भरत प्रसाद के धारावाहिक उपन्यास कालकलौटी की दूसरी कड़ी
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| भरत प्रसाद |
प्रकृति का अपना अद्भुत ताना बाना है। यह ताना बाना किसी भी व्यक्ति को सहज ही अपनी तरफ आकृष्ट कर लेता है। दह, ताल, तलैया, पोखर, तालाब जैसे इस खूबसूरती में चार चांद लगा देते हैं। इस जलमग्न क्षेत्र में पौधों की उपस्थिति सहजीवन का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है। उपन्यासकार भरत प्रसाद अपने उपन्यास कालकलौटी में प्रकृति के इस खूबसूरत नज़ारे का वर्णन कुछ इस प्रकार करते हैं प्रकृति की लीला के आगे लोटने का मन करता है। कहाँ से पाया ऐसा जादुई खिलना, कैसे भर गया इतना टटकापन? पंखुड़ियों में नरमी की महिमा कैसे भर उठी? मोती झील का हार अकेले कमल-पत्ता नहीं। जलकुंभी, काई, सेवार, पनिहा घास सब अपने-अपने ढंग से रच-बस गए हैं – झील की काया में। जलकुंभी हटा दो तो झील के तन से साड़ी हट गई। काई हटावोगे, तो पानी की चमड़ी छिल जाएगी। सेवार के बिना तो झील अपने आदिम अनगढ़पन को खो देगी। रही बात पनिहा घास की तो वह झील की काया के पीछे छाया जैसी रहती है। कहा न कि मोती झील की अपनी दुनिया है। पटेरा, पोंटे, मोकटान, जेनीचेला, कटिया, कुमुदिनी, सफेद कमल, कमल गट्टा – ये सब ऐसे सेवार हैं, जिन्हें या तो पक्षी जानते हैं या पक्के मल्लाह या फिर उनके भीतर घर बसाने वाली मछलियाँ। जल-रानियों की गिनती तो लाखों में है, कौन जान पाया आज तक? पिछले महीने हमने इस उपन्यास की पहली कड़ी प्रस्तुत किया था। पहली बार पर हरेक महीने के दूसरे रविवार को भरत प्रसाद द्वारा लिखे जा रहे उपन्यास को हम सिलसिलेवार प्रस्तुत कर रहे हैं। इसी शृंखला में आइए पहली बार पर आज हम पढ़ते हैं भरत प्रसाद के धारावाहिक उपन्यास 'कालकलौटी' की दूसरी कड़ी।
धारावाहिक उपन्यास : दूसरी कड़ी
कालकलौटी
भरत प्रसाद
एक सवाल का जवाब खोजे न मिलेगा कि इस धरा-धाम पर एक चेहरे का कौन है? दरख्त? नहीं। ऋतुओं के अनुसार बदल जो जाते हैं। जानवर? ये भी मौका भांप कर अपना रंग बदल देते हैं। पक्षी? सवाल ही नहीं। इन्हें तो बस हवाओं का रुख उड़ान भरना आता है। आगे मत पूछना। वह तो बहुरूपियों का सरदार है, मुखिया है। दोहरेपन से याद आ चला मोती झील का कमल-पत्ता, जैसे पानी पर बिछी हुई हरियर चमड़ी। भीतर-भीतर नसें इस कदर फैली हैं, जैसे फसलों के बीच बिखरी हुई जल रेखाएँ। कमल-पत्ता दुरंगापन का नमूना, ऊपर-हरा, नीचे-ललछौंह। मगर हाँ! जब कमल के फूल को अपनी नाभि से जन्म देता है – तो आश्चर्य करने की क्षमता भी चुक जाती है, प्रकृति की लीला के आगे लोटने का मन करता है। कहाँ से पाया ऐसा जादुई खिलना, कैसे भर गया इतना टटकापन? पंखुड़ियों में नरमी की महिमा कैसे भर उठी? मोती झील का हार अकेले कमल-पत्ता नहीं। जलकुंभी, काई, सेवार, पनिहा घास सब अपने-अपने ढंग से रच-बस गए हैं – झील की काया में। जलकुंभी हटा दो तो झील के तन से साड़ी हट गई। काई हटावोगे, तो पानी की चमड़ी छिल जाएगी। सेवार के बिना तो झील अपने आदिम अनगढ़पन को खो देगी। रही बात पनिहा घास की तो वह झील की काया के पीछे छाया जैसी रहती है। कहा न कि मोती झील की अपनी दुनिया है। पटेरा, पोंटे, मोकटान, जेनीचेला, कटिया, कुमुदिनी, सफेद कमल, कमल गट्टा – ये सब ऐसे सेवार हैं, जिन्हें या तो पक्षी जानते हैं या पक्के मल्लाह या फिर उनके भीतर घर बसाने वाली मछलियाँ। जल-रानियों की गिनती तो लाखों में है, कौन जान पाया आज तक? मगर इनमें तीन सबसे ऊपर, कहिए कि सबसे खास – भाकुर, टेंगा और मगुरी। भाकुर है तो बलवान, मगर भद्भद्, मोटका लड़के की तरह, मुँह बा कर तुरंत जाल में फंस जाता है। टेंगा कांटे की बिजली है। और मंगुरी? तन पर हाथ धरने नहीं देगी। चिक्कन इस कदर मानो पानी नहीं, तेल पीती हो। लुभाएगी, थकाएगी, बुलाएगी और अंत में कांटा मार देगी, आप ऐंठ कर रह जाएँगे।
यू. पी. का पूर्वांचल अर्थात् पृथ्वी का अलहदा कछार, देश-दुनिया को अपनी ठसक पर रखने बोला, लोकल राजनीति की प्रयोगशाला और पूजा-पाठी मूर्तियों की अमर राजधानी। यहाँ गिनती के बाहर गांव-गिरांव बिखरे हैं तो निगाहों से ओझल हजारों पोखर। पोखर का तात्पर्य जल के बंदी जीवन का मरा हुआ इतिहास। इधर कछार की दुनिया में लगभग हर गांव के आजू-बाजू एक न एक पोखर चमक उठेगा आंखों में। बेलहर, तामेश्वरनाथ, धर्मसिंहवा, पांडे पोखरा, लैबुड़वा ताल ये तो ऊंट के मुंह में जीरा जैसे हैं। इन्हीं सबके बीच तहसील मेंहदावल के चार कोनों पर जमे हुए चार पोखरे-बाराखाल टोले का पक्का पोखरा, दक्षिण में ठाकुर द्वारा, पूरब दिशा में गंगा-सागर और पश्चिम दिशा में कुबेरनाथ का पोखरा।
कभी तो पक्का पोखरा अपने बेढ़ब कच्चेपन से रोमांच भरता था – रोम-रोम। मार खाई सीढ़ियों पर तन्हाई की उदासी जमी रहती। दुपहरिया में पोखरा का थमा हुआ पानी सन्ना कर सो रहता और सीढ़ियों पर दिन बीतने तक झन-झन पसरी रहती। रौनक लौटती तो किशोर या नवधा मछलियों की बंकिम उछाल से, जो न जाने किस उमंग में एक गहराई से उठतीं और दूसरी गहराई में समा जातीं। फिर पीछे छोड़ जातीं – जलमग्न सीढ़ियों से आहिस्ता टकराने वाली लहरें, जिससे हनक मिलती थी – पोखरा के अंतस्थल में जलपरियों की रौनक खिली हुई है। इन्हीं के बीच लुकते-छिपते-हांफते झींगा, केकड़े, क्लैम, ईल, स्क्विड रहा करते थे। बच गये तो अहोभाग्य, मिट गये तो राम-नाम सत्य। लुजलुज बदन में बाल बराबर हलन-चलन नहीं। उधर गहरे तैरते शैवालों के जंगल से मछलियों के शावक झुंड बांध कर गश्त करने निकले हैं – मेंढक से जरा नीचे ठिठक जाते हैं – फिर आँखों-आंखों में मेंढक की औकात तौलते हुए दूसरी गली की ओर बहक चले। हम मनुष्यों से जरा भी कम होशियारी नहीं। हमारी तरह ये भी फूंक-फूंक कर कदम रखते हैं। हमारे जैसे ये भी पेट के लिए परिश्रम करते हैं। एक-दूसरे से आगे निकलने की जिद साधते हैं और अक्सर मौका देख कर चाल चलने की कलाकारी करते हैं। मेंहनावल का पक्का पोखरा सारे जवार की जुबान पर बसा है। ‘पक्के पोखरा पर रुक कर मेरी राह देखना।’ ‘पक्के पोखरा गाड़ी रोके रहना।’ ‘पक्के पोखरा बैठकर चाय-पानी कर लेना।’ कहिए तो यह भोर से सांझ तक राहगीरों का आरामालय है, थकान धोने का आश्रय है, बेवजह यात्रा रोक देने का बहाना है और भूले-भटके बेसहारा जन का खुल्ला घर है। सांड़, गाय, कुत्ते, बिल्ली और भी सैकड़ों जीव-जानवर पोखरा की माया-छाया-काया में शरण पाते हैं। जहाँ पोखर वहां मंदिर। यह कुछ वैसा ही है – जहाँ विलाप, वहाँ आंसू। जहाँ स्वार्थ, वहाँ मिलन, जहाँ भाव, वहाँ प्रेम। पक्का पोखरा खास कमलगट्टा की रौनक के लिए जाना जाता है। चैत-बैसाख का मनसुख मौसम, जब जाड़े का दर्द सह कर पीली हो चली पत्तियाँ दरख्तों से विदाई लेती हैं, जब पक्षियों के कंठ में बसंत ऋतु की खुशी का रस आ जाता है, जब शीत के आतंक में जम चुकी दिशाएँ जगने लगती हैं – कमल के फूल भरभरा कर पंखुड़ियां खोलना शुरू करते हैं। क्या ही चुंबकीय रंग बख्शा है – प्रकृति ने? सफेद नहीं, मगर सफेद के बिना भी नहीं, लाल नहीं, मगर ललछौंह में अंगड़ाई लेता हुआ। गुलाबी भी नहीं, मगर इसी रंग की भनक देता हुआ। यह बस कमल का रंग है, जो किसी भी रंग से अलहदा है। ‘काहे री नलिनी तूं कुम्हलानी, तेरे ही नालि सरोवर पानी।’ बाबा कबीर दास को आखिर क्या नई बात सूझी होगी – कमल को देख कर। आकंठ पानी में डूबी नाल, जिसके शिखर पर कमल खिलता है। सिर्फ समय की आंखों को पता है – पंखुड़ियाँ कितनी अदेखी चाल से खुलतीं और कितनी महीन शर्माहट के साथ बंद होती हैं। सूर्य के उगने और अस्त होने से कदम ताल मिलाता कमल एक अबूझ जीवन सत्य पैदा करता है। शीत ऋतु के विदा काल से ले कर सावन-भादों की ब्रज बारिश तक खिलता-मुरझाता रहेगा। देश का राष्ट्रीय फूल है, तालाबों की शान है, पानी का श्रृंगार है, भौरों की भूलभुलैया और अपने ही सौंदर्य के वजन में शर्मा कर जरा लचक जाने वाली सुंदरता का जादू।
सावन-भादों का गिलहा मौसम। रोवनहा-जिद्दी बच्चे की तरह अदबदा कर बारिश होती है। बादल नशा की तरह छा गये हैं, सिर पर। न सुबह होने का अंदेशा, न शाम ढलने की भनक। औचक में घुप्प कजरारे बादल कब टूट पड़ें, किसे पता? है किसी की जुबान में दम जो पुरवैया बयार को जुबान पर गा पाए? है कोई माटी का लाल जो धूसर माटी में नहा-नहा कर लाल-लाल हो जाय। है तो एक गंवई गीत, चलो तान छेड़ कर ऋण उतारते हैं –
ताल-तलैया आम-अमरइया,
पीपल के ऊ शीतल छैंया, ठीक लागे ला।
हमरा शहरी से गइयाँ बड़ा, नीक लागे ला।।
रोज गवाला गइया दूहे।
भोरे-भोर खटाल बा,
चाय के चुस्की ले के चाचा
चर्चा करत चउपाल बा
नोंके-झोंक के लड़इया बड़ा नीक लागे ला।
हमरा शहरी से गंइयाँ बड़ा नीक.......।।
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| सुरहा ताल |
जनपद बलिया में सरनाम ताल है – सुरहा ताल, बनारस की धरती पर आबाद है – औंधी ताल और योगी गोरखनाथ के नाम पर बसे शहर गोरखपुर की शान-शौकत है – रामगढ़ ताल। तो फिर काहें न हम याद कर लें – बस्ती जनपद का ताल? नाम भी खूब है – चन्दो ताल, जिसे देहाती कंठ चंदू ताल भी पुकारता है। सौ-चार सौ मीटर नहीं, लगभग-लगभग पांच किलोमीटर की लंबाई और नाहीं-नूहाँ चार किलोमीटर की चौड़ाई में लहरता-सिहरता है – यह ताल। कभी किसी भूले-बिसरे युग में यहां चन्द्रनगर बसा करता था। खुदाई हुई, अवशेष हाथ लगे, प्रमाण खुल गया। यहाँ यकीनन एक विकसित नगर रहा होगा। हंडा, बटुला, थारा, चौखट, पत्थर की बनी राहें, क्या नहीं मिली यहाँ? किंतु हाय रे समय! तू किसी को नहीं बख्शता, कोई तुम्हारे पहिए के नीचे पिसने से बच नहीं पाया। शिखरों को जमींदोज करता है तू। कोलाहल सन्नाटों की बलि चढ़ जाते हैं। किसी भी की पहचान स्थायी नहीं। सब एक न एक दिन वक्त की परतों के नीचे विस्मृति की भेंट चढ़ जाते हैं। इस पहेलीमय ताल को ले कर एक मान्यता यह भी है कि यहाँ थारू नामक घूमंतू जाति की बसाहट थी। नेपाल के तराई इलाके से पांव-पांव चल कर थारू जनजाति के लोगबाग आज भी आते हैं यहाँ। इनके ढब-ढांचे में मंगोलियन आदतें कूट-कूटकर भरी हैं। गीत-गवनई, बाजा-बांसुरी से भरा पड़ा है – इनका जीवन। बिरहा, झूमर, रोपनी-कटनी, सोहर, बियाह, बसंता, चइता, बारहमासा, पचरा सब भांति के गीत टेरते हैं। जब मौसम की उमंग में इनके गीत परवान चढ़ते हैं – तो समझो कायनात से अबूझ दुख की बारिश शुरू हो रहती है।
बिहार का सरनाम जिला – चंपारन, पच्चासों निचली जातियों की बेतरतीब बसाहट से जीवनमय अंचल। थारू जनजाति की सभ्यता इस धरती को भी ढके हुए है। था कभी कोई समय – जब ये अपनी बोली में नाराज होते थे। अपनी अनगढ़ जुबान में कच्चे-पक्के गीत गाते थे, अपनी भाषा में इंकार रोते थे। वह इनके रोम-रोम की जुबान थी, इनके सपाट हृदय की निर्भय पुकार थी, इनके अलक्षित अनगढ़ व्यक्तित्व को स्वर देने वाली भाषा थी। मगर अब इनकी जुबान ने भोजपुरी, मैथिली और निवारी बोल कर काम चला लेना सीख लिया है। कोई पूछे कि खांटी – अभाव, गरीबी, अशिक्षा, जहालत और बेहाली के बीचोंबीच जीने का बल कहाँ से आता है? हंसी-ठिठोली से? ना जी। किस्सा बुझौवल से? ना, ना। ताश-पत्ता खेलले से? कैसी बात करते हो? फिर क्या नाच-गान में मन लगाने से? हाँ, यह बात हुई न! मगर नाच-गाना भी कब तक साथ देगा? ये थारू न! गजब जीवट आदमी हैं – एक-दूसरे की चिंता कर खुद को मजबूत बनाते हैं। इनके दो कंधे आपस में मिल कर लोहा बन जाते हैं। इनके निपट अकेलेपन ने एक-दूसरे के मौन को बूझ लेना सिखा दिया है। ये गीत को गीत जैसा कहाँ गा पाते हैं? पांत-पांत में गरम-गरम दुख झरता है, मानो रोज-रोज की रिसती पीड़ा ने शब्दों को आँसुओं की बूँदें बना लिया हो।
अइसन करमवा लिखि देला रे,
लिखि देला विपति हमार।
घाम के घमाईल गइलीं, बिरिछ तर रे,
से हो बिरिछा भइले पतझार।
घाम के घमाइल गइली जमुना दह रे
से जमुना भइली बलुआ – रेत।
पेट के जरल भीख मांगे गइली रे,
से हो भीख भइली रे अलोप।।
सम्पर्क
मोबाइल : 9077646022





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