पंकज चौधरी की कविताएं
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| पंकज चौधरी |
जाति भारतीय समाज की सच्चाई है। इसे उपेक्षित कर भारतीय समाज को आज भी नहीं समझा जा सकता। आजादी के पश्चात जिस भारत की कल्पना हमारे पुरखों ने की थी उसे दरअसल एक ऐसा देश होना था जहां जाति, धर्म, लिंग, वर्ग, क्षेत्र को नहीं, योग्यता को वरीयता दी जानी थी। लेकिन समाज में कोई आधारभूत बदलाव नहीं आया। धार्मिक और जातीय कट्टरताएँ समय के साथ बढ़ीं हैं। धार्मिक और जातीय पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह कदम कदम पर नजर आते हैं। चुनाव के लिए टिकट देते वक्त धर्म और जाति इतनी मजबूती से सामने आते हैं कि उसका ध्यान रखना सारे दलों की मजबूरी बन जाती है। ऐसे में उस समाज की कल्पना कैसे की जा सकती है जो धार्मिक और जातीय दुराग्रहों से मुक्त हो। ऐसे में उस समाज की कल्पना कैसे की जा सकती है जहां स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की आधुनिक भावना नजर आए। अपनी कविता 'जातिपर्व' में पंकज लिखते हैं : "यह जातिसभा का चुनाव है/ लोकसभा का नहीं!/ यह जातिपर्व का लोकतंत्र है/ लोकतंत्र का महापर्व नहीं!" पंकज चौधरी का हाल ही में एक नया कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है 'लम्बी लड़ाई'। पंकज हमारे समय के प्रतिष्ठित कवि हैं। वे अपने समय की विडंबनाओं से भलीभांति अवगत हैं और यह जानते हैं कि भारत में प्रगतिशील समाज की स्थापना की लड़ाई आसान नहीं है। यह लड़ाई अभी काफी लम्बी चलनी है। इसी क्रम में पंकज बड़ी साफगोई से जातीय सवाल को इस तरह सामने रखते हैं कि आप इसे उपेक्षित नहीं कर सकते। कविता में बिना उग्र हुए वे सहजता से अपनी बातें रख देते हैं। कवि के तौर पर यह बड़ी सफलता है। वे जड़वादी विचारों के खिलाफ मजबूती से खड़े नजर आते हैं। पंकज को उनके इस उम्दा संग्रह के लिए बधाई। आज के भारतीय समाज को जानने के लिए यह कविता संग्रह एक जरूरी संग्रह की तरह है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं पंकज चौधरी की कविताएँ।
पंकज चौधरी की कविताएं
मेरा संघर्ष
एक ने मुझे डस्टबिन में डाल दिया
दूजे ने नौकरी से निकाल दिया
तीजे ने नजरबंद करने की कोशिश की
चौथे ने ब्लॉक कर दिया
पांचवें ने हुक्का-पानी बंद करवा दिया
मेरा कसूर यही है कि
मैं जाति को अनलॉक करता हूं।
जातिसभा/ जातिपर्व
भूमिहारों का टिकट कटा
ब्राह्मणों को टिकट मिला।
यादवों को ज्यादा सीटें मिलीं
कुर्मियों को उससे कम।
राजपूत सब पर भारी पड़े
कायस्थों को शहरी क्षेत्र से टिकट मिले।
चमारों को दो सीटें ज्यादा मिलीं
दूसाधों को दो सीटें कम।
वाल्मीकियों ने खटिकों की सीटों पर दावा किया
खटिकों ने राजभरों की सीटों पर।
गुर्जरों ने जाटों के लिए अपनी सीटें छोड़ीं
लोधों ने टिकट के लिए की मारामारी।
मल्लाहों का खाता खुला
कुम्हारों का रास्ता बंद।
कहारों ने चक्का जाम किया
हज्जामों ने पार्टी दफ्तर पर बोला हमला।
संतालों ने मुंडाओं को दिया शिकस्त।
अशराफों ने पसमांदों की सीटें हड़पीं।
यह जातिसभा का चुनाव है
लोकसभा का नहीं!
यह जातिपर्व का लोकतंत्र है
लोकतंत्र का महापर्व नहीं!
अमर प्रेम
पहला भाजपाई है
तो दूसरा बसपाई
तीसरा कांग्रेसी है
तो चौथा मार्क्सवादी
पांचवां सपाई है
तो छठा लोजपाई
सातवां तेदेपाई है
तो आठवां शिवसेनाई
पहला प्रचारक है
तो दूसरा विचारक
तीसरा राजनेता है
तो चौथा अभिनेता
पांचवां समाजशास्त्री है
तो छठा अर्थशास्त्री
सातवां कविगुरु है
तो आठवां लवगुरु
एक राजस्थान का रहने वाला है
तो दूसरा पंजाब का
तीसरा कर्नाटक का रहने वाला है
तो चौथा बंगाल का
पांचवां यूपी का रहने वाला है
तो छठा बिहार का
सातवां दक्षिण का रहने वाला है
तो आठवां मध्य का
पहला सांवला है
तो दूसरा भूरा
तीसरा तांबई है
तो चौथा लाल
पांचवां कत्थई है
तो छठा गेहुंअन
सातवां नीला है
तो आठवां पीला
फिर भी इनमें कितना प्रेम है
भारत का यह कैसा खेल है!
सत्ता और जाति
पहली बार
उन्होंने जब अपनी जाति को पुरस्कृत किया
लोगों का ध्यान नहीं गया।
दूसरी बार
उन्होंने जब अपनी जाति को पुरस्कृत किया
लोगों का ध्यान गया।
तीसरी बार भी
उन्होंने जब अपनी ही जाति को पुरस्कृत कर दिया
लोगों का दिमाग ठनका।
चौथी-पांचवीं बार भी
जाति ही पुरस्कृत हुई
अब लोगों ने अपना दिमाग लगाना बंद कर दिया था।
कैसे टूटेगी जाति?
कौन तोड़ेगा जाति?
ऐसे ही तो
मजबूत नहीं हुई जाति!
अपनी चाम की तरह प्यारी है जाति!
रेणु का शुद्धिकरण
कोई उन्हें मुखर्जी बता रहा है
कोई उन्हें चटर्जी
कोई उन्हें भट्टाचार्जी बता रहा है
कोई उन्हें बनर्जी।
कोई उन्हें कोइराला बता रहा है
कोई उन्हें सिन्हा
कोई उन्हें झा बता रहा है
कोई उन्हें मिश्रा।
कोई उन्हें पाठक बता रहा है
कोई उन्हें त्रिपाठी
कोई उन्हें शर्मा बता रहा है
कोई उन्हें पांडे।
कोई उन्हें सिंह बता रहा है
कोई उन्हें ठाकुर
कोई उन्हें चौहान बता रहा है
कोई उन्हें सिसोदिया।
मैला आंचल, परती परिकथा
आदिम रात्रि की महक, मृदंगिया, पंचलाइट, संवदिया
ठेस, तीसरी कसम के रचनाकार को
महानता के वृत्त में
मंडल (धानुक) बना कर
कैसे शामिल किया जा सकता है?
कमजोर ताकतवर
तुम कितने कमजोर हो
कि किसी कमजोर को दबाने के लिए
तुम ताकतवर एक हो जाते हो?
साहित्य में आरक्षण
मैं कहां कह रहा हूं कि
तुम शेक्सपियर नहीं हो?
गेटे नहीं हो?
वर्ड्सवर्थ नहीं हो?
वाल्टव्हिटमैन नहीं हो?
इलियट नहीं हो?
एजरा पाउंड नहीं हो?
पाब्लो नेरूदा नहीं हो?
नाजिम हिकमत नहीं हो?
तुम सब हो
औेर तुम्हारी असाधारणता का
मैं क्या
आकाश, सूर्य, चंद्रमा, सितारे
पृथ्वी, महासागर भी साक्षी हैं।
तुम जो नहीं हो
वही तो वह है।
तुम जेनरल कैटेगरी में टॉपर कवि होते हुए भी
रिजर्व कैटेगरी के कवि हो!
मुक्ति
अकेला हो जाने का भय
जब गहराने लगा
तभी उसे याद आया
सूर्य के अकेले जलने का
चंद्रमा के अकेले चलने का
अकेले ही इस दुनिया में आने का
अकेले ही इस दुनिया से जाने का।
सम्पर्क
मोबाइल : 9910744984


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