शैलजा की लम्बी कविता 'ऐसे कौन नाराज होता है'
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| शैलजा |
दुनिया का शायद ही कोई कवि होगा जिसने माँ पर कविताएँ न लिखी हों। दुनिया का सबसे अप्रतिम रिश्ता होता है माँ और उसकी सन्तान का। यह अकथनीय होता है। भारतीय परम्परा में यह मान्यता है कि स्त्री सन्तान को जन्म देने के बाद ही स्त्रीत्व को पूर्ण करती है। माँ स्वाभाविक रूप से अपनी सन्तान के लिए आजीवन चिन्तित और परेशान रहती है और उसके बेहतर जीवन के लिए प्रयास करती रहती है। लेकिन एक दिन आता है जब माँ इस दुनिया से रुखसत कर जाती है। माँ की छत्र छाया के हटने से सन्तानों की दुनिया जैसे अधूरी हो जाती है। यह इसलिए भी कि माँ की जगह इस दुनिया में कोई ले ही नहीं सकता। शैलजा हमारे समय की समर्थ कवयित्री हैं। अपनी लम्बी कविता में उन्होंने माँ को शिद्दत से याद किया है। इस कविता को पढ़ते हुए वे तमाम स्मृतियां एकबारगी जैसे जीवन्त हो उठती हैं जो माँ के रहते हुए जी गई थीं। माँ की डांट फटकार, माँ का स्नेह और प्यार दुलार, पिता के साथ उनकी नोक झोंक सब एक एक कर याद आते हैं। इस रिश्ते में कोई औपचारिकता नहीं बल्कि अनौपचारिकता होती है। यह कविता इस अनौपचारिकता की ही दास्ताँ है। भावनात्मक अहसासों को शब्दबद्ध करना आसान नहीं होता लेकिन अपने शिल्प से शैलजा ने इसे संभव कर दिखाया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शैलजा की लम्बी कविता 'ऐसे कौन नाराज होता है'।
शैलजा की लम्बी कविता
'ऐसे कौन नाराज होता है'
अम्मा ने एक दिन लम्बे बाल कटवा दिए
बाल छोटे रखने लगी
उसे जरा भी किसी और के सोच की नहीं पड़ी थी
अचानक आए परिवर्तन से घर वाले और बाहर वाले लोगों में बातें होने लगी
अम्मा को कोई फरक नहीं पड़ा
सबेरे अम्मा पैर पर पैर चढ़ा अंग्रेजी अखबार पढ़ती
मुश्किल शब्दों के अर्थ उसे शब्दकोश के सहारे मिल जाते
को एजुकेशन में पढ़ी अम्मा एजुकेशनलेस मानसिकता में जीवन नहीं बिताना चाहती थी
उसने बड़े होते बच्चों से बताया के घर के काम में उसे बस जरा सा हेल्प ही नहीं चाहिए
बल्कि काम बांट लेना चाहिए
शहर की आर्ट गैलरी में जाना शुरू किया उसने
अम्मा बार बार यह नहीं कहती के हम तो हाउस वाइफ हैं
हमारे पास पैसे नहीं
अम्मा पूरे अधिकार से घर के पैसों से अपने मतलब भर के पैसे निकाल आर्ट गैलरी जाती
थियेटर का पुराना शौक पूरा करती
घर को छोड़ या पति को तलाक देने की जरूरत नहीं थी
उसको अपने समय से मतलब था
अम्मा जानती थी
जाती उमर अगर उसने समय पर
अपने तरीके से शासन नहीं किया
तो उसके हिस्से के सपने कोई और पूरा नहीं करेगा
शुरू के आजादी के दिन मुश्किल थे
होने ही थे
रसोई वाली अम्मा के शौक जाग जाय ये बात किसे पचती
इस उम्र में इतनी बेफिक्र और आवारगी वाली अम्मा को देख लोग बातें बनाते
बड़े होते बच्चों का कोई लाज नहीं इस औरत में
कैसी बेहया की तरह जब तब घर से निकल जा रही
ये वही लोग हैं जो कोई नहीं होते
इन्होंने अम्मा की पच्चीस साल की गृहस्थी में कुछ नहीं जोड़ा
कोई आगे आ कर नहीं कहेगा उठो निकलो
जरा अपने मन का कर लो
कोई भी नहीं
पति और बच्चे भी नहीं
घर में चौबीस घंटे की बेपगार नौकरी भला कौन करता
तो एक दिन अम्मा बस अम्मा नहीं रही
अपने नाम का जीने लगी
शीला अनुमेहा शालिनी और नर्मदा की तरह
उसे ऐसे ही जीना चाहिए था .....
(राग बदलना भी चाहिए कभी)
और फिर वो नाराज हो गई
अम्मा बहुत नाराज होती
बहुत ज्यादा
कहती मन करता है सब छोड़ चले जाए
हम फिस फिस कर हंसते
कि आखिर कहां जाओगी
अच्छा चली ही जाओ
लेकिन कहां
यही एक दर तो नहीं बना औरतों का
सरकारें गौर क्यों नहीं करती
एक जगह भर तो चाहिए
नाराज हुई पत्नियों मांओं को
अम्मा नाराज होती महीने खर्च के बचे पैसे चौकी पर पटक देती
चलाइए घर अपना
करिए हिसाब पाई पाई का
अम्मा पिता जी से नाराज हो कर सबसे नाराज हो जाती
पुरुष की नाराजगी लंबी नहीं खींचती
थोड़ी देर में उड़ जाती
पिता जी हंसते हुए कहते क्या करें मन तो है नाराज हो जाएं
पर खाने को मना नहीं किया जा रहा
अम्मा गुस्सा हो कर खाना देती
पिता जी मुंह नीचे किए मुस्कराते से खा लेते
हमें इशारे करते
अम्मा गुस्सा हैं तुम्हारी
जाओ गरम गरम समोसा ले कर आओ
देखो गोलगप्पा वाला आया हो तो ले आओ भाई मालकिन गुस्सा हैं
अम्मा के पटके पैसे में थोड़े और पैसे मिला पिता कहते
लीजिए रखिए आप लक्ष्मी हैं घर की
अम्मा नाराज होती तो पिता जी इनके खटिया पर आ कर बैठ जाते
अम्मा करवट कर लेती
पिता जी कुछ नहीं कहते बस बैठे रहते
धीरे से खसक कर अम्मा उनके बैठने की जगह बना देती थी
इससे ज्यादा पिता जी कुछ नहीं कर पाते
एक बार मजाक में बोले थे
कोई कोप भवन में बैठी है क्या
बताइए कोई बात मनवानी है तो
अम्मा किसे वनवास देती
वो तो खुद ही लंबे वनवास की तैयारी में थी
अम्मा नाराज होती
पिता जी चुप से उनके कपड़े तहा कर रख देते
एक दिन इकलौता बेले का फूल सिरहाने रखे थे
कहते छोड़िए खाना मत बनाइए
आज दूध चूड़ा खा लेंगे
इस नाराजगी में अम्मा को पिता का साथ इस तरह मिलता
अम्मा नहाते समय बैठती तो पिता दो बाल्टी पानी चला कर रख देते
नाराज हो कर भी अम्मा हमारी थी
उनके गुस्से से सब उन्हें जरा ज्यादा ध्यान देते
बिना मांगे चाय बना देते
यही तो चाहती रही होंगी अम्मा
इतने से की चाह में अम्मा को नाराज होना पड़ता
बहुत औरतें नाराज होती हैं
दांत पिसती
सर पटकती
तंग आई हुई
बस अब बस हुआ के बाद किसी जगह की तलाश में
होनी तो चाहिए कोई जगह नाराज अम्माओं की
सरकारें और समाज को ध्यान देना चाहिए इस ओर
बच्चों का मुंह देख कर रुक जाती हैं उसी घर में हजार बार
कोई जगह होती तो चली जाती
दो जोड़ी कपड़ा लिए
रहती हजार नाराज औरतों संग
एक दूसरे से बोल कर हल्की हो जाती
लौट आती घर
लौट ही आती
पिता जी कहते कभी
अरे पांडे जी नाराज क्यों हैं
चाय के साथ कुछ बनाइए ना
अम्मा बेहद रुसवाई से बोलती
मेरी क्या पूछ
बहू आ गई
वही बनाएगी आपके लिए
ये बात अम्मा यूं कहती जैसे सारी कायनात घुटने पर बैठ रोती हुई हलकान कहने लग जाए
अरे नहीं तुम्हारे हाथ की बात ही अलग है अम्मा
और पच्चास साल की अपनी यात्रा पर अम्मा खुश हो जाती
पर अम्मा फाइनली नाराज हुई तो पिता की घिग्घी बंध गई
बच्चे बेहाल हो गए
कोई चाय उसको रोक कर नहीं मना सकी
अब की भी अम्मा लेटी थी
पिता साथ बैठे थे मनाने को
अबकी अम्मा ने सरक कर हमारे में से किसी के लिए जगह नहीं बनाई
जाए गरम समोसा या गोलगप्पा लाने अम्मा
इतना लंबा कहां नाराज हुआ जाता है भला...
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एक दोपहर जब हम सब ऊंघते से इकलौते कमरे के लाल फर्श पर पड़े दिन काट रहे थे
कि अचानक अम्मा मेरी बहन का सलवार कुर्ता पहने हमारे सामने नुमाया हुई
यूं मुस्कुराती सरमाती
हम हक्का बक्का
बड़ी बहन एकदम से चिल्ला पड़ी
अम्मा
मेरा कपड़ा क्यों पहनी
हम आश्चर्य में थे
जबकि हमें प्रेम और दुलार से भर जाना चाहिए था
जिंदगी में पहली बार अपनी दो जवान होती बेटी के सामने ऐसा मन कैसे हुआ भला
अम्मा बहुत हँस रही थी
उन्हें लगा ये हँसने के लिए ही तो की थी वो
कौन पागल अम्मा डोरी से बेटी का सलवार कुर्ता ऐसे पहन सामने आती
सच हम खूब हँसे थे
जैसे जोकर के पीछे फट्टा मारने पर हम हँसते
क्या अम्मा कैसी लग रही
थोड़ी देर के बाद अम्मा अपने साड़ी में आ गई
और चुप थीं
हम अपनी मां को बस मां ही जानते
जो हमारा पेट भरती
जो जन्म देती
जो सुलाती घर संभालती और बूढ़ी हो कर मर जाती
उस दोपहर अम्मा अपने लिए वैसे पहनी थी कपड़े
कितने दिन से कहती रही थी
लाल फूल वाला सलवार कुर्ता बड़ा सुंदर है
अम्माओं को याद ही नहीं करने दिया गया
कि कभी वो लड़की थी
उन्हें अपना अम्मा होना ही याद
हमें पूछना था
अम्मा सलवार कुर्ता पहनने का मन हुआ क्या
अच्छा आखिरी बार कब पहनी थी
बताइए ना कौन से दोस्त थे बचपन में
कितना घूमी है आप
कभी फिल्म गई थी शादी के पहले
बोलिए
और फिर एक कोयल आम के इस रस भरे मौसम में कूक कर हमें सराबोर कर देती
अतीत के पन्ने खुलते
अम्मा फ्रॉक स्कूल बगिया की बात करती
होली और रंग की बात करती
व्याह और विदाई बताती
पिता से पहली लड़ाई बताती
गाल की लुनाई के भवर में बीता व्याह का पहला साल बताती
पुरानी डायरी में प्रेम गीतों का छुपा दस्तावेज दिखाती
पर कमबख्त हम उनके स्वार्थी बच्चे
जो थाली भर खा कर उसे शुक्रिया तक कहना भूल गए
अम्मा वो नहीं जो हमारी है, तुम्हारी है
अम्मा वो जो खुद की है
जीवन इच्छाओं से भरी
प्यार करने वाली
जीवन जीने वाली
हमें उसका जीवन उसे जरूर देना चाहिए.......
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अम्मा डिप्रेशन नहीं जानती थी
रात हिचकियों से भरी मेरी देह से बेचैन
गरम कपडे से छाती सेंकती थी
एकदम से हड़बड़ा कर ढेर सा तेल सर पर रख देती थी
सरसो के गरम तेल से तलुओं की मालिश करती
अम्मा डिप्रेशन नहीं जानती थी
पंडित से कुंडली की किसी ग्रह दसा पर बात करती
किसी अचानक से रखी पूजा में मेरे नाम का संकल्प लेती
किसी मंत्र को जुबान पर बांधने को मनाती
न जाने किस किस को बुला कर नजर उतरवाती
आधी आधी रात भरी बाल्टी का पानी मुझे सर पर डालते देख
मंदिर में कोई जप करने लगती
अम्मा डिप्रेशन नहीं जानती थी
महीना चढ़ गया क्या
उधर घर वाले ठीक है न
कोई कुछ बोला क्या
उधर मन नही लगता?
कुछ नहीं बोलोगी तो कैसे पता चलेगा
पैर टटा रहा
छाती में दर्द
कंधा या कमर
ज्यादा काम तो नहीं पड़ गया
मन की बीमारी से नावाकिफ अम्मा तो कभी न जान पाई
मन की इतनी महीन बीमारी भी होती है
पर्स में दस हजार रखने
हवाई जहाज से आने जाने वाली बेटियों का चेक इन
चेक आउट होता रहना बस चमक भर है
इनके मन की तमाम गाठें है
इन्हें सही जगह चेक इन करवाने की जरूरत थी
हमको कुछ समझ में नही आ रहा अम्मा हमको क्या हुआ है......
ठीक ऐसा कहते थाम लेना चाहिए किसी को हाथ
पीठ को सहलाना चाहिए
और कहना चाहिए
होता है ऐसा कोई बात नहीं
बुखार ठीक करने की तरह
मन ठीक करने वाले भी हैं
तुमको ले चलेंगे
तुम ठीक हो जाओगी...
पागल पागल कहने से कुछ बुरा ही होगा
पागल को समझने के किये
गरम कपड़े से छाती सेंकने से कुछ नही होगा
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अम्मा नहीं जानती थी मैं प्रेम में हूं
उसने मेरे मन को परे रख कहा
धूप तेज है आज और आलू सस्ते
अम्मा नहीं समझ सकीं
कि कॉलेज से लौट कर रास्ते की कितनी पीड़ाएं मेरे साथ घर आ जाती हैं
घर आते वो कहती
जाओ हाथ पैर धो लो
चाय बनाओ
मन तो यूं भी नहीं धुलते
देर तक सोने पर उसने झकझोर कर जगाया
उठो भाई खराई मार देगी
वो नहीं जानती थी
रात कैसी कैसी बातों से मरता रहा मन
दुनियां के सभी सम्बन्ध सम्बंध भर होते हैं
दुख पीड़ा हँसी से गुजरती देह को कोई नहीं जान सकता
शायद कोई भी नहीं
खून के रिश्ते आयोजन प्रयोजन और मरण में साथ खड़े हो भी जाए
हमारे मन के अकेलेपन को हमारा मन ही पार लगाता है....
अम्मा अफेयर और रिलेशन नहीं जानती थीं
उनको पता था साथ रहना और निभाना औरत की ओर रहा हमेशा
हमेशा अम्मा औरत की ओर पीठ किये दलीलें देती रहीं
बात बढ़ाना नहीं चाहिए
औरतों को पता होना चाहिए
रुकने झुकने की जगह
छत बड़ी चीज है
अम्मा छत संभालने का पाठ पढ़ाती रहीं
हम अपनी जमीनें भी हार गए
डरे हुए समय की डायरी में दर्ज अम्मा जरा कमजोर थीं
प्यार मुहब्बत कर के क्या मिला?
थू थू अलग हुई न
भुगतान तुमको पड़ेगा
मार खा कर सीधी की गई औरतों की कहानियों ने हममें भय भर दिया
अम्मा
परिस्थितियां विपरीत हुई
तब
समय के सहारे रहना
पढ़ी औरतों ने कलह किया हुआ है
अम्मा जानती थीं पढ़ी औरतें जानती है हक हुकूक की बातें
बात उठेगी तो पक्के घर ढहेंगे
औरतों को कच्ची सोच का ही होना चाहिए
हजार हजार बार मन मारने के बाद
हम एक किसी दिन बोल ही पड़े
हमें बोल ही देना चाहिए था
औरतें अगली औरतों से पिछली औरतों की तरह जीवन की उम्मीद न करें
हमारे हक में बात तो होनी ही चाहिए
अम्मा नहीं हैं
वो नहीं देख पा रही
बोलने की ओर मैंने पहला कदम बढ़ा दिया है....
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अम्मा कहाँ जानती थी सोशल डिस्टेंसिंग
सबको जोड़ कर चलने वाली अम्मा के लिए कठिन समय होता ये
*********
अम्मा हमेशा कहती रसोई में इतना खाना रहे के रात विरात आये मेहमान को भूखा न सोना पड़े
पटरियों पर भूख के मारे हमेशा को सो गए
रोटियां बिखरी थी
ऐसे कहाँ अनाज का निरादर देख पाती अम्मा
गरीबों मजदूरों को कौन रोएगा?
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अम्मा
आजकल हर दिन ही कोई दुःख सामने आ खड़ा होता है
कौन पास बिठा कोई लाल हरा तेल सर पर रख देता के पहुँच जाती थोडा ठंडक
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बटवारे की तस्वीरें तुम्हारी बताई कहानियों के बाद
आजकल हम रोज देख रहे हैं
दर्द भी दुहराता है अपने आप को
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रोटी की खातिर देश गाँव छोड़ गए लोग
पुराने पते पर फिर पहुँचना चाहते हैं
उनका पता जानती हो अम्मा?
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पुराने लोग लम्बी यात्रा पर पैदल ही निकल जाते थे
नए लोग भी निकल पड़े हैं लम्बी यात्रा पर
प्रार्थना करना अम्मा
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अम्मा हम तुम्हारा दूध पीना कब छोड़े थे
एक डेढ़ साल
लेकिन भाई चार साल तक चिपका रहा तुम्हारी छाती से
डेढ़ साल ही सही
चार साल की लड़की बारह सौ किलोमीटर की लम्बी यात्रा पर है
दुआ करना पहुँच जाय
लड़कियाँ कम में भी दम रखती हैं
सुन रही हो अम्मा
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बिना अम्मा के बच्चे को लोग टुवर बोलते हैं
तुम देखो कितनी भूखी अम्मा लोग
सर पर शहर गोद और पेट मे बच्चा लिए
जलती धूप में छांव की तलाश में चल पड़ी हैं
उन मम्मियों को दुआ देना तुम
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खीर पूड़ी खाने से नहीं मनते त्योहार
तुम्हारे पीठ पर लटकने
तुम्हारे बड़े पेट पर गुलगुली करने से मन जाते हैं
हम कितने जोर से रूठे हैं
कभी हमें भी मना लो आ कर
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अम्मा पेटीकोट छाती पर बांध नहाने जाती
ऐसे जैसे किसी जंग पर जा रही
कितनी देर लगेगी कुछ पता नहीं
जैसे इस दरम्यान चूल्हा बंद रहता
और हमें हिदायत के कोई परेशान ना करे
चैन से नहाने दे
तब ही अखबार में राम तेरी गंगा मैली की फोटो हर रोज आती मंदाकिनी की
हम कहते
मंदाकिनी नहाने जा रही
सफेद पेटीकोट छाती पर बांधे
बड़े छोटे तीन चार बाल्टी के झरने में अम्मा घंटों नहाती
देर तक ब्रश से अपनी चप्पल चमकाती
उसकी यात्राओं से ज्यादा उसकी चप्पल धोने से घिसी
बाल्टी भर कपड़े को ऐसे चमकाती जैसे सूखने के बाद आप नए पुराने का अंतर भूल जाओ
मग्गे की लगातार धार से चेहरे पर पानी डालती और अफना कर रुक जाती
पानी में ही बह जाते अम्मा के ढेर सारे बाल
पानी के साथ ही पुरानी कोई धुन की आवाज आती
पानी के सहारे उदास और खुश होती
पानी ने ही दुख में थामा और खुशी में झरना सा झरा
ज्यादा उदास अम्मा पानी से उलझती
ज्यादा खुश अम्मा भी पानी से
हमारी विदाई जब भी हो तभी अम्मा जल्दी नहा लेतीं
जाने के बाद नहाने का अपशकुन न हो
तब पानी बचता और आंसू खर्च होते
अम्मा नहाती तब अपनी एड़ी चमकाती
कहती भी तलवा शीशे जैसा साफ रखना पसंद
ऐसे ही एक रोज मंदाकिनी पेटीकोट छाती के ऊपर बांधी और नहाने की तैयारी की
चप्पल चमकाए
कपड़े धुले
खूब पानी भरी बाल्टियों में
और एकदम से सांस रुकने लगी
सब भागे
पानी लाओ
पानी पिलाओ
पानी छिड़का जाय
हाय अभी तो नहाने जा रही थी
पानी का हर बूंद मुख से ढलका
सबके कंठ सूखे
सबकी जीभ अकड़ गई
सबने आवाज लगाई
अम्मा अम्मा
अम्मा गहरे पानी के देश चमकती चप्पल छोड़ चली गई
बच्चे बिलखते रहे
सबने यही कहा
थोड़ा पानी पी लो बच्चों
यही विधि का विधान है
यही आग पानी की यात्रा
सबने पानी तजा
सबको पानी ने ठौर दी
लगातार झरनों से गिर रहा पानी
भींग रही मंदाकिनी आज भी टीवी स्क्रीन पर
पर हमारी मंदाकिनी खो गई
अम्मा की इकलौती पुकार का गला रूंध गया
बेटियों को मां याद आए तो पिता को जरा जोर से गले लगा लेती हैं
पिता को पता है यह बिन मां की बेटियां
कितना कुछ अब पिता से छुपा लेती हैं
पानी के पास आज भी रखा है
सर्फ सोडा साबुन और ब्रश
अम्मा गायब हैं
किसी नदी में समा गई
किसी समंदर के किसी लहर की सवारी करती सी
बनारस की शाम में किसी दीए के लौ सी
सुना आज मदर्स डे है
और झरने की तेज धार में तुम्हारी याद की बौछार है
हम भींग रहे हैं अम्मा
7
अम्मा गंगा की तरह बैठती थी
पसर कर
हम उनके किनारे पर बैठे मिट्टी का खेल खेलते
अम्मा एक दिन हरसिंगार बनी
खूब खिली सारी रात झरती रही
हम सुबह टोकरी में उन्हें चुन चुन कर रखते वो इठला कर टोकरी में भरी रहती
एक बार एक फूल को उठा
कहने लगी
इस डिजाइन का कर्ण फूल कितना सुंदर लगता
तब अम्मा अप्सरा होती
और हम उनकी दासियां उन्हें सजाती
अम्मा एक दिन अपने सिंहोरर का सिंदूर बन गई और उसमे रखे काठ के फट्टी को उठा कहने लगी
इसमें सोने का सिक्का भी डालते हैं पैसे वाले लोग
हर जमाने में पैसे का जमाना रहा है
कोई कम पैसे वाला ज्यादा पैसे वाले से दबा है
गर्मी की दोपहर अम्मा अंगद का पैर बन जाती
हम बच्चों को अपने जांघ में जकड़ हमें जिंदगी बख्स्ती और खूब हंसती थी
हंसती हुई अम्मा
तारा सितारा थी
बिखरी तो आंगन के प्राण सूख गए
बिछड़ी तो घर की नींव चीख उठ्ठी
अम्मा शाम के समय ले जाई गई घाट
जब गद्दीयों पर जुलाहें हाथ की बनाई बनारसी साड़ियां खोल रहे थे
जब अन्नपूर्णा की आरती से दीवार चमक रही थी
जब सभी चौराहे पर चाट गोलगप्पे की भीड़ लगी थी
तभी
मुस्कुराती सी निकल रही थी
अम्मा की अंतिम सवारी
पिता के हाथ में रखा फूल कांप कर गिर गया
थिर गई पिता की नजर
मरने वाली लड़ाई अम्मा जीत गई थी
पिता के पाले में काठ मारे बच्चे खड़े थे
गंगा में दूर तक उठी आग
फिर सब ठंडा हो गया
हमेशा के लिए....
अम्मा गंगा बन गई
हम किनारे पर छिटक अपने गिरे घरौदो को देख रो रहे थे
अम्मा आसमान सा नीला पल्लू हमारे ऊपर ओढ़ा देती हैं
हम ठीक हो जाते हैं...
8
अम्मा जब भी पुराना बक्सा खोलती
भाइयों से जुड़ी चीजें ज्यादा निकलती
जैसे सुंदर सा झबला
सुंदर सी टोपी
मखमल की जैकेट
ऊन का बनाया बित्ते भर का स्वेटर
हम लोग उछल उछल सब देखते
झबला मुंडी में घुसाने की कोशिश
टोपी सर पर
और अम्मा के बक्से में ताक झांक
अम्मा हम लोग का क्या चीज है?
अम्मा कहती अरे खूब फ्रॉक थी तुम लोग की
पर क्या घर में आगे जितनी लड़कियां हुई
उनको चले जाते तुम लोग के कपड़े
अरे देखो वो गांव वाली चाची
वो फलाने बुआ
वो बाजू वाली
गुप्ताइन्न
इन सबके बाद में लड़की ही हुई
तो ये मांग ले जाते
हम उदास हो कहते
पर हमारे बचपन का क्या संजोई हो तुम
अम्मा बहुत सोच समझ कर कहती
अरे पीतल का कजरौटा
तुम लोग का ही है
उसी में काजल बनाते थे
तुम लोग को रोज काजल लगाते
देखो कैसा मछली के शेप का है ये
फिर हम मछली के कजरौटा से ही खुश हो जाते
कपड़े को जब भी अम्मा धूप दिखाती
बक्सा खुलता
हम सारे कपड़े छूते
भाइयों के कपड़े धूप में उलटने पलटने का काम करते
एक दिन क्रीम कलर की सुनहरे तार से कढ़ी एक साड़ी धूप में दिखी
अम्मा ये साड़ी?
अरे यही एक भारी साड़ी मिली थी
असली चांदी तार के कढ़ाई वाली
फिर हम डबल तह कर के साड़ी लपेटते घूमते
हमारी चढ्ढी में इतने प्लेट्स का भार होता फिर भी संभालते
अम्मा कहती उतार दो साड़ी
नहीं संभलेगी
हमसे ही नहीं संभलती थी
पर समय के साथ सब संभल जाता है अम्मा
पुराने कपड़े में आज ही आपका बनाया झबला मिला मेरे बेटे के जन्म वाला
हाथ सिलाई से बना
मछली के कजरौटा में आंख नजर का टीका और हमारी छोटी आंखें छूटी हुई हैं उसी बक्से में
हमारा कोई धराऊ कपड़ा नहीं
हमारी तो स्मृतियां भी बांट दी गई हैं
पर चांदी तार से भारी साड़ी हो या जीवन सब संभल गया है
पर पाकिट् वाला जैकेट तो हमारे लिए भी बनाना चाहिए था
साटन और मलमल के फ्रॉक सी कोमल जिंदगी नहीं होती
धूप तेज है
कपड़ों को धूप दिखाओ अम्मा
और हमें दुनियां
मछली के कजरौटे का कपूर उड़ गया है अब तो....
9
ये बचे हुए में बची रहीं औरतें .........
कम खाती रहीं
ज्यादा रही जागती
कम रुकी
ज्यादा रही भागती
ये कम चूड़ियों की कलाई में
खनकी जान होने तक
ये कम दिखती नजर से
ज्यादा सलाई से उतारती रही स्वेटर
ये कम की गई मन से
ज्यादा मन बक्से में छुपी रही
ये तमाम जिंदगी यात्रा में बांधती रहीं रसोई
बचे तेल से महीनों उसी स्वाद से उबी चुबी खपाती रही तेल
उसी बचे से मीठा नमक
नमक मीठा होता रहा
ज्यादा सही
कम बोली
ज्यादा चली
कम थकी
कम खाई
ज्यादा खपी
उम्र की काँपती उँगलियों से ये अपनी ढीली हुई चोली कस रहीं हैं
ये मन ही मन हँस रहीं हैं
शरीर पर उतर रही झुर्रियों को बाँध रहीं कम साइज ब्लाउज में
कभी तनी थी
अब ढली है
छुटियों में जाले उतारने
ज्यादा डिब्बा साफ़ करने
ज्यादा पर्दा साफ़ करने की कवायद को ये घोर के पि गई हैं
भरे सावन खाली मन से गा रही कजरी
कमजोर रस्सी लिए
ये खोज रही
नैहर का वो मोटे तने वाला पेड़
जहाँ बौराई सखियों की टोली थी
जहाँ जिंदगी भांग की गोली थी
जहाँ हवा में प्रेम का गुलाबी रंग मिला था
जहाँ आग पर इश्क का कोई गीत गाती पहली रोटी जली थी
जहाँ कुवें के अँधेरे में छूट गई बाल्टी की साँस अब भी धुक पुक कर दे रही सुनाई
जा रे औरत
ऐसे कैसे रही बैराइ
न खीचे काजल
न रंग है आँचल
न उमंग है देह
न मुस्कारट है आग
जा रे
यही तेरा भाग
बचे तेल में महीना गुजारना
अख़बार में ठेकुवा बांधना
तले के खुरचन सी आबाद रहना
घर में
जहाँ दिवारों के करवट भर जागती तुम
नमक बो रही
कमबख्त किसके याद की हो रही
तुम बची हुई
बचाती रही
घर के बचे हुए बुजुर्ग
तुम्हे भरी जिंदगी
कोई न बचाया
इत्ता कमाल करना कौन सिखाया ?
10
अम्मा सुख दुख के साथ जोड़ी वाली बहनों की बात करती
नैहर पूछे न पूछे बहनें हाल लेती देती रहेंगी
बहनें बाकायदा निष्कासित की गई और उनकी जगह घर में जरा खुली जगह उभरी
घर में भी यही बातें रहीं कि दोनों चली ही जाएंगी
कमरा बक्सा अलमारी सब खाली कर के
भाइयों ने जाने तक सब्र रखा
फिर हर अलमारी बैठक चौकी बिस्तर को समेट नया सेटअप बना लिया
जोड़ी में बड़ी हुई बहनें उदासी बांट लेती हैं
इनकीं बैग में हमेशा एक्स्ट्रा रुमाल रहता है
दो चार बीमारी की दवाई की सलाह ये लेती देती रहती हैं
यही आपस मे समझती समझाती है
कि कोई ध्यान दे न दे विटामिन कैल्शियम जरूर लेती रहना
अम्मा के बक्से में धरी साड़ियां इन्हें मुंहजबानी याद है
इन्हें सब याद है
इनके पास गोया याद ही बची है
बस ये किसी को कम याद आती हैं
ये मिलती है तो देर शाम वाली चाय लिए छत के कोने में गुंथी मिलती है
वहीं घर से हमेशा को विदा हुए बड़े पापा कोई बेहद फेवरेट चाची की प्रार्थना सभा होती है
वही रखती है मौन
वहीं एक दूसरे को दिलासा देती कहती हैं
अब खोने का समय आ गया है मेरी बहन
मन को कड़ा रखो
अम्मा के बाद के किस्से इन्हें ही याद है
यही कह उठती है
अरे तुम्हें याद नहीं अम्मा कहती थी न ....
कहने और रहने वाली अम्मा की रिक्त जगह पर ये बैठी हैं एकदम अम्मा की तरह
भाई की बात सुन रही
छोटी बड़ी उनकी समस्या को राय बात से सुलझा रही
अपने सुख दुख की गठरी ये बंधा ही रखने लगी हैं
ये साधने लगी हैं उदासी
ये नियत भाग्य और ईश्वर के हाथ में छोड़ रखी हैं अपनी जिंदगी
इनकीं जुबान पर धनिया खटाई की चटनी की तरह उतरती है छूटे आँगन की याद
ये छलकती हैं
मुस्कराती हैं
नाक मुँह पोंछती हैं
और हँस के कह देती हैं
हरी मिर्च बहुत खाते हो तुम लोग
हमसे अब तीखा खट्टा बर्दास्त नहीं होता..
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मम्मियों की सिर्फ रसोई होती है
सबको खिलाने की खुशी होती है
घर के हर सदस्य की खुशी में
हर सक्सेस में
फटाफट हलुआ बनाने वाली गरम कढ़ाई होती है
मम्मियों के पास तुलसी का पौधा होता है
दर्द का बाम
घुटने का दर्द होता है
चक्कर आने की बेतुकी बीमारी होती है
मम्मियों की दोस्त मम्मियां ही होती है
इनकीं न लगने वाली नींद होती है
इनके पास बहुत बोरिंग अतीत होता है
वर्तमान इनका हुआ ही नहीं कभी
भविष्य इनका घर और बच्चे होते हैं
मम्मी का साथी पिता होता है
पिता की साथिन कोई भी हो सकती है
पिता मम्मी की बात जिंदगी भर नहीं समझ कर भी उसका साथी ही रहता है
मम्मी की जिंदगी में इतना कुछ होने के बाद
कोई नहीं कभी नहीं हो सकता
पुरुष मित्र मम्मियों के नहीं हो सकते
खानदान की नाक कट जाती है
मम्मी दूसरों (पुरुषों) के साथ बात करती जरा भी नहीं सुहाती
बच्चों के दोस्त हंसी उड़ाते
फिर बच्चों के दोस्तों में इस चर्चा पर बच्चे शर्मसार होते
मम्मी की उम्र में मम्मियों वाला काम ही शोभा देता
मम्मियां स्लिम सुंदर उम्र को पीछे छोड़ती हुई नई उम्र लड़कियों से मुकाबला नहीं कर सकती
मम्मी को मम्मी रहना चाहिए
घर के पढ़े लिखे भी इससे बेहतर नहीं सोच सकते
बिल्डिंग आस पास समाज क्या खाक सोचेगा
औरतों का अपना कमरा होना चाहिए
ऐसी किताबों से मन भटक जाता है
कमरे में इनकीं जगह करवट भर नींद हो तब भी ये भाग्य वाली मानी जाती हैं
तो मम्मियों ऐसी मेनका बनी न घूमो
ऐसे रहो कि लगे दो बच्चों की माँ हो
पुरुषों से दोस्तियाँ रखने वालियों को पीठ पीछे सब चरित्रहीन ही कहते
कौन मम्मी पुरुषों के कन्धे पर धौल जमाती ठठा के हंसती है
साथ बैठी मन खोलती हैं
यात्रा की योजना बनाती हैं
मम्मी मेरी बहुत समर्पित महिला थी
किसी ने कभी उसे घर के बाहर नहीं देखा
गृहस्थी का सब काम उसी का था
लाख पिता ने थाली फेंकी या गाली दी
मम्मी रात उनके थके तलवे में तेल लगाना कभी नहीं भूलती थी
उम्र के साथ तरह तरह की बीमारी आई
मम्मी सब सहती रही
मम्मी ने कभी घर के लोगों को अपने लिए तंग नहीं किया
मम्मियों को ऐसा ही तो होना चाहिए
उम्र के चाबुक से लहूलुहान रही मम्मियों की पीठ
ऐसी बड़ी और गहरी आंखों में बेजार जीवन डूबा और खत्म हो गया.....

प्यारी ,मनभावन और मार्मिक भी.कहीं-कहीं तो जीवन-दर्शन से भरी पंक्तियाँ भी.
जवाब देंहटाएंमाँ की याद से भरी मार्मिक कविता
जवाब देंहटाएंBahut sundar. ...dil ko chhuta hai...sab kuchh jaise samne ho raha....Amma...kya hi kahein ❤️😭😭😭
जवाब देंहटाएं.
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behtareen ,shailaja ka javab nahi ,unhe pyar
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