शेखर सिंह की कविताएँ
![]() |
| शेखर सिंह |
पतंगों की अपनी एक प्यारी दुनिया हुआ करती है। अबोध बच्चों से ले कर बुजुर्गों तक में पतंगों के प्रति दीवानगी देखी जा सकती है। स्वाभाविक रूप से ये पतंगें कविताओं में भी आती हैं और कविता के आकाश को बहुरंगी बना देती हैं। पतंगों भरी आसमान यह तस्दीक करती है कि जिन्दगी हस्बेमामूल चल रही है। लेकिन पतंगों के लिए भी खतरे कम नहीं होते। पतंगें कट जाती हैं। कहीं फंस या उलझ कर चिथड़े चिथड़े हो जाती हैं लेकिन पतंग उड़ाने का उत्साह धीमा नहीं पड़ता। युवा कवि शेखर सिंह के अन्दर भी लटाई थामे पतंग उड़ाता उत्साह से भरा वह बच्चा है जो उम्मीदों से भरा हुआ है। और जब तक ये उम्मीदें हैं तब तक यह दुनिया सुरक्षित है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शेखर सिंह की कविताएँ।
शेखर सिंह की कविताएँ
अन्यथा ले सकते हैं
कुछ दिनों से मैं
निहायत ईर्ष्यालु होता जा रहा हूँ
ईर्ष्या करने लगा हूँ
मोहल्ले की घरेलू महिलाओं से
जिनकी चर्चा में बना रहता है इन दिनों
पड़ोस का एक लड़का जो शादी नहीं करना चाहता
शादी और उम्र कैद में फ़र्क़ नहीं होता जिसकी राय में
जिसे कल शाम एक लड़की के साथ देखा गया
एक साथ हंसते हुए खुले आसमान तले
ईर्ष्या करने लगा हूँ
उन महिलाओं से भी जो शादियों में
मनोरम सुर के साथ गालियां गाती हैं
इतने सुरीले अंदाज़ में
कि उन पलों में अपशब्द अपशब्द नहीं होते
नारी शक्ति का विजय गीत हो जाते हैं
मैं ईर्ष्या करने लगा हूँ
नुक्कड़ पर हर शाम जमा होने वाले बूढ़े सज्जनों से
पतोह से सेवा नहीं मिलने के दर्द पर जिनके
अफ़साने नहीं लिखे जा रहे हैं
जिनमें से कुछ का दर्द है
बेटे की शादी में चार लाख रुपए दहेज और
शगुन में रखवाए जा सकते थे
उन प्रोफ़ेसर्स से तो ख़ास तौर से जलता हूँ मैं
दो लाख पचास हज़ार रुपए की पगार पर
जिनके जीवन की अजब त्रासदी है
कि विभाग के एच ओ डी और फिर डीन न बन सके,
कोई शुक्ला द्विवेदी या पांड़े जी
सर झुकाए पड़ाम करते चले गए
वाईस चांसलर हो गए
अपने दौर के तमाम कामयाब लोगों के बीच
जलन की आग में जलते हुए मुझे
एक लंबा अरसा हो चुका है
मैं ख़ालिस तौर पर निठल्ला हो चला हूँ
मन के दहकते शोलों को बुझाने के लिए
मैं घूमता रहता हूँ दर ब दर बे मौसम बे वक़्त
कविताएं पढ़ता हुआ
गाना गुनगुनाता हुआ
सिगार जलाता हुआ
किसी ख़ूबसूरती को ठहर कर
एक पल में सौ बार जी लेता हुआ।
(अप्रैल 2026)
अलविदा की रस्म
मेरे समय के वैज्ञानिक
पृथ्वी के भविष्य से निराश हैं
अनुमान है एक दिन सूरज की लपटें
सब कुछ को गले लगा लेंगी,
गुरुत्वाकर्षण बल की नियमावली
गले मिलन की इस आख़री रस्म में
हमारी मौजूदगी के
सख़्त ख़िलाफ़ होगी,
इसलिए चांद या मंगल ग्रह पर
नगर बसाने के बंदोबस्त में मसरूफ़ हैं
मेरे समय के वैज्ञानिक
कुछ लाख साल बाद जब कभी
हम विदा लें पृथ्वी से
मेरी मौजूदगी ये उम्मीद करेगी
हम बचा कर रख ले जाएं साथ
थोड़ी सी एकता थोड़ा लिहाज़,
किसी तरह मांग लें माफ़ी
जीव जंतुओं की उन नस्लों से
जिनकी मौजूदगी हमें इतनी अच्छी लगती रही
कि उन्हें लोहे के डिब्बों में
हम चैन की नींद सुलाते चले गए
ताली बजाने पर जब नहीं दिखी कोई हरकत
हम मनोरंजित हुए
किसी तरह ठहर जाएं कुछ देर
उनकी कब्रगाहों पर
जिन्होंने पृथ्वी को बचाने की कोशिशों में
आख़री दम तक समझौते नहीं किये
जिनके जाने पर विदा के गीत नहीं गाए गए
जिनकी मौजूदगी किसी का उत्सव न बन सकी
किसी तरह ज़रूर
शुक्रिया का एहसास करा चलें
तालाबों नदियों और आसमान के अनेक रंगों का
जिन्होंने हमें मुश्किलों में जीना
और प्यार में मरना सिखाया,
जिनके गाढ़ेपन में ये जानते हुए भी
कि कभी सच नहीं होते सुहाने मौसम के सपने
न सिर्फ़ हमने सपने देखना चुना
हमने ऐतबार किया
वैज्ञानिकता में जज़्बात के लिए
कोई जगह नहीं होती लेकिन
मेरी मौजूदगी को पूरा भरोसा है
विदा के समय किसी तरह तो ज़रूर
धरती को ये एहसास करा चलेंगे
कि हम बतौर मनुष्य
यहां के सब कुछ से बेहद लगाव रखते हैं
यहां के सब कुछ को हमने हमेशा चाहा
यादों में हमेशा चाहते रहेंगे।
(अप्रैल, 2026)
सपने और असल के दरमियान
मेरी नींद में
अघोषित आपातकाल के तेज़ हूटर बजते हैं
बंद पलकों पर तीखी चमक के साथ
आँखें खुलती हैं
आग का एक विशाल गोला
सूरज का मुखौटा पहने
हरियाली जलाने को आतुर
दीवारें और किवाड़ जलाने को व्याकुल
आसमान में दहकता रहता है
मौसम के जानकारों की राय में
आग का गोला एक देवता है
जिसकी आस्था पर शक करना
दैवीय धाराओं में दण्डनीय अपराध है
मेरा सवेरा
जिसमे बचपन की बेफ़िक्री
बूढ़े आम के पेड़ से
आज भी झूला झूलती है,
अरसे पुराने सवेरे को
बाइज़्ज़त लौटा देने की मेरी अर्ज़ी
सुदूर भविष्य के मेरे बुढ़ापे में
कहीं खो गई है।
(अप्रैल, 2026)
तुम्हारे लिए
तुम्हारे लिए मेरा प्यार
आसमान में लापता उस पतंग की तरह है
जिसके किसी शाख़ में फंस कर
चीथड़े हो जाना तय था
ये और बात है
कि हवा के जाने पहचाने झोंके
उसे मीलों दूर उड़ाते चले गए
जब किसी उदास शाम की बेमुरव्वत चुप में
आसमान की तरफ़ देखता हूँ
मन का बालक जबरन हाथ बढ़ाता है
कि शायद पा ही जाए
कटी पतंग की छूटी हुई डोर कहीं
कि शायद लौट आएं पुराने दिन
जब सारा आकाश हमारी शरारतों का शहीद था
जब रात के तारे कभी न थमने वाली बातों के उजाले थे
जो भोर तक नज़र आते थे
मैं मन के बालक के हाथ थामता हूँ
आहिस्ता समेट लेता हूँ
उसे बताने का हौसला नहीं जुटा पाता
पतंगे उड़ती चली जाती हुई भी
प्यारी लगती हैं।
(अप्रैल, 2026)
पतंगों की दुनिया
किसी दिन सारी पतंगें कहीं दूर उड़ जाएंगी
गहरे पीले रंग की
गाढ़े लाल रंग वाली
हरी या फिर नीली
और वो वाली भी
पिन्टू की गुमती में जिस रंग की
अकेली बची थी,
जिसके लिए छोटू और गोलू ने
आपस में मार कर लिया था
मनोहर चचा ने जिनके गृह युद्ध में
समझौता कराया था
और अमजद बाबा ने कंचे थमा कर मन बहलाया था
दूर उड़ जाएंगी किसी दिन
ये सारी पतंगें
किसी ऐसी जगह
जहाँ कोई न होगा उन्हें उड़ाने वाला
कोई न होगा झगड़ने वाला
किसी ख़ास रंग की पतंग के लिए,
लूटने को दौड़ेगा नहीं
भरी दुपहरी में कोई पगला
रंग बिरंगी पतंगों की
अपनी दुनिया होगी कहीं
लेकिन पिन्टू, छोटू और गोलू की दुनिया में नहीं होंगी,
न उस पगला की दुनिया में
जो दुपहरी में गलियां छानता था नंगे पैर
पतंगें लूटने के लिए।
(मई 2026)
मुस्करा के कह देते हो
(दिवंगत दोस्त, संजीदा इन्सान और एक शानदार योद्धा, अविनाश पांडे की यादों के नाम, जिसने हालात से आखरी हद तक जंग जारी रखी।)
बचपन की किताबों ने कहा
झूठ बोलना पाप है
कमोबेश यही कहा दूसरी किताबों ने भी
अपनी अपनी तरह से
संवैधानिक धाराओं ने कहा
दण्डनीय है झूठ बोलना
कमोबेश यही कहा नदियों की धाराओं ने भी
अपनी अपनी तरह से
लगभग उन सभी चीज़ों ने
झूठ बोलने से मना किया
जिसने हमें संवारा और बड़ा किया
लेकिन मेरे दोस्त,
मैं पूछता हूं आज भी
क्या हाल चाल है
मुस्करा के कह देते हो
सब कुछ बहुत अच्छा है।
जुलाई, 2024
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
सम्पर्क
मोबाइल : 8765000678



टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें