विजय शंकर चतुर्वेदी की कविताएँ


विजय शंकर चतुर्वेदी 


किसी भी जीव की प्रमुख विशेषता यह होती है कि वह ठीक अपने ही जैसे जीव को जन्म दे सकता है। इस तरह पीढ़ी दर पीढ़ी यह जैविक निरन्तरता बनी रहती है। कामोद्वेग के चलते नर मादा एक दूसरे के प्रति सहज ही आकर्षित होते हैं। यह कामोद्वेग युगल के बीच उस प्रेम का भी आरोपण करता है जो एक दूसरे को भावनात्मक रूप से जोड़ने का काम करता है। साहित्यकारों और कलाकारों ने पुरातन समय से ही अपनी रचनाओं में इस काम को रेखांकित करने का काम किया है। वात्स्यायन का कामसूत्र ऐसी ही प्रमुख रचना है। खजुराहो के कलाकारों ने भी वहां के मंदिरों पर तमाम ऐसी मूर्तियां गढ़ी हैं जो काम में लिप्त हैं। इस पर कुछ शुद्धतावादी नाक भौ सिकोड़ते हैं। लेकिन सच को इससे भला क्या फर्क पड़ता है। ऐसे शुद्धतावादी महिलाओं के पहनावे को ले कर भी अक्सर टीका टिप्पणियाँ करते रहते हैं। लेकिन उस विकृत मानसिकता के लोगों का क्या किया जाए जो मासूम बच्चियों तक को अपने हवस का शिकार बना डालते हैं। विजय शंकर चतुर्वेदी हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि हैं। अपनी कविता 'खजुराहो की टेर' में वे लिखते हैं 'मूर्तिकारों ने आँकी होगी देवदासियों की प्रजनन क्षमता/ समझा होगा यौनिकता का अनिवार्य महत्व/ अलगाई होगी पशु और मानव की चेतनता/ चित्रित किया होगा लज्जा के दिखावे का देवत्व।/ आप बाहर से चाहे डूब जाएँ गहरे यौनाकर्षण में/ पर उनकी आपसे अब भी है बस इतनी सी आस/ कि इष्टदेवता के मंदिर में प्रवेश करने से पहले/ कामुकता की केंचुल उतार दें वहीं सीढ़ियों के पास।' कामुकता की केंचुल पाले लोग ही इस तरह का शोरगुल ज्यादा करते हैं। काश ऐसे लोग कला को कला की तरह देखने की तमीज विकसित कर पाते। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं विजय शंकर चतुर्वेदी की कविताएं।


विजय शंकर चतुर्वेदी की कविताएँ 


खजुराहो की टेर


सामूहिक मैथुन में निरत एक मूर्ति का 

टूट चुका है बायाँ पैर

लटक गया है दायाँ स्तन

हाथ के सहारे के बगैर।


हालाँकि दसवीं से ले कर हमारी वर्तमान सदी तक

बरकरार रहा है इन रूपाकारों का संतुलन

एक-दूजे में गुँथे कई जोड़ों की बदौलत

जारी है उन प्रस्तर खंडों में कामदेव का नर्तन।


यौन झिझक मिटाने आए नवविवाहित जोड़े

दंग रह जाते हैं देख कर इन काम मुद्राओं व आकारों को

किंतु मंद मंद मुस्कुराते मंदरिया महादेव

निर्मूल करते रहते हैं मन में उठते अस्थायी विकारों को।


कला समीक्षकों ने भर डाले हैं पन्ने

पन्ना से आई इन बलुआ चट्टानों के सौंदर्य पर

बहस की है उभरी हुई अनगिनत आकृतियों के 

आँखों में पैदा होने वाले औदार्य को ले कर।


आख़िर इनके सरपरस्त चंदेल राजा

आते ही रहे होंगे घोड़ों और रथों पर बैठ कर

अपनी रानियों और राजकुमारियों के साथ

डालते ही रहे होंगे इस काम-चक्र पर एक भरपूर नज़र।


मूर्तिकारों ने गढ़े वीरभद्र और गणेश

वाराह और नग्न नऋति के विकराल केश

मगर व वृषभमुखी आकृतियाँ अष्टवसु कहलाएँ

देवों की जंघाओं पर बिठाईं देवियों की प्रतिमाएँ।


छहभुजा भैरव हैं, बारहभुजा नटराज

दसभुजा चामुंडा, विराजे हैं यमराज

चतुर्भुज गजेंद्रमोक्ष, चतुर्भुज हैं कुबेर

जूते पहने हैं सूर्यदेव, ब्रह्मदेव पत्नी समेत।


विष्णु, नरसिंह, वामन और शिव पार्वती

शेर, कछुए करते हैं अहर्निश इनकी आरती

लेकिन उस सदी में भी कहाँ था इतना आसान

निर्विघ्न संपन्न करना मंदिरों का निर्माण।


किसी देवता के आभूषण छूट गए अधूरे

किसी अप्सरा का बाजूबंद उकेरा ही न जा सका

कुछ सुंदरियाँ अधबनी ही रह गईं

कुछ देव मेखलारहित ही खड़े रह गए।


भ्रष्ट आकृतियों में ही अंकित रह गए कुछ मिथुन

पशुओं की मुद्रा में आज भी झुकी हैं रथिकाएँ

दिग्पाल और विद्याधर इंतज़ार कर रहे हैं

कि उनकी अलंकरण रेखाएँ भरी जाएँ।


आख़िर खजूर के वृक्षों ने ढँका सदियों तक

उन चयनित स्त्रियों की लज्जा को

जो लाई जाती थीं मगध, मालवा और राजपूताने से

और भरती थीं मूर्तियों की मज्जा को।


पक्षियों ने उड़ानें भरीं बेआवाज़

इनकी निशानदेही गुप्त रखने के लिए

हवा ने हवा तक नहीं लगने दी

यौनिक सुगंध की लाज रखने के लिए।


मगर कभी तो महावर की बूँदों को

केन बन कर उछलना था

और मुसाफ़िरों के अंतस्तल में

कोई शृंगार कक्ष खुलना था।


इरादे चहकने लगे समूचे मंदिर प्रांगण में

ढोल-ताशे बज उठे खजूरपुरा के आँगन में

शिखरों, मंडपों और प्रदक्षिणा-पथों पर

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की चाहत बहकने लगी

चौड़े कूल्हों, भारी स्तनों और मद भरी आँखों की

कामुकता बेजान पत्थरों से टपकने लगी।


मूर्तिकारों ने आँकी होगी देवदासियों की प्रजनन क्षमता

समझा होगा यौनिकता का अनिवार्य महत्व

अलगाई होगी पशु और मानव की चेतनता

चित्रित किया होगा लज्जा के दिखावे का देवत्व।


आप बाहर से चाहे डूब जाएँ गहरे यौनाकर्षण में

पर उनकी आपसे अब भी है बस इतनी सी आस

कि इष्टदेवता के मंदिर में प्रवेश करने से पहले

कामुकता की केंचुल उतार दें वहीं सीढ़ियों के पास।



ओ मेरे देश!


गर्भ से निकल कर जब मैं पृथ्वी के आँचल में आया

तब मेरी तुमसे पहली भेंट हुई

मुझे जीवन की आशा और मृत्यु की प्रत्याशा का

कोई भान नहीं था, न हो सकता था

तुमसे मेरा प्रथम परिचय माँ की गोद जैसी आश्वस्ति लाया।


ओ मेरे देश!

मुझसे अलौकिक लीलाओं की कोई अपेक्षा मत करो

मैं अनजाने ही निकल पड़ा हूँ सूक्ष्म से विराट की यात्राओं पर

मेरी झोली में माया नहीं, ममता का पाथेय रखा हुआ है

मैं साफ़ करता जा रहा हूँ उन जालों को, झाड़-झंखाड़ों को

जो सदा से यहाँ नहीं थे और प्रगति के पथिकों को आगे बढ़ने से रोकते हैं

मैं तोड़ता जा रहा हूँ उन पत्थरों को

जो अपनी हठधर्मिता के कारण मेरे साथ चलने से मुँह मोड़ते हैं।


ओ मेरे देश!

मैं जानता हूँ कि मेरी लघु चेतना के बिना तुम सदा से अपूर्ण हो

मैं तुम्हारी परम सत्ता से एकाकार होने की चरम कोशिशें कर रहा हूँ

मगर मार्ग कंटकाकीर्ण है

पग-पग की बाधाओं से मेरा हृदय विदीर्ण है

मुझे साफ़-साफ़ बताओ

कि तुम पूरब में बसते हो या पश्चिम में

उत्तर में उलझे हो या दक्षिण में

या फिर कर रहे हो रक्तस्नान स्वर्ग के किन्हीं काल्पनिक तटों पर?


ओ मेरे देश!

मुझे ढूँढ़ना था राम का सरयू में डूबा धनुष

जो रावण के हाथ लग गया है

खोजनी थी द्वारिका के जंगलों में कृष्ण की खोई बाँसुरी

जिसे कंस बजा रहा है

धो-पोंछ कर रखना था सुदर्शन चक्र

जिसे अश्वत्थामा ने मैला कर दिया है

और पाञ्चजन्य में अपने प्राण फूँक कर करना था जनयुग का शंखनाद

मगर मैं भटक गया हूँ इतिहास की ध्वस्त हो चुकी सुरंगों में।


ओ मेरे देश!

यदि मृत्यु के मलबे में धँस कर भी अमरता तुम्हारे सिर नहीं चढ़ती

मेरे दु:ख की दारुणता भी अगर मुझे सुख का पता नहीं देती

यदि युगों-युगों की कायरता भी तुम्हारे मन में ग्लानि नहीं भरती

मेरी सार्वजनिक कातरता भी मेरी पशुता का विसर्जन नहीं करती

तो मेरे और तुम्हारे होने का कोई अर्थ नहीं है

ओ मेरे देश!



मेरा सामान


अभी सचमुच बहुत कम है मेरा असबाब

फ़ौरी तौर पर याद करूँ तो एक बेग़ैरत जोड़ा पैंट-शर्ट का

और गैस लाइटर तोड़ कर बनाई गई मुँहफट चिलमची

बनी हुई है मेरी ज़रूरत का जबाब।

वैसे सामान की फ़ेहरिस्त बनाई जाए तो ज़रा ठहरिए- 

एक चटाई और चादर है 

जिन्हें मैंने कई महीनों से धोया नहीं है, 

धो दूँ तो ज़िंदगी फट जाने की आशंका है जनाब!


सीलन भरा यह कमरा मुझे विष्णु चिंचालकर की याद दिलाता है 

जो कहते थे कि हवा में भी चित्र और जीवन के रंग देख लेना देखना होता है 

रूपाकारों को ऐसे ही देखा जाना चाहिए कोरे-काले ब्लैक बोर्ड पर भी

इतने और ऐसे चित्र बादल भी नहीं बना सकते 

रंगत ऐसी कि देह की कूची के सामने दा विंची और माइकल एँजेलो पानी भरें! 


इस कमरे की दीवारों पर मेरी ज़िंदगी के निशाँ दर्ज़ हैं 

देखो… देखो मेरी पीठ बनी हुई है उस जगह चौखट के पास

ठीक उसी तरह जैसे कि एक शायर का सर बना पाया गया था  

कमाठीपुरा के एक कोठे के बाहर पत्थर के बड़े-से टुकड़े पर 

वह ग्राहकों से निबटने के बाद किया करता था अपनी प्रेमिका का इंतज़ार। 


मैं सोता हूँ कुछ तिलचट्टों के साथ 

जिनके बारे में मैंने गूगल में पढ़ा- 

ये मनुष्य के सबसे प्राचीन साथी हैं 

इनकी कौन-सी नस्ल रहती है मेरे साथ

इसका पता लगाना अभी बाक़ी है।

मैं तो चमगादड़ों को भी नहीं रोकता आने-जाने से 

और छिपकलियों के क्या कहने! 

उन्हें अगर न भगाओ तो वे हर घर में रहना पसंद करती हैं।


वैसे अध्यापकों की कौन-सी पीढ़ी पढ़ाती है छात्रों की किस पीढ़ी को? 

क्योंकि मेरे कमरे में कई अध्यापक हैं 

मैं न उनसे सवाल पूछता हूँ न ही वे मुझे कुछ बताते हैं 

हम रहते हैं एक निस्संग और निर्विकार दुनिया में

वह देखो… देखो चला जा रहा है कनखजूरा बड़ी शान से

थोड़ी देर पहले छप्पर में सरसरा रहा था गेहुँआ साँप

दरवाज़े से घुसने की ताक में बैठा है बिच्छू का बाप!

मुझे नज़र दौड़ाने दीजिए जनाब!

कहाँ रखा है मेरा काँसे का लोटा, 

अरे! इस टूटे पलंग के नीचे जो माँ को मिला था पिता से 

और इसके लँगड़ हो चुके तीन पाये! 

इनसे लिपट-लिपट कर रोया हूँ मैं कितनी रातें 

इसकी बुझे सूर्य जैसी उजड़ी पुस्त 

जिस पर सर टिका कर मैं हो जाता हूँ और उदास।

ख़ैर, यह रहा मेरा टूटा हुआ प्याला 

जिससे टपकती ही चली जा रही है ज़िंदगी की आला शराब!

 

यों तो गिनाने के लिए अनगिनत जंग खाए गिलास,  

चम्मचें, बटलोइयाँ, करछुलें, गागरें 

तलवार की मूठें, बल्लम, भाले, आरियाँ-कटारियाँ 

कुदाल, फावड़े, बेलचे, तसले, गैंतियाँ, दराँतियाँ

बाज़ूबंद, पाज़ेब, करधन, चूड़ियाँ-अंगूठियाँ वगैरह  

बिखरी पड़ीं हैं याददाश्त की अँधेरी कोठरी में  

लेकिन ज़िंदगी के कबाड़खाने के लिए  

मुझे अभी और बहुत कुछ जुटाना है।




नफ़रत से नफ़रत


नफ़रत किधर से आती है 

नफ़रत किधर को जाती है 

क्या यह किसी से किसी को 

प्यार करना भी सिखाती है? 


नफ़रत बिल्लियों की तरह कहीं भी आ-जा सकती है बेरोकटोक 

तुम उस पर पहली नज़र में शक़ नहीं कर सकते 

रीढ़ की हड्डी में नागिन की तरह कुण्डली मारे बैठी रह सकती है बरसों बरस 

वह कलम की स्याही बन कर झर सकती है मीठे-मीठे शब्दों की आड़ में 

नफ़रत को झटक दो कि वह तुमको तुमसे ही बेदख़ल कर रही है।

 

नफ़रत हर ख़ास-ओ-आम में मिल जाएगी 

किसी पैमाने से उसे मापा नहीं जा सकता 

खिड़की बंद कर के उसे रोका नहीं जा सकता 

नफ़रत हवाओं में उड़ती है विमानों के साथ-साथ 

पानियों में घुल कर एक से दूसरे देश निकल जाती है 

कई बार वह आती है ग्रंथों के पन्नों में दबी हुई 

लच्छेदार बातों की शक्ल में पहुँच जाती है दिमाग़ तक 

गिरफ़्त में ले लेती है स्वर्ग की कोई अप्सरा बन कर

हर दरवाज़े पर दस्तक देती फिरती है नफ़रत।


नफ़रत की एक बूँद भी आत्मा को फाड़ देती है दूध की तरह 

नफ़रत कब तलब बन जाती है यह पता भी नहीं चलता 

हम रोज़ सुबह पछताते हैं कि अब से नहीं करेंगे नफ़रत 

लेकिन नफ़रत के माहौल में करते हैं सुबह से शाम तक नफ़रत।

 

वैसे सही जगह की जाए तो नफ़रत भी बुरी चीज़ नहीं 

पर यह क्या कि दुनिया की हर चीज़ से नफ़रत की जाए! 

नफ़रत करो तो ऐसी कि जैसे नेवला साँप से करता है  

ब्राह्मण बुद्ध से और शिकार शिकारी से करता है

बक़िया मिसालों के लिए अपने आस-पास ख़ुद ढूँढ़ो 

कि कौन किससे, किस क़दर और क्यों करता है नफ़रत?

 

वैसे भी प्यार का रास्ता आम रास्ता नहीं है 

इसलिए नफ़रत से जम कर नफ़रत करो 

कि हमारे और तुम्हारे बीच नफ़रत बन कर खड़ी है- नफ़रत।



असमाप्त शोकसभा


मुनादी नहीं पिटी कहीं

फिर भी सबको ख़बर हो गई—

शोक–सभा है एक महान राष्ट्र की।


कोई शव नहीं रखा गया मंच पर,

मैं भी रोया नहीं बिलख कर

सिर्फ़ एक विशाल मानचित्र

ढँका है ताबूत की शक्ल में—

किनारों से रिसती हुई

इतिहास की हल्की हरारत,

कपड़े से झरती हुई

सदियों की थकी रोशनी

मुझे यकीन नहीं है इस मौत पर!


सबसे पहले पहुँचा किसान-

उसने मिट्टी झाड़ी अपने पैरों से

और चुपचाप रख दी

एक बित्ता उपजाऊ भूमि—

जिसमें दफ़न थी भविष्य की पहली भूख

फिर बीजों की एक छोटी डिबिया

मानचित्र के पास प्रश्न की तरह सज़ा दी—

अगर यह भी सूख गए

तो अगले मौसम में क्या उगाऊँगा?


उसके पीछे आया शिक्षक,

कंधों पर अक्षरों की थकान लिए—

उसने ‘ज्ञान’ शब्द को

हथेलियों में खिलाया सरसों की तरह

और चश्मेतर से बुदबुदाया—

यदि सवाल ही बुझा दिए गए

तो जवाब किसे दूँगा माँ?


पत्रकार ने कलम झुका दी—

सच कहने की इज़ाज़त नहीं, 

और अपनी ही आवाज़ पर

काला फीता बाँधने लगा।


वकील ने संविधान की प्रति खोली—

उसके पन्नों से उड़ती रही

बहसों की राख,

जैसे शब्द

अपनी ही परिभाषाओं से

विलुप्त हो रहे हों।


एक कवि दाख़िल हुआ—

उसने कविता नहीं पढ़ी,

सिर्फ़ जेब से निकाला

एक जला हुआ रूपक,

और धीमे से बोला—

भाषा की नब्ज़

अब परनाले में धड़कती है।


एक बुनकर आया,

उधड़ा हुआ ताना-बाना ले कर—

धर्म, नस्ल, भाषा, असहमति,

जाति, रंग, भूख, विश्वास—

सबकी सिलवटें

उसकी आँखों में उलझी खड़ी थीं।


फिर दौड़ती आई एक बच्ची-

आँखों से पूछ बैठी—

मेरी तितलियों का क्या होगा

अगर बाग़ ही सो गया?


सभा में नदी भी घुसी—

अपने सूखते किनारों के साथ,

उसने आगे कर दी

एक मटमैली लहर

और बोली—

पिता, अब मैं किस दिशा में बहूँ?


यादों का शालवन पेश हुआ

अधकटी बाँहें लहरा कर,

और हवा ने अपनी जड़ों पर

मौन का काला दुपट्टा ओढ़ लिया।


शोकाकुल आवाज़ें

अपने ही कंठ में रहीं निर्वासित

मगर‌ सभा समाप्त नहीं हुई—

क्योंकि आँसुओं को भी

दरकार थी सरकारी अनुमति।

लोग मौन नहीं थे,

अपने-अपने पेशों की चुप्पी

सलीब पर टाँग कर

बेचैन आवाजाही करते रहे।


दीवार पर टँगी घड़ी ने

अपनी सुइयों से

धड़कनों की ओर इशारा किया

और टिक-टिक लिखती रही

एक लंबा, अधूरा संध्या–वाक्य।


सफेद कपड़े के नीचे

अब भी धड़क रही हैं

महाचित्र की महानताएँ,

जो स्मृतियों में जीवित हैं

और कायाकल्प में

तलाश रही हैं अपनी संभावनाएँ

.... मैं एक असमाप्त शोकसभा में हूँ।



स्मृति का सबसे नरम घाव


पिता के लौटने से पहले

घर की साँस बदल जाती।

साँझ दरवाज़े पर ठहरती।

आहट भीतर तैर आती।


हम नन्हें हाथों से

पिता के थैले में उतर जाते—

जो अभी रास्ते में था।

केले की भुसावली गंध,

इलाहाबादी अमरूद का स्वाद,

पेठे के पारदर्शी पिरामिड 

कल्पनाओं में झिलमिलाते।


पिता मुस्कान पहन कर आते—

हल्की, धूसर मजबूरी की तरह

हम सबसे पहले थैले पर झपटते

और वह हर बार माफ़ कर देता।

कभी कुछ निकलता

तो आँगन भर जाता

कभी खाली मुंह खोलता

तो सीढ़ियां सुस्त पड़ जातीं।

माँ दाल में आँसू मिला देती

रोटी की भाप कम बोलती।

पिता देर तक बैठे रहते—

हथेली से धनरेखा की धूल छुड़ाते हुए। 


जब साँझ टूटी हमारी पीठ पर

थैला हमारे हाथ आया

बाज़ार ने आवाज लगाई—

खुरचन, सिंघाड़े, जलेबी ईईई—

जैसे यादें अब भी सजी हो ठेलों पर।

जिस दिन जेब चुक जाती—

घर लौटना धूमिल पड़ जाता

दरवाज़ा तपस्वी की तरह खुलता

बच्चे मुस्कुराते किताबों में छिपते हुए

भीतर कुछ दरक जाता।


जब बच्चे पहचान जाते हैं—

पिता के मन का रंग

वह अपनी नज़रों में छोटा हो जाता है,

और उसी क्षण थोड़ा बड़ा भी,

क्योंकि प्रेम

खाली हाथों में भी बचा रहता है।

हम बचे रहे—

कुछ थैलों से,

कुछ हाथों से,

कुछ अधूरी प्रतीक्षाओं से।


हर घर में

एक शाम ऐसी होती है

जब कोई बच्चा

पिता से पहले

उनकी जेब समझ लेता है

कुछ थैले हम भरते हैं

कुछ बच्चे हमें भर देते हैं। 


देहरी पर अब भी

एक बचपन बैठा है

जाते हाथों से

आने वाली हथेलियों तक

पिता की मुस्कान ले जाता हुआ।



हम सबके दर्शक होते हैं


हम सबके दर्शक होते हैं

हम कोई सिनेमा या नाटक नहीं हैं

लेकिन दुनिया के रंगमंच पर

पल-पल रखी जाती है हमारे किरदार पर नज़र

अच्छे काम पर बजती हैं तालियाँ

बुरे काम पर पड़ती हैं गालियाँ

ये मनोरंजन के लिए जुटे दर्शक नहीं

खेद या सहानुभूति जताने आये इष्ट-मित्र भी नहीं

ये खुले सभागृह में उपस्थित सर्जक होते हैं।


कुछ होते हैं हमारे मूकदर्शक, कुछ प्रशंसक

कुछ अनचीन्हे आलोचक तो कुछ उदार समालोचक

इनकी नज़र में अक्सर बदलती रहती है हमारी तस्वीर

कभी वह हो जाती है सफ़ेद तो कभी स्याह

कभी स्याह-सफ़ेद हो जाती है जाने-अनजाने

इन दर्शकों को रिश्वत दे कर बरगलाया नहीं जा सकता

कोई एजेंसी नहीं चमका सकती हमारी दागदार छवि

हमारी चमक को धूमिल भी नहीं किया जा सकता इनकी निगाह में।


जब हम निकलते हैं घर से

तो हमें निहारते हैं पेड़ अपने हज़ार-हज़ार फूलों-पत्तियों की आँखों से

इमारतें हमारी चौकसी करती हैं चुपके से खिड़कियाँ खोल कर

सड़क पर आते-जाते वाहन हमें घूरते हुए चलते हैं

दफ़्तर में हमारी निगरानी करती हैं मेज़ और कुर्सियाँ

सर पर चक्कर काटता पंखा गौर करता है हम पर विहंगम दृष्टि से

दराज़ों में पड़ी फ़ाइलें ताकती रहती हैं हमारे हाथों की तरफ टुकुर-टुकुर

दीवार पर टँगे कैलेण्डर और परदे

हमारे धतकरम देख कर भी शर्म से आँखें नहीं मूँदते।


हमें अहसास भी नहीं हो पाता

कि हमें किस दृष्टि से देख रही है दुनिया

यह पलकों के झपकने की तरह होता रहता है अनायास

और हमें लगातार देखा जाता है।

हमारा अवलोकन करते रहते हैं हमारे विचार

कि आज का दिन कैसे जिया

किसका अच्छा किसका बुरा किया

जब हम सो रहे होते हैं

तब भी हमारा ख़ामोश नज़ारा करती रहती है हवा

और सपनों को हमारी नींद में आने का रास्ता दिखाती है।


हम अपने दर्शकों को देख नहीं पाते

लेकिन उनके होने से इनकार करना

अपनी हस्ती मिटाने से कम नहीं

सच तो ये है कि अगर हमारे दर्शक न हों

तो इश्क़-ए-मजाज़ी भी नहीं, 

इश्क़-ए-हक़ीक़ी भी नहीं।



अग्नि के वंशज


समय बदला

और आकाश ने अपनी धूप 

पाताल को गिरवी रख दी।


समय एक नदी हुआ करता था—

कभी उफनती, कभी शांत,

उसमें सपनीली नावें चल सकती थीं।

हमारा समय एक समुद्र है लोहे का

जहाँ लहरें भी किसी के आदेश से उठती हैं

ग़लतियाँ पहले भी होती थीं

पर उनमें बची रहती थी

सही होने की गुंजाइश 

अब भविष्य की अनुमानित योजनाएँ हैं

जिनके पूर्ण होने की 

कोई समय सीमा नहीं।


सच अब भाषा में नहीं, 

नगों और दरों में लिखा जाता है

और झूठ— राष्ट्रगीत की तरह‌ 

हर सुबह बजाया जाता है।

मेरे शहर की दीवारों पर

नारों की जगह भय उग आया है

मेरी नींद के भीतर एक अनाम चिंता

पत्थर की तरह रख दी गई है।


हम अपने बच्चों को देखते हैं—

उनकी कॉपियों में भविष्य का नक्शा नहीं,

एक धुँधला-सा प्रश्न है।

कभी-कभी मन के भीतर इतनी धूल भर जाती है

लगता है कि अब कोई रास्ता नहीं बचेगा

सब कुछ किसी अंतिम अँधेरे में डूब जाएगा।

क्या हम समय की सड़ांध से ऊब कर

करुणा का वस्त्र भी उतार देंगे?


पर तभी मनुष्य के भीतर का

सबसे पुराना शिलालेख हल्का-सा चमकता है।

जिस पर उत्कीर्ण हैं ये पंक्तियाँ:

तुम मिट्टी के पुतले हो,

पर तुम्हारे भीतर तारों की जिद भी है।

आख़िर इंसान का दिल लहू से नहीं, 

धड़कनों से बजता है

हम अपने छोटे-छोटे उजाले बचाएँगे

धीमे स्वर में ही सही, सच की अलख जगाएँगे

जैसे दुनिया भर के पहाड़

बर्फ़ के नीचे भी नदी बनने का अभ्यास करते हैं।


हम बच्चों को भय का नहीं,

भूख का व्याकरण सिखाएँगे

हम भरोसे का धान रोपेंगे

कोसी की धमकियाँ अनसुनी करते हुए।

आख़िर सभ्यताएँ दरबारों से नहीं,

खेतों की मिट्टी से जन्म लेती हैं।


सत्ता चाहे आकाश पर काँटों का जंगल उगा दे,

हम धरती में फूल उगाने की ज़िद नहीं छोड़ेंगे

अँधेरा हमारा घर नहीं—

हम बुने गए हैं आग की स्मृतियों से

हमारे शजरे में शामिल हैं

अंधेरी गुफाओं में दीपक जलाने वाले।


इतिहास का सूर्य

किसी स्वर्णकाल से नहीं,

जनमानस की नेकी से उगता है।

जब थकी हुई क्रूरताएँ

आत्मघात कर लेंगी,

तो हमारे लोग कह उठेंगे:

बराबरी सिर्फ़ सपना नहीं थी।

न्याय सिर्फ़ किताब नहीं था।

समता हमारी साझा धड़कन थी।

उस सुबह कोई बिगुल नहीं बजेगा,

बस लोग एक-दूसरे को देख कर

थोड़ा कम डरेंगे।

क्योंकि मनुष्य कभी हारता नहीं

बस थक कर थोड़ा चुप हो जाता है।


हे रोज़मर्रा के अदृश्य नायक!

अपनी अच्छाई को तलवार की तरह नहीं

विचार की तरह बचाओ।

जब सारे सम्राट थक जाएँगे,

सारे मिथक अपने ही भार से ढहेंगे,

तब भविष्य पीछे मुड़ेगा,

उसे साम्राज्य नहीं, सिर्फ़ मनुष्य दिखेगा

क्योंकि राख चाहे जितनी गिरे,

आग अपना वंश 

कभी ख़त्म नहीं होने देती।



प्रतिरोध का व्याकरण


धरनों की फटी चटाइयों पर

धूप झरती रहती

किसी शोक की तरह।

किसी की आवाज़ फट जाती

नारों के बीच

वह पानी पी कर

फिर उसी जगह खड़ा हो जाता

पैर बदल कर।

अनमनी भीड़ फैलती,

फिर सिकुड़ कर

दोबारा लेट जाती।

शरीर

अपनी थकान से बाहर निकलना

धीरे-धीरे भूल रहा।

मन को हाँ कहने की आदत

पर चले आना होता ना कहने

हाथ उठते

कुछ पूरे,

कुछ बीच में रुक जाते

जैसे पहले ही पता हो

इम्तिहान का नतीजा।


शाम ढलती,

बैनर झुक जाते,

पर डंडे

अब भी सीधे खड़े रहते।

कोई पीछे मुड़ कर देखता

युद्धस्थल पर

छूट चुकी अपनी ही परछाई।


तमाम खुदाइयों के बावजूद

धरती अपने भीतर

हमेशा एक परत सँभाल कर रखती

वहाँ से फूटती रहतीं

भूकंप की संभावनाएँ।


दफ़्तर में फ़ाइल

मेज़ से मेज़ तक सरकती,

पर ग़लत जगह पर

कोई दस्तख़त उभरता नहीं।

सब ताली बजाते,

मगर एक जोड़ी हाथ

प्रश्नाकुल आँखों के साथ

घुटनों पर ही जमे रहते।

ग़लत हिसाब

पेंसिल से काट दिया जाता,

और सही संख्या

चुपके से लिख दी जाती। 


खंभे में अटका तिरछा बैनर

कोई हाथ से सीधा कर देता,

फिर पढ़ने लगता इंक़लाबी इबारत

पत्थरों और कबूतरों के बीच 

कोई सड़क पर घायल पड़े शब्द

हथेलियों में दबा कर

एक इरादे के साथ आगे बढ़ जाता।

एक बुजुर्ग

राजा की कहानी सुनाते-सुनाते

अंतिम वाक्य अधूरा छोड़ देता।


एक आदिम तरीका

जन्म ले रहा

इतना साधारण

कि उसका कोई नाम तक नहीं,

किसी ने अभी तक

उसे हथियार नहीं कहा।


दिन खत्म होने से पहले

आदमी जबड़े भींचता

कोई निर्णय गढ़ते हुए

उसी में जन्म लेता

कल का प्रतिकार।



उनकी बात 


वे हमेशा कहते आए हैं—

समय अभी पका नहीं।

मैं हमेशा पूछता आया हूँ—

समय कब कच्चा था?


एक आवाज़ उठती रहती है भीतर

वे उसके ऊपर

दूसरी आवाज़ रख देते हैं।

जहाँ शब्द तेज़ होने लगते हैं,

वे हाथ में थमा देते हैं

प्रार्थनाओं की एक पोथी।

आवाज़ नहीं बदलती,

बस उसका रास्ता मोड़ दिया जाता है।

वे फिर कहते हैं— 

अभी रुको।

मैं फिर पूछता हूँ—

किसके लिए?



परिचय: 


विजय शंकर चतुर्वेदी

विजय शंकर चतुर्वेदी हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि, पत्रकार और वैचारिक लेखक हैं। उनका लेखन साहित्य, राजनीति और समाज के अंतर्संबंधों की पड़ताल करता है। उनका मानना है कि सत्ता से प्रश्नाकुल संवाद करना और तरल नागरिक विवेक को सक्रिय रखना, साहित्य का वास्तविक कार्य है।

मध्य प्रदेश के सतना जिले की नागौद तहसील के ग्राम आमा में 15 जून 70 को जन्मे विजय शंकर ने अभिव्यक्ति के प्रायः सभी आयामों को कुशलता से स्पर्श किया है। विविध समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, स्तंभों, टीवी, रेडियो, उपन्यास, कहानी, कविता, पुस्तक-संपादन जैसे कई माध्यमों में वह प्रखरता से व्यक्त हुए हैं। उन्होंने जनसत्ता, प्लस चैनल, रिलायंस कम्युनिकेशंस, टी-सीरीज, टारगेट पब्लिकेशंस, प्रिया, नया सिनेमा, दोपहर आदि संस्थानों को अपनी लेखकीय सेवाएं दीं।

प्रमुख कार्य:

उपन्यास: 'विदूषक', जनसत्ता की सबरंग पत्रिका में धारावाहिक प्रकाशित (1995-96)। 

कविता संग्रह: 'पृथ्वी के लिए तो रुको', राधाकृष्ण प्रकाशन (2009)।

पुस्तक संपादन: 'समय के सुलगते सरोकार'- लोकभारती प्रकाशन, लेखक: प्रोफेसर सेवाराम त्रिपाठी (2019), 'देशनामा-गांवनामा', राधाकृष्ण प्रकाशन, लेखक: देवीशरण‌ सिंह ग्रामीण (2023),

‘पहल’, ‘वसुधा’, ‘वागर्थ’, ‘लमही’, ‘आजकल’, ‘वर्तमान साहित्य’, ‘रविवारी’, दैनिक भास्कर, जनसत्ता ‘सबरंग’, ‘सृजन-संदर्भ’, ‘समालोचन’, ‘कौशिकी’, ‘कृत्या’, ‘कृति-अनुभूति’ आदि प्रतिष्ठित मंचों पर रचनाएँ प्रकाशित।

इन दिनों स्वतंत्र लेखन, पुस्तक-संपादन, सोशल मीडिया और रचनात्मक लेखन में सक्रिय।


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)



सम्पर्क


मोबाइल: 9967354059


ईमेल: vijaysshankarchatturvedi@gmail.com

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