भगवानदास मोरवाल का उपन्यास अंश ‘सैय्यद इब्राहीम का ब्रज गमन’
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| भगवान दास मोरवाल |
‘मानुष हौं तो’ वर्तमान कथा साहित्य के सर्वाधिक सक्रिय और अपने नए-नए विषयों के लिए जाने जाने वाले कथाकार भगवान दास मोरवाल का तेरहवाँ उपन्यास है, जो शीघ्र ही वाणी प्रकाशन से प्रकाशित होने जा रहा है। विदित है कि हाल में वाणी प्रकाशन से ही उनका बारहवाँ उपन्यास ‘दण्ड प्रहार’ (2025) प्रकाशित हुआ है। उनकी लेखकीय रचनात्मक को ध्यान में रखते हुए, हाल में इलाहाबाद की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘संचेतना’ द्वारा, प्रति वर्ष किसी रचनाकार को उसके समग्र साहित्यिक योगदान के लिए दिया जानेवाला वर्ष 2026 का ‘राजमणि देवी स्मृति साहित्य सम्मान’ 2026 उन्हें देने की घोषणा की गई है।
अतीत को उसके उसी रूप में संचित करने की परम्परा सामान्य तौर पर इतिहास में प्रचलित रही है। लेकिन हमारे यहाँ उस तरह का बोध न होने की वजह से अतीत की घटनाओं या व्यक्तित्व के बारे में सुनिश्चित जानकारी नहीं मिल पाती। यही वजह है कि कबीर, सूर, तुलसी की जन्म तिथि और स्थान के बारे में आज भी एकमत नहीं है। ऐसी ही स्थिति रसखान के साथ रही है। बल्कि रसखान के बारे में संदर्भों का कहीं ज्यादा ही अकाल है। रसखान हिंदी साहित्य के भक्तिकाल काव्य धारा के प्रमुख कवि माने जाते हैं। उन्होंने न तो किसी संप्रदाय से बँध कर कृष्ण भक्ति की और न किसी उद्देश्य से प्रेरित काव्य रचना की। उनके काव्य में कृष्ण के रूप में राधा और कृष्ण की प्रेम लीला और ब्रज महिमा का मनमोहक वर्णन है। 'दो सौ भागवत वैष्णव की बातचीत' और 'मूल गोसाईं चरित' के आधार पर माना जाता है कि उनका जन्म सन 1548 में हुआ था। उनका मूल नाम 'सैयद इब्राहिम' था। वे 'पिहानी' उत्तर में पैदा हुए थे। कृष्णभक्ति से प्रभावित रसखान ने 'गोस्वामी विठ्ठलनाथ' से दीक्षा ली और ब्रजभूमि (वृंदावन) में व्यापारी बस गए। इसके बाद उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन श्रीकृष्ण के नाम, रूप, लीला और गान-ध्यान में लगा दिया। 'सुजान रसखान' रसखान की कीर्ति का प्रतिष्ठित आधार है। अभी तक मेरे संज्ञान में रसखान के ऊपर कोई भी उपन्यास हिन्दी साहित्य में नहीं है। इसका कारण सन्दर्भों की कमी हो सकता है। भगवानदास मोरवाल ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए ‘मानुष हौं तो’ नाम से उपन्यास लिख रहे हैं। इस लेखन में उनकी शोध वृत्ति स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। उपन्यास लेखन में उन्होंने कल्पना की उड़ान भी भरी है लेकिन वह कुछ इस तरह की कल्पना है जो यथार्थपरक लगने लगता है। ब्रज भाषा के मनोरम प्रयोग ने इस उपन्यास को एक विश्वसनीयता प्रदान की है। इस उपन्यास के अंश पूर्व में कुछ वेबसाइट पर प्रकाशित हो चुके हैं। मोरवाल जी ने इस उपन्यास का एक बड़ा अंश पहली बार के लिए उपलब्ध कराया है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं भगवानदास मोरवाल का उपन्यास अंश ‘सैय्यद इब्राहीम का ब्रज गमन’।
उपन्यास अंश
‘सैय्यद इब्राहीम का ब्रज गमन
भगवानदास मोरवाल
पहले लगभग दस वर्षों तक सूरवंश की अन्तर्कलह। उसके बाद हुमायूँ की आकस्मिक मृत्यु। हुमायूँ की मृत्यु के एक साल बाद हेमू अर्थात हेमचन्द्र विक्रमादित्य की बैरम ख़ानख़ानाँ के हाथों पराजय के साथ सूरवंशीय साम्राज्य का अन्त। इसके बाद अकबर द्वारा दिल्ली की सत्ता सँभालना। भारतीय उपमहाद्वीप में पहले लगभग तेरह साल राजनीतिक उथल-पुथल, और उसके बाद मुग़लों के फिर से हिन्दुस्तान आने के बावजूद राजनीतिक घमासान में कोई कमी नहीं आयी। इसकी वजह से सैयद इब्राहीम को अब दिल्ली से विरक्ति और वितृष्णा होने लगी। लेकिन उसकी इस वितृष्णा और विरक्ति में जिन दो घटनाओं का सबसे अधिक योगदान रहा, उनमें एक मानवती द्वारा उसके प्रेम को ठुकराना और दूसरा, हुमायूँ द्वारा दिल्ली सत्ता सँभालते ही भयंकर अकाल पड़ना रहा। इस अकाल ने दिल्ली ही नहीं दूर तक के इलाक़ों को अपनी चपेट में ले लिया। इब्राहीम जब भी कोटला क़िला के निकट बसे फ़िरोज़ाबाद से बाहर आता, तो जगह-जगह रास्तों में सड़ती लाशों के बीच साँस लेना मुश्किल हो जाता। मुँह पर गमछे का ढाठा लगा वह यमुना की तरफ़ जाता तो उसमें बहती लाशों, किनारे पर जगह-जगह मृत शवों के अम्बारों की जलती चिताओं और दफ़नाये जाने वाले दृश्यों को देख कलेजा मुँह को आ जाता। ऐसा लगता मानो पूरी दिल्ली किसी श्मशान में बदल गयी है। जहाँ तक उसकी नज़र जाती, छितरी हुई लाशें-ही-लाशें दिखाई देतीं। दिन में आता तो कहीं चील, कव्वों और गिद्धों के झुण्डों द्वारा बदबू मारती लाशें को नुचते हुए; तो कहीं आवारा कुत्तों के बीच आपस में लाशों को खींचने-झपटने के दृश्य नज़र आते। जबकि शाम का झुटपुटा शुरू होते ही यमुना के खादर में उगे झाड़-झंकाड़ों से निकल कर बाहर आये सियारों की कर्कश हुआँ-हुआँ सुनाई देती।
इस सबका युवा इब्राहीम के मन पर बहुत गहरा असर पड़ा। जब-जब रात में सोते हुए उसे दिल्ली में जगह-जगह पड़ी आवारा लाशों को चील, कव्वों, गिद्धों और आवारा कुत्तों के झुण्डों द्वारा नोंचने के डरावने व ख़ौफ़नाक सपने आते, तो वह घबरा कर जाग जाता। दिल्ली के प्रति तेज़ी से बढ़ती सैयद इब्राहीम खाँ की इस वितृष्णा को और अधिक इन ख़ौफ़नाक सपनों ने बढ़ा दिया। रात तो रात, अब दिन में भी उसकी आँखों के आगे ये दृश्य तैरने लगे।
जब इब्राहीम से नहीं रुका गया, तब एक दिन पहुँच गया क़ाज़ी साहब के पास।
इब्राहीम का उतरा चेहरा देख क़ाज़ी साहब ने मुस्कराते हुए पूछा, “बरख़ुरदार, कैसे सूरत पर मुर्दनगी छायी हुई है ?”
इब्राहीम ने कोई उत्तर नहीं दिया।
“क्या किसी की याद आ रही है?” क़ाज़ी साहब ने मुस्कराते हुए इस बार कोंचा।
“ऐसी कोई बात नहीं है दादा जान।”
“तो फिर चेहरा क्यों इस तरह बुझा हुआ है ?”
“दादा जान, एक बात कहूँ...” कहते-कहते रुक गया इब्राहीम।
“हाँ कहो!”
“मेरा अब दिल्ली में दिल नहीं लगता है। क्या हम अपने पिहानी नहीं चल सकते?”
“इब्राहीम, आपने मेरे मन की बात कह दी। मगर अभी ऐसे हालात नहीं हैं कि वहाँ जाया जाए। बेटे, जैसे ही हालात सुधरेंगे हम वापस पिहानी लौट जाएँगे। अल्लाह ने चाहा तो ज़ल्दी ही हालात ठीक हो जाएँगे। सब्र से काम लो!” क़ाज़ी साहब ने इब्राहीम को एक मासूम-सा झूठा दिलासा देते हुए कहा।
“ठीक है दादा जान।”
क़ाज़ी साहब ने देखा कि जाते हुए इब्राहीम के चेहरे से उसके आश्वासन ने पूरी तो नहीं, उदासी की थोड़ी-सी रंगत बदल दी है।
जब-जब क़ाज़ी सैयद अब्दुल ग़फूर आते-जाते उदास इब्राहीम को देखते, वे बेचैन हो उठते। हालाँकि बीच-बीच में वे अपने भरोसेमन्द ख़िदमतगार से यह जानकारी भी लेते रहते, कि इब्राहीम अब भी मानवती से मिलने जाता है? और हर बार सुलेमान के मना करने के बावजूद, न जाने क्यों उन्हें अपने भीतर कुछ चटकता हुआ-सा लगता है।
1354 में फ़िरोज़ शाह तुग़लक द्वारा बनवायी गयी और उस समय की सबसे पुरानी व बड़ी संरचनाओं में से एक, कोटला क़िले की जामी मस्जिद से क़ाज़ी सैयद अब्दुल ग़फूर जुमे की नमाज़ अदा कर बाहर निकले। मस्जिद के बाहर पड़ी अपनी जूतियों को वे पहन कर हटे ही थे, कि देखा मस्जिद के भीतर से सुलेमान भी चला आ रहा है। सामने पड़ते ही सुलेमान ने अस्सला वालैकुम कहा और अपनी जूतियाँ पहनने लगा। जब तक सुलेमान जूतियाँ पहनता, क़ाज़ी साहब मस्जिद की सीढ़ियाँ उतर उसका इन्तज़ार करने लगा।
घर पहुँचने तक दोनों के बीच औपचारिक बातें होती रहीं। लेकिन इससे पहले क़ाज़ी साहब को उनकी बैठक के सामने छोड़ सुलेमान आगे बढ़ता, क़ाज़ी साहब उसे टोकते बोले, “कहाँ जा रहे हो सल्लू मियाँ? घड़ी-दो घड़ी कभी हमारे पास भी बैठ जाया करो!”
सुलेमान जाते-जाते रुक गया और क़ाज़ी साहब के पीछे-पीछे उनकी बैठक में आ गया। बैठक में बिछे तख़्त पर बैठने के बाद क़ाज़ी साहब ने हाथ से इशारा करते हुए कहा, “सल्लू मियाँ, ताक़े से ज़रा पानदान उतारना!”
सुलेमान ने लपक कर ताक़े से चाँदी का ख़ूबसूरत पानदान उतारा, और उसे क़ाज़ी सैयद अब्दुल ग़फूर के सामने खोल कर खड़ा हो गया, “लीजिए क़ाज़ी साहब!”
क़ाज़ी साहब ने पानदान नहीं लिया बल्कि उसमें रखे पत्तों में से एक पत्ता उठाया। एक-एक कर उस पर कत्था, चूना, सुपारी, ज़र्दा तथा दूसरे मसाले डाल उसका बीड़ा बना कर कल्ले में दबा लिया। पानदान को वहीं रख सुलेमान ने तख़्त के सरहाने ज़मीन पर रखे थूकदान को आगे सरका दिया।
पान जब थोड़ा-सा मुँह में घुल गया, तो क़ाज़ी साहब ने पहले अपने पाँव ऊपर किये और फिर सुलेमान की ओर देखते हुए बोले, “सल्लू मियाँ, अब तो नहीं जाता है इब्राहीम उस मुहतरमा क्या नाम है उसका...?”
“मानवती”
“हाँ-हाँ वही!”
“जी अब नहीं जाते हैं।”
“पक्का?”
“इतनी ज़िल्लत झेलने के बाद तो कोई भला आदमी उस तरफ़ झाँकेगा भी नहीं क़ाज़ी साहब।”
“सल्लू मियाँ, बात जाने या उस तरफ़ झाँकने की नहीं है। बात दिल की है।”
“जिस तरह उसने हमारे साहबज़ादे की तौहीन की है न, उसके बाद मुझे नहीं लगता कि ये कभी वहाँ जाने के बारे में सोचेंगे। मैं तो उन्हें जब देखो कोई-न-कोई किताब पढ़ते हुए देखता हूँ। क़ाज़ी साहब, अपने इब्राहीम को वो किताब पढ़ कर, जिसके बारे में आप एक बार बता रहे थे, क्या पता उसे सँभलने का कोई रास्ता मिल गया। हो सकता है उसका कुछ असर हो गया हो?”
“हो सकता है। बल्कि एक दिन उसके वालिद गँन्ने मियाँ भी बड़े दु:खी मन से बता रहे थे, कि इब्राहीम किसी साहूकार के बेटे के पास कुछ इल्म लेने के लिये जाने लगा है। मैंने ही गँन्ने मियाँ को समझाया कि जवान औलाद है। इल्म ही तो है, लेने दो जो ले रहा है। ज़्यादा ज़ोर-ज़बरदस्ती ठीक नहीं।”
“एक बात कहूँ क़ाज़ी साहब, यह सब उस मानवती के कहे का असर है। क्योंकि उसी ने इब्राहीम से कहा था कि जितना तुम मुझे चाहते हो, उतना अगर उसे चाहते जिसे लाखों गोपियाँ चाहती हैं, तो तुम सचमुच पागल हो जाओगे!” फिर एक पल चुप रहने के बाद सुलेमान जिज्ञासा प्रकट करते हुए बोला, “ये गोपियाँ कौन होती हैं?”
“गोपियाँ किरशन की भक्त थीं। दरअसल, ये वृन्दावन में रहने वाली ग्वालिनें थीं और गायें चराती थीं। ये गोपियाँ किरशन के साथ हँसना-खेलना, जिसे रास कहा जाता है, रचती थीं। इन्हीं में राधा नाम की गोपिका भी थी, जिसे किरशन की ख़ास सहेली माना जाता है। सल्लू मियाँ, लगता है हमारा इब्राहीम उस मुहतरमा की बात कुछ ज़्यादा ही दिल पर ले बैठा। इसीलिए उस साहूकार के बेटे के पास यह मालूम करने के लिये जाता है, कि यह किरशन कौन है जिसके पीछे ये गोपियाँ पड़ी रहती थीं।”
“हो सकता है। मगर मैं इस बात का आपको पक्का यक़ीन दिलाता हूँ कि इब्राहीम मियाँ अब नहीं जाते हैं चन्द्रावल।”
“चलिए, मुझे आज पक्का यक़ीन हो गया कि उसने मानवती को अपने दिल से निकाल दिया होगा!” इतना कह क़ाज़ी सैयद अब्दुल ग़फूर ने आख़िरी थूक का गोला थूकदान के हवाले किया, और कमर सीधी करने की ग़रज़ से तख़्त पर लेट गया।
सुलेमान के लिये इतना ही इशारा काफ़ी था और क़ाज़ी साहब की बैठक से उठ कर चला आया।
अभी कुछ ही महीने बीते थे कि क़ाज़ी सैयद अब्दुल ग़फूर ख़ान ने इस बार जो ख़बर सुनी, उसे सुन जैसे उनके पूरे जिस्म का ख़ून निचुड़ गया। अपने कानों पर उन्हें विश्वास नहीं हुआ। मानवती का मामला तो फिर भी समझ में आता है लेकिन इस बार इब्राहीम ने, वह भी इस उम्र में यह क्या कर डाला, उसकी कल्पना-भर से उनका रोआँ-रोआँ सिहर उठा? वे यही सोच-सोच कर बेचैन हो उठे, कि जब इब्राहीम के इस कृत्य का फ़िरोज़ाबाद के लोगों को पता चलेगा, उसे सुन कर लोग क्या कहेंगे? क़ाज़ी साहब को उठते-बैठते चैन नहीं। बस, चौबीस घण्टे वे इसी के बारे में सोच-सोच कर घुलने लगे। अब तो अपने ख़िदमतगार सुलेमान से उनकी कुछ कहने या सुनने की हिम्मत नहीं हो रही है।
बावजूद इसके एक बार फिर क़ाज़ी साहब ने अपने सबसे विश्वसनीय ख़िदमतगार के पास बुलवा भिजवाया। बुलावा मिलते ही ख़िदमतगार समझ गया कि क़ाज़ी साहब को उसके कहे पर रत्ती भर भी यक़ीन नहीं है। वह रह-रह कर सोचने लगा कि आख़िर वह क़ाज़ी साहब को कैसे यक़ीन दिलाये? कुछ समझ में नहीं आ रहा है उसके। मगर जाना तो पड़ेगा। यही सोच कर ख़िदमतगार क़ाज़ी साहब की तरफ़ चल दिया।
जिस समय ख़िदमतगार क़ाज़ी साहब के पास पहुँचा, उसने देखा वे इधर-से-उधर छोटे-छोटे क़दमों के साथ बड़ी बेचैनी के साथ चहल-क़दमी कर रहे हैं।
“आओ सल्लू मियाँ!” सुलेमान के पदचापों को सुन क़ाज़ी सैयद अब्दुल ग़फूर बोले।
“आपने याद फ़रमाया क़ाज़ी साहब?” आते ही सुलेमान ने पूछा।
“याद क्या फ़रमाना... वक़्त नहीं कट रहा था इसलिए आपको याद कर लिया।
सुलेमान के आने के बाद भी क़ाज़ी साहब इधर-से-उधर टहलते रहे।
“तबियत तो आपकी ठीक है न?”
“उसे क्या होगा मियाँ।”
“तो फिर इस तरह कैसे अकेले में चहल-क़दमी कर रहे हैं?”
इतना सुन क़ाज़ी साहब सुलेमान की तरफ़ मुड़े और बेहद दु:खी मन से बोले, “सल्लू मियाँ, सोच रहा हूँ कि अपने पिहानी लौट जाऊँ। मियाँ, जब से इस दिल्ली में आये हैं, एक दिन चैन से नहीं गुज़रा है। रोज़-रोज़ की जंगों से आजिज़ आ गये हैं। न दिन को चैन, न रात को आराम।”
“यह बात तो है क़ाज़ी साहब। अब तो पिहानी ने भी ख़ूब तरक़्क़ी कर ली होगी। वो मस्जिद भी पूरी हो गयी होगी, जिसका नाम हज़रत जहाँबानी हुमायूँ ने रखा था।”
“आप सही कह रहे हैं दमिश्क-ए-अवध पूरी तरह बन चुकी है... और इब्राहीम का भी अब दिल्ली से मन उचटने लगा है। एक दिन तो उसने कह भी दिया था कि दादा जान, मेरा अब इस दिल्ली में दिल नहीं लगता है।”
“इब्राहीम का मन ना लगने की दूसरी वजह भी हो सकती है क़ाज़ी साहब।”
“मैं आपकी बात समझता हूँ सल्लू मियाँ। मगर सिर्फ़ वही एक वजह नहीं है। सच कहूँ तो पहले मुग़लों और सूरों की जंग और उसके बाद दिल्ली में अकाल के दौरान भुखमरी के चलते जगह-जगह घरों और सड़कों पर पड़ी लाशों को नोंचते गिद्धों को देख कर, कई बार तो मेरी भी रूह काँप-काँप जाती थी। इब्राहीम तो फिर भी हमारे सामने बच्चा है...। हमें तो कन्नौज से ले कर दिल्ली आने और उसके बाद भी इन जंगों को देखने की आदत पड़ चुकी है...। ऊपर से इब्राहीम का नया कारनामा।” फिर एक लम्बी साँस लेते हुए क़ाज़ी साहब बोले, “मुझे तो अब भी आपकी बात पर यक़ीन नहीं हो रहा है कि यह ऐसा ज़िनाह कर सकता है!”
“क़ाज़ी साहब, आप भले ही यक़ीन मत करिए पर जो बात है, वो तो है। चलो, इसको भी देख लिया जाए, पर उस रुसवाई का क्या किया जाए जो पूरे सलीमगढ़ में फ़ैली हुई है। जो भी सुन रहा है, वही थू-थू कर रहा है। मगर अपने साहबज़ादे बदी से बाज़ नहीं आ रहे हैं।”
“वैसे आपको पूरा यक़ीन है न सल्लू मियाँ कि यह उसी साहूकार का लड़का है?”
“क़ाज़ी साहब, एकदम सही कह रहा हूँ...वह अमीरचन्द साहूकार का ही बेटा है।”
सुलेमान ने एक बार फिर जिस तरह पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी बात दोहरायी, उसे सुन इस बार यह कहते हुए अपना सर पकड़ लिया, “या मेरे मौला, यह किस गर्त में जा रहा है! आख़िर इस नालायक ने उस साहूकार के बेटे में ऐसा क्या देख लिया, जो उसके इश्क़ में फँस गया ?”
“ऐसा तो नहीं है क़ाज़ी साहब कि उस साहूकार के बेटे में इब्राहीम को किरशन की तरह अपनी राधा दिखाई देती हो ?”
“यह आप किस बिना पर कह रहे हैं सल्लू मियाँ?” क़ाज़ी साहब ने हैरानी के साथ पूछा।
“वह इसलिए कि साहूकार का बेटा बेहद ख़ूबसूरत और कमसिन है।”
“आप यह सब इतने भरोसे के साथ कैसे कह रहे हो?”
“क़ाज़ी साहब, मैंने ख़ुद उसे अपने इब्राहीम के साथ देखा है। आप भी कभी उसे देखोगे तो देखते रह जाओगे, कि वल्लाह क्या ख़ूबसूरत लौंडा बनाया है। इसे तो किसी शहज़ादी के रूप में पैदा होना चाहिए था।”
“तो क्या वह अपने इब्राहीम से भी ज़्यादा ख़ूबसूरत है?”
“इसीलिए तो इब्राहीम का उसी में मन लगा रहता है। एक बात कहूँ क़ाज़ी साहब, इल्म तो एक बहाना है, असल में यह दूसरे चक्कर में उसके पास जाता है। हर वक़्त उसके पीछे-पीछे फिरता रहता है...। आठों पहर उसी की ग़ुलामी करता रहता है...।” फिर कुछ पल के लिये ख़ामोशी ओढ़ते हुए सुलेमान बोला, “क़ाज़ी साहब, मुझे तो यहाँ तक पता चला है कि अपना इब्राहीम आठों पहर उस साहूकार के बेटे में इस क़दर डूबा रहता है, कि उसका जूठा तक खाने से परहेज़ नहीं करता है।”
“ला हौल वा ला कुव्वत इल्ला बी अल्लाह!”
अन्तिम जानकारी को सुन क़ाज़ी सैयद अब्दुल ग़फूर का मानो सर घूम गया। उन्हें उबकाई आने लगी। क़ाज़ी साहब ने इसकी कल्पना नहीं की थी कि बात इतनी बढ़ चुकी है। आसक्ति अपनी जगह है लेकिन इतनी दीवानगी कि इब्राहीम उस साहूकार के बेटे का जूठन तक खाने लगे।
“क़ाज़ी साहब, सलीमगढ़ की गलियों में आजकल इन दोनों के बड़े चर्चे हैं। बल्कि मैंने कुछ पठानों को अपने इब्राहीम की मलामत और मज़म्मत करते हुए तक सुना है। मगर इस पर कोई असर ही नहीं होता है।”
“सल्लू मियाँ, ऐसे कामों में रुसवाई और मज़म्मत नहीं होगी तो क्या क़सीदे पढ़े जाएँगे। क्या किया जाए? एक काम न करूँ, क्यों न मैं उस साहूकार से मिल कर उसे सारी बात बता दूँ कि उसका बेटा किस रास्ते पर चल रहा है।”
“मेरा मानना है कि उस साहूकार के पास उसके बेटे की शिकायत करने से अच्छा है, आप अपने इब्राहीम को समझाओ। यह समझ गया तो साहूकार का बेटा अपने आप रुक जाएगा।”
“आपकी यह सलाह अच्छी है सल्लू मियाँ। दूसरों के बजाय क्यों न पहले हम अपने बच्चे को समझाएँ। आपका बहुत शुक्रिया इस नेक सलाह के लिये।”
“शुक्रिया क़ाज़ी साहब। अभी तो कुछ नहीं बिगड़ा है।” इतना कह कर ख़िदमतगार सुलेमान क़ाज़ी सैयद अब्दुल ग़फूर ख़ान के पास से चला आया।
अस्र के समय उस दिन अमीरचन्द साहूकार के बेटे से मिल कर इब्राहीम सलीमगढ़ से निकल कोटला क़िले की ओर बढ़ा ही था, कि एक नुक्कड़ पर चार जनों को आपस में बतियाते देख, उसने यूँ ही अपने कान के परदे इस बातचीत को सुनने की ग़रज़ से ढीले छोड़ दिये।
“...बात तो एकदम सही कही है भैया, कि आदमी को प्रभु में चित्त लगाया जाए तो ऐसा लगाया जाए जैसा वा पठान के लड़के ने साहूकार के बेटे से लगाया हुआ!” एक कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए उनमें से एक ने कहा।
इन शब्दों को सुन इब्राहीम थोड़ा चौंकन्ना हो गया। वह धीरे-से उनके इतने समीप आ गया, जहाँ से उनकी बातें साफ़ सुनाई दे जाएँ।
“कौन है यह पठान का लड़का? आपने कभी उसे देखा है?” इब्राहीम अनजान बन उनकी बातों में शामिल होते हुए बोला।
“देखा तो नहीं है, पर पूरे सलीमगढ़ में उसकी बड़ी चर्चा है कि उसने एक साहूकार के बेटे से ऐसा दिल लगाया हुआ है, कि आठों पहर उसमें ऐसा डूबा रहता है कि इतना तो कोई अपने भगवान श्रीकृष्ण में भी नहीं डूबा रहता।” दूसरे ने चहकते हुए कहा।
“...और तो और वह उसका जूठा तक खाता है। इतना तो कोई अपनी माशूका से भी दिल नहीं लगाता है, जितना उस पठान के लड़के ने साहूकार के बेटे से लगाया हुआ है।” पहला जना जब यह सब कह रहा था, इब्राहीम ने देखा उसकी आँखों में एक अजीब-सी जुगुप्सा झाँक रही थी।
“मगर तुम लोग यह सब क्यों कह रहे हो?” इब्राहीम ने उत्सुकतावश पूछा।
“ना कहें तो क्या करें? भला, एक मर्द की दूसरे मर्द से ऐसी आशिक़ी देखी है? कहीं ऐसा होता हुआ देखा है? सुना है, अब तो मियाँ लोगों में भी बड़ी ज़ात वाले मुसलमान उसकी बड़ी लानत-मलामत कर रहे हैं, पर वह है कि किसी की सुन ही नहीं रहा है...। जब देखो आठों पहर उसका चित्त उसी साहूकार के बेटे में लगा रहता है।” यह सब कहते हुए पहले वाले के होंठ वक्र होते चले गये।
“यह भी तो हो सकता है कि उसे अपने प्रभु का उसी में रूप दिखाई देता हो?”
इब्राहीम की बात सुन सारे जने ज़ोर-से हँस पड़े।
“देखिए, यह तो अपनी-अपनी भावना की बात है।” इतना कह दूसरे ने अपनी क़मीज़ की ऊपर वाली जेब से एक तस्वीर निकाली, और उसे इब्राहीम को दिखाते हुए बोला, “अब देखो, जैसे ये हमारे प्रभु श्रीनाथ हैं, वैसे ही कोई-न-कोई प्रभु उसका भी होगा?”
“दिखाना!” इसके बाद इब्राहीम ने वह तस्वीर ली और उसे निहारने लगा। कुछ पलों तक उसे निहारने के बाद बोला, “मगर यह मिलेगा कहाँ?”
“कहाँ मिलेगा! वैसे तो यह हमारे घट-घट में है। मगर सचमुच इससे मिलना है, तो इसके लिये महावन जाना पड़ेगा।”
“महावन! यह कौन-सा मुल्क है। कहाँ पड़ता है यह?” इब्राहीम ने ऐसे पूछा जैसे उसे उनके प्रभु श्रीनाथका पता मिल गया हो!
जिसने इसका नाम लिया था वह सोचने लगा कि इसे कैसे बताऊँ यह महावन कहाँ है? कुछ क्षण सोचने के बाद वह बताने लगा, “यह ब्रज के बारह पवित्र वनों में से एक है जो वहाँ का दूसरा सबसे बड़ा वन है। चार कोस की परकम्मा वाला एक विशाल और हरा-भरा वन है यह।”
“और क्या-क्या है वहाँ?” इब्राहीम की जिज्ञासा अब सर चढ़ कर बोलने लगी।
“यहाँ एक जगह है गोकुल। इसे ही महावन कहते हैं। यहीं हमारे इस प्रभु श्रीकृष्ण ने बचपन में अपनी दिव्य लीलाएँ रची थीं। इसी महावन में नन्द महाराज और यशोदा मैया का निवास था, जहाँ श्रीकृष्ण ने अपने बचपन के पहले साढ़े तीन बरस बिताये थे। आपको पता है गोकुल का मतलब गायों के रहने की जगह होती है। 'गो' यानी 'गाय' और 'कुल' मतलब 'रहने की जगह'।”
“भैया, सरल और सीधे अक्षरों में कहें तो गोकुल यानी एक ऐसा गाँव, जहाँ ग्वाले और उनकी गायें साथ-साथ रहती हों। पता है यहीं हमारे मोहन यानी कृष्ण जी बचपन में गोपियों के घरों से दही-मक्खन चुरा कर अपने दोस्तों और पेड़ों पर उछलते-कूदते वानरों को खिलाते थे। कृष्ण जी ने यहाँ ऐसी बाल लीलाएँ रची थीं कि लोगबाग उनके दर्शन को गोकुल में आते हैं।” एक जने ने महावन के बारे में बताते हुए कहा।
एक बार फिर से मोर्चा पहले जने ने सँभाल ली, “यहाँ का चौरासी खम्बा, जिसे नन्द भवन भी कहा जाता है, जुड़वें अर्जुन के पेड़ हैं जिन्हें कृष्ण जी ने तोड़ा था। यहीं माता यशोदा ने अपने नटखट पुत्र कृष्ण को ओखली से बाँधा था।”
जिस समय इब्राहीम महावन का महात्म्य सुन रहा था, ऐसा लग रहा था मानो वह सचमुच महावन के बीच खड़ा कृष्ण की लीलाओं को निरख रहा है।
“और दिल्ली से यहाँ जाने का रास्ता क्या है?” इब्राहीम ने पूछा।
“जिधर से यमुना बह कर जाती है।”
इब्राहीम सोचने लगा कि यमुना के किनारे तो वह रोज़ जाता है। इसका मतलब है कि जिधर यमुना जाती है यह महावन उधर ही पड़ता है।
“अच्छा इस तस्वीर को मैं ले सकता हूँ?”
“ले ले भाई। मैं तो अपने प्रभु की दूसरी तस्वीर ले लूँगा।” इतना कह जिसने अपनी जेब से श्रीकृष्ण की तस्वीर निकाल कर इब्राहीम को दिखायी थी, उसी ने उसे इब्राहीम को दे दिया।
तस्वीर ले कर इब्राहीम सलीमगढ़ से कोटला क़िला अर्थात फ़िरोज़ाबाद की ओर बढ़ गया।
जो बात अभी तक सलीमगढ़ तक सीमित थी, अब कोटला क़िले की दीवारों से होती हुई फ़िरोज़ाबाद के भीतर तक पहुँच गयी। इसकी भनक दोनों मियाँ-बीवी गँने खाँ और मिसरी देवी को भी लगी। सुनते ही मिसरी देवी तो ग़श खा गयी। गँने खाँ ने सर पकड़ लिया। एक बार गँने खाँ के मन में आया कि वह क़ाज़ी साहब से इस बारे में जा कर बात करे, किन्तु यह सोच कर नहीं गया कि वे तो पहले ही चेता चुके थे, कि इब्राहीम अब जवान हो गया है। आख़िर उनके पास वह अब किस मुँह से जाए? गँने खाँ के दिमाग़ ने जैसे काम करना बन्द कर दिया। हार कर वह यह सोच कर चुप्पी साध गया, कि एक बार बाप होने के नाते वह क्यों न अपने बेटे से बात कर ले।
इशा की नमाज़ के बाद जब घर के कुछ लोग सोने की तैयारी में होंगे और कुछ सो चुके होंगे, गँने खाँ ने बीवी से कह कर बेटे को बुलवाया। इब्राहीम चुपचाप माँ के साथ आया और चारपाई के पाँयते की ओर बैठ गया।
पिता होने के नाते शुरुआत गँने खाँ ने ही की।
“इब्राहीम, अब तो आपकी सारी तालीम हो चुकी है, इसलिए...”
“बेटा हम सोच रहे हैं कि क्यों न अब तेरा घर बसा दिया जाए?” मिसरी देवी पति का वाक्य बीच में लपकते हुए बोली।
इब्राहीम कुछ नहीं बोला। मिसरी देवी ने जैसे ही अपनी बात दोहराई, इब्राहीम चारपाई से उठ कर खड़ा हो गया और जाने के लिये। जैसे ही उसने क़दम बढ़ाया, गँने खाँ दबी ज़बान में डाँटते हुए बोला, “ बरख़ुरदार, कहाँ चल दिए? अपनी माँ की बात का जवाब दो!”
न जाने कैसे क़ाज़ी साहब को इसकी भनक लग गयी। इसलिए वे जामी मस्जिद से इशा की नमाज़ अदा कर, अपनी बैठक के बजाय गँने खाँ के घर की जानिब हो लिये। उन्होंने घर का दरवाज़ा या सोच कर धीरे-से थपथपाया कि सोने वालों, या सोने की तैयारी करने वालों के आराम में ख़लल ना पड़ जाए। कुछ ही देर में धीरे-से दरवाज़ा खुला। भीतर जैसे ही बरामदे में फ़ैले ढिबरी के उजाले में लिपटे सहमे-से साये को देखा, उनका अन्दाज़ा सही निकला। उजाले में लिपटा सहमा-सा साया कोई और नहीं, इब्राहीम ही था।
“आइए, बैठिए! अच्छा हुआ चचा जान जो आप भी आ गये।”
“क्या चल रहा है गँन्ने मियाँ?” चारपाई पर बैठते हुए क़ाज़ी साहब ने आसपास का मुआयना करते हुए पूछा।
“बड़े खाँ, चल क्या रहा है। हम दोनों इसे यही समझा रहे हैं कि बेटा, आपकी उम्र हो गयी है। क्यों न अब आपका घर बसा दिया जाए!” पति के बजाय जवाब मिसरी देवी ने दिया।
“तो इसमें दिक़्क़त क्या है?” क़ाज़ी साहब ने इब्राहीम को सुनाने के बहाने मियाँ-बीवी से पूछा।
“दिक़्क़त यह है कि साहबज़ादे सुनते ही उठ कर चल दिये!” गँने खाँ ने पूरी बात बता दी।
क़ाज़ी सैयद अब्दुल ग़फूर कुछ पल चुप रहे। उन्होंने मन-ही-मन सोचा कि आज सही मौक़ा है। फिर ऐसा मौक़ा मिलने से रहा।
“इब्राहीम, आपके वालिदान सही कह रहे हैं। बुरा मत मानना, बहुत कड़वी बात कह रहा हूँ कि आपकी इस हरकत ने हमारे सैयद ख़ानादान को कहीं बोलने लायक नहीं छोड़ा। घर से बाहर निकलने में गँन्ने मियाँ और आपकी वालिदा को दस बार सोचना पड़ता है। हम सबका घर से निकलना दूभर हो गया है। बरख़ुरदार, आपकी इन ख़ुराफ़ातों पर हम कब तक परदा डालते रहेंगे? ऐसा है यह आपके पास आख़िरी मौक़ा है हफ़्ता-दस दिन आराम से सोच लीजिए! अगर आपके मन में कुछ हो, तो आप इन्हें नहीं कम-से-कम मुझसे कह सकते हो। जाइए, अब आराम से सोइए और जो वक़्त दिया है, उसमें सोच कर अपने वालिदान को अपने फ़ैसले से आगाह कर देना... गँन्ने मियाँ आप भी सोइए!” इतना कह क़ाज़ी साहब अपनी चले आये।
पूरे रास्ते क़ाज़ी सैयद अब्दुल ग़फूर यह सोच कर बेचैन होते रहे, कि हफ़्ते-दस दिन बाद इब्राहीम क्या कहेगा? क्या वह अपने वालिदान गँने खाँ और मिसरी देवी की बात मान लेगा? इन्हीं सवालों में उलझे क़ाज़ी साहब को न जाने कब नींद आ गयी, उन्हें पता ही नहीं चला।
इधर सैयद इब्राहीम की पूरी रात बेचैनी भरी करवटों और अपने आपसे लड़ते हुए बीत गयी। जब उसे लगा कि अब किसी हालत में नींद नहीं आएगी, तब वह चुपचाप छत पर आया और सर पर आसमान में तने पूरे चाँद को निहारने लगा। जो तारे अमावस्या के आसपास पूरे आकाश को ढाँपे रहते थे, पूर्णिमा के बाद वे चाँदनी के डर से न जाने कहाँ छिप जाते जाते हैं। बल्कि यह तक नहीं पता चल रहा है कि पौ फटने में अभी कितनी देर है। भौर की जो लालिमा क्षितिज के किनारों को हल्का-सा रंग देती है, चाँदनी के चलते वह भी दिखाई नहीं दे रही है।
दूर कहीं किसी परिन्दे के चहचहाने से उसने अनुमान लगा लिया कि रात का अन्तिम पहर लगता है शुरू हो चुका है। छत पर कुछ देर टहलने के बाद वह नीचे आया और कपड़े के थैले में रखे सामान पर आख़िरी नज़र मार उसे वापस रख दिया। इस बीच परिन्दों की चहचाहट में कुछ और सुर मिल गये। अब उसे पूरी तरह अन्दाज़ा हो गया कि कभी भी फ़ज्र की अज़ान लग सकती है। उसने पहले से मन बना लिया कि आज वह फ़ज्र की नमाज़ नहीं पढ़ेगा।
इससे पहले कि जामी मस्जिद में फ़ज्र की नमाज़ के लिये आने वाले नमाज़ी रास्ते में मिलें, उसने अपना सामान उठाया, और दूसरे दिनों से कुछ देर पहले मस्जिद जाने के बहाने घर से निकल आया। बाहर आया तो वाक़ई रास्ते में उसे कोई नहीं मिला। इसके बाद उसने अपनी चाल बढ़ायी और कोटला क़िले की दीवारों के बीच बने संकरे रास्तों को पार कर यमुना की तरफ़ बढ़ गया। कुछ ही देर में वह फ़िरोज़ाबाद को छोड़ यमुना के किनारे पहुँच गया। यमुना के किनारे आने के बाद चाँदनी में चमकते अभ्रक मिले रेते पर वह पनहिया उतार कर बैठ गया, और अपने सामने बहती यमुना को अपलक निहारने लगा।
सचमुच सैयद इब्राहीम अपने साथ कुछ ले कर नहीं आया सिवाय दो जोड़े पहनने वाले कपड़ों के। और तो और उसने अपनी उन मनपसन्द कुरम की जूतियों को भी नहीं पहना। उन जूतियों को जिनको पहनने के बाद उनकी चर्र-चर्र पास से गुज़रने वालों के कानों में देर तक जैसे कानाबाती करती रहती हैं। बल्कि उनकी जगह पुरानी पनहिया डाल कर वह घर से निकल आया।
यमुना की देह को जब-जब छूती पौ फटने की मन्द समीर उसके बदन से आकर टकराती, तब-तब लगता मानो कोई उसे धीरे-धीरे थपकी दे रहा है। इब्राहीम ने यूँ ही आसमान में टँगे चाँद पर निगाह मारने के बाद यमुना की सतह पर अठखेलियाँ करते चन्द्रमा के तिरमिरा रहे अक्स को देखा, तो उसे देखता रह गया। ऐसा लगा मानो चाँदनी में नहाया यमुना का पानी भी उसके साथ चलने को आतुर है। यमुना के शीतल और चाँदी से चमकते पानी पर चन्द्रमा ने मानो मटमैला वरक बिछा दिया हो। उसकी सतह को निहारते हुए एकाएक पुरानी स्मृतियों के चित्र तैरने लगे। अनायास उसे उन चार जनों के बीच हो रही वार्ता की याद आ गयी, जो आपस में उसकी बात करते-करते महावन के बारे में बताने लगे। अपनी धुन में मन्थर गति से बहती यमुना के पानी में कभी उसे मानवती का चेहरा नज़र आता, तो कभी माँ का।
इससे पहले कि वह कुछ और सोचता जामी मस्जिद से लगने वाली फ़ज्र की अज़ान के बोल उसके कानों से टकराये। इब्राहीम ने ज़ल्दी-ज़ल्दी पाँवों में पनहिया डाली। वह एक झटके से खड़ा हुआ और यमुना की देह को छू कर आने वाली अलस्सुबह की ताज़ा हवा को ज़ोर से फेफड़ों में भर, तेज़-तेज़ क़दमों से यमुना के किनारे-किनारे दक्षिण-पूर्वी दिशा की ओर चल दिया।
इस रास्ते को इब्राहीम ने यह सोच कर भी चुना कि यमुना के किनारे-किनारे चलते हुए उसे कोई असुविधा नहीं होगी। वैसे भी कहा जाता है कि सबसे अच्छा मार्गदर्शक किसी नदी का बहता हुआ पानी होता है। जैसे वह कहीं नहीं भटकती है, उसी तरह वह अपने साथ-साथ चलने वाले को नहीं भटकने देती है। वैसे जाने को वह पश्तून शासक शाह आलम शेरशाह सूरी द्वारा बनवाये गये, और हिन्दुस्तान को मध्य एशिया से जोड़ने वाले आगरा-लाहौर मार्ग यानी बादशाही सड़क अर्थात सड़क-ए-आज़म से भी जा सकता है। किन्तु इस मार्ग से जाने का ख़तरा यह है, कि उसके अचानक घर छोड़ने की ख़बर सुन, दादा जान क़ाज़ी सैयद अब्दुल ग़फूर ख़ान उसे ढूँढ़ने के लिये इन रास्तों पर अपने आदमी भेज सकते हैं। हो सकता है वे दिल्ली से पिहानी जाने वाले रास्ते पर भी अपने आदमी भेज दें। हाँ, कुछ दिन बाद जब उसकी ढूँढ़ बन्द हो जाएगी, तो वह आगरा-लाहौर मार्ग पर आ जाएगा। लाहौर-आगरा मार्ग से इस समय जाने का एक डर यह भी है कि जिस तरह मुग़ल सिपाही सूर वंश के पठानों को खोज-खोज कर उनकी हत्या कर रहे हैं, कहीं ऐसा न हो कि वह उस पर चलते हुए उनके हत्थे चढ़ जाए। दिल्ली में तो उसके दादा क़ाज़ी सैयद अब्दुल ग़फूर बचाने वाले हैं, दिल्ली से बाहर उसे कौन बचाएगा? कौन उसकी बात पर यक़ीन करेगा कि वह उस क़ाज़ी साहब का पोता है, जिसने हज़रत जहाँबानी हुमायूँ को बिलग्राम की जंग में हारने के बाद पिहानी के जंगलों में पनाह दी थी। यह सोच कर भी इब्राहीम ने यह रास्ता चुना।
बड़ी मुश्किल से हफ़्ता बीता। क़ाज़ी साहब आज कहीं नहीं गये। पूरे दिन घर पर ही रहे कि पता नहीं अपने फ़ैसले से उन्हें आगाह करने कब इब्राहीम आ जाये? हालाँकि हफ़्ता-दस दिन का वक़्त उन्होंने ही दिया है, इसलिए अभी दो दिन बकाया हैं। मगर पता न जाने क्यों उन्हें रह-रह कर लग रहा है कि इब्राहीम आज ही उनके पास आएगा। इसी उम्मीद में कब ज़ुह्र की नमाज़ हो गयी और कब अस्र की, उन्हें पता ही नहीं चला।जैसे-जैसे मग़रिब की नमाज़ का समय नज़दीक आने लगा उनकी व्यग्रता बढ़ने लगी। परन्तु जैसे ज़ुह्र और अस्र नमाज़ हो गयी, वैसे ही मग़रिब की भी हो गयी लेकिन इब्राहीम का दूर-दूर तक पता नहीं है। आख़िरकार इशा की नमाज़ भी हो गयी। जामी मस्जिद से नमाज़ अदा कर क़ाज़ी साहब घर आये और देर तक दरवाज़े पर होने वाली दस्तक का इन्तज़ार करते रहे। मगर दरवाज़े पर कोई दस्तक नहीं हुई।
दूसरा दिन भी इब्राहीम के इन्तज़ार में बीत गया। ख़ैर, अभी एक दिन और बचा है। हो सकता है उसे फ़ैसला लेने में कोई परेशानी हो रही हो। फिर ऐसी भी क्या ज़ल्दी है। पाँच-सात दिन और ले ले, क्या बुराई है। मन में उठ रही तरह-तरह की आशंकाओं, और उनका स्वयं ही निदान कर क़ाज़ी साहब मन को तसल्ली देते रहे।
लेकिन ठीक दसवें दिन, यानी उनके द्वारा तय की गयी मियाद का आज आख़िरी दिन है। मगर जैसे ही दिन का पहला पहर ख़त्म हुआ, दूर से अपनी बैठक की ओर आगे-आगे बदहवास गँने खाँ और उसके पीछे-पीछे गिरती-पड़ती आ रही मिसरी देवी को देख, क़ाज़ी साहब का माथा ठनका। जब तक वे कुछ समझने की कोशिश करते, या कुछ अनुमान लगाते दोनों मियाँ-बीवी उनके पास आ गये।
मिसरी देवी तो ग़श खा कर गिरते-गिरते बची। सुबह-सुबह अचानक पैदा हुए इस नज़ारे को देख क़ाज़ी सैयद अब्दुल ग़फूर घबरा गये। एक पल के लिये उनके मन में बुरे-बुरे ख़याल आने लगे। इनमें सबसे बुरा ख़याल यह था कि इब्राहीम ने कहीं कोई उल्टा-सीधा क़दम तो नहीं उठा लिया। क़ाज़ी साहब लपक कर गँने खाँ के पास आये और बोले, “गँन्ने मियाँ, सब ठीक तो है?”
“ठीक क्या चचा जान! यह देखिए, उस मरदूद ने यह क्या किया?” इतना कह गँने खाँ ने अपने हाथ में पकड़ा काग़ज़ का एक पुर्ज़ा क़ाज़ी साहब की तरफ़ बढ़ा दिया।
अपना अन्दाज़ा क़ाज़ी साहब को सही जान पड़ा। उन्होंने काँपते हाथों से उसे लिया और उसे पढ़ने लगे। पूरा पढ़ने के बाद उस पुर्ज़े को वापस गँने खाँ की ओर बढ़ाते हुए बोले, “न जाने क्यों मुझे लग रहा था कि इब्राहीम यही करेगा!”
“इसका मतलब है वह आपसे कह कर गया है...। आपको इसकी जानकारी थी...। चचा जान, जब आपको पता था तब आपने हमें क्यों नहीं बताया?” एक ही साँस में गँने खाँ ने कई सवाल दाग दिये।
“गँन्ने मियाँ, ना वह मुझसे कह कर गया है... ना मुझे इसकी जानकारी है। मैं तो इसलिए अन्दाज़ा लगा रहा हूँ कि एक बार उसने मुझसे कहा था...।”
“क्या कहा था?”
“यही कि दादा जान मेरा इस दिल्ली में दिल नहीं लगता है।” क़ाज़ी साहब ने एक निराशा भरी उसाँस लेते हुए कहा।
“मेरा इब्राहीम लौट तो आएगा न बड़े खाँ?” इस बार मिसरी देवी की रुलाई फूट गयी।
“अपनी बेगम को समझाओ गँन्ने मियाँ!” इतना कह क़ाज़ी साहब मिसरी देवी की ओर पलटे, “दुल्हनिया, सब्र रखो, कहीं नहीं जाएगा...। आठ-दस दिन में लौट आएगा धक्के खा कर। हो सकता है पिहानी चला गया हो! एक बार मुझसे पूछ रहा था कि हम अपनी पिहानी कब चलेंगे। मैंने कहा कि जैसे ही हालात सुधरेंगे हम वापस पिहानी लौट जाएँगे।”
“लेकिन इस पुर्ज़े से तो नहीं लगता कि वह पिहानी गया होगा?” गँने खाँ ने आशंका जताते हुए कहा।
“या मेरे मौला, मेरी इत्ती-सी दुआ क़बूल कर ले कि मेरा बेटा पिहानी ही जाए।” मिसरी देवी दोनों हाथों को हवा में उठाते हुए अपने बेटे इब्राहीम की सलामती की दुआ माँगते हुए कातरता के साथ आगे बोली, “बड़े खाँ, आपको पक्का यक़ीन तो है न कि मेरा इब्राहीम वापस आ जाएगा?”
“अच्छा यह बताओ, वह लेकर क्या-क्या गया है? मेरा मतलब है रुपया-पैसा या कोई ज़ेवर-ज़ेवरात?”
“चचा जान, मुझे नहीं लगता वह कोई ऐसी चीज़ ले कर गया होगा। उसके सारे कपड़े-लत्ते तो यहीं पड़े हुए हैं। हाँ, वह एक मज़हबी किताब ज़रूर लेकर गया है।”
इतना सुन क़ाज़ी साहब ने धीरे-से सर हिलाया। वह समझ गया कि गँने खाँ किस मज़हबी किताब को इब्राहीम द्वारा ले जाने की बात कर रहा है। उन्होंने सर ऊपर उठाया और दोनों मियाँ-बीवी को सुनाते हुए कहा, “गँन्ने मियाँ, इसका मतलब है कि या तो वह ज़ियारत पर निकल गया, या वह बैरागी हो गया।”
“चचा जान, इसका यह मतलब थोड़े है कि आदमी किसी को बता कर ही ना जाए।”
“मतलब उसने घर-बार सब छोड़ दिया बड़े खाँ?” मिसरी देवी ने चौंकते हुए पूछा।
“दुल्हनिया, मैं ऐसा नहीं कह रहा हूँ। हो सकता है मक्का-मदीना भी चला जाए।” क़ाज़ी साहब ने मिसरी देवी को झूठी दिलासा देते हुए कहा।
“मुझे नहीं लगता चचा जान कि वह बैरागी हो गया है!” गँने खाँ अपने मन को समझाते हुए बोला।
“फिर इस काग़ज़ पर लिखे का क्या मतलब है?” फिर क़ाज़ी साहब ने गँने खाँ से झल्लाते हुए कहा, “इसका मतलब आप लोगों के अब भी समझ में नहीं आ रहा है!”
“पर मुझे लगता है कि वह मक्का गया है। काग़ज़ के लिखे के तो कई मतलब हो सकते हैं।”
“पर बड़े खाँ इस पर क्या लिखा हुआ है?” मिसरी देवी ने धीरे-से पूछा।
“इस पर लिखा हुआ है कि अब्बू-अम्मी, मैंने आप लोगों का बड़ा दिल दु:खाया है। मेरी वजह से आप लोगों को जो ज़िल्लत उठानी पड़ रही है, वह अब मुझसे देखी नहीं जा रही है। मैं घर छोड़ कर जा रहा हूँ। ख़ुदा के वास्ते मुझे ढूँढ़ने की भी कोशिश मत करना। आप लोगों के साथ मेरा बस इतना ही साथ था। ख़ुदा हाफ़िज़!”
क़ाज़ी साहब ने पुर्ज़े पर लिखी इबारत अभी ख़त्म ही की थी, कि दरवाज़े की ओट ले कर खड़ी मिसरी देवी किसी पुरानी माटी की दीवार-सी यह कहते हुए भरभरा कर ढह गयी, “हाय मेरे इब्राहीम तूने यह क्या किया बेटे? अपनी माँ को अकेला छोड़ कर जाते हुए तुझे उस पर ज़रा भी तरस नहीं आया। जाने से पहले तूने एक बार भी नहीं सोचा कि मेरे बाद मेरी माँ का क्या होगा! तेरे जाने से पहले मुझ पर क्यों नहीं माटी पड़ गयी!”
क़ाज़ी साहब ने कनखियों से एक माँ को अपने बेटे के लिये जिस तरह टूटते हुए देखा, उनकी आँखें नम हो उठीं। वह कैसे इसे तसल्ली दे कि उसका बेटा लौट कर आएगा भी या नहीं? सच तो यह है कि इसका यक़ीन ख़ुद क़ाज़ी साहब को भी नहीं है, कि इब्राहीम अब कभी इनके पास लौट कर आएगा भी या नहीं?
कैसे एक निरीह माँ पुत्र वियोग में देखते-देखते किसी खण्डहर में तब्दील हो गयी, उसका जीता-जागता प्रमाण उसकी बैठक की मुश्किल से पौने दर्ज़न सीढ़ियों से उतरती मिसरी देवी है। ऐसा लग रहा है मानो उसके भीतर दौड़ते रक्त को किसी अदृश्य शक्ति ने निचोड़ लिया है, और यह कभी भी कच्ची दीवार-सी भरभरा कर ढह जाएगी। क़ाज़ी साहब गँने खाँ और उसकी पत्नी मिसरी देवी को तब तक देखते रहे, जब तक वे दोनों उनकी आँखों से ओझल नहीं हो गये।
माँ के शोक और उसकी व्यथा को देखते हुए क़ाज़ी साहब ने इब्राहीम का कुछ दिन तो इन्तज़ार किया। लेकिन वह जब नहीं लौटा तो एक दिन अपने ख़िदमतगार सुलेमान को इस हिदायत के साथ पिहानी रवाना कर दिया, कि वह वहाँ जा कर यह ख़बर ले कर आए कि अगर इब्राहीम यहाँ आये, तो इस बारे में तुरन्त दिल्ली ख़बर कर दें। इस बीच जहाँ-जहाँ इब्राहीम के होने की सँभावना हो सकती है, उन्होंने वहाँ भी ख़बर भिजवा दी। गँने खाँ और मिसरी देवी को इस बात का इल्म है, कि क़ाज़ी साहब उनके बेटे को ढूँढ़ने और उसका पता करने की किस हद तक कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन जैसे ही मिसरी देवी को यह पता चला कि सुलेमान पिहानी से लौट आया है, वह गिरती-पड़ती सुलेमान के पास पहुँच गयी। उसने सुलेमान को दुआ-सलाम का भी मौक़ा नहीं दिया और जाते ही पूछा, “सल्लू मियाँ, पिहानी में कुछ पता चला मेरे इब्राहीम का?”
“बा जी, पता तो तब चले जब वे वहाँ पहुँचे हों।”
“वहाँ नहीं पहुँचा? फिर कहाँ चला गया?” मिसरी देवी ने सुलेमान को सुनाते हुए डूबती आवाज़ में कहा और निराश हो वहाँ से चली आयी।
बेटे के वियोग में तड़पती मिसरी देवी पूरे एक महीने लगभग रोज़ाना क़ाज़ी साहब के पास जाती, और हर बार उनसे बैठक की सीढ़ियों से यह पूछ कर लौट आती, “बड़े खाँ, कुछ पता चला मेरे इब्राहीम का?”
शुरू में क़ाज़ी साहब भी उसे दिलासा देते हुए कहते, “घबराने की ज़रूरत नहीं है, आ जाएगा।”
मगर जैसे-जैसे दिन बीतने लगे और क़ाज़ी साहब की दिलासा भी भोथरी पड़ने लगी, मिसरी देवी ने उनके पास जाना पहले कम किया, और फिर एक दिन हार कर जाना ही बन्द कर दिया। अपनी इस विफलता पर क़ाज़ी सैयद अब्दुल ग़फूर को आत्मग्लानि होने लगी।
इधर दिल्ली के हालात अब तेज़ी से सुधरने लगे। एक दिन क़ाज़ी साहब ने हज़रत जहाँबानी हुमायूँ के उत्तराधिकारी और मुग़ल साम्राज्य की बागडोर सँभालने वाले नये-नये बादशाह जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर के पास उनसे मिलने की दरख़्वास्त भिजवायी। दरख़्वास्त मिलते ही बादशाह ने क़ाज़ी साहब को मिलने के लिये बुलवा लिया।
बादशाह अकबर के सामने पड़ते ही क़ाज़ी सैयद अब्दुल ग़फूर ने घुटने के आधे बल झुक कर फ़र्शी सलाम किया।
“ख़ुश-आमदीद! आइए ख़ान साहब, मुग़ल दरबार में आपका ख़ैर-मक़्दम है!” क़ाज़ी सैयद अब्दुल ग़फूर ख़ान को देखते ही बादशाह अकबर ने अपने वालिद हुमायूँ द्वारा नवाज़े गये लक़ब ‘ख़ान’ से सम्बोधित कर ख़ुद उनका स्वागत किया।
“बस, आपकी मेहरबानी है बादशाह सलामत!” सलाम की मुद्रा में ही क़ाज़ी साहब ने धीरे-से जवाब दिया।
“और सुनाइए! दमिश्क-ए-अवध तो पूरी तरह तामीर हो चुकी होगी?” बादशाह ने पूछा।
“जी हुज़ूर। इसीलिए सोच रहा हूँ कि बाकी के दिन अब पिहानी में गुज़ार दूँ।”
“पिहानी में गुज़ार दूँ! क्या दिल्ली में कोई परेशानी है?”
“ऐसी बात नहीं है बादशाह सलामत। दिल्ली से अब दिल भर गया। जो थोड़े-से दिन बचे हुए हैं, अब उन्हें अपनी माटी में गुज़ारने का मन बना लिया है।”
“यह तो अच्छा सोचा है आपने। अगर कभी कोई ज़रूरत पड़े तो चले आना। हमारे वालिद हज़रत जहाँबानी पर आपका इतना बड़ा एहसान है, कि मुग़ल सल्तनत की तारीख़ में हमेशा दर्ज रहेगा।”
“ऐसी बात नहीं है बादशाह सलामत। यह तो इस ग़ुलाम का फ़र्ज़ था।” क़ाज़ी साहब ने झुकते हुए बड़े अदब से कहा, “जाते-जाते एक अर्ज़ है जहाँपनाह।”
“हाँ-हाँ कहिए!”
“मेरे छोटे भाई जो मुक़तदी भी हैं उनके एक साहबज़ादे हैं ग़फूर आलम। अभी उनकी उम्र कम है इसलिए मेरी ख़्वाहिश है कि आपकी सरपरस्ती में तालीम हासिल करने के लिये वे दिल्ली आ जाएँ।”
“ख़ान साहब, यह तो हमारे लिये बड़े फ़ख़्र की बात होगी। आपने पहली बार हमसे कुछ माँगा है। आप अपने भतीजे ग़फूर आलम को दिल्ली भेज दीजिए। हम उसे अच्छी-से अच्छी और आला दर्जे की तालीम दिलाएँगे।”
“बहुत शुक्रिया जहाँपनाह! अब जाने की इजाज़त दीजिए!” क़ाज़ी साहब ने एक बार फिर फ़र्शी सलाम बजाते हुए कहा।
“हम कैसे कह सकते हैं ख़ान साहब।”
इसके बाद क़ाज़ी सैयद अब्दुल ग़फूर ख़ान बिना मुड़े सलाम बजाते हुए पहले दूर तक गये, और फिर सीधा हो कर अपनी दिशा में बढ़ गये।
इसके कुछ दिन बाद क़ाज़ी साहब का लगभग पूरा सैयद परिवार, जो बिलग्राम के युद्ध में हुमायूँ की पराजय और शाह आलम शेरशाह सूरी द्वारा हिन्दुस्तान सत्ता सँभालने के बाद छिप कर दिल्ली चला आया था, एक बार फिर से अपने अपने पिहानी लौट गया।
घर और दिल्ली छोड़ने के बिछोह से सैयद इब्राहीम अब मुक्त हो चुका है।
दिन में वह यमुना के किनारे-किनारे चलता। थक जाता तो आसपास खड़े पेड़ों की छाया में विश्राम कर लेता। भूख़ लगने पर यमुना के खादर में उगी बेलों से ख़रबूज़ा, तरबूज़, ककड़ी और दूसरे कन्द-मूल खा कर पेट भर लेता। रास्ते में नमाज़ का वक़्त होता, तो यमुना के पानी से वज़ू कर वहीं किनारे पर नमाज़ अदा कर, फिर से अपनी यात्रा पर आगे बढ़ जाता। जबकि शाम का मटमैलापन पसरने से पहले वह वह मुख्य मार्ग के किनारे बनी किसी सराय में आ जाता, और दूसरे राहगीरों के साथ रात बिता लेता।
यमुना किनारे रात बिताना वह इसलिए मुनासिब नहीं समझता क्योंकि एक तो खादर के आवारा झाड़-झंखाड़ों में छिपे भेड़िये, सियार और विषैले साँप इत्यादि, ऊपर से चोर-लुटेरों का डर। हालाँकि चोर-लुटेरों के लिये उसके पास कुछ नहीं है। ले-देकर गले में पड़ा चाँदी का वह पुराना ताबीज़ है, जिसे उसकी अम्मी बचपन में एक बार जामी मस्जिद में आये एक सूफ़ी से लायी थी और उसके गले में पहना दिया था। अम्मी इस ताबीज़ को यही सोच कर लायी थी कि उसका लाड़ला अच्छी-बुरी नज़रों से बचा रहे।
यमुना को छोड़ जब इब्राहीम आगरा-लाहौर मार्ग पर आता, तब इसके किनारे दो से तीन कोस की दूरी पर मिश्रित पत्थरों व लखौरी ईंटों से बनीं, और सुर्खी चूने से की गयी लिपायी वाली तक़रीबन दस गज़ ऊँची मीनारों को देख उसे बड़ा आश्चर्य होता। आगे बढ़ते हुए जब भी कोई मीनार रास्ते में मिलती, उसकी बनावट को वह उसके चारों ओर परिक्रमा देते हुए बड़े ध्यान से देखता। वह कोशिश करता यह जानने की, कि इन मीनारों को किसने बनवाया होगा? इन्हें बनवाने का क्या मक़सद हो सकता है? उसने इन मीनारों में यह भी देखने का प्रयास किया कि इन पर कुछ लिखा हुआ मिल जाए, ताकि उससे इनके निर्माण का मक़सद पता चल सके। मगर उसे इन पर ऐसा कुछ लिखा हुआ नज़र नहीं आया।
कभी यमुना किनारे और कभी आगरा-लाहौर मार्ग पर चलते हुए सैयद इब्राहीम को दिनों का तो पता है, कि उसे दिल्ली से चले कितने दिन हो गये हैं, किन्तु यह नहीं पता कि उसने कितने कोस की यात्रा तय कर ली है। अब तो वह खादर में पड़ने वाले खेतों में काम करते मज़दूर-किसानों, जिनमें स्त्री-पुरुष दोनों होते, उसे उनसे बात करने में आनन्द आने लगा। विशेषकर, उनके द्वारा बोली जाने वाली भाषा में। पिहानी में जहाँ वह बचपन में कन्नौजी-अवधी मिश्रित उर्दू, जिसका विकास शौरसेनी प्राकृत की भाषा पांचाली प्राकृत से हुआ, बोलता था; वहीं दिल्ली में आ कर ब्रज और खड़ी बोली मिश्रित फ़ारसी ज़बान बोलने लगा। लेकिन यह कौन-सी भाषा अथवा बोली है, जिसमें ये मज़दूर-किसान उससे बात करते हैं। जो भी है इस ज़बान में है बड़ी मिठास।
जुह्र की नमाज़ अदा कर उस दिन दोपहर में इब्राहीम यमुना के किनारे खड़े घने नीम की छाँव में अपने साथ लायी चटाई को बिछा उस पर लेटा ही था। इसी बीच उसने देखा कि पास के खेतों में काम करते मज़दूर-किसानों का छोटा-सा समूह उसी की तरफ़ आ रहा है। बग़ल के कदम्ब के पेड़ की नीचे बैठते हुए अधिकतर ने उसे ‘राधे-राधे’ किया। इसे इब्राहीम ने सुन तो लिया किन्तु इस पर उसने ध्यान नहीं दिया।
“अरे भिया राधे-राधे!” समूह के एक बुज़ुर्ग ने फिर से ऊँची आवाज़ में कहा।
इस बार जैसे ही राधे-राधे की आवाज़ उसके कानों में पड़ी, उसने चौंकते हुए यह सोच कर अपने आस पास देखा, कि उसके अलावा उसके आसपास और कौन है?
“अरे भिया! तुम्हईं तै बोली है।” राधे-राधे बोलने वाले बुज़ुर्ग ने इस बार इब्राहीम से कहा।
इब्राहीम ने जैसे ही देखा कि कदम्ब के नीचे बैठा आदमी उसी से कहा रहा है, उसे अपने ऊपर थोड़ी शर्मिन्दगी-सी हुई। उसने तुरन्त अपनी ग़लती सुधारते हुए, इस अभिवादन को स्वीकार कर मुस्कराते हुए जवाब दिया, “राधे-राधे!”
इस बीच कुछ ने सामने बहती यमुना में हाथ-मुँह धोये, और कुछ अपने साथ लाये पानी से हाथ धोने लगे। समझ गया इब्राहीम कि ये सब अब खाना खाएँगे। ऐसा हुआ भी कि कुछ ने रोटी की पोटलियाँ खोल लीं, और कुछ ने अपने पीतल के कटोरदान खोल लिये। एक-एक कर पोटलियों और कटोरदानों से कुछ घी में चिपुड़ी, कुछ बिना चिपुड़ी रोटियों के बीच फँसी लाल मिर्च, प्याज़ और लहसुन की सिलबट्टे पर पिसी चटनी बाहर निकल आयी। एकाध ने प्याज़ के गन्ठे फोड़ लिये। जैसे ही सबकी पोटलियों और कटोरदानों ने खुली हवा में साँस ली, उनसे फूटी गन्ध वातावरण में व्याप गयी। इब्राहीम के नथुनों ने इससे पहले ऐसी गन्ध कभी नहीं सूँघी। वह कनखियों से कुछ गज़ दूर खाने की तैयारी करते लोगों को देखता रहा।
इससे पहले कि कदम्ब के नीचे बैठे किसान-मज़दूर अपना खाना शुरू करते, उनमें से उसी बुज़ुर्ग जिसने ‘राधे-राधे’ के साथ उसका अभिवादन किया था, बड़ी आत्मीयता से आग्रह किया, “ लल्ला आ जा, रोटी खा लेओ!”
“आप लोग पढ़ो बिसिमिल्लाह!”
“ऐसे कैसे हो सके कि हम खाएँ और...।”
“ऐसी कोई बात नहीं है।” सैयद इब्राहीम ने यह कह तो दिया, मगर सच यह है कि बहुत दिनों से उसे अन्न नसीब नहीं छुआ है। जो वह दिल्ली से साथ ले कर चला था, वह बहुत पहले ही ख़त्म हो गया। इसके बाद उसे यमुना किनारे उगे तरबूज़, ख़रबूज़, ककड़ी और दूसरे कन्द-मूल खा कर पेट भरना पड़ रहा है।
“देख लल्ला, हमारे ब्रज में ई रीत है कि अगर सामईं कोऊ अनजान परदेसी होए, तो बाकू भोजन करानो हमारौ फरज बने है।”
“बाबा, आपको कैसे लगा कि मैं कोई परदेसी हूँ?” मुस्कराते हुए इब्राहीम ने पूछा।
“लल्लाSSS... तेरी बोली-बानी तै पतौ चलरो है...। दूसरी बात, तेरी बेसभूसा भी बतारी है कि तू ब्रज कौ बासी तो है ना।”
इब्राहीम को उस बुज़ुर्ग किसान की बात और उसके अनुभव को सुन-देख अच्छा लगा। वह अपनी जगह से खड़ा हुआ और कदम्ब के पेड़ के नीचे बैठे मज़दूर-किसानों के पास आकर बैठ गया। इस बार किसान ने बिना इब्राहीम की सहमति के अपने कटोरदान से एक रोटी निकाली, और उस पर चटनी रख उसकी तरफ़ बढ़ाते हुए बोला, “लेओ महाराज!”
इस सम्बोधन को सुन इब्राहीम को और भी आश्चर्य हुआ कि इस किसान ने उसे रोटी देते हुए ‘लल्ला’ नहीं ‘महाराज’ कहा। इस सम्बोधन में एक अनजान के प्रति किसान का जो मान छिपा हुआ है, उसे सुन इब्राहीम जैसे निहाल हो उठा।
रोटी खाने के बाद अचानक जैसे इब्राहीम को कुछ याद आ गया। याद आने पर उसने अपनी क़मीज़ की जेब से वही तस्वीर निकाली, जो उसने सलीमगढ़ में ली थी।
“बाबा, आप लोग इसे जानते हैं?” किसान को चित्र दिखाते हुए इब्राहीम ने पूछा।
किसान ने चित्र को अपने हाथ में लिया, और उसे देखने के बाद ज़ोर-से हँसते हुए बोला, “अरे लल्ला, या बंसी बारै ए कौन ना जाने है? ई ब्रज तो जाकौ घर है। जाकै बारे में काई तै पूछ लीजो कि भिया, ई मुरली बजइया कृष्ण-कन्हैया कहाँ मिलेगो?”
“लेकिन यह तो आप भी बता सकते हैं?”
इब्राहीम ने जिस मासूमियत से पूछा, उसे सुन किसान एक बार फिर हँसा, और इससे पहले कि वह कोई जवाब देता, बीच में कुल्ला करता दूसरा किसान बोला, “जे तो तोहे सब जगह मिल जाएगो। महाराज, अभई तो तू जा ब्रज में घुसोई है। आगे जाएगे तो सब पतौ चल जाएगो कि ई मुरलीधर कहाँ मिलेगो।” हँसते हुए दूसरा किसान आगे बोला, “बैसे एक बात पूछूँ... बुरौ तो ना मानोगे?”
“हाँ पूछो!” इब्राहीम ने स्वीकृति देते हुए कहा।
“कहीं तुम तुरक तो ना है?”
“तुरक ? मैं कुछ समझा नहीं?”
“मेरौ मतलब है मुसलमान तो ना है?’
“आपको कैसे पता चला?” सैयद इब्राहीम ने आश्चर्य से पूछा।
“एक तो आपकी बोली-बानी बैसी है... दूसरो, थोड़ी देर पहले तुम निमाज पढ़ रहे है।”
“आपने सही पहचाना। मैं वही हूँ जो आप समझ रहे हो।”
“लल्ला, तू कहीं हज्ज पे तो ना जारो है?” किसान ने अनुमान लगाते हुए पूछा।
“हाँ, वही जा रहा हूँ।” इससे पहले कि वह किसान कुछ और असहज करने वाला सवाल करता, मुस्कराते हुए इब्राहीम ने उसी के सवाल में छिपा जवाब देते हुए कहा।
“चलो लल्ला, जे तो अच्छी बात है। आदमी ए अपनी जियारत-जात्रा जरूर करनी चहिए।” रोटी देने वाले किसान ने इब्राहीम से सहमति जतायी।
“पर एक बात बता, जा भरी उमर में ऐसी कहा मजबूरी आ परी, जो तू झोरा-झण्ड लेके हज्ज पे चल दियो? अभई तो तेरो बिहा-निकाह भी ना हुओ होएगो? हुओ भी होएगो तो एकाध बालक-छोटो भी होएगो...।” इसके बाद एक पल रुकने के बाद किसान बोला, “वैसे चेहरे-मोहड़े ते तू मोहे काई ऊँचे खानदान को लगे है?”
“अभी मेरा निकाह नहीं हुआ है...। और फिर ज़ियारत-तीरथ का कुँवारे या शादी-शुदा से क्या रिश्ता है? यह तो जब मन करे, तभी कर लो!”
“तो फिर जे कह, कि ना घर की चिन्ता... ना गिरस्थी की फिकर।” दूसरे ने मज़ाक़ करते हुए कहा।
“कुछ भी समझ लो!” इब्राहीम नज़र नीची कर धीरे-से बोला।
“अच्छो लल्ला, आराम ते जइयो! राधे-राधे।” इसके बाद किसान ने अपना कटोरदान बन्द किया, और बाकी के मज़दूर-किसानों के साथ खेतों की ओर चल दिया।
इधर इब्राहीम ने भी अपना सामान समेटा, और वह भी फिर से यमुना के किनारे-किनारे आगे बढ़ गया।
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| विट्ठलनाथ |
सैयद इब्राहीम ने एक तरह अब आगरा-लाहौर मार्ग पूरी तरह त्याग दिया। उसने निश्चय कर लिया कि आगे की यात्रा वह बहती हुई यमुना के साथ-साथ चल कर करेगा। दिन में रह-रह कर ब्रजवासियों से मिलने और उनसे वार्तालाप करते रहने के कारण उसे न केवल अब ब्रज समझ में आने लगी है, बल्कि अब अच्छी-ख़ासी ब्रज बोलने भी लगा है। अन्य ब्रजवासियों की तरह जब भी वह ब्रज में बातचीत करता है, तब उसे देखकर कहना मुश्किल है, कि यह बाहर से आया हुआ है अथवा यहीं का मूल निवासी है।
जगह-जगह उगे रसाल, प्रियाल, कचनार, कटहल, जामुन, बेल, मौलश्री, माधवी, श्याम तमाल, ऐंठा कदम्ब, पीलू , करील, छोंकर तथा यमुना के तट पर विराजमान अन्यान्य वृक्ष लताओं को देख इब्राहीम जैसे अपने सारे सन्तापों को भूल गया। आसपास पेड़ों पर बैठे जब कभी एकसाथ कई मोर बोलते, तब लगता जैसे कानों में मुरलियों का समूह-गान गूँज रहा है। रह-रह कर आते-जाते लोगों के मुँह से अभिवादन स्वरूप निकला ‘राधे-राधे’ तो उसके चित्त में जैसे भीतर तक समा गया। उसे लगता है जैसे ब्रज में उगे वृक्षों के डाल-डाल, और पत्ते-पत्ते से बस एक ही आवाज़ आ रही है-राधे-राधे। मगर एक बात इब्राहीम के पल्ले नहीं पड़ रही है कि ब्रज भूमि है तो कृष्ण की, परन्तु यहाँ के मनुष्य तो मनुष्य, पशु-पक्षियों से ले कर पेड़-पौधे तक से राधे-राधे की आवाज़ सुनाई देती है। आख़िर कौन है यह राधा, जिसका नाम सबकी ज़बान पर है?
सैयद इब्राहीम जब भी ब्रज के किसी गाँव के पास पहुँचता, तो आते-जाते प्रत्येक ब्रजवासी में उसे कृष्ण और राधा दिखाई देती। बड़े तो बड़े, छोटे-छोटे बालकों में उसे कान्हा का ही रूप नज़र आने लगे। उसने ऐसा कोई पीपल, नीम, कचनार, मन्दार, शिरीष, ढाक या आम का वृक्ष नहीं देखा, जिसके नीचे किसी-न-किसी रूप में राधा-कृष्ण का युगल न दिखाई दिया हो। जगह-जगह बने छोटे-बड़े मन्दिरों का तो कहना ही क्या। वे तो मानो इन दोनों के स्थाई वास हैं।
जिस तरह इब्राहीम को जगह-जगह साधू-सन्तों के रूप में राधा-कृष्ण के भक्तों की टोलियाँ दिखायी दे रही हैं, उन्हें देख एक बात तो उसके समझ में आ गयी कि वह ब्रज के किसी भी कोने में चला जाए, वह भूखा नहीं रह सकता। जब ये अपना जीवन-यापन कर सकते हैं, तब इनकी तरह वह क्यों कर सकता? इसका एक लाभ यह है कि वह जिसकी खोज में यहाँ आया है, क्या पता वह उसे कहाँ मिल जाए। उसे यहीं आ कर पता चला कि जिसे आम बोलचाल भाषा में भीख या भिक्षा कहते हैं, ब्रज में उसे मधुकरी कहते हैं। इसी मधुकरी को माँग कर साधु-सन्त अपना जीवन निर्वाह करते हैं।
एक दिन उसने एक बुज़ुर्ग साधू से जिज्ञासावश पूछ भी लिया, “बाबा, भीख को ब्रज में मधुकरी क्यों कहबै हैं?”
साधू ने हल्के-से पहले इब्राहीम की आँखों में झाँका, और फिर एक स्निग्ध अलौकिक मुस्कान बिखेरते हुए बोला, “बच्चा, पहले तो इसे सही बोलो! यह भीख नहीं भिक्षा होती है। आपका प्रश्न है कि भिक्षा को मधुकरी क्यों कहा जाता है। इसका अर्थ बड़ा दार्शनिक भरा है। मधुकरी इसलिए कहा जाता है, कि जिस तरह मधुकर जिसे भौंरा या भ्रमर भी कहा जाता है, फूलों से रस इकट्ठा करता है, उसी तरह मधुकरी में भिक्षा के रूप में अन्न इकट्ठा किया जाता है। मधुकरी यानी घर-घर जा कर माँगना...। ठीक उसी प्रकार जैसे भौंरा तरह-तरह के फूलों से रस इकठ्ठा करता है।”
इब्राहीम साधू की बात चुपचाप सुनता रहा।
“एक बात और भीख, भिक्षा और मधुकरी इन तीनों का अर्थ सर्वथा अलग-अलग है। भीख दरिद्र और असहाय लोगों यानी अन्नार्थियों को दी जाती है। इसके माँगने और देने की कोई सीमा नहीं है। इसी तरह भिक्षा यती अर्थात ब्रह्मचारी यानी गुरुकुल में पढ़ने वालों और ब्राह्मण को दी जाती है। जबकि मधुकरी तपस्या करने वालों को दी जाती है। ब्रजवासियों द्वारा पके हुए अन्न को माँग कर पाने को मधुकरी कहा जाता है, और इसे आवश्यकता अनुसार केवल पाँच-सात घरों से ही माँगा जाता है।”
“सही कहा महाराज, बैसे आदमी को चाहिए भी कितना।” इब्राहीम ने साधू के अन्तिम वाक्य से पूरी तरह सहमति जताते हुए कहा।
“नहीं बच्चा, ऐसा नहीं है। मधुकरी को भी लोगों ने एक व्यवसाय बना लिया है। अगर इसे कभी देखना हो तो साल-छह महीने वृन्दावन में रह कर देखना।”
इब्राहीम के लिये यह एकदम नया ज्ञान है। उसे मधुकरी तो छोड़िए, भीख माँगने और भिक्षा माँगने का अन्तर आज पता चला।
गुरु ज्ञान के रूप में मिले इस पहले सबक ने इब्राहीम पर ऐसा असर डाला, कि उसने साधू के चरणों में अपना सर टिका दिया।
“जाओ बच्चा। सुखी रहो!”
मधुकरी में छिपे दर्शन को जान, इब्राहीम की सारी दुविधा दूर हो गयी। क्योंकि ब्रज में आने पर एक बार उसके मन में आया, कि अपनी दाढ़ी को क्यों न किसी हज्जाम के पास जा कर छोटी-छोटी करवा दे। लेकिन उसने अपना यह इरादा अब यह सोच कर त्याग दिया, कि साधू-सन्तों या पीर-फ़क़ीरों की असली पहचान और उनका ज़ेवर यह दाढ़ी ही तो होती है। अगर उसने अपना यह ज़ेवर ही उतार दिया, तो फिर काहे की सन्तई और काहे की फ़क़ीरी। उसने बड़े प्यार से अरसे बाद अपनी बढ़ चुकी दाढ़ी को सहलाया। मधुकरी के रूप में इब्राहीम को ज़िन्दगी और दुनिया को समझने का जैसे एक माध्यम मिल गया। इसलिए उसने मधुकरी माँगने का निर्णय किया, ताकि वह घर-घर जा कर उसे तलाश सके, जिससे मिलने की चाह उसे यहाँ तक खींच लायी है।
सैयद इब्राहीम कभी अकेला तो कभी साधू-सन्तों के समूह में ब्रज के गाँव-गाँव और मोहल्ला-मोहल्ला जा कर मधुकरी माँगता और जीवनयापन करता। पिछले कई वर्षों से ब्रजभूमि में रहते हुए वह यहाँ की रज में ऐसा रम गया कि वह भूल गया, कभी दिल्ली से आया था। हाँ, जब कभी वह अकेला होता, तब कभी-कभार उसके अवचेतन और स्मृति में मानवती आ कर जैसे ही वह खिलखिला कर हँसती, चन्द्रावल बाज़ार की पुरानी छवियाँ ताज़ा हो उठतीं। शुरू में सोते-जागते मानवती ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। इब्राहीम ने मानवती को भुलाने की बहुत कोशिशें कीं लेकिन गाहे-बगाहे उसकी सूरत आँखों के सामने तैर ही उठती है। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, सैयद इब्राहीम ब्रज के बरगद, पीपल, रसाल, प्रियाल, कचनार, कटहल, जामुन, बेल, मौलश्री, माधवी, कदम्ब, सदाबहार तमाल, पीलू , पखार, आम, हींस, छोंकर के टहनी-पत्तों और करील के कुंजों, वन-उपवनों, ताल-तलैयों, पोखरों में ऐसा डूबा कि अब उसे इनके सिवाय कुछ दिखाई नहीं देता है। जहाँ भी उसकी नज़र पड़ती, लगता अधरों पर बाँसुरी धरे बक़ौल उन मज़दूर-किसानों के मुरली बजैया, मुरलीधर या कहिए कृष्ण-कन्हैया खड़ा मुस्करा रहा है।
मीलों तक फ़ैली यमुना अब इब्राहीम को नदी नहीं, एक ऐसा अलौकिक जल द्वीप दिखाई देता, जिस पर दिन में चाँदी की परत चढ़ी होती, और अमावस्या के आसपास की रातों में आसमान से नीचे उतर कर तारों की चादर बिछ जाती। जबकि पूर्णिमा के आसपास की रातों में मन्थर गति से बहती उसकी शान्त देह पर उतर जब चन्द्रमा किलोल करता, तब लगता जैसे कृष्ण और राधा आपस में रास रचा रहे हैं। बीच-बीच में कोई टिटहरी आकाश में उड़ते हुए टिटयाती, और कुछ पलों के लिये इस रास में विघ्न डाल गायब हो जाती। जबकि कभी-कभी कोई मछली यमुना की सतह को फोड़ अचानक बाहर निकलती, और साँस ले वापस डुबकी लगाते हुए अपनी दुनिया में लौट जाती। इस तरह एक तरफ़ बहती यमुना और दूसरी ओर अपने पीछे नये-पुराने पेड़ों के कुंजों के बीच बैठा इब्राहीम अक्सर देर तक इस अलौकिकता में डूबा इसका आनन्द लेता रहता।
एक गाँव से मधुकरी माँगने के बाद एक दिन इब्राहीम यमुना के किनारे-किनारे लौट रहा था। तभी दूर उसे कदम्ब के पेड़ों के नीचे एक छोटा सा स्त्री-पुरुषों का समूह दिखाई दिया। उत्सुकतावश उसके पाँव उसी तरफ़ उठ गये। जैसे-जैसे वह आगे बढ़ने लगा, समूह के बीच से आती आवाज़ को सुन उसने अनुमान लगा लिया कि अवश्य यहाँ कोई प्रवचन अथवा कथा चल रही है।
पास जा कर देखा तो पाया उसका अनुमान एकदम सही है। फिर भी अपने अनुमान की पुष्टि के लिये अपनी गायों के साथ अपनी बंसी की धुन में मस्त, वहाँ से गुज़र रहे ग्वाले के पास आकर उसे अभिवादन किया, “राधे-राधे!”
अपनी बंसी में ग्वाल ऐसा डूबा हुआ है कि उसने इब्राहीम को नहीं सुना। इस बार जैसे ही उसने थोड़ी ऊँची आवाज़ में पुनः ‘राधे-राधे’ कहा, तब जाकर ग्वाला धीरे-से मुड़ा।
“राधे-राधे महाराज!” ग्वाले ने प्रत्युत्तर में राधे-राधे कहते हुए जवाब दिया।
“भिया, नेक जे तो बता कि वा कदम्ब के नीचे ई कहा हे रह्यौ है ?” इब्राहीम ने ग्वाले से पूछा।
“व्यास जी भगवत गीता बाँचरे हैं।” इससे पहले कि इब्राहीम कुछ और पूछता, ग्वाला यह कहता हुआ एक गैया की तरफ़ दौड़ा, “कहाँ भागी जारी है ललिता !”
ग्वाले की इस निश्छलता पर इब्राहिम की हँसी छूट गयी। वह सोचने लगा कि ग्वाले ने यदि अपनी इस गाय का नाम ललिता रखा हुआ है, तो उसने दूसरी गायों के नाम भी रखे होंगे! ब्रज में आकर इब्राहीम यहाँ की महिमाओं और लीलाओं से अब धीरे-धीरे अच्छी तरह परिचित होने लगा है। अगर यह ग्वाला यह जानता है कि ललिता कौन है, तो वह औरों के बारे में भी जानता होगा! ललिता को श्रीकृष्ण की सबसे चहेती गोपी माना जाता है। बल्कि यह राधा की सबसे क़रीबी सहेली है।
इब्राहीम तेज़ी से ग्वाले की ओर लपका।
“भैया, नेक-सी एक बात और पूछनी है कि जैसे तैने अपनी या गैया को नाम ललिता धर राख्यौ है, ऐसेई औरन को भी धर राखो होएगो?”
“हाँ धर राख्यौ है न। जैसे वाकौ बिसाखा है, तो वाकै कनै जो चररी है वाकौ नाम चम्पक लता है... और ऊSSS जो कबरी गैया हैं न वाकौ नाम चित्रा है। ऐसे ही मैंने अपनी काई गैया को नाम तुंगबिद्या रखो है, तो काई को इन्दुलेखा...। काई को रंगदेबी धर राख्यौ है, तो काई को सुदेबी धर राख्यौ है।” ग्वाले ने एक साँस में इब्राहीम की पूरी जिज्ञासा शान्त कर दी।
“फिर तो इनके बारे में जै भी पतौ होएगो कि जै सब कौन ही। मेरौ कहबै को मतलब ई है कि ललिता, विशाखा, चम्पकलता, चित्रा, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रंगदेवी और सुदेवी कौन ही?”
“कैसी बच्चों वारी बात कररे हो महाराज। अपने बंसी बारे की इन खास सखिन के बारे में तो ब्रज को बच्चा-बच्चा जानै है। महाराज, जाओ कथा खतम हेबे वारी है!” इतना कह अपनी गायों को हाँकता ग्वाला आगे बढ़ गया।
इब्राहीम भी कदम्ब के नीचे चल रही कथा की ओर बढ़ गया।
वहाँ जा कर इब्राहीम ने देखा कि एक कदम्ब की जड़ में पड़े पत्थरों के ढेर पर साँवली सूरत वाले श्रीकृष्ण का रखा मोहक चित्र, जिसके गले में गेंदे की माला पड़ी हुई है। जबकि उसके सामने धूप जल रही है। यमुना से थोड़ा हट कर बाँची जा रही श्रीमद्भागवत कथा के बीच धूप और कदम्ब की गन्ध चारों तरफ़ फ़ैली हुई है। इब्राहीम चुपचाप कथा सुनने वाले श्रद्धालुओं के पीछे जाकर बैठ गया, और सुनने लगा व्यास गद्दी पर बैठे कथावाचक द्वारा सुनाई जा रही श्रीमद्भागवत कथा।
“...एक जगह कहा गया है कि ‘दिल कहता है मेरी सुन और मन कहता है मेरी सुन’! भक्तो, यही वह द्वन्द्व है जिसमें समस्त मानव-जीवन की गति बँधी हुई है। मन और हृदय के इस द्वैत सुर के बीच झूलता हुआ व्यक्ति, न तो पूरी तरह अपने भीतर उतर पाता है, न ही बाहर की दुनिया में पूर्ण स्थिरता पा सकता है। इसी असमंजस में मनुष्य का सम्पूर्ण अस्तित्व उलझा हुआ प्रतीत होता है। मन वह है जो इन्द्रियों से जुड़ा हुआ है। अर्थात इच्छाओं, वासनाओं, तृष्णाओं, और अनगिनत विचारों का केन्द्र है मन। मन कहता है-सही-ग़लत सोचो, जबकि दिल कहता है-जो अच्छा लगे वही करो। यह द्वन्द्व कभी मित्रता में आता है, कभी प्रेम में। कभी धर्म में और कभी कर्म के चयन में... और चूँकि मनुष्य दोनों की सुनता है यानी थोड़ा दिल की, थोड़ा मन की, इसलिए न तो वह पूरी तरह प्रेम में उतर पाता है, न पूरी तरह नीति में टिक पाता है। यह बीच की स्थिति ही उम्र की सबसे बड़ी चोरी कर लेती है।
इस द्वन्द्व को न समझ पाने की वजह से जीवन में न जाने हम कितने अवसर चूक जाते हैं, कितनी सम्भावनाएँ दम तोड़ देती हैं, और कितनी प्रतिभाएँ समझौतों के अन्धकार में खो जाती हैं। एक ही व्यक्ति जीवन-भर अपने मन की गणना करता रह जाता है, और अन्त में पछताता है कि काश दिल की सुन ली होती! वहीं दूसरी ओर कोई दिल की सुनते हुए ज़िन्दगी के जोखिम उठा लेता है, और भले हार जाए, पर भीतर की सन्तुष्टि पा लेता है। यही सन्तुष्टि जीवन की वह उपलब्धि है जो किसी तर्क से नहीं, केवल भाव से मिलती है।
ध्यान देने योग्य बात यह है भक्तों, कि न तो मन पूर्णतः त्याज्य है, यानी उसे छोड़ा जा सकता है, और न दिल ही सर्वदा निर्दोष। मन की आवश्यकता विवेकपूर्ण जीवन के लिये है, और दिल की आवश्यकता आत्मिक-जीवन के लिये। पर जब दोनों की टकराहट होती है, तो कौन-सा मार्ग ठीक हो, इसका निर्णय अनुभव, साधना और आत्मविवेक से होता है। वही सन्त और ज्ञानी होते हैं जो इस द्वन्द्व को पार कर पाते हैं, जो मन को साध लेते हैं और दिल की गहराई से संवाद करते हैं। तो प्रेम से बोलो जय श्रीकृष्ण...राधे-राधे!”
कथावाचक के पीछे सारा समूह समवेत स्वर में बोल उठा- जय श्रीकृष्ण... राधे-राधे! कथा समाप्त होने के बाद प्रसाद बाँटा जाने लगा। इब्राहीम ने भी प्रसाद ग्रहण किया। लेकिन दूसरे श्रद्धालुओं की तरह वह वहाँ से गया नहीं, बल्कि कथावाचक को श्रीकृष्ण के चित्र और दूसरे सामान को समेटते हुए देखता रहा। इधर जैसे ही कथावाचक की नज़र उस पर पड़ी, तो उसने मुस्कराते हुए बोला, “लगे है ब्रज में नये-नये आये हो?”
“जी महाराज।”
कथावाचक को लगा सामने खड़ा व्यक्ति, जो एकटक उसके हाथ में पकड़े चित्र को देखे जा रहा है, उससे कुछ कहना चाह रहा है।
“कछु कहनो चाहबै हो?” इब्राहीम की दुविधा भाँपते हुए कथावाचक ने पूछा।
“पण्डित जी, एक बात कहनी है कि जा साँवली सूरतवारे की मनमोहिनी सूरत मेरे दिल में बस गयी है... वैसे याको कहा नाम है और जै कहाँ मिलेगो ? क्या आप मुझे याकौ पतौ बता सकते हो?”
इब्राहीम के इस भोलेपन पर कथावाचक मुस्करा कर रह गया। वह सोचने लगा कि वह इसको इसका क्या नाम बताये, इसके तो अनगिनत नाम हैं। उसे ऐसा कोई नाम नहीं सूझ रहा था, जिसे वह उसे बता पाए। सूझे तो तब जो इस नाम को नहीं जानता हो। एकाएक कथावाचक की जिह्वा पर एक नाम आया। यही सोच कर कि इस अनजान को टालने का इससे अच्छा उत्तर नहीं हो सकता, वह बोला, “भिया, याकौ नाम रसखान है।”
“और जे कहाँ मिलेंगे?”
“तप ब्रज में याकौ बास है।” कथावाचक ने पीछा छुड़ाने का प्रयास करते हुए कहा।
“और जै तप ब्रज कहाँ है?” रसखान ने कथावाचक की भाषा में पूछा।
अपने सामने खड़े एक अनजान का यह सवाल सुन कथावाचक भाँप गया, कि सचमुच इसे ब्रज के बारे में कोई जानकारी नहीं है। यही सोच उसने सरल रास्ता बताते हुए कहा, “ऐसो है, जा यमुना जी के किनारे-किनारे बस चलतो जइयो, चलतो जइयो! चलते-चलते सबते पहले यमुना जी के किनारे केशी घाट पड़ेगो। केशी घाट पे मदन मोहन मन्दिर, वईं चीर घाट और जुगल घाट पड़ेंगे। जब जे सब मिल जाएँ तो समझ लीजौ बस, जेई तप ब्रज है।”
“और जे कोई महाबन और बतायो!” इब्राहीम ने लगे हाथ उस जगह के बारे में भी पूछ लिया, जिसके बारे में उसने सबसे पहले सलीमगढ़ में उन चार जनों से पूछा था।
“सब वईं जाके पतौ चल जाएगो।” कथावाचक ने इब्राहीम से पीछा छुड़ाते हुए कहा और अपनी कथा का सामान समेट एक छोटी-सी बस्ती की तरफ़ बढ़ गया।
इसके बाद इब्राहीम भी अपनी दिशा की तरफ़ चल पड़ा। रास्ता उसने वही चिर-परिचित चुना यानी यमुना के किनारे-किनारे आगे बढ़ता रहा।
कथावाचक ने कथा के अन्त में मन और हृदय के द्वन्द्व की जो व्याख्या की, रास्ते-भर वह इब्राहीम के कानों में थपकियाँ देती रही। सबसे अहम् बात इस प्रवचन की उसे यह लगी कि जब मन और दिल में टकराहट होती है, और इनमें से कौन-सा मार्ग चुनना ठीक होता है; इसका निर्णय अनुभव, साधना और आत्मविवेक से किया जाना चाहिए। इसलिए जो इस द्वन्द्व को पार कर पाते हैं, मन को साध लेते हैं और हृदय की गहराई से संवाद करते हैं, वे ही सन्त और ज्ञानी होते हैं। सन्त और ज्ञानी की इस परिभाषा और व्याख्या ने जैसे इब्राहीम का आगे का रास्ता प्रशस्त कर दिया।
यमुना के किनारे-किनारे चलते हुए उसे रात हो गयी। एक जगह वह रुका तो यमुना पुलिन पर दूर तक फ़ैली रेत पर उसकी नज़र ठहर गयी। पूर्णिमा की छिटकती चाँदनी में अभ्रक के चमकते कणों की आभा जैसे देखते ही बन रही है। इब्राहीम की नज़र जब-जब अभ्रक के इन चमकते कणों पर पड़ती, तब-तब लगता जैसे असंख्य छोटे-छोटे तारे आकाश से विद्रोह कर यमुना के किनारे बिखरे हुए हैं। उसने झोले से मधुकरी में मिला खाना निकाला और उसे खाने लगा। खाना समाप्त कर वह यमुना के किनारे आया, और उसकी हल्की-हल्की लहरों के साथ अपने आड़े-तिरछे प्रतिबिम्ब के साथ अठखेलियाँ करने लगा।
सैयद इब्राहीम से पाँचों वक़्त की नमाज़ अब छूट गयी है। सबसे पहले इब्राहीम से फ़ज्र की नमाज़ छूटी और उसके बाद इशा की। इसके बाद कब ज़ुह्र की नमाज़ छूट गयी और कब अस्र की, उसे पता ही नहीं चला। जब ये चारों छूट गयी तो मग़रिब की नमाज़ अपने आप छूट गयी।
ब्रजरज का स्पर्श करने के बाद, यमुना अर्थात भगवती कालिन्दी के जल की शीतलता के स्पर्श-सुख से उन्मत्त समीर के मदिर कम्पन की अनुभूति होते ही, श्याम तमाल से उलझी लताओं की हरियाली का नयनों में आलोड़न होते ही इब्राहीम जैसे अपनी सुध-बुध खो बैठा। यमुना के जल की शीतलता के स्पर्श से ही उसके भावपूर्ण हृदय में प्रेमोवेग से कम्पन्न होने लगा। यहाँ के कण-कण से गूँजती अलौकिक सुरीली धुन ने उसे भाव-विभोर कर दिया। इब्राहीम यमुना की ठण्डी-ठण्डी रेत पर पसर गया, और चाँदनी में चमकती सूखी रेत को मुट्ठियों में भर-भर कर बच्चों की मानिन्द अपने ऊपर डालने लगा। अपने ऊपर गिरती यमुना की रेत, उसे रेत नहीं किसी झरने से गिरते पानी की तेज़ बौछारें जैसी लगीं।
तभी उसे कुछ दूर एक ऊँची जगह से आरती के साथ बजती घण्टियों की आवाज़ सुनाई दी। समझ गया वह कि कथावाचक ने जहाँ उसे भेजा है, वह जगह यहाँ से अधिक दूर नहीं है। रह-रह कर कानों में पड़ती आरती और घण्टियों की आवाज़ को सुनते हुए लगा जैसे ये आरती के नहीं, मस्जिद से आते इशा की अज़ान के बोल हैं। अचानक उसे ख़याल आया कि क्यों न आज तयम्मुम (मिट्टी से वज़ू करना) के बाद इशा की नमाज़ अदा कर ली जाए? यही सोच उसने काबा की तरफ़ मुँह किया और सचमुच वह नमाज़ अदा करने लगा। नमाज़ अदा कर वह फिर से रेत पर लेट गया, और कथावाचक द्वारा बताये गये नाम ‘रसखान’ को बुदबुदाने लगा, जो एकाएक एक तेज़ पुकार में बदल गयी। इब्राहीम देर तक इस नाम को दोहराता रहा। उसके बाद उसने अपना सामान उठाया और जिधर से आरती के साथ घण्टियों की आवाज़ आ रही थी, उस दिशा में बढ़ गया।
घना अँधेरा होने के कारण इब्राहीम को पता ही नहीं चल रहा है कि वह किस दिशा में चला जा रहा है। उसके कानों में तो ऊँची जगह पर होने वाली आरती और बजती घण्टियों की आवाज़ आ रही है, यमुना के किनारे-किनारे उसी तरफ़ हो लिया। देर तक चलने के बाद जैसे ही उसे कुछ टिमटिमाते छोटे-छोटे चकत्ते दिखाई दिए, तब कहीं जा कर उसकी जान में जान आयी। वह समझ गया कि आबादी अब अधिक दूर नहीं है। जैसे-जैसे छोटे-छोटे चकत्तों निकट आने लगे, इब्राहीम की गति भी बढ़ गयी।
एक जगह रुक कर उसने पहले लम्बी साँस ली, और फिर अपने दाहिने ओर देखा तो चाँदनी में नहायी एक मीनार जैसी आकृति दिखाई दी। हल्की-सी चढ़ाई चढ़ने के बाद कदम्ब के एक घने पेड़ के नीचे से आते हरे कृष्ण महामन्त्र की ओर बढ़ गया-
हरे कृष्ण हरे कृष्ण,
कृष्ण कृष्ण हरे हरे,
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे॥
महामन्त्र का जाप करते साधू की तल्लीनता में विघ्न डालना इब्राहीम को उचित नहीं लगा। वह वहीं खड़ा रहा और प्रतीक्षा करने लगा कि कब साधू का मन्त्र पूरा हो तथा कब वह उससे अपनी बात पूछे।
बहुत देर के बाद जैसे ही बीच में महामन्त्र ने थोड़ा साँस लिया, इब्राहीम साधू के करीब आया और झिझकते हुए बोला, “महाराज, जे कौन-सी जगह है?”
“भिया, जे बिन्दाबन कौ कालीयदमन घाट है।”
“कालीयदमन घाट, जे तो बड़ौ ही अजीब नाम है महाराज?” साधू को सुनाते हुए इब्राहीम ने स्वयं से कहा।
“ऐसो है, जा घाट के किनारे एक बृख ते मुरली बारै ने कालिया नाग के दमन के लिये जमना जी में छलांग लगाई ही। जेई किनारे हमारे मोहन ने कालिया दमन लीला रची ही और जमना जी में घुसके कालीय नाग ते जुद्ध करो हो ऊ हरायौ हो। पतौ है जब जे बात ब्रजराज नन्द जी और माँ ब्रजेस्वरी जसोदा मइया ने सुनी, तो वे दोनूँ दौरे-दौरे याँ आये। आते ही माँ जसोदा ने अपनौ लाल कान्हा अपने अँसुअन ते तर-बतर कर दीनौ। ऊ वाकै हाथ-पाँवन्ने छू-छू के ऐसे देखन लगी कि वाकै लाड़ले के कहीं कोई चोट तो ना आई है। तो भैया याही वजह ते याकौ नाम कालीयदमन घाट परौ है।”
“और जो पीछे ई गुम्बद-सी खड़ी है जे कोई मन्दिर है ?”
“हाँ, जे श्री राधा मदन मोहन जी को मन्दिर है।” साधू ने बताया।
“जाकौ मतलब ई भयो महाराज कि यई बिन्दाबन है।” इतना कह इब्राहीम साधू के समीप बैठ गया।
“तू तो भिया मोहे कोई परदेसी-सो लगे है?”
“हाँ महाराज, कछु ऐसोई समझ लेओ।” फिर कुछ पल रुक कर इब्राहीम बोला, “महाराज तनिक ई बता सको हो कि या बिन्दाबन में ई रसखान कहाँ मिलेगो?”
“भिया ई कौन है?”
इब्राहीम को लगा कि साधू को इस नाम के बारे में नहीं पता। इसलिए उसने सोचा कि कल सुबह वह लोगों से इसके बारे में पूछेगा। वैसे भी लगता है बहुत रात हो गयी है। यही सोच वह वहाँ से उठा और द्वादशादित्य टीले पर बने राधा मदन मोहन मन्दिर की ओर बढ़ गया। उसी टीले की ओर जिस पर मुल्तान के एक नमक व्यापारी रामदास कपूर और उड़ीसा के राजा ने इस मन्दिर को बनवाया था। रात काफ़ी हो चुकी है। बीच-बीच में बस कोई हल्की-सी आवाज़ आती। मन्दिर की सीढ़ियों से होते हुए वह उसके खुले प्रांगण में आया, और मन्दिर की दीवार की तरफ़ सरहाना कर बग़ल में झोले को लगा वहीं सो गया। कार्तिक महीने के शुरुआती दिन हैं इसलिए कम ठण्ड के चलते उसे तुरन्त नींद आ गयी।
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