महादेवी वर्मा का रेखाचित्र 'गिल्लू'
महादेवी वर्मा हिन्दी की कुछ विधाएं आजकल लगभग मृतप्राय सी हो गई हैं। रेखाचित्र ऐसी ही विधा है जिसमें एक जमाने में तमाम लेखक लिखा करते थे। जैनेन्द्र कुमार, कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर, बनारसी दास चतुर्वेदी, राहुल सांकृत्यायन, रामवृक्ष बेनीपुरी, कृष्णा सोबती, हरिभाऊ उपाध्याय, विष्णु प्रभाकर, प्रकाश चन्द्र गुप्त, पद्म सिंह शर्मा, देवेन्द्र सत्यार्थी के साथ साथ रेखाचित्र लेखन में महादेवी वर्मा को महारत हासिल थी। बचपन में कभी उनका रेखाचित्र 'गिल्लू' पढ़ा था जिसने मन मस्तिष्क पर गहरा असर डाला था। हमारे यहां जीवों को भी अपने परिवार का ही अंग मानने की एक समृद्ध परम्परा रही है। आंगन में गोरैयों का झुंड उतर आता। कौआ कांव कांव करते हुए किसी अतिथि के आगमन की पूर्व सूचना देता। बसंत आते ही कोयलों की कुहुक से वातावरण सज जाता। गांव में बिरला ही कोई होता जिसके दरवाजे पर गाय, भैंस, बैल न बंधे होते। घर के अन्दर तोता, खरगोश, बिल्ली आदि का राज होता। और कुत्ते तो हर दरवाजे पर होते ही थे। इन सबके बाकायदा नाम भी रखे जाते। इनके साथ घर के सदस्यों का अपनत्व भरा व्यवहार होता। पिता हर दिन सोने के पह...