कुछ-न-कुछ ऐसी परम्पराएँ हैं ही कि जिन पर उचित-अनुचित गर्व कर सकते हैं, परन्तु हमारी कठिनाई दूसरी सारी सभ्यताओं, जातियों तथा देशों से कहीं अधिक है। इतिहास के क्रम में अधिकांश सभ्यताएँ अपने अतीत से कट कर सर्वथा भिन्न-भावभूमि ग्रहण कर चुकी हैं अतः उनका अतीत एक प्रकार से उनके रचनात्मक व्यक्तित्व के लिए शेष हो चुका है। परन्तु हमारी कठिनाई यह है कि एक ओर तो हम बहुश्रुत तथा बहुविध परम्पराओं से मण्डित हैं और दूसरी ओर हमारी जातीय अस्मिता पर गत दो हजार वर्षों से क्षार-पर्ते निरन्तर पड़ते-पड़ते इतनी कड़ी पड़ गयी हैं कि रामकृष्ण, विवेकानन्द, गांधी या अरविन्द द्वारा किये जाने वाले मोह-भंग से भी हमारा स्वत्व जाग्रत नहीं होता। चाहे तो कह सकते हैं कि इसके लिए आवश्यक हो गया है-मृत्युभंग!! हमारी अस्मिताहीनता में और जड़ता में थोड़ा ही अन्तर रह गया होगा। भले ही हम अपनी अस्मिताहरणता के लिए सामी-वैचारिकता को दोषी ठहराएँ पर वास्तविकता यह है कि अब हमें किसी भी बाहरी शत्रु की आवश्यकता नहीं रह गई है।
जिस प्रकार किसी देश की भौगोलिकता में परिवर्तन मनुष्य द्वारा नहीं सम्भव है उसी प्रकार घटित इतिहास को भी नहीं बदला जा सकता और क्यों? पश्चिम की भूमि में आम नहीं होता क्योंकि वह पूर्वीय भूमि की भौगोलिकता की ही विशेषता है तब हमें धर्म की ऐतिहासिकता क्यों असुविधाजनक लगती है? मैं किसी भी प्रकार के धार्मिक संस्थान का पक्षधर नहीं परन्तु तात्त्विक स्तर पर पूछना चाहूँगा कि क्या हमारी धर्म-दृष्टि भी सामी-धर्मदृष्टियों की भाँति अनुदार रही है? क्या निरन्तर उसमें परिवर्तन करते हुए उसे मनुष्य मात्र के लिए सहज उपलब्ध बनाने की चेष्टाएँ नहीं की गई हैं? जीवन को देखने-परखने और रचने की सामी-दृष्टि ही एकमात्र ऐतिहासिक, आधुनिक तथा किसी सीमा तक वैज्ञानिक दृष्टि भी है, यह मान कर अपनी दृष्टि को तिलांजलि दे देना कितना खतरनाक होता है इसके हम प्रमाण हैं। औद्योगिक युग में दासता का यही स्वरूप हुआ करता है। अतः हम प्रथम कोटि में आते हैं कि अतीत का गुणगान करते हुए अपनी हीनता को छुपाये रखें। अपने अतीत का गुणगान करने का भी यदा-कदा वाला जो यह साहस है उसके पीछे भी पश्चिम का ही प्रश्रय है न कि किसी आत्म-प्रतीतिवश हम ऐसा करते हैं।
हमने अपनी स्वतन्त्र इतिहास-दृष्टि गत दो हजार वर्षों में कभी निर्मित ही नहीं की तब भला वह विकसित कैसे होती? इसीलिए सामी जातियों, सभ्यताओं और संस्कृतियों की दरारों, दुरभिसन्धियों तथा कूटताओं को कभी नहीं जान पाये। अपने धर्म-परिवर्तन के कारण सामी जातियाँ अपने अतीत की गौरव परम्पराओं, वैचारिक सम्पदाओं तथा पूजा-आस्थाओं से कट गयीं। इस प्रकार की बातों का सामान्य जीवन तक पर प्रभाव पड़ा करता है। यह बात अलग है कि सामान्य जन इसका दुष्परिणाम प्रायः नहीं समझ पाता है परन्तु इस प्रकार की ऐतिहासिक दुर्घटनाओं से जातीय सृजनात्मकता में क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाया करते हैं। जातीय सृजनात्मकता की प्रकृति ही बदल जाती है। किसी भी देश की या जाति की जातीयता उसकी मिथकता है। सामी-धर्मों ने धर्म परिवर्तन करने वाली जातियों, देशों और सभ्यताओं को उनके अपने विचारदर्शन, पूजा आस्थाओं और मिथकों से सदा के लिए काट दिया, फलतः समय के साथ गहनतर होते जाने वाले सभ्यता के विकास की, जो कि धर्म को भी विकसित करता है, दिशा ही अवरुद्ध हो गयी। जब धर्म या दर्शन अपनी जातीय अस्मिता, इतिहास-प्रक्रिया की उपज नहीं होता तब वह जातीय रचना-त्मकता में सहयोगी नहीं होता। अतीत की ऐसी मिथकता क्या पश्चिम, क्या मित्र, क्या ईरान सभी के लिए मृतप्राय है परन्तु ऐसा हमारे साथ तो नहीं है। राम, कृष्ण, शिव और इन्द्र की मिथकहीनता के बाद क्या भारतीय सृजनात्मक-मानस वैसा ही निष्प्रभ नहीं हो जायगा जैसा कि सामी देशों में है? इसीलिए जीवन्त मिथकता के सभाव में धर्म की रूढ़ियाँ, जकड़बन्दी अधिक हो जाया करती हैं। भारतीय सन्दर्भ में धर्म को वैसी जकड़बन्दी, सामाजिक अनिवार्यता नहीं है जैसी कि सामी धर्मों में है। इसीलिए भारतीय सृजनात्मक-मनस की यात्रा और सामी सृजनात्मक-मनस की यात्रा में प्रतिविरोध है। सामाजिक रूप से कट्टर धार्मिकता वाला सामी सृजनात्मक-मनस, रचनात्मक स्तर पर अराजक होने की चेष्टा करता है। अपने अवचेतन में वह उस धार्मिक जकड़बन्दी से मुक्ति का अनुभव करना चाहता है और वह एकाकी हो उठता है; जबकि इसके विपरीत सामाजिक रूप से अराजक धार्मिकता वाला भारतीय सृजनात्मक-मनस, रचनात्मक स्तर पर धर्मप्राण होने की चेष्टा करता है ताकि सृष्टि के महाभाव से एकात्मता अनुभव कर सके। क्या यह साधारण अन्तर है कि भारतीय सन्दर्भ में सारी महत्त्वपूर्ण कविता धार्मिक महाभाव प्रधान रही है परन्तु सामी-साहित्यों में धर्म और काव्य में ऐसी कोई युति नहीं है? अपनी रचनात्मक अक्षमता की क्षतिपूर्ति के लिए पश्चिम ने गद्य का विकास यथार्थ के धरातल पर किया। मिथकों के अभाव को यथार्थ चरित्रों के द्वार दूर करने की चेष्टा की गयी। विस्तार में न जा कर इतना ही कह देना काफी होगा कि मिथक, जातीय मूल्यवत्ता के प्रतीक होते हैं जबकि चरित्र अधिक से अधिक वैयक्तिक अथवा सामाजिक वैचारिकता घटनात्मकता के प्रतीक होते हैं। अतः शुद्ध यथाधिक चरित्र की ओर की गयी पश्चिमी गद्य की इस सृजनात्मक-यात्रा का क्या परिणाम निकला? ऊर्ध्वोन्मुखी मिथकों के स्थान पर जड़ीय वैयक्तिकता तथा अमानवीय सामाजिकता की अन्ध गुफाओं में भटकते हुए मूल्यहीन, व्यक्ति-द्वीपवाले अजनबी लोग या फिर राजनीतिक यातना-शिविरों में त्रास पाती मान-बता ही तो सामने आयी । इससे अस्वीकार हो ही नहीं सकता है कि साहित्य की आधारभूत भावभूमि यथार्थ ही होती है परन्तु प्रश्न है सृजनात्मक दृष्टि का। जब तक वह ऊर्ध्वोन्मुखी असंगता से प्रभूत नहीं होगी तब तक कैसा ही मेधावी प्रणयन क्यों न हो सामाजिक परिवर्तन का कारण नहीं बन सकता। जातीय ऊर्ध्वोन्मुखी अस्मिता की वाहिका धर्म-दृष्टि हुआ करती है। मैं पुनः स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि धर्म से तात्पर्य किसी सम्प्रदाय, मठ या संस्थान से नहीं है। धर्म, प्रकृति की भाँति उदार एवं असंग होता है। काव्य और साहित्य के लिए मैं इसी धर्म की अस्मिता का पक्षधर हूँ। आज के अस्मिताहीन वातावरण में ऐसी काव्य-अस्मिता की चर्चा पर समकालीनता लांछन लगा सकती है परन्तु इससे सृजनात्मक शून्यता की वास्तविकता नहीं बदल जायेगी। हम जितनी तेजी से बिना अपनी भौगोलिकता एवं जलवायु का विचार किये भारतीय स्थापत्य के स्थान पर पश्चिमी स्थापत्य ला रहे हैं संभवतः उससे भी अधिक तेजी से उन स्थापत्यों में बसाये जाने के लिए सामाजिकता को भी स्वरूपित करने में सन्नद्ध हैं। चार ठगों ने प्राचीन काल में किसी सत्पुरुष के बछड़े को बारम्वार श्वान कह कर उसे ठगा था। कठिनाई केवल यही हुई कि हमने इस कथा को पढ़ते समय भी तथा आज भी अपने अस्मिताहरण से कहीं इसे नहीं जोड़ा।
व्यक्तिगत रूप से हम सब रामायण के पात्र हैं जो कि प्रति-व्यवहार करते समय महाभारत के चरित्र बन जाते हैं। इसीलिए ये दोनों ग्रन्थ पढ़ते समय ऐसा नहीं लगता कि ये केवल मात्र पोथियाँ ही हैं जिनका प्रणयन वाल्मीकि, व्यास, वैशम्पायन और सौति तक ही सीमित हैं।मानवीय चरित्र की ऐसी विशाल सफलता और अप्रतिम प्रतिभा, संयम की कलात्मक यथार्थता क्या कोई सृजनात्मक चुनौती नहीं देती? कालपत्रों पर उत्कीर्णित महाभारत की यह महागाथा किसी भी मेधावी को ठण्डा पसीना ला सकती है। कहना न होगा कि भारतीय भौगोलिकता का सिंचन जिस प्रकार मुख्य रूप से हिमालय, विन्ध्य और सह्याद्रि-पुत्रियों से ही होता है उसी प्रकार भारतीय मानसिकता का सिंचन-पल्लवन रामायण-महाभारत आदि आकर-स्रोतों से ही संभव है। धर्म, संस्कृति, सभ्यता या साहित्य कभी भी गमलाई-वानस्पतिकता नहीं हुआ करते। प्रमाण है-दीनेइलाही, ब्रह्म-समाज, प्रार्थना समाज, उर्दू भाषा-साहित्य और आज के अंग्रेजी के भारतीय लेखक। इन आकर स्रोतों तक प्रत्येक भारतीय सृजनशीलता ने अपनी मिट्टी में स्नात हो कर पदयात्रा की। वैसे तो इस प्रकार की थोड़ी-बहुत यात्राएँ प्रत्येक प्रकार की सृजनशीलता को भी करनी ही पड़ती हैं और तभी समझ में आता है कि कौन यात्रिक था और कौन 'टूरिस्ट'। हिमालय जड़ भी है और चेतन भी। वह गमलाई-वनस्पति के पोषकों के लिए 'हिमालया' पहाड़ भर है पर अधिकांश धूसरित भारतीयता के लिए धूर्जटी चेतना रूप है। हिम की शुभ्रता, तेजस्विता आदि हमारी पात्रता और स्थिति पर निर्भर करती है। धर्म-दृष्टि बदल जाने के बाद कुछ के लिए गंगा और गन्दे जल में कोई अन्तर नहीं रह जाता। अपने मिथकों से कट जाने का ही यह परिणाम होता है कि देवतात्मा हिमालय तथा पंचगंगाओं के बीच में होने पर भी गढ़वाल में भैंसे चराते काश्मीरी मुस्लिम अहीरों की न जल, न पर्वत, न अरण्य किसी से कोई रागात्मिकता नहीं होती। मुझे यह लगता है कि भारतीयता, शेष मानवता से इसी अर्थ में भिन्न है कि हमारी विकास यात्रा हिंसा से अहिंसा की ओर रही है जबकि शेष मानवता की यात्रा हिंसा से घोर हिंसा की ओर। भारतीयता ने जड़ को भी चेतनत्व प्रदान किया जबकि शेष ने मनुष्य को भी जड़ बना देने का उपक्रम किया है। जब तक इन बातों को आधार बना कर इतिहास-दृष्टि निर्मित नहीं की जायगी तब तक हम सदा गलत निर्णयों पर पहुँचेंगे।
मुझे यह संसार, सृष्टि, संगीत के पर्याय लगते रहे हैं। धूप मेरे लिए वस्तुतः धूप न हो कर जौनपुरी का आलाप लगती है। इसीलिए जहाँ रामायण मुझे भारतीय एकान्तिकता की कोमलकान्त भैरवी या ब्रह्ममुहूर्त के पूर्व की ब्राह्मणी विहाग लगती है, वहाँ मुझे, महाभारत, भारतीय समवेतता का उदात्त एवं असंग भैरव या अग्निकाषायी शंकरा लगता है। इस संगीत-वाकोत्सव को मैंने अपने व्यक्तित्व के अनगढ़ इकतारे में एक सुगन्धित अनुष्ठान के रूप में सम्पन्न होने दिया है फलत अनायास ही मेरे असिद्ध-कण्ठ से भी कभी कोई आलाप फूट पड़ता है।
सम्पूर्णता की दृष्टि से यही लगता कि रामायण, भारतीय जन-जीवन का माधुरी भाव है जो कि अगत्या महाभारत के निष्काम-कर्म की ही भाँति निर्वेद है। सृजनशीलता की इस असंगता ने मुझे बारम्बार झकझोरा है। रचनात्मकता के स्तर पर न पात्र, न चरित्र और न रचनाकार किसी भी आसक्ति का कोई अर्थ नहीं। संभवतः इसीलिए भारतीय काव्य में 'पर्सनल-लेखन' जैसा कोई विभाजन नहीं। लेखन के क्षेत्रों में भी इस प्रकार की पर्सनल-भावना पाश्चात्य औद्योगिक कूटता की देन है।) सामन्तयुगीन वास्तुशिल्प में भी निजी-कक्ष नामक कोई कक्ष नहीं होता था। खुले प्रांगणों-दालानों के उस राजस-जीवन तक में दास-दासियों तक का खुला प्रवेश था। लेखक भी सार्वजनीन था। हाँ, पर्सनल से अधिक महत्वपूर्ण स्थिति जो हमें देखने को मिलती है, वह थी आत्म-साक्षात्कार की। अतः इस प्रकार की अनेकानेक बातें हैं जिन पर आधुनिक ढंग से, पाश्चात्य-मुक्त मनस से विचार करने पर ही हम अपनी अस्मिता को समझ सकेंगे अन्यथा हम पश्चिम के वैचारिक उपनिवेश ही सघनतर होते जाएँगे।
मुझसे पूर्व भी अनेक सार्थक कवियों ने इन आकर स्रोतों तक रचनात्मक-यात्राएँ की हैं। इस सन्दर्भ में सबसे बड़ी कठिनाई यह होती है कि इन महाग्रन्थों में जो घटनाएँ हैं यदि उन्हें यथातथ्य रूप में ही ग्रहण किया जाए तो वह रचना, मात्र इतिवृत्तात्मक तो हो ही जाएगी, लेकिन इससे भी अधिक संकट की स्थिति यह होगी कि जैसे स्फटिक प्रसन्न-जल अपनी संपूर्ण स्पष्टता में भी यह नहीं अभिव्यक्त होने देता है कि उसका जलीय व्यक्तित्व कितने 'पुरुस' का है। हम साधारणतः इस प्रकार के जलीय व्यक्तित्व में इतिवृत्तात्मकता समझ कर ही प्रविष्टते हैं और वह स्फटिक स्पष्टता वास्तविकता में असाधारण अथाह निकलती है। वैसे इससे बचने के लिए नवीन उद्भावनाओं वाला मार्ग तभी सुकर हो सकता है जब रचनाकार के पास भी उतनी ही बड़ी नयी लोक दृष्टि एवं आधुनिक सृजनात्मक क्षमता उपलब्ध हो, अन्यथा पौराणिकता के जलों को नहीं छूना चाहिए। ये ऐसी एकान्त बावड़ियाँ हैं जो अपने प्रशान्त जलों पर काई के आवरण डाले मौन हैं। इनमें अवगाहन आसान नहीं होता। तुलसी ने मात्र प्रसंग सम्बन्धी नवीन उद्भावनाएँ ही नहीं कीं बल्कि अपनी लोक-दृष्टि एवं सृजनात्मक क्षमता के बल पर राम-कथा को अन्तिम रूप से धर्म-वेदी प्रदान की। इसी प्रकार कालिदास ने भी 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' में नागरिकता और आरण्यकता को प्रति-सम्मुख खड़ा करके महाभारत के एक साधारण प्रसंग को अप्रतिम बना दिया। वैसे एक और मार्ग भी है- 'प्रसाद' का। 'कामायनी' का अतीत, आतीतिक ग्रन्थिवाला या पौराणिक ग्रंथिवाला अतीत नहीं है। 'कामायनी' का वर्ण्य-विषय उस अर्थ में पौराणिक नहीं है जिस अर्थ में पौराणिकता से भय लगता है अथवा जिसकी उपेक्षा की जाती है। 'प्रसाद' ने पौराणिकताहीन इस अतीत का सम्पूर्ण लाभ उठाया है। फिर भी यह प्रश्न तो है ही कि क्या पौराणिकता के ब्यूह का भेदन करके उसमें घिरी या अभिव्यक्त जीवनदृष्टि को पुनः आधुनिक सन्दर्भ दिया जा सकता है? मुझे लगता है कि यह सर्वथा संभव है क्योंकि वे मात्र चरित्र नहीं है बल्कि मिथक हैं। आधुनिक कविता से दो प्रमाण तो दिये ही जा सकते हैं कि ऐसा संभव है- 'अन्धायुग' और 'आत्मजयी'। मुख्य बात है स्वतन्त्र काव्य दृष्टि। यदि कवि के पास यह प्रज्ञात्मकता है तो वह असन्दिग्ध रूप से सभी प्रकार के जलों में सन्तरण कर सकता है।
(राम और श्रीकृष्ण भारतीय मानसिकता के अक्षांश और देशान्तर हैं तथा इन दोनों की युति वाला आग्नेय बिन्दु ही शिव है। पुराण, धर्म के कथा-वस्त्र हैं। इन्हीं कथा-वस्त्रों में सज्जित कर धार्मिक संप्रदाय अपने-अपने इष्ट प्रस्तुत करते हैं। राम, श्रीकृष्ण और शिव के चरित्रों में आधार-भूत भिन्नताएँ हैं। इसीलिए इन तीन इष्टों का अपने-अपने सम्प्रदायों से सम्बन्ध भी भिन्न प्रकार का है। राम अत्यन्त कोमल राग हैं। राम के आदिगायक वाल्मीकि ने आरम्भ से ही राम के व्यक्ति में कोमल, तीव्र और षड्ज स्वरों का बहुत अधिक ध्यान रक्खा है। सम्पूर्ण राम-कथा जलरंग चित्रशैली में प्रस्तुत हुई है। विषम से विषम स्थिति के रंग भी घुले, फीके तथा घुले-मिले हैं। कोई रंग किसी दूसरे रंग पर आक्रामक रूप से छाता नहीं है बल्कि सब एक दूसरे को प्रति-संपूर्ण ही बनाते हैं। एक चरित्र के रूप में राम का जितना सृजनात्मक व्यवहार हुआ उतना दूसरे किसी चरित्र का नहीं हुआ। इसका कारण संभवतः यह था कि राम में अपौरुषेयता के स्थान पर कहीं विश्वसनीय साधारणता भी रही हैं। राम की दैवीयता में मानवीय सुगन्ध भी थी। गत चार सौ वर्ष पूर्व तुलसी की मेधा ने इस चरित्र को बड़े ही रचनात्मक साधिकार-भाव से मन्दिर-मण्डित कर दिया। तुलसी के पूर्व भी राम देवता थे परन्तु तुलसी ने राम के चरित्र के देवत्व को आग्रह के साथ रेखांकित किया। इसी आग्रह-दृष्टि के कारण तुलसी प्रायः साहित्य की सीमा का भी अतिक्रमण करते रहते हैं। राम के चरित्र में इस मन्दिर मर्यादा ने यह आमूल परिवर्तन ला दिया कि जनमानस के लिए वह कई अर्थों में अब विश्वसनीय साधारणता वाले दैवीय-पुरुष न रह कर कीर्तनप्रिय प्रतिमा बन गये। नतीजा यह हुआ कि सृजनात्मक मनस, राम से दूर होता गया । समस्त रीतिकाल में राम कहीं आलम्बन नहीं हैं। छायावाद में 'राम की शक्ति-पूजा' ही एक मात्र अपवाद है जबकि भारतीयता का दावा उसका काफी बड़ा रहा है। क्या यह कहना बहुत अनुचित होगा कि छायावाद मुख्यतः फैशनेबल भारतीयता का ही काव्य है? ब्रह्म-समाज और प्रार्थना समाज का ही साहित्यिक स्वरूप रवीन्द्र तथा छायावादी काव्य हैं। इसीलिए रवीन्द्र के पूजा-गीत या निराला की प्रार्थनाएँ साहित्य की सीमाएँ अतिक्रमित नहीं कर पायीं। छायावादी-काव्य किसी धर्मदृष्टि या दर्शन की भावभूमि का प्रतिफल नहीं है। वह तो रीतिकालीन या उत्तर रीति-कालीन तद्भव काव्य-भाषा के विरुद्ध तत्सम काव्य-भाषा का आन्दोलन था। यदि किसी अभिनव धर्मदृष्टि या दार्शनिक भावभूमि का प्रतिफल होता तो तुलसी या भक्तिकालीन कवियों की बढ़ती लोकप्रियता का विकल्प बनता, अस्तु। सृजनात्मकता के किस स्तर पर कवि-दृष्टि को भविष्य में सम्प्रदायवादी मन्दिर-मर्यादा वाले राम को पुनः प्राप्त करने का रचनात्मक संघर्ष करना पड़ेगा, आज कहना कठिन है; परन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि साहित्य, राम जैसे महत्त्वपूर्ण मिथक को सदा के लिए कीर्तनियों के हाथों में नहीं रहने दे सकता। राम यदि मात्र चरित्र होते तो चिन्ता न होती परन्तु वह जातीय मिथक हैं। तुलसी ने राम में वाल्मीकि से आगे की सम्भावनाएँ प्रस्तुत कीं। अब यह भविष्य के कवि का काम होना चाहिए कि इस मिथक की भावी संभावनाएँ प्रस्तुत करें।
जहाँ तक श्रीकृष्ण का सम्बन्ध है, वह सर्वमान्य लीलापुरुष हैं। उनकी यह लीलामयता उनके चरित्र निरूपण में भी विद्यमान है। श्रीकृष्ण की कल्पना में चरित्र और मिथक का योग है; यह सन्धि है गोपाल और पार्थसारथी की। इस सन्धि के पीछे कितनी ऐतिहासिकता, कितनी वास्तविकता आदि है यह प्रमाणित करना कठिन भी है तथा हमारा प्रतिपाद्य भी नहीं। श्रीकृष्ण से संबंधित संप्रदायों ने या तो उनके बालमुकुन्द रूप को स्वीकारा या बहुत हुआ तो उनकी गोपी-वल्लभता के कारण राधायुक्त युगल-सरकार को मान्यता दी। संप्रदायों की इस परिसीमा के कारण श्रीकृष्ण के चरित्र में जो सर्वसत्तात्मक, सर्वप्रभुतासंपन्न, अनासक्त एवं गत्यात्मकता महाभारत में वर्णित है वह साहित्य के लिए अक्षय भण्डार है। उत्तर वैदिक देवतावाद में श्रीकृष्ण ही पौराणिकों की ऐसी देन हैं जो वैदिक सृष्टि-पुरुष तथा इन्द्र के समीप हैं। श्रीकृष्ण की चरित्र-खनिजता, मानवीय उदात्तीकरण के लिए सहज सुलभ है। युद्ध के चटख लाल रंगों की धधकती पृष्ठभूमि में अनासक्त गीता-गायक का निर्वेद नीलवर्णी व्यक्तित्व जिस अप्रतिम रूप में उकेरा या चित्रित किया गया है, उसका समकक्ष स्वयं भारतीय पौराणिकता में दूसरा नहीं है तब ग्रीक, यूनानी या चीनी पौराणिकता की तो बात ही क्या है। जिन किन्हीं बाह्य कारणों से अवतारों को मूर्त करने की आवश्यकता पौराणिक चिन्तकों को अनुभव हुई होगी उसका सम्यक एवं पूर्ण परिपक्व मिथक श्रीकृष्ण हैं। बुद्ध की आद्यन्त करुणा तथा राम के अकुण्ठ मर्यादा स्वरूप से शेष सभी गुणज्ञता श्रीकृष्ण के चरित्र की विभूति है। वैदिकता को छोड़ कर जैन, बौद्ध और स्वयं सनातन धर्म मिथकों में भी श्रीकृष्ण की परिकल्पना से अधिक विकसित दूसरा कोई मिथक नहीं।
शिव मुख्यतः वैदिक देवता हैं। कहने को तो शिव से सम्बन्धित संप्रदाय हैं परन्तु वस्तुतः शिव ने कभी न तो संप्रदाय को और न ही देवताओं वाली किसी धार्मिक सुविधा को स्वीकारा। वास्तव में शिव निरंतर विकसित होते रहने वाले एकमात्र देवता रहे हैं। शिव की संपूर्ण विकास यात्रा को देखने पर लगता है कि वह देवत्व का भी अतिक्रमण कर गये हैं! शिव से बड़ी अवधारणा किसी भी भावी मानव-मस्तिष्क से भी संभव नहीं हो सकेगी। काल और देशगत सभी संभावित एवं असंभावित की मिथकता ही शिव हैं। साधारण ग्रामीण जन के बीच भोले बाबा नन्दी पर सपरिवार चढ़ कर गाँव-गाँव में लोगों की करुणा से विगलित अवढर-दानी हैं तो तांत्रिकों के परमाराध्य अघोरशीर्ष भी हैं। हिमालय, संगीत, नृत्य, श्मशान, शक्ति, अनासक्ति, कल्याण, प्रलय, रौद्र, सहज, जन्मा-तीतता किसके प्रतीक शिव नहीं हैं? वह स्वयं प्रकृति भी हैं और पुरुष भी, इसीलिए संपूर्ण मानवी सभ्यता, संस्कृति, दर्शन और धर्म की मिथक अवधारणाओं में केवल शिव ही अर्धनारीश्वर हैं। पाशुपत रुद्र, सदाशिव भी हैं। बड़े ही सहज भाव से उन्हें प्रसन्न किया जा कर छला जा सकता है। है। शुभ्रवर्ण के इस देवाधिदेव के प्रति द्रविणवंशी होने की भी शंकाएँ की गयी हैं। राम और रावण दोनों के ही वे आराध्य हैं। राक्षसों के मस्तक पर त्रिपुण्ड बन मण्डित होते हैं तो उनके संहार वाले सारे देवायजनों में अपनी शक्ति का प्रयोग भी करते हैं। शिव के देवत्व का जिस प्रकार का साधारणीकरण हुआ उतना किसी महत्त्वपूर्ण केन्द्रीय देवता का नहीं हुआ। शायद ही कोई ऐसी भारतीय बस्ती होगी जहाँ शिव प्रस्थापित न मिलें। इसीलिए केवल सृष्टि ही नहीं बल्कि देश-कालातीत ऋतम्भरा प्रज्ञा की पराब्रह्माण्डता भी जिस पर आश्रित है वह शिव ही हैं। काल या देश का मूर्त या अमूर्त स्पर्श करने का तात्पर्य ही शिव का स्पर्श है। तात्पर्य यह है कि शिव से पृथक कुछ भी नहीं ।
इस संदर्भ में एक विचारणीय बात यह है कि जिस ऐतिहासिक दबाव में वैदिक धर्म को जब नवरूपित किया गया तब वह सनातन धर्म कहलाया। इस क्रान्तिकारी परिवर्तन का काफी श्रेय एकमात्र भारतीय सम्राट पुष्यमित्र शुङ्ग को जाता है। सनातन धर्म के आकर-ग्रन्थों का निरूपण, प्रणयन तथा सम्पादन आदि किया गया था। इसी सांस्कृतिक कार्यक्रम में पुराण सामने आये। पुराणिकों ने अपने मिशनरी उत्साह में कुछ आधारभूत गलतियाँ भी कीं। यदि ये गलतियाँ अज्ञानवश होतीं तब तो समय ने उन्हें ठीक कर लिया होता परन्तु लगता है वे सायास चेष्टाएँ थीं। उनमें से हम कुछेक की यहाँ चर्चा करना चाहेंगे। पुराणिकों ने शिव और इन्द्र के साथ स्पष्टतः पक्षधरता बरती। इस मिशनरी संकीर्णता की आँच काफी-कुछ शिव को लगी पर इन्द्र तो उसमें स्वाहा ही हो गये। बेचारे ब्रह्मा-प्रजापति होने के बाद भी उन्हें तर्पण देने वाला तक नहीं रहा। निश्चय ही इन्द्र की हत्या में पुराणिकों का घोषित हाथ है। ऐसा करने के पीछे कौन सा ऐतिहासिक दबाव या दार्शनिक तर्क अथवा सिद्धांत है, समझ में नहीं आता। हाँ, ऐतिहासिक दबाव को किसी हद तक समझ सकता है। तत्कालीन भारतीय स्थिति लगभग ऐसी थी कि विन्ध्य के ऊपर के भारत में बौद्ध-धर्म अधिकांशतः राज-धर्म बन चुका था। साथ ही कलिंग (वर्तमान उत्कल) से ले कर समस्त दक्षिण भारत, गुजरात और सांभर झील तक का राजस्थान जैन धर्म से प्रभावित क्षेत्र था। वैदिक धर्म के प्रमुख देवता थे इन्द्र और वैदिक धर्म की मुख्य पहचान थी यज्ञ, और यज्ञ में हिंसा ही तो थी । अतः पुराणिकों की बाध्यता समझ में आती है कि जिस औपनिषदिक तथा वेदान्तिक चिन्तन की अहिंसा वाली सर्वात्म विचारधारा से प्रेरणा प्राप्त कर जैन-बौद्ध विकसित हुए थे उसी को आधार बना कर यज्ञ की कल्पना में आमूल परिवर्तन किया गया। यह परिवर्तन निश्चय ही स्तुत्य था। इस परिवर्तन का फल यह हुआ कि भारतीय भूमि का आधारभूत धर्म, पुनः अपनी विशाल वटता में पुष्पित हो उठा। जैन तीर्थंकरों की परम्परा या बुद्ध और बोधिसत्वों की परम्परा कारण थे या और कुछ, कह नहीं सकते परन्तु सनातन धर्म में अवतारवाद का सिद्धान्त अजीब गडमड रूप से प्रस्तुत हुआ। मत्स्य, कच्छप आदि अवतारों का आधार तो वैज्ञानिक सृष्टि विकास का द्योतक है, जो कि वेदसम्मत भी है परन्तु राम, परशुराम, श्रीकृष्ण तो सर्वथा पुराणिकों की सृष्टियाँ हैं। वेद में जो विष्णु एक गौण देवता है उनकी वैदिकी वामनता को पुराणिकों ने विराटता में परिणत कर दिया। विष्णु को ऐसी प्रमुखता मिलने में निश्चय ही इन्द्र बाधक हो सकते थे अतः जिस रूप में, जिस भाषा में और जिस कृतज्ञता से इन्द्र को विष्णु के महाभिषेक में बलिपशु बनाया गया वह नितान्त जघन्य कृत्य था। मुझे प्रायः यह लगा है कि सनातन धर्म की नींव में 'इन्द्रमेध' सम्पन्न हुआ है। पुराणिकों ने अति उत्साह में अनेक विरोधी बातें तक कही हैं जिनमें एक तो "हिमालयन ब्लंडर" की भाँति स्पष्ट है। क्या एक ही युग में एक ही साथ दो-दो अवतार संभव हैं? यदि ऐसा है तो 'यदा यदा हि' वाले श्लोक के अनुसार त्रेतायुग में कितना बड़ा अधर्म का विनाश रूप होगा। जब राम और परशुराम अवतार साथ-साथ हुए। दूसरे यह कि अवतार तो विष्णु के हुए हैं तब राम की भाँति परशुराम भी विष्णु रूप ही हुए। समझ में नहीं आता कि विष्णु को एक ही साथ दो अवतारों की क्या आवश्यकता हुई थी? तीसरे यह कि राम द्वारा परशुराम का अपमान, सारे राजाओं की उपस्थिति में पुराणिकों की ओछी मनोवृत्ति का परिचायक है। क्या यह निष्कर्ष बहुत गलत होगा कि पुराणिक यह सिद्ध करना चाहते थे कि यदि कोई अवतार भी शिवभक्त या शिव का पक्षधर होगा तो उसे भी नीचा देखना पड़ेगा?
देवराज इन्द्र, आर्य सभ्यता के परमाराध्य थे जिन्होंने असुरमहत (अहुरमज्द) वरुण पंथियों से संघर्ष करके आर्य-सभ्यता को स्वरूपित किया था। वह कोई काल्पनिक चरित्र नहीं थे। उनकी जिजीविषा, चरित्र एवं व्यवहार अत्यन्त मानवीय था। समस्त वेद पद-पद पर जिसकी स्तुति से भरे पड़े हैं वही हठात पुराणों में लुच्चा, लम्पट, चरित्रहीन, षड्यन्त्री, कायर तथा पदलोलुप बना दिया गया। जनता में इन्द्र की चरित्र-हत्या के लिए अहल्या-बलात्कार तथा गोवर्धन-धारण जैसे निरर्थक प्रसंगों की उद्भावनाएँ की गयीं। लगता है इन पुराणिकों का इन्द्रद्वेष कोई सीमा नहीं रखता। लगे हाथ कुछ अन्य धर्मों ने भी इन्द्र को अपने मन्दिरों का द्वारपाल बना डाला। पुराणिकों की इस हीन ग्रन्थि को भलीभाँति समझा जा सकता है कि जब तक इन्द्र का पतन नहीं होगा तब तक वेदों के नगण्य विष्णु को सर्वसत्तात्मक सिद्ध नहीं किया जा सकेगा। राम और कृष्ण के भगवान रूपों की जो भी स्थिति हो परन्तु विष्णु न तो जनमानस और न ही भारतीय सृजनात्मकता - किसी को भी उद्दीपित न कर सके। पुराणिकों के ही अशोभन एवं अनुत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार का ही नतीजा हुआ कि दो कदम आगे बढ़ कर सरेआम वाजिद अली शाह ने अपने पतुरिया समाज का नाम ही "इन्दर-सभा" रखा। इतने बड़े किसी जातीय मिथक का ऐसा घोर पतन, नृशंस हत्या अन्य धर्मावलम्बियों के द्वारा तो हुआ है परन्तु अपने ही देश में, अपनी ही जाति के द्वारा हुआ हो, ऐसा उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है। भारतीयता के अस्मिताहीन हो जाने का और क्या प्रमाण हो सकता है? निश्चय ही राम और कृष्ण इन्द्र के स्थानापन्न नहीं बन सके इसीलिए वर्चस्वी इन्द्र का पराभव, आधारभूत भारतीय वर्चस्विता, अस्मिता का पराभव है। उस आधारभूत भारतीयता का पराभव है जिसके उत्थान के हेतु पुराणिकों ने इन्द्र के विरुद्ध षड्यन्त्र किया। कई बार मुझे लगता है कि इस देश, जाति, संस्कृति और सभ्यता की ऐसी प्रदीर्घ अस्मिताहीनता का क्या कारण है? वेद, उपनिषद्, उन्नत दर्शन सम्प्रदाय, प्रशांत आकर-ग्रन्थ, पुष्कल सङ्ग्रन्थ, सन्तों-महात्माओं की अक्षुण्ण परम्परा के होते हुए भी यह देश क्रमशः अस्मिताहीन ही कैसे होता गया? ज्ञान की सारी पोथियों का स्थान अगत्या सत्यनारायण की कथा-पोथी ले लेती है! शीर्षस्थ देवत्व का क्रमशः, अवमूल्यन होते-होते कैसे अजीब देवी-देवता प्रमुखता पा जाते हैं। अतः ऐसा लगता है कि इस अस्मिता को इन्द्र का शाप लगा है। कल तक जो इन्द्र परमाराध्य था, उसे हमने पतुरियों के बीच में ले जा कर बैठाल दिया। जो काम महमूद गजनवी जैसे विधर्मी न कर सके वह काम स्वधर्मी हो कर पुराणिकों ने सम्पन्न किया। निश्चय ही पुराणिकों ने हमें राम-कृष्ण की श्री से मण्डित किया परन्तु इन्द्र से श्रीहीन भी किया है।
ऊपर मैं स्वीकार कर चुका हूँ कि इन जातीय-मिथकों तथा जातीय कथाओं की सार्थकता हमारे आज के जीवन संघर्ष के संदर्भ में भी है। 'संशय की एक रात' में युद्ध की अनुपादेयता को केन्द्र बना कर राम के प्रजा-व्यक्तित्व को प्रस्तुत करने की चेष्टा की थी। प्रस्तुत काव्य में राज्य, राज्य-व्यवस्था और उस व्यवस्था के दर्शन की अमानवीय प्रकृति एवं प्रवृत्ति को स्पष्ट करना चाहा है। इसीलिए मैंने कथा और कथा-पुरुषों की निर्वेद स्थिति एवं मनःस्थिति को ही अपने दोनों काव्यों में चुना क्योंकि निर्वेद की स्थिति में ही मानवीय प्रज्ञात्मकता अपने विवेक रूप में होती है। यह अनासक्त मनःस्थिति होती है अतः अत्यन्त स्पष्ट रूप में समस्याओं के उलझे सूत्रों को, विरोधी गतिविधियों को देख सकती है। बिना ऐसी समग्र स्थिति एवं मनःस्थिति के हम जीवन को परिभाषित नहीं कर सकते। कहाँ तक प्रस्तुत काव्य में जीवन परिभाषित हो सका है-कह सकना मेरे लिए कठिन है, परन्तु यदि किंचित भी आज के संदर्भ में यह काव्य किसी प्रकार प्रासंगिक लगे तो रचनाकार के नाते मैं अपना श्रम सफल समझूंगा। अन्त में श्री गिरिराज किशोर, अमर गोस्वामी और डाक्टर सत्यप्रकाश मिश्र ने पाण्डुलिपि को पढ़ कर जो सुझाव दिये उनके लिए आभारी हूँ।
श्री नरेश मेहता
नवरात्रि, अक्टूबर 1974
91-ए, लूकरगंज,
इलाहाबाद-1


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