ललन चतुर्वेदी का संस्मरण 'मेरा बचपन खो गया है'।


ललन चतुर्वेदी 


किसी भी व्यक्ति के बचपन के दिन उसकी ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत दिन होते हैं। माँ पिता की सघन छाया में बच्चे का विकास होता है। माँ पिता बच्चे में अपने अक्स ढूंढते हैं। बच्चे भी किसी तरह की फिक्र से दूर निश्छल मन अपनी कल्पना की दुनिया में खोए रहते हैं। धीरे धीरे बच्चों का विकास होता है और उनकी स्कूलिंग शुरू हो जाती है। यहीं पर बच्चों को वर्णमाला से परिचित कराया जाता है साथ ही उनकी सामाजिकता का भी विकास होता है। कवि ललन चतुर्वेदी ने अपने संस्मरण में खुद के बचपन को उसके खुरदुरेपन के साथ याद किया है। उनका सरस गद्य पाठक को खुद के साथ बहा ले जाता है। बांग्ला की एक कहावत है 'अभाव स्वभाव बदल देता है।' सामान्य घर परिवार की नियति होता है अभाव। लेकिन इसी अभाव के बीच जिस बच्चे का विकास होता है वह उसके अन्दर दृढ़ इच्छा शक्ति के बीज बो देता है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ललन चतुर्वेदी का संस्मरण 'मेरा बचपन खो गया है'।



संस्मरण

'मेरा बचपन खो गया है' 

                                                    

ललन चतुर्वेदी


बचपन को कैसे याद करूँ? आदमी ताउम्र बचपन जीता रहता है। बचपना बचा रहे तो जीवन में आनंद के हिलोरे आते रहते हैं. 'क्या बचपना है!' इसे मैं गलत मुहावरा मानता हूँ. बचपन और बचपना को बचाना बहुत दुष्कर काम है। बचपन चाहे जितने  दुखों से भरा हो उससे प्यारा और मधुर कुछ भी नहीं हो सकता। बचपन की दुनिया इतनी बड़ी होती है कि बाद का जीवन उसके सामने तुच्छ दिखाई पड़ता है। दुःख यह है कि बचपन लौट नहीं सकता लेकिन बचपन में लौटने का सुख हम किसी पल भी महसूस कर सकते हैं। यह सही है कि दुनिया में हर बच्चा चाँदी का चम्मच ले कर जन्म नहीं लेता और उसे चांदी की कटोरी में दूध-भात भी मयस्सर नहीं होता। फिर भी इतना सत्य है कि उसे माँ के आँचल की शीतल छाया मिलती है और पिता के कन्धों पर बैठ कर चन्दा मामा को देखने का सुअवसर भी। वह पिता की पुरानी साइकिल पर बैठ कर मेला घूमने तो जा ही सकता है और पिता की जेब में उधार-पैंचा या कठिन परिश्रम से बचे चंद सिक्कों से मूढ़ी-बतासा तो खा ही सकता है। माँ-पिता की गोद में बैठा बालक अपने को शहंशाह भले ही न समझे लेकिन सुरक्षित अवश्य महसूस करता है। इस समय दुनिया की कोई शक्ति उसे डरा नहीं सकती। यह सौभाग्य समान रूप से लगभग सभी बच्चों को प्राप्त होता है. सब जानते हैं लेकिन पुनः कहना जरूरी समझ रहा हूँ कि पिता यदि बालक को आकाश की ओर उछालता है तो बालक खिलखिला उठता है। उसे भरोसा होता है कि वह गिरेगा भी तो पिता की बांहों में। विश्वास का यह धागा बालक का रक्षा-कवच है जिसे कोई तोड़ नहीं सकता। बचपन का यह सुख दुर्लभ है।


शुरुआत से ही शुरू करूंगा। दो बहनें दुनिया में आ गयी थी। पुत्र की प्रतीक्षा थी। भैंरो दास घुमंतू साधु थे। भिक्षाटन करते थे और भिक्षान्न एकत्र होने पर महीने में एक बार गाँव जाते थे। शायद घर पर उनके भाई-बंधु या माता-पिता रहते हों। घूमते-फिरते दरवाजे पर पहुँच गए। सुरीले कंठ में प्रभाती सुनाई- "उठ जाग मुसाफिर भोर भई!" आवाज का जादू ऐसा कि नर-नारी सभी मुग्ध हो गए। नानी कुसुम कुमारी आँगन से निकली- "बाबा! आशीर्वाद दीजिए।" इसके पहले ही भैंरो बाबा के हाथ उठ गए "नाती होगा। कुल के दीपक का शुभागमन होगा।" न जाने पहले के सामान्य से दिखने वाले संत-फकीरों के अनायास कहे गए वचन भी फलीभूत हो जाते थे। आज प्रभावशाली शब्द भी अर्थ खोते जा रहे हैं। हृदय की सहजता ही गायब हो गयी तो शब्द साकार कैसे होंगे। भैंरो बाबा कह कर चले गए। आशीष फलीभूत हुआ। और 10 मई 1966  के 11.15 बजे रात्रि में ननिहाल बंगरा देवरिया(जिला- मुज़फ्फरपुर, बिहार) में जिस बालक का जन्म हुआ, उसे भैंरो बाबा का दिया नाम मिला-ललन. ललन का अर्थ ही होता है-प्यारा। अब जीवन में कितना प्यार मिला, इसकी कहानी नहीं सुनाऊँगा। अभी कुछ समय तक नानी के आँगन में खेलना चाहता हूँ। तीन-चार वर्ष का हो जाऊँगा तो अपने पिता के घर लौटूंगा। नानी बहुत प्यार-दुलार करती है। वह चली गयी मगर उनका प्यार अमर है। जाड़े के दिनों में घूर (अलाव) पर बासी भात रख कर गरम कर खिलाती थी ताकि बच्चे को सर्दी नहीं हो। वह स्वाद अभी भी जीभ पर है। जीभ स्मृतियों को आजीवन सुरक्षित रखती है। बचपन में नानी या माँ जो बासी खाना खिलाती थीं, वे सब के सब याद हैं। मेरी स्मृति अभी जवान है और पूरे जोश-खरोश के साथ सारी घटनाओं को मानस-पटल पर क्रमिक रूप से लाने में सक्षम भी। मेरे ननिहाल के मुझ पर अनंत उपकार हैं।


दादा जी मेरे जन्म के तीन वर्ष बाद ही इस संसार से विदा हो गये। उनका चेहरा तो याद नहीं लेकिन माँ बतलाती थी कि मैं उनकी अंगुलियाँ पकड़ कर घूमा करता था। वे मुझे अवध बिहारी कह कर पुकारते थे। दादा की बदकिस्मती यह थी कि वे बागी बलिया (उत्तर प्रदेश) की अपनी जन्मभूमि को छोड़ कर परिस्थितियों के कारण बिहार आ गए। यहाँ जमींदारी थी। उसे नष्ट होना ही था। दुश्मन पीछे पड़  गए। पहले दुश्मनों ने और बाद में कालनेमि मित्रों और कपटी रक्त सम्बन्धियों ने सब कुछ लूट लिया-घर मकान भी। दादा महात्मा गांधी मार्ग के राही थे-सत्य-अहिंसा के पुजारी। इन दुष्टों का मुकाबला कर भी कैसे सकते थे? अंत में विक्षिप्त हो गए थे और कुछ सहृदय प्रतिष्ठित लोगों के दरवाजे पर जा कर चावल-दाल और चाय के पैसे मांगने लगे थे। बाबू जी की पढ़ाई छूट गयी और वे बुरी तरह दीवानी मुकदमों में उलझ कर अभिमन्यु की तरह लड़ने लगे। भला हो कृष्णकांत उपाध्याय वकील का कि किसी तरह घर बच गया और दुश्मनों का यह संकल्प कि बलिया भेज कर छोड़ेंगे, मिट्टी में मिल गया।


पिता ने मोर्चा संभाला और अपने पुरुषार्थ से तूफानों के बीच डूबती हुई नैया को पार लगाया। बहरहाल, सरकारी दस्तावेजों में मेरा नाम ललन दर्ज  हुआ। गाँव के प्राइमरी स्कूल में सीधे तीसरी कक्षा में मेरा नाम लिखवा दिया गया। गाँव तो अशिक्षा के अन्धकार में डूबा हुआ था। पिता जी ने ए बी सी डी और सौ तक अंग्रेजी की गिनती रटवा दी थी। महज इसी के बल पर मुझे इंटेलिजेंट विद्यार्थी का खिताब मिल चुका था। मैं एक हाथ में जूट का बोरा (इसे बिछा कर बैठ जाता था। स्कूल में बेंच नहीं थी। यह स्कूल मात्र एक कमरे में चलता था, जहाँ पहली से पांचवीं कक्षा के विद्यार्थी एक साथ बैठते थे।) और कंधे पर झोला लटकाए स्कूल जाता था। मालूम नहीं कैसे पांचवीं कक्षा में मुझे फर्स्ट घोषित कर दिया गया। मैं अपने शिक्षकों-विद्या बाबू, पटेल जी और मिथिलेश देवी को श्रद्धा के साथ याद कर रहा हूँ। रिजल्ट के दिन हर साल स्कूल में भोज होता था। लड़कियां चावल-दाल, सब्जी बनाती थी। पंक्ति में बैठ कर बच्चे और शिक्षक एक साथ खाते थे। हुआ यूँ कि खाना परोसने के बाद सबसे पहले शिक्षक शुरु करते थे लेकिन अज्ञानता में मैंने ही सबसे पहले शुरु कर दिया। सब बच्चे हंसने लगे। खैर, फर्स्ट होने की खुशी में झूमता हुआ मैं घर आ गया। छठी कक्षा में दूसरे गाँव के स्कूल में मेरा एडमिशन हो गया। अब मेरी स्थिति यह हो गयी जैसे कुएं का मेढक तालाब में आ गया हो। मैं यहाँ फर्स्ट नहीं कर सका। यहाँ भी बोरा बिछा कर ही बैठना था। बाबू जी घूमते-फिरते एक दिन स्कूल पहुँच गए। उस समय संस्कृत के शिक्षक लाला जी पढ़ा रहे थे। बाबू जी ने अनुरोध किया- "थोड़ा बच्चवा पर ध्यान रखल जाई।" उस दिन लाला जी ने गज शब्द का रूप सुनाने का टास्क दे दिया। दूसरे दिन तक मुझे रूप या याद नहीं हुआ। क्लास में खड़ा कराया गया। उसके बाद लाला जी ने रौद्र रूप दिखाते हुए खजूर की छड़ी से पीठ पर ऐसी धुनाई की कि जगह-जगह लाल-नीले धब्बे उभर आये। जब घर आ कर शर्ट खोला तो माँ ने कहा-'मास्टर नहीं, कसाई है।' खैर, लाला जी को बच्चे नाकू लाल कहते थे। उनका उच्चारण थोड़ा अनुनासिक था। जो भी हो, शब्द-रूप तो मुझे मैट्रिक तक भी याद नहीं हुआ। बावजूद इसके बोर्ड परीक्षा में संस्कृत में मुझे छिहत्तर अंक मिले। मेरा सबसे बड़ा दुश्मन गणित था। मेरे अंग्रेजी के शिक्षक  सज्जन पुरुष थे। वे एलजेबरा को अजब लबरा कहते थे। गणित और विज्ञान के शिक्षक से मैं बहुत डरता था। एक दिन उन्होंने भी जबरदस्त पिटाई कर दी थी। मैं भगवान् से प्रार्थना करता था कि मास्टर साहब स्कूल ही नहीं आयें, लेकिन यह कैसे संभव था? ज़रा सोचिये आज के जमाने में शिक्षक यदि विद्यार्थी को पीट दे तो कयामत आ जायेगी। वीडियो वायरल कर दिया जाएगा। मैं पूरी श्रद्धा के साथ अपने शिक्षकों को याद करते हुए उन्हें नमन करता हूँ। बाद में एक प्राइवेट शिक्षक ठाकुर जी ने गणित में मेरी ऐसी रुचि जगाई कि मुझे नब्बे प्रतिशत तक अंक प्राप्त हुए। मेरी पढ़ाई-लिखाई में उनका अविस्मरणीय योगदान है। लोग भूल जाते हैं। महाभारत का कथन याद आ रहा है- "शिक्षा ग्रहण करने के उपरान्त शिष्य गुरु को भूल जाता है और रति प्रसंग के बाद पुरुष पीठ फेर लेता है।" सही है। हर व्यक्ति को यह याद रखना चाहिए कि उसके निर्माण में अनेक लोगों का प्रत्यक्ष या परोक्ष योगदान होता है। लेकिन कर भी क्या सकते हैं? विस्मृति हमारी राष्ट्रीय परम्परा है (यह मेरे एक व्यंग्य का शीर्षक है)। अपनी उपलब्धि गिनाने के पहले अपने सफ़र पर नजर डालिए। अनेक समर्पित चेहरे आपकी आँखों में उतर जायेंगे। मैं व्यक्तिगत तौर पर ऐसे शिक्षकों का जीवनपर्यंत ऋण नहीं चुका पाऊंगा।


यह बतलाना आवश्यक लग रहा है कि मेरा हाईस्कूल घर से लगभग चार किलोमीटर दूर था। घर में एक ही पुरानी साइकिल थी, उसे पिता जी उपयोग में लाते थे। मुझे पैदल जाना होता था। पाँव में चप्पल नहीं रहती थी। गर्मी के दिनों में स्कूल से लौटते हुए शॉर्टकट रास्ते से अर्थात खेतों/पगडंडियों से गुजरते हुए आता था। जोते हुए खेत की बलुई मिट्टी आग की तरह तप्त हो जाती थी। जब उसमें मेरे पाँव पड़ते थे तो मैं रेत की मछली की तरह छटपटाता था। मेरी एक कविता 'जूते के बिना यात्रा 'में कुछ ऐसा ही भाव है। मैं समझता हूँ जूते टोपी से कहीं अधिक मूल्यवान और उपयोगी होते  हैं। सन्दर्भ जूते का है तो एक घटना याद आ रही है कि किसी संबंधी के यहाँ कोई शादी-विवाह का आयोजन था। मैं आठ-नौ साल का था। मुझे भी चाचा के साथ भेजा जाना था। दिक्कत यह थी कि पांवों में चप्पल नहीं थी। बगल में मेरी ही उम्र की कोई लड़की की चप्पल को मांग कर लाया गया। लड़कियों की चप्पलों की संरचना ऐसी होती है कि पीछे से  कुछ ऊँची  बनाई जाती हैं (मालूम नहीं यह किस डिजाइनर के दिमाग की उपज है)। वह चप्पल हाई हील तो नहीं थी लेकिन हवाई ही थी और पीछे से हल्की सी ऊँची। वहां जाने पर कुछ शहराती लड़कों ने मुझे यह कह कर चिढ़ाया कि लड़की की चप्पल पहन कर आये हो। अपमान अभाव का सहयात्री है। जीवन में अपमान की अनेक घटनाएं हैं। उन दिनों सरकारी सहकारी दुकानों में सस्ते कपड़े मिलते थे। बाबू जी  ने नीले रंग का मोटा कपड़ा खरीद कर लाया। उसी से मेरे लिए कुर्ता-पाजामा सिलवा दिया। एक दिन मैं उसी ड्रेस को पहन कर स्कूल गया। ऊपर नीचे पूरी तरह नीला, जैसी किसी कैदी की पोशाक होती है। प्रार्थना के लिए जब सभी लड़के (लड़कियां भी) एक साथ खड़े हुए तब सबने मुझे देख कर हंसना शुरू कर दिया। किसी तरह मैं अपने आँसू को रोक पाया। हाईस्कूल में ऐसे भी कई अवसर आये जब फीस के लिए  नाम काट दिया गया और फिर नाम लिखवाने पर सबसे अंत में रोल नंबर आता था। फीस भी कोई अधिक नहीं होती थी - महज पांच रुपये। फिर भी निर्धारित पंद्रह तारीख को शायद ही कभी जमा हुई हो। फिर, महीने की आख़िरी तिथि को पच्चीस पैसे विलम्ब शुल्क के साथ जमा करना होता था। उसी दौरान एक तुकबंदी की थी-

"गरीब का बेटा प्यार का हकदार नहीं होता।

सचाई, ईमानदारी का पुरस्कार नहीं होता।।"  

खैर, दीनों के भी दिन बीत जाते हैं।

मैट्रिक पास करने के उपरान्त एक संबंधी के यहाँ एक महीने के लिए गया था। मुझे बाद में पता चला कि वे मुझे ले जाने के पक्ष में नहीं थे। उस समय मैंने दस रुपये में हवाई चप्पल खरीदी थी, जो मुलायम थी। वह कुछ महीने में ही घिस गयी और कई जगहों से टूट गयी। तब मुझे तार से बाँध कर कुछ महीने तक और काम चलाना पड़ा। अच्छा हुआ कि मेरे पुलिस अफसर संबंधी ने चप्पल खरीद कर उपलब्ध नहीं कराया, अन्यथा मेरा अपराध बोध जीवनपर्यंत बना रहता। जीवन में जूते-चप्पल का यह अभाव नौकरी मिलने के पूर्व तक बना रहा। एक बार किसी इंटरव्यू में शामिल होने के लिए मेरे एक प्रोफ़ेसर चाचा जी ने सद्भावपूर्ण ढंग से अपने पुत्र के जूते पहनने के लिए दिए। खैर, खुश हूँ कि टाई बाँधने की कभी नौबत नहीं आयी। मैं यह सब किसी की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए नहीं लिख रहा हूँ। बच्चन जी  की पंक्ति याद आ रही है- 

'क्या करूँ संवेदना ले कर तुम्हारी?'




मैट्रिक का रिजल्ट फर्स्ट डिविजन में आया था। उस समय  इस डिविजन का महत्व था। पिता जी चाहते थे कि एल एस कॉलेज, मुजफ्फरपुर में मैं पढूं। (वही एल एस कॉलेज जहाँ राजेन्द्र बाबू की पढ़ाई हुई थी और कभी दिनकर जी वहां के हिंदी विभागाध्यक्ष हुआ करते थे।) परन्तु अंक उतने अच्छे नहीं थे इसलिए आरडीएस  में नाम लिखवाया। शहर मुझे भाता नहीं था। आर्थिक कठिनाई तो थी ही, इसलिए घर पर रह कर ही पढ़ाई पूरी की। द्वितीय श्रेणी में आई. एस सी. पास कर गया। मेरी रुचि साहित्य में थी. हिंदी के प्रेम में पागल हुआ जा रहा था। गाँव में आर्ट पढ़ने वाले को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था। अशिक्षित होते हुए भी लोग कहते -"आर्स के पढ़ल और घास के गढल बराबर होता है।" मतलब आर्ट पढ़ना घास छीलने के बराबर है। मैं यह सब सुनने वाला तो था नहीं। घर से 24 किलोमीटर दूर आर पी एस कॉलेज जैंतपुर में हिंदी ऑनर्स में एडमिशन ले लिया। अच्छे शिक्षक मिले खासकर गीतकार रवीन्द्र उपाध्याय. ऐसे मेहनती और विद्वान् शिक्षक बहुत कम होते है। उनकी कक्षाओं में बैठने के बाद महसूस होता था कि साहित्य पढ़ कर कुछ सार्थक कर रहा हूँ. सोलह साल का लड़का एक पुरानी  साइकिल ले कर कॉलेज निकल जाता। जाड़ा-गर्मी और बरसात में मेरी यही दिनचर्या बन गयी। पॉकेट में चवन्नी-अठन्नी भी नहीं हुआ करती थी कि साइकिल कहीं पंक्चर हो जाए तो बनवा लूं (वेब पोर्टल गोलचक्कर पर 09 मई 2026 को प्रकाशित संस्मरण -बाबू जी के साइकिल  में इसका विस्तार से वर्णन है।) गर्मी के दिनों में सर पर गमछा लपेट कर पछुआ हवा से संघर्ष करते हुए चिलचिलाती धूप में ढाई-तीन बजे तक घर पहुंचता था। जाड़े के दिनों में कुहासे से जूझना और शरीर पर स्वेटर भी नहीं। याद आ रहा है कि मेरे फुफाजी होमगार्ड में सब इंस्पेक्टर थे। मेरी फुआ जी ने जवानों को मिलने वाले मोज़े के ऊन को काले रंग में रंगवा कर मेरे लिए एक स्वेटर बना दिया था। वह स्वेटर पहनने पर देह में चुभता था। उसे पहनने के सिवा कोई और उपाय भी नहीं था। देव-दुर्योग से हल्की बारिश में भीग गया तो दूसरे दिन क्या पहनता, इसकी चिंता बनी रहती। ठंड से सर दर्द भी करने लगता था। एकाध दिन क्लास में गैप हो गया तो उपाध्याय जी ने पूछा- "कल क्लास में क्यों नहीं आये?" मैंने जवाब दिया- "सर, ठंड लगने से तेज सर-दर्द हो गया था।" उन्होंने कहा- "इसीलिए स्वेटर पहन कर नहीं आये हो।" मैं भरी कक्षा में क्या कहता कि मेरे पास एक ही हाफ स्वेटर है। विवाह होने के उपरान्त पत्नी ने नेवी ब्लू कलर का स्वेटर बुन कर दिया था। वह अनमोल उपहार अब तो नहीं है लेकिन उसके रंग अब भी मुझसे बोलते-बतियाते रहते हैं। स्वेटर बुनने का चलन ख़त्म हो चुका है और मुझे लगता है कि स्वेटर में अब वैसी उष्मा भी नहीं बची। तब के स्वेटर में माँ, बहन और पत्नी के प्यार की गरमाहट थी। गुजरा हुआ वक्त स्मृतियों की पनाहगाह में है।

ग्रेजुएशन की नैया पार लगने ही वाली थी की नदी के बीच भंवर में उत्तर दिशा से तेजी से एक नौका आयी जिस पर गाँव की एक निर्दोष कन्या सवार थी। उसके अभिभावक ने कहा- "वो दूर के मुसाफिर! इसको भी साथ ले लो। पार किए तो ठीक नहीं तो साथ ही डूबोगे। वैसे तो तुम कुशल माझी हो लेकिन मेरी बेटी  भी कम नहीं है। भवसागर के हर तूफ़ान में तुम्हारे साथ खड़ी रहेगी।" यह ऐसा प्रस्ताव था जिसे अस्वीकार करने का मेरे पास कोई उपाय नहीं था। इसके पहले भी भारी हंगामे के बावजूद मैंने विवाह के प्रथम प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। बिलखते हुए मुनिनाथ ने कहा था कि भावी प्रबल है - पूर्वजन्म कृतं विद्द्या, पूर्वजन्म कृतं  नारी। कोई माने या न माने दो दूर देश के पंछी एक ही डाल पर बैठ कर जीवन का राग अकारण नहीं गाते हैं। खैर, अभी मैं वयस्क नहीं हुआ था और मुझे मताधिकार प्रयोग करने की पात्रता भी प्राप्त नहीं थी। साफ शब्दों में कहूं तो पावन परिणय की उस शुभ रात्रि में साढ़े सत्रह साल का एक युवक पंद्रह वर्षीय एक युवती के पाणिग्रहण की प्रक्रिया में भारी मन से संलग्न था। बाहर अंग्रेजी बाजे बज रहे थे और भीतर दिल रो रहा था। दुर्बल कन्धों पर गुरुत्तर  दायित्व।

अठारह वर्ष पूर्ण हो जाने के बाद बचपन तकनीकी रूप से समाप्त हो जाता है लेकिन हमारे यहाँ पच्चीस साल के उम्र के युवाओं को तत्कालीन परिस्थितियों में परिपक्व नहीं माना जाता था-अर्थात यह गदहपचीसी की उम्र है। आगे का महासमर संक्षेप में यही कि एक बेरोजगार युवक की शादी कुछ वैसी ही है जैसे किसी सिपाही को बेहथियार मोर्चे पर लड़ने के लिए भेज दिया जाए। यह कहानी तो काफी लम्बी है लेकिन जैसे ही ग्रेजुएशन पूरा हुआ, पिता जी ने आगे की पढ़ाई के लिए हाथ खड़े कर दिए। मेरी स्थिति यह थी कि मैं अपनी पत्नी के लिए दो रुपये की बिंदी का पत्ता भी खरीद नहीं सकता था। खैर, पत्नी ने कभी कोई मांग नहीं की- 

'पिय हिय की सिय जाननिहारी'

(मानस का वह प्रसंग जब सीता केवट की नाव-खेवाई के लिए अपनी मणि-मुद्रिका उतार कर देने लगती हैं। पत्नी को इसी लिए सहधर्मिणी कहा गया है।) 

पति-पत्नी में संवाद न्यून इसलिए होते हैं कि यहाँ एक के हृदय की  बात दूसरे को पता होता है- 

'कहिहें सब तोरे हिय, मोरे हिय की बात।' 

अभाव का यह सफ़र भावों से लबालब भरा हुआ था जिसमें प्रीति-कलश से सुधा की बूँदे जब-तब छिटक कर मन-प्राण को सुरभित-सिंचित करती रहती थी। अब मैं केवल बेरोजगार पति नहीं रह गया था बल्कि बेरोजगार पिता बन गया था। अपने बच्चों में अपना बचपना ढूंढ रहा था जो समय से पहले सयाने हो रहे थे।

बहरहाल, मैं इस बालकाण्ड को विश्राम देने के पहले एक प्रसंग का जिक्र करना चाहूँगा जिसे लोककथा ही समझिए। कथा यूँ है कि एक स्त्री काफी बूढ़ी हो गयी थी। उसकी कमर इतनी झुक गयी थे कि वह पचास प्रतिशत तक झुक गयी थी। बिना बैठे वह भर नजर किसी को देख नहीं सकती थी। वह लाठी के सहारे थोड़ी दूर पर स्थित हाट-बाजार करने जाती थी। एक दिन इसी स्थिति में वह बाजार से लौट रही थी। कोई शरारती आदमी उससे पूछ बैठा- "ये बूढ़ी! क्या ढूंढ रही हो?" हाजिरजवाबी  उस स्त्री ने कहा- "मेरी जवानी खो गयी है। मैं उसी को ढूँढ रही हूँ।" जीवन के इस मोड़ पर मैं भी उस वृद्ध स्त्री की तरह कहना चाहता हूँ - मेरा बचपन खो गया है। मैं उसे ढूँढ रहा हूँ।


(मई, 2026)


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग कवि विजेन्द्र जी की है।)


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ई मेल : lalancsb@gmail.com  

 

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