मधु कांकरिया का उपन्यास अंश ‘रास्ते बंद हैं सब, कूचे कातिल के सिवा'


मधु कांकरिया 


नियम कानून इसलिए बनाए गए जिससे समाज में कोई अराजकता न रहे और उस का संचालन सुचारु रूप से हो सके। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो इन नियम कानूनों क़ा दुरुपयोग अपने संकीर्ण स्वार्थों के लिए करते रहे हैं। उन्हें इस बात की परवाह नहीं होती कि वे जो कर रहे हैं वह गलत तो है ही, इससे किसी और की जिंदगी पर बुरा असर पड़ सकता है। एक झटके में ही निर्दोष व्यक्ति अपराधियों की पंक्ति में खड़ा दिखता है। यह उस व्यक्ति की जिम्मेदारी होती है कि वह खुद को निरपराध साबित करे। व्यवस्था से जुड़े लोग भी इसका फायदा उठाते हैं। पुलिस, थाना, कचहरी और अदालत से जुड़े लोग भी इसका फायदा उठाते हैं। मधु कांकरिया लीक से अलग हट कर लेखन करती हैं। आजकल वे जो उपन्यास लिख रही हैं उसमें इस मुद्दे को उन्होंने बखूबी अपना विषय बनाया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं मधु कांकरिया का उपन्यास अंश ‘रास्ते बंद हैं सब, कूचे कातिल के सिवा'।


उपन्यास अंश 

‘रास्ते बंद हैं सब, कूचे कातिल के सिवा'


मधु कांकरिया


बकौल शेक्सपीअर यदि ‘जिंदगी एक मूर्ख द्वारा कही गयी कथा है' तो इस कथा का मूर्ख मैं ही हूँ। सच यह भी कि जीवन की मार से उपजी और वक़्त के बेरहम धागों से बुनी हुई यह वह कहानी है जिसे मैं कहना नहीं चाहता था। चाहता था कि वक़्त की ईंटों के नीचे ही दबी रहे यह कहानी। हार की जीत कहानी के नायक बाबा भारती ने डाकू से कहा था - इस घटना को किसी के सामने प्रकट नहीं करना नहीं तो लोग गरीबों पर विश्वास करना छोड़ देंगे। मेरे मन में भी दुविधा थी - इस घटना को कहूँ या न कहूँ। पर एक अर्थ में यह घटना मेरे मनुष्य होने का प्रारम्भ थी इसलिए भी मुझे इस घटना का उल्लेख करना जरूरी लगा। 

सत्य सदैव सुन्दर होता है ऐसा बुद्ध ने कहा था। और सत्य यह भी कि हर कहानी कहानीकार का अपना सत्य होती  है बल्कि वह भी सम्पूर्ण सत्य नहीं बल्कि सत्य का एक टुकड़ा भर होती है, एक जलता हुआ लम्हा जो जिंदगी की धुन  बदल कर रख दे। किसी पुलिस अफसर, किसी दिलजले पड़ोसी या किसी न्यायाधीश की तर्जनी की एक हरकत, जरा सी जुम्बिश आपके जीवन और मृत्यु का फैसला  कर देती है।

जिंदगी नामुमकिनात का दूसरा नाम है।   

हम भी बस उस एक पल में ही सारा जहाँ हार बैठे थे। 

जैसे कंप्यूटर में एमिनेशन होता है और पलक झपकते ही इंसान इंसान से नुकीले दांतों और पंजों वाला खूंखार हिंसक शेर में बदल जाता है, जैसे कोई होलोग्राफिक इमेज की तस्वीर हो जहाँ कोण बदलते ही दृश्य बदल जाता है जबकि तस्वीर वही रहती है वैसे ही पुत्र तुल्य पड़ोसी एक ही पल में मेरे खून का प्यासा दरिंदा बन गया। जिंदगी पल भर में ही राख हो गयी, 'तुम्हारे पास जितना ही अधिक होगा, तुम ख़ुद उतने ही कम होगे, मार्क्स ने कहा था कभी लेकिन हम तो आज कम होते होते जीरो हो गए थे।

मन में पसरे डर की भी कहानी है यह जब चीलें हमारे घर पर मंडराने लगी थी जबसे मेरे पर वह घिनौना आरोप लगाया गया था। 

समय किसी पागल सांड की तरह मेरा पीछा कर रहा था। 

जीवन जीवन जैसा था, शांत था, कहीं से कोई अशिष्ट लहर नहीं उठ रही थी कि तभी चिड़िया ने बीट कर दी और एक आशातीत अनागत आ धमका हमारे द्वार। देखते ही देखते बिल्ली पंजा मार गयी हमारी खुशियों पर। एक फूंक और बुझ गयी लौ जिंदगी की। मैं हवालात में। लगा जैसे हनुमान जी ने फिर से सूरज निगल लिया है, समय स्थिर हो गया है। दिन रात सब रुक गए हैं। नियति ने चलती जिंदगी का दरवाज़ा बंद कर दिया है, जो भी दुनिया में अच्छा है - धूप, हवा, चांदनी सब उस पार है। इस पार मैं हूँ और मेरे साथ है मेरे समय का खालीपन और अँधेरा। पता नहीं आने वाला पथ कैसा होगा? जाने कितनी रातें गुजारनी पड़ेगी हवालात में। मैं अकेला प्राण! अकेला मन!  लेकिन फिर भी एक विश्वास तो था ही कि अच्छाई की संभावना बुराई की सम्भावना से बहुत अधिक होती है। 

सीखना होगा धीरे-धीरे शरीर से निस्संग होना। अपने को स्थगित करना!


रात की रात पहली जो पंक्ति मैंने अपनी डायरी में लिखी वह यह थी की - ईश्वर नहीं है, यदि होता तो क्या छू मंतर की तरह उग आता इतना घिनौना इल्जाम? रोम रोम सुलग रहा है यह सोच कर कि मैं और मेरी पत्नी दोनों निस्संतान, हमने उसे प्राणों से बढ़ कर पाला, ममता दी, मेरी पत्नी की आत्मा का फड़फड़ाता टुकड़ा थी वह जिस पर वह अपनी पाई पाई खर्च कर देना चाहती थी और मैं? मेरा भी अरमान था कि जमाने की धूप तक उस पर नहीं पड़ने दूंगा, उसने मेरे लिए क्या ऐसा कहा होगा? उसी की माँ ने उसके कहने पर (सच्चाई तो सिर्फ ऊपर वाला ही जानता है दुनिया को तो प्रमिला ने यही बताया कि उसकी पांच वर्षीय बेटी ने मेरे लिए ऐसा कहा) मुझ पर ऐसा घिनौना आरोप लगाया। मुझ पर यदि किसी ने मर्डर का आरोप लगाया होता तो भी मुझे इतना दुःख नहीं होता। जितना इस आरोप ने लगाया। कुछ घाव ऐसे होते हैं जिनका कोई मलहम नहीं होता। 

                  

मन रह रह कर चीख रहा था कि क्या यह ही वह इंसान है जिसके लिए कहा जाता है ‘मानव तुम सबसे सुन्दरतम' पर तभी ख्याल आया कि जिन्होनें प्रमिला की बात पर विश्वास कर लिया होगा वे आज मेरे लिए भी कुछ ऐसा ही सोच रहे होंगे। 

मैं फिर गहरी उदासी से घिर गया।

इस घिनौने आरोप ने जिंदगी से सारे उजाले छीन  लिए। मेरे अतीत, मेरे सारे वजूद, चरित्र, भरोसों पर उसने पोंछा लगा दिया। रूह कोने में मुंह छिपा कर बैठ गयी। धरती जगह देती तो मैं उसमें समा जाता। पुलिस कस्टडी में मुझे विन्सेंट वॉन गॉग की याद आयी। जीवन की संध्या में अवसाद में चले गए थे वे। इस अवसाद को और गहराया प्रेमिका ने जिसने उनके प्रेम प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। उनकी मानसिक अवस्था इस कदर बिगड़ी कि उन्हें पागलखाना में भेजना पड़ा। वही पागलखाने की खिड़की से उनकी नजर पड़ी सामने दूर दूर तक फैले गेहूं  के खेतों पर। बस इसी दृश्य को उन्होंने चित्रित किया और जो ‘वीट फील्डस विथ क्रो' नाम से बाद में विश्व की अप्रतिम चित्रकृति में से एक हुई। सत्रह दिनों के बाद विन्सेंट वैन गोग ने खुद को उसी गेंहू के खेतों में गोली मार दी।



मेरे भीतर तूफ़ान उठ रहा था।विडंबना थी कि मैं कुछ कर भी नहीं सकता था। सूखे पत्तों की तरह खुद को मैंने हवाओं के हवाले किया। 

कहाँ चूक हुई हमसे? काश कहीं से तीसरी आँख मिल जाए जो दिखा दे मुझे मेरा दोष! जी कर रहा था कि मैं जोर जोर से चीखूँ या दीवार से अपना सर फोड़ लूँ। इस घिनौने आरोप से बढ़ कर दुनिया का कोई भी दुःख नहीं था। शरीर की एक एक नस तड़क रही थी। उफ्फ! किस जन्म की दुश्मनी निकाली पडोसी ने? क्यों लगाया ऐसा आरोप? अब हमारी दुनिया में न बादल बरसेगा, न सूरज चमकेगा। सब कुछ रुक गया था। दुनिया में और कुछ नहीं है, कहीं कुछ नहीं है। हमारा सारा संसार जैसे उस एफ आई आर (FIR) पर ठहर गया था और जिंदगी सवालों के नोक पर टंग  गयी थी। एक अंतहीन रात की शुरुआत हो चुकी थी। 

यदि मैं वह नहीं जो मैं हूँ तो मैं कुछ नहीं - कहा था वर्जीनिया वुल्फ ने। आज मैं कुछ नहीं रह गया था।  

मैं हर वक़्त आशंकाओं, इच्छाओं, कामनाओं और मनुष्य की प्रवृति के बारे में सोचता रहता।प्रचुर पैसे मैंने कमाए थे पर आज वो पैसा मुझे किसी भी प्रकार की सुख शांति नहीं दे रहा था। जिंदगी सवालों के नोक पर टंग गयी थी। मुझे लगा था कि अपने आचरण से मैं एक सम्मानित व्यक्ति हूँ और मेरे समर्थन में कम से कम वे लोग तो अवश्य ही आएँगे जो मुझे लम्बे समय से जानते हैं। लेकिन इस नाजुक समय में भी कुछ अच्छे पड़ोसियों ने भी चुप्पी साध ली क्योंकि निर्भया काण्ड के बाद माहौल ही कुछ ऐसा हो गया था कि हर मामले में शंका के घेरे में सबसे पहले पुरुष ही आ रहा था। अंगुली पुरुष पर ही उठ रही थी। सवाल यह भी था कि पांच वर्षीय अबोध बालिका झूठ क्यों बोलेगी? एक ने कहा भी कि बच्चे भगवान का स्वरूप होते हैं वे झूठ नहीं बोलते। मैं कहना चाहता था, 'बच्चे भगवान् का स्वरूप नहीं बारिश की बूँद की तरह स्वच्छ और पवित्र होते हैं पर तभी तक जब तक वे धरती की गंदगी के सम्पर्क में नहीं आ जाते।'

पर मैं कह नहीं सका। कहीं पढ़ा था कि सत्य जब तक जूते पहनता है झूठ सारे शहर में चक्कर काट कर आ जाता है। मेरी ‘करतूत' पूरे मकान और  आस पास के लोगों तक खूब नमक मिर्च के साथ पहुंच चुकी थी। मेरे अपने लोग भी अब मुझे पुलिसिया और शक की निगाहों से देखने लगे थे। जैसे आदिवासियों में होता है न कि उनके बीच जैसे ही किसी महिला को डायन घोषित कर दिया जाता है फिर उसके पति,पुत्र और परिवार तक की संवेदनाएं उसके लिए मर जाती है वह स्त्री से डायन बन जाती है। मेरे मामले में अंतर सिर्फ इतना था कि मेरा अपना परिवार मेरे साथ था। बिना किसी अपराध के इस भूचाल ने मेरा सब कुछ लील लिया था। मौत का दुःख मैं सहन कर सकता था क्योंकि उसके साथ अपमान नहीं जुड़ा होता, पर यह दुःख? यह लांछन तो असहय था।

कुछ पड़ोसियों के लिए यह मामला संगीन था तो कुछ के लिए रंगीन। कुछ पडोसी तो ऐसे भी थे खुद जिनकी बेटियां हमारे यहाँ घंटों रहती थी कभी किसी की माँ छोड़ जाती रागिनी के पास तो कभी किसी को हमारे बड़े से हाल में साइकिल चलाना होता। तो कभी किसी को हमारे कम्प्यूटर की जरूरत पड़ जाती। मेरी पत्नी रागिनी को बच्चों से स्वभाविक प्रेम था इसलिए वह सबका स्वागत करती। उसे यह अहसास भी सुख देता था कि उसके सूने आँगन में बच्चों की हंसी गूँज रही है।  क्या कभी उनकी बच्चियों के साथ कुछ अनुचित हुआ? पर कोई सामने नहीं आया। सबकी आँखें धुंधला गयी थी। मोतियाबिन्दी आँखों से साफ़ दिखे भी कैसे?

हमारी एक पड़ोसिन थी श्रीमती महेश्वरी। हर सुबह जब मैं प्रातः भ्रमण के लिए निकलता, वे मंदिर के लिए बस स्टैंड पर खड़ी मिलती। सुबह के समय बस, ट्राम काफी देर से आती तो मैं अक्सर उन्हें मंदिर छोड़ देता। कई बार पत्नी उलाहना भी देती कि उनके चक्कर में हमें देर हो जाती है और लौटते लौटते धूप निकल आती है। जब भी वे मइके जाती अपनी प्यारी सी बेटी को हमारे यहाँ छोड़ जातीं। वे श्रीमती माहेश्वरी भी तात्कालिता के प्रभाव में प्रमिला के साथ खड़ी मुझे गरिया रही थी। दरअसल जब भी ऐसे आरोप किसी पुरुष पर  लगते हैं तो लोगों की सारी सहानुभूति स्त्रियों के साथ ही होती हैं। मैं पूछना चाहता था श्रीमती महेश्वरी से कि क्या आपके या आपकी बेटी के साथ मैंने कभी कोई गलत व्यवहार किया? पर मैं किस-किस का मलबा साफ़ करता? सब अपनी खाल के बाहर आ चुके थे। शायद इंसान वही विश्वास करता है जो वह करना चाहता है। 

उक्त घटना के सप्ताह भर बाद श्रीमती महेश्वरी को अपनी भूल महसूस हुई और उन्होंने रागिनी से माफ़ी भी मांगी। उसके शब्द थे - प्रमिला के आंसू ने मुझे कुछ और सोचने ही नहीं दिया। 

विडंबना यह भी थी कि बारह फ्लैटों वाली हमारी बिल्डिंग में पांच फ्लैट वाले प्रमिला और कुणाल के रिश्तेदार थे और एक से उनके व्यापारिक संबंध भी थे इस कारण  वे मुझे जानते हुए भी नहीं जानते थे। सब पहले से कहीं अधिक हिंदुस्तानी हो गए थे और सच्चे हिंदुस्तानी की तरह हर कोई अपनी आँखों से नहीं बल्कि कानों से देख रहा था। कानों से देख ही नहीं रहा था बल्कि सच्चे कथाकार की तरह कथ्य और सत्य का निर्माण भी कर  रहा था। कुछ पड़ोसी कम पड़ोसी हो गए थे और सृष्टि के साथ हुए तथाकथित दुष्कर्म के लिए मुझे गरिया रहे थे। वे बंजर हो गए थे। कुछ ज्यादा पड़ोसी हो गए थे और उन्होंने समझदार चुप्पी चुन ली थी।           

बिल्डिंग में कुछ दिन पहले ही मेरा पंगा हो चुका था। हमारी बिल्डिंग के सामने सरकारी नलके के पास ही पानी संग्रह करने के लिए सीमेंट की खुली चौड़ी सी टंकी बनी हुई थी। दिन भर हाथ रिक्शे वाले, ठेले वाले, मुटिया मजदूर वहां स्नान करते रहते थे। हमारी बिल्डिंग के लोगों ने प्रस्ताव रखा कि बिल्डिंग की सुरक्षा के मद्देनज़र इस टंकी को हटवा दिया जाय। मैंने इसका पुरजोर विरोध किया था। मेरा कहना था कि ये गरीब गुरबा नहाने को कहाँ जाएंगे? ये कोई अपराधी भी नहीं, इनमे से अधिकांश बिहार और यू पी से रोटी की तलाश में आए मजदूर और कामगार लोग हैं। 

मेरा विरोध कइयों को रास नहीं आया था। 

हमारी बिल्डिंग के भूतल से सटी हुई एक घडी की दुकान थी जिसका मालिक कोई मुस्लिम था। बिल्डिंग वाले उस दुकान को तुड़वाना चाहते थे जबकि उसकी दुकान वैधानिक ढंग से हमारी बिल्डिंग बनने से पहले से ही बनी हुई थी। पर बिल्डिंग वालों को उसके मुसलमान होने से ही आपत्ति थी। मैंने उस समय भी बिल्डिंग वालों को समझाया था कि हमें मुसलमानों के प्रति यह राग द्वेष नहीं पालना चाहिए। 

बिल्डिंग में छत पर लोग कबूतरों को दाना देते थे। मुझे दाना देने से आपत्ति नहीं थी। पर कई परिवार के लोग जिसमें मेरा परिवार भी शामिल था, वे सब घर के बचे हुए भोजन जैसे दाल भात, रोटी के टुकड़े वगैरह भी छत पर डाल देते।इससे छत छत न रह कर कूड़ा घर बन गयी थी।  मैंने जब इसका विरोध किया तो कइयों की धार्मिक आत्मा मुझे गरियाने लगी। एक परिवार तो इसीलिए मेरा दुश्मन बन बैठा कि अक्सर वह खिड़की जंगलों की सफाई करते वक़्त इतना पानी उंडेलता कि नीचे चलने वालों के सर पर पानी गिरता। एक बार तो बालकनी में सूखते हमारे कपड़े तक गीले हो गए। मैंने इसका भी विरोध किया था। 

आज वे विरोधी अपना पुराना हिसाब निपटा रहे थे। मौका मिला था, चौक्का-छक्का लगा रहे थे।समय के साथ हम किसी चिंतनशील बौद्धिक समाज में नहीं बस एक आत्मविहीन भीड़ में तब्दील हो गए थे।  

***

भरोसे के सारे शीशे एक एक कर तड़क रहे थे। पड़ोसी कोई नहीं रहा था। लग रहा था जैसे मैं एक बीमार नगरी में रह रहा हूँ जहाँ कुछ सड़ रहा है, जहाँ सोचने वाला कोई नहीं है, बस हैं धारा के साथ बहने वाली कुछ मरी हुई मछलियां। 

संसार में सिर्फ दो व्यक्ति जानते थे मेरी सच्चाई - एक मैं खुद और दूसरी प्रमिला। इन हालातों में गाँधी भी प्रमिला थी और गोडसे भी वही थी। प्रमिला ने शायद गोएबल्स को नहीं पढ़ा था या शायद पढ़ लिया था पर वह अनायास ही उसका अनुकरण कर रही थी कि एक झूठ को इतनी बार बोलो कि वह सत्य लगने लगे। मेरे सारे भरोसे, आस्था, सदभावना, सत्य अनाथ हो गए थे। अपमान का बिच्छू घडी-घड़ी डंक मार रहा था। उफ्फ, किस पेड़ से लिपट कर कहूँ मन की वेदना? किस बोधिवृक्ष के नीचे बैठ पाऊं ज्ञान, शांति? आत्मा की खुरचन तक में जहर खुल गया। 

सबकी वीरान आँखों को देख लगता परिवार के पूरे चेहरे  पर ही जैसे कालिख पोत दी हो किसी ने!

मौ सम कौन कुटिल फल कामी!

‘आई विल इम्प्लिकेट यू बास्टर्ड!’ मेरी आँखों में अपनी गोल गोल खूंखार आँखों से खंजर भोंकते हुए कहा था मेरे उस पड़ोसी के साले ने। जो पड़ोसी अभी तीन  दिन पहले तक मुझे अंकल अंकल कहते नहीं थकता था। हर त्योहार पर मेरे चरण स्पर्श करता था। वही कुणाल मुझे इस कदर घूर रहा था जैसे अपनी पैनी नजरों से मेरी सारी  शक्ति चूस लेगा। 

और आज!

कल सुबह पडोसी कुणाल और उसकी पत्नी प्रमिला ने मेरी भाभी से सम्पर्क किया और क्रोध में उबलते हुए अदृश्य मिसाइल फेंकते हुए अपनी लड़ाकू आँखों से भाभी को घूरते हुए कहा -"तुम्हारे देवर ने सृष्टि की सू सू की जगह में अंगुली घुसेड़ी है इतनी जोर से कि उसे गहरे घाव हो गए हैं और वह रात भर सो भी नहीं सकी।"

भाभी ने कहा - यह सम्भव नहीं है फिर भी मैं कहती हूँ कि चलिए डॉक्टर के पास, लड़ाई हम बाद में भी लड़ लेंगे पर सबसे पहले सृष्टि की सुरक्षा जरुरी है। चलिए पास में ही है एक चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉक्टर। 

पर उन्हें डॉक्टर के पास जाने में कोई भी दिलचस्पी नहीं थी। उन्हें दिलचस्पी थी मुझे बदनाम करने और बिल्डिंग के छकड़ा भर लोगों से अधिक से अधिक सहानुभूति बटोरने में, बात को फैलाने में। इसी बीच भाभी ने देखा, सृष्टि मजे में उछल कूद कर रही थी। उन्होंने कहा भी कि सृष्टि को देख कर तो लगता नहीं कि वह गहरे दर्द में है। 

प्रमिला ने कहा - बच्ची है, बहुत रो रही थी तो मैंने यह नया खिलौना दे दिया, उसको देख दर्द भूल गयी है। मेरी भाभी ने यह भी कहा कि अभिमन्यु भाई के फ्लैट की एक डुप्लीकेट चाबी तो हमेशा से आपके पास ही रहती है जरा सोचिये यदि वे ऐसा करते तो क्या अपने फ्लैट की चाबी आपके पास रखवाते? फिर उनके घर का दरवाज़ा तो सुबह शाम दोनों बेला खुला ही रहता है क्योंकि हम लोगों का दोनों घरों में आना जाना लगा रहता है, कुछ तो दिमाग लगाओ ,क्या खुले दरवाज़े में यह सब किया जा सकता है? अभिमन्यु भाई के घर का दरवाज़ा सिर्फ दोपहर के समय बंद रहता है जब सब बाई काम कर चली जाती हैं। लेकिन मेरी भाभी की किसी भी बात में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं थी।



और इसके साथ ही बज गया बिगुल युद्ध का!

घर में पसर गयी एक घायल अशांति। कल दिन भर वे हम लोगों पर दवाब बनाते रहे कि हम यह फ्लैट महीने भर के भीतर खाली कर चले जाएं नहीं तो इसका अंजाम भुगतने को हम तैयार रहें। उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया में भी उनकी खासी जान पहचान है और वे मेरे मुंह पर काला कपडा डलवा कर मुझे टीवी के सामने पेश करेंगे। उनकी मीडिया में जान पहचान थी यह मुझे पता था, वे रसूख वाले ताकतवर लोग थे। कोलकाता का नामी डायरेक्टर अनिल धानुका भी उनकी रिश्तेदारी में था। खुद  कुणाल का बड़ा भाई उन दिनों कलर  टीवी का चीफ रह चुका था। (यह बात अलग है कि बाद में अर्णव गोस्वमी के केस में गलत तरीके से टी आर पी बढ़वाने के चक्कर में वह भी पंद्रह दिन हिरासत की हवा खा कर आ गया था और आज भी एफ आई आर (FIR) में  उसका नाम है)। उसी समय मैंने सुना था पॉक्सो एक्ट के बारे में। अनिल धानुका अन्याय और असामाजिक तत्वों के खिलाफ फिल्म बनाने वाले निर्माता के रूप में मशहूर हो चुके थे। कुणाल और प्रमिला ने अपनी बेटी के साथ जो तथाकथित दुष्कर्म मेरे द्वारा हुआ उसकी सूचना अनिल धानुका तक भी पहुंचा दी थी। एफ आई आर की एक रात पहले कुणाल उन्हें भी आधी रात मेरे घर ले कर आया था। मैंने सज्जनतावश उन्हें हाथ जोड़े तो जवाब में उन्होंने मुझे जम कर कई थप्पड़ जड़ दिए थे। उन थप्पड़ों ने मुझे चोट बिलकुल नहीं पहुंचायी थी और न ही उस वक़्त मुझे जरा भी दर्द महसूस हुआ था। पर उस थप्पड़ ने मेरे भीतर किसी चीज को तोड़ कर मुझे पराजित कर दिया था। मैं समझ गया था कि  जहर अपना असर कर रहा है। 

**

दूसरे दिन घर वालों को  यह  सब पता चला तो यह सब सुन वे बहुत डर गए थे। तापमान बढ़ता जा रहा था। 

उस पर खतरनाक पॉक्सो कानून!

झंडा - डंडा सब उनके साथ!

हम पुलिस के नाम से ही डरने वाले लोग थे। हमारे अभी तक के जीवन में कभी छोटी सी भी आपराधिक घटना नहीं घटी थी और अब जेल  की आशंका? घर वाले तैयार हो गए थे फ्लैट तक छोड़ देने के लिए। माँ और बड़े भाई ने कहा - भाग्य में होगा तो इससे भी शानदार फ्लैट हम फिर बना लेंगे। पर हम तुम्हारे जेल जाने का खतरा मोल नहीं ले सकते। पर मैं अड़ा रहा कि जब मैंने कुछ किया ही नहीं तो क्यों खाली करूँ फ्लैट? बगावत वैसे भी मेरी माटी में ही थी। कुछ बंगाल की माटी का प्रभाव और कुछ बड़े भाई की संगत। संघ और शाखा में मैं विद्रोही के नाम से बदनाम भी था फिर यदि आज जेल के डर से मैं उस अपराध को कबूल कर लिया जिसे मैंने किया ही नहीं तो खुद अपने से क्या नजर कभी भी मिला पाता? फिर हमें एक नहीं दो दो फ्लैट खाली करने पड़ते क्योंकि बड़े भाई भी पास के फ्लैट में ही रहते थे और मेरी माँ भी मुझे अकेले नहीं जाने देने वाली थी। फिर आनन् फानन में फ्लैट खाली करते तो दाम भी क्या मिलते? 

एक बार मेरे दिमाग में यह भी आया कि यदि हम चले जाएंगे तो हमारे दोनों फ्लैटों को कहीं कुणाल और प्रमिला अपने रिश्तेदारों या भाइयों को ही न दिलवा दे। क्योंकि भाइयों के साथ प्रमिला का साझा ज्वेलरी का बिजनेस भी था। भीतर यह दुष्ट भाव भी आया कि कहीं यह सब फ्लैट के लिए तो नहीं? मैं मरता मर जाऊंगा पर अपने नाम पर आंच नहीं आने दूंगा। मैंने घर वालों और मकान वालों को ही अपना दो टूक फैसला सुना दिया। उनके पास रसूख वाले लोग हैं तो मेरे पास मेरा सत्य है। 

        

सौ सवालों का एक सवाल! क्या हम पर एफ आई आर होगी?

लगता तो नहीं था। 

आशंका यह भी थी कि वे एफआइआर जैसा कुछ करने वाले नहीं हैं। उनका मकसद है हमें डराने का और रागिनी की अक्ल ठिकाने लगाने का जिससे सृष्टि के प्रति जो उसका गैर जिम्मेदाराना और अतिशय लगाव है उसे विराम लग जाए। 

***

बहरहाल। उसके बाद जो हल्ला बोल और पत्थर बारिश शुरू हुई कि इसने हमारे आत्मविश्वास की धज्जियां उड़ा कर रख दी थी। दृश्य वही थे पर दृष्टि बदल गयी थी। लोग वही थे पर अब वे अजनबी बन गए थे। बेपेंदे के लोटे सा लोगों का भरोसा! देखते-देखते मैं संदिग्ध हो गया था। मकान के कुछ लोग जो कल तक मुझ पर भरोसा कर रहे थे। प्रेमपूर्वक व्यवहार कर रहे थे इस घटना के बाद एकाएक उनकी भी कल्पना की बदरंग खिड़कियां खुल गयी थी। वे भी आज मुझ पर थूक रहे थे! सबकी सहानुभूति पड़ोसी की बेटी की तरफ थी, पहली बार अहसास हुआ कि पुरुष होना ही अपने आप में गुनाह हो गया है। 

पहली बार यह भी समझ में आया कि व्यक्ति ही नहीं समाज के भी नुकीले नाखून और खूनी पंजे होते हैं। 

पर शायद यही मनुष्य होना भी है। किसे दोष दूँ? उन्हें या या उस समाज को जिसकी देन हैं वे!

रागिनी का हाल यह था कि गैस पर दूध चढ़ा उफ़न रहा है वह जाने किस ख्याल में है। कई  बार तो रोटी भी तवे पर जल गयी। कई बार उसने पानी का नल ही खुला छोड़ दिया। मैं सोच नहीं पाता कि उसकी चिंता किसके लिए ज्यादा थी। मुझ पर लगे आरोपों पर या सृष्टि से बलात दूर किये जाने पर? उससे बात करना भी आसान नहीं था। मुंह खुलने के पहले ही उसकी आँखें बहने लगती।                

घर में उन दिनों ईश्वर बहुत अधिक हो गया था। उस दिन सुबह मैं परेशानी में घर में चक्कर काट रहा था कि अम्मा ने जोर जोर से भक्ताम्बर का टेप लगा दिया, मैं यूं भी परेशान था, मेरा माथा भन्ना गया, मैंने कहा - बंद करो इसे। अम्मा चालू हो गयी, खरखराती हुई बारीक आवाज़ में कहा उन्होंने।

धर्म का नाम तुम लोगों को नहीं सुहाता है न! इसीलिए आयी है यह विपदा! यह कष्ट निवारक है पर तुम लोग क्या समझोगे इसे? पत्नी ने भी अम्मा का पक्ष लेते हुए मुझे ही कटघरे में खड़ा कर दिया। हर वक़्त भगवान और गुरुदेव का अपमान करते हैं, दोष तो लगता ही है। 

हे भगवान! मैंने माथा पीट लिया। जिस पत्नी के चलते आज यह सब भुगत रहा हूँ वह भी इस अवस्था के लिए कहीं-कहीं मुझे जिम्मेदार ठहरा रही है कि मैं माँ और पत्नी की तरह धार्मिक कर्मकांड में हिस्सा नहीं लेता।           

भींगी बिल्ली की तरह अभी तक दुबका बैठा बड़े भाई प्रशांत का आक्रोश फड़फड़ाया। हाथ जोड़ कर अपने पपड़िया ओठों पर जीभ फेरते हुए विनती की - भगवान् के लिए घरेलू झगड़ा और दोषारोपण बंद करो, लोग हम पर थूक रहे है! यह समय साथ निभाने का है। झगड़ने का नहीं।  

ओह, किस समुद्र में जा कर डूब जाएं हम?

लग रहा था जैसे जिल्लतों, षड्यंत्रों, दुश्मनियों और भविष्यहीनताओं का एक मकड़जाल चारों तरफ बन गया है, कैसे निकलें इससे बाहर?

सुबह से शाम घिर आयी थी, बाहर का अँधेरा भीतर के अँधेरे से मिल गया था। मकान वाले वही  देख रहे थे जो उन्हें दिखाया जा रहा था। 

हर घर में इंसान से ज्यादा भगवान् रहते थे इसलिए लोग तर्क के आधार पर नहीं पड़ोसी होने के आधार पर अपने पड़ोसी धर्म का साथ निभा रहे थे। 

देखते-देखते सब कुछ बदल गया था। मुझे कुछ भी अच्छा लगना  बंद हो गया था। मेरे लिए मानव सभ्यता का सारा दायरा सिर्फ़ मेरे ऊपर लगे लांछन तक सीमित रह गया था तो मेरे पड़ोसी के लिए इंसानी दायरा सिर्फ मेरी बर्बादी में था। 

****

चार्ली चैपलिन कहा करते थे कि 'दूर से देखें तो जिंदगी कॉमेडी नजर आती है और पास से देखो तो ट्रेजेडी।'

कितना दिलचस्प मंजर था न! कल के दो घनिष्ठ पडोसी, दांत काटी दोस्ती वाले, पिता पुत्र जैसे लेकिन आज मैं उनके लिए ऐसा दुश्मन हो गया कि ओसामा बिन लादेन भी अमेरिका के लिए क्या रहा होगा। 

आज के पहले शायद ही मैंने कभी  सोचा हो, जीवन के बारे में। क्या है जीवन? क्या है इसकी सिद्धि? इसका प्राप्य? इसका अर्थ। इस घटना की चोट से जैसे सब कुछ एकाएक दीप्त हो उठा है। इस यातना की तीव्रता ने जैसे मुझे ही नहीं पूरे परिवार को दृष्टा बना डाला हो।

आत्मा की आत्मा तक में घुल गया जहर जब प्रमिला के भाई ने चेहरे पर जल्लाद किस्म की क्रूरता और हिकारत के भाव से देखते हुए बंदूक की तरह अंगुली मुझ पर तानते हुए कोंचा - 'वी विल इम्प्लिकेट यू बास्टर्ड'। मैं सन्न था जैसे मरी छिपकली गिर गयी हो बदन पर, मैं जो कुछ कहा गया था उसकी गंभीरता समझने की कोशिश करने लगा। वे अपनी आँखों में सात्विक आक्रोश लाने की कोशिश करते रहे  पर उनकी आंखें इतिहास की सबसे क्रूर आँखों में तब्दील हो रही थी।                

उनका फड़फड़ाना बढ़ता जा रहा था। उन पर ताकत का नशा तारी था। नाख़ून और दांत नुकीले होने लगे थे। तीन दिन पहले का प्यारा अंकल हर होली दीपावली जिसके वह चरण स्पर्श करते नहीं थकता था वह आज बास्टर्ड बन गया था। एक छि: में तब्दील हो गया था। मेरी चौरासी वर्षीया माँ ने जब यह सुना तो अपनी आंतरिक पीड़ा में कुछ पल नि:शब्द  घुलती रही, आंधी में हिलते पत्ते सी काँप उठी फिर अटक अटक कर परम दुःख के साथ मुंडी हिला-हिला कर फनफनाने लगी - साँपों को दूध पिलाया हमने, देखना अंग-अंग से कोढ़ फूटेगा।                

कुछ सामान्य होने पर किसी अदृश्य सत्ता के आगे हाथ जोड़े दोनों ने - अब लाज तेरे हाथों मालिक! और कष्ट निवारक नवकार मंत्र का जाप करने लगीं। मेरी भाभी ने कष्ट निवारण होने पर ग्यारह हजार का प्रसाद बोला। माँ ने मिठाई छोड़ दी, पुत्र सकुशल इस दाग से निकल जाए तो ही मिठाई खाऊँगी। पड़ोसी के साथ था तगड़ा कानून और मेरे साथ थी सिर्फ मेरी आत्मा की आँच। वे कसाई बने हुए थे और हम बकरा बने ताक रहे थे उनकी ओर।          

जो पॉक्सो एक्ट के बारे में जानते हैं वे जानते हैं कि पहले एक अति थी तो पॉक्सो एक्ट उस अति के जवाब में दूसरी अति है कि निर्भया काण्ड के दबाव में बने इस खतनाक और इकतरफे विकलांग कानून में कोई दलील, कोई साक्ष्य, कोई चुनौती, कोई भी तर्क कोई भी सफाई अभियुक्त पक्ष नहीं दे सकता। और तो और अधिकाँश केस में जमानत भी नहीं मिल सकती। आरोप लगाने वाली अबोध बच्ची का इतना भर कहना ही काफी है कि मुझे गलत तरीके से गलत जगह छुआ गया है। आप सिर्फ राम भरोसे अपने को निर्दोष साबित करने के लिए अदालत की खर्चीली और दमघोंटू यात्रा करते रहिये। और यदि खुद को निर्दोष साबित न कर पाए तो उम्र कैद!

सामान्य कानून से दस गुना खतरनाक होता है पॉस्को कानून। सामान्य कानून कहता है (Innocent until proven guilty) यानि आप जब तक अपराधी सिद्ध नहीं किये जाते हो, आप निर्दोष हो जबकि पॉक्सो कानून कहता है कि आप तब तक अपराधी हो जब तक आप खुद को बेग़ुनाह सिद्ध नहीं करते हो (Guilty until proven innocent )


आग हमारे कपड़ों में लग चुकी थी। पॉक्सो कानून ने मुझे शून्य से भी नीचे गिरा दिया गया था। हमें लगा था कि मामला एफ आई आर तक नहीं पहुंचेगा। लेकिन घर के आसमान पर चीलें उड़ने लगी थीं, आसार सही नहीं लग रहे थे। हर आनेवाले दिन के साथ मैं ही नहीं सारा घर ही एक अशांत चुप्पी में बदलता जा रहा था। 



इस बीच प्रमिला, उसके दोनों भाई और उसकी माँ ने हमारे घर में घुस कर अपने किसी रसूखदार रिश्तेदार के साथ मुझसे मार पीट करने लगे, उस समय रागिनी मंदिर गयी हुई थी। हमारी बाई काम कर रही थी, संयोग से उस बाई की बच्ची को मैं कभी कभार गणित पढ़ा दिया करता था, जब उस बाई ने यह सब देखा सुना तो वह प्रमिला को ही बुरा भला कहने लगी। प्रमिला की माँ ने अपने औरतपन का फायदा उठाते हुए मेरी बाई को एक झापड़ जड़ दिया - तू बाहर का, तेरी यह औकात? यह बोलते हुए वह यह भी भूल गयी कि वह खुद भी बाहर की थी। मेरी बाई का तेजस्वी रूप उजागर हुआ और उसने भी पूरे दमखम के साथ एक झापड़ प्रमिला की माँ को जड़ दिया। प्रमिला ने जब झापड़ जड़ा तो कोई ख़ास हलचल नहीं हुई पर जैसे ही बाई ने एक संभ्रांत महिला को थप्पड़ जड़ा सब सन्नाटे में आ गए। यद्यपि इस घटना से मेरा कोई लेना देना नहीं था फिर भी प्रमिला और उसके घर वाले मुझे भला बुरा कहने लगे कि और कोई नहीं मिला तो बाई को ही अपने बचाव में खड़ा कर दिया। 

इस कुरूप दृश्य में थोड़ी रंगीनियत तब आयी जब अपनी दादी को खोजती सृष्टि हमारे घर में घुस गयी और मेरी पत्नी को नहीं पा कर मुझसे ही पूछने लगी - दादा, दादी किधर है? सृष्टि की मासूम आँखों में जो हो रहा था उसकी कोई परछाई तक नहीं थी, हमेशा की तरह वह हँस रही थी और अपनी दादी के कमरे की ओर बढ़ने लगी थी कि प्रमिला ने फिर उसको कस कर पकड़ लिया - आगे नहीं जाना है। वह हाथ छुड़ाने की कोशिश में दादा दादा करने लगी। तब तक मेरी भाभी भी आ गयी थी, उन्होंने कहा - देखो प्रमिला, अपनी आँखों से देखो यदि अभिमन्यु भाई ने उसे कुछ किया होता तो क्या वह इतनी सहजता से आती हमारे घर और मदद के लिए भी दादा को पुकारती। प्रमिला कुछ नहीं बोली लेकिन उसकी माँ ने कहा - अभी वह हम लोगों के बीच है इसलिए उसे दादा से डर नहीं लग रहा है।      

*****

इसी खंडहर में कहीं कुछ दिये हैं टूटे हुए

इन्ही से काम चलाओ बड़ी उदास है रात

घर के गहन उदासी में डूबे मनहूस वातावरण में हर वक़्त हमें इंतजार रहता - शायद कोई चमत्कार हो जाए, पड़ोसी को सद्बुद्धि आ जाए, हमारे किये उपकार ही याद आ जाए। पर अब तो वह उन उपकारों को भी उपकार नहीं बल्कि हमारे उपकारों को सृष्टि का घर में आना जाना बना रहे और मैं उससे मजा लेता रहूँ इस कोण से जोड़ कर देख रहे थे। कई बार मन करता कि एक बार अकेले में पड़ोसी से मुलाकात करूं पर घर वालों को डर क्या पूरा विश्वास ही था कि खून का प्यासा पड़ोसी किसी भी मुलाकात को मुक्कालात में बदल देगा इसलिए मन मार कर बैठा रहा मैं। दो दिन तक हम सब के मानस में यही चलता रहा कि क्या पड़ोसी हम पर एफ आई आर  ठोकेगा? दिशा दिशा से जैसे एक ही सवाल क्या एफ आई आर  होगी?

होगी? होगी?

दम थामे आशंकित मन  से  हमें लग रहा था नहीं नहीं नहीं। …तारे, तो कुछ दिनों से हर रोज ही टूट रहे थे पर उस दिन तो आसमान ही टूट गया जब परिवार की सारी प्रार्थनाओं, आशीर्वादों और मन्नतों को धता बताते हुए 17 सितम्बर की सांवली मनहूस शाम गिद्ध ने पंख पसारे और हमारे आँगन में अँधेरा छा गया। मुझ पर एफ आई आर ठोक दी गयी। P.S. case no. 191 के अंतर्गत मुझ पर इंडियन 376 IPC और पॉक्सो एक्ट की धारा 4 लगाईं गयी। मैंने खुद थाने जा कर आत्मसमर्पण किया था जबकि एफ आई आर में लिखा गया कि पुलिस ने मुझे अपने घर से पकड़ा। खैर, हम मारवाड़ी लोग वैसे भी पुलिस से डरते हैं, मेरे बासठ वर्षीय जीवन में कभी छोटी सी भी गलती के लिए कानून और पुलिस की जरूरत नहीं पड़ी थी उस पर एक पॉक्सो एक्ट! यह सोच मेरे बदन पर चींटियां रेंगने लगी कि यदि मैं खुद को निर्दोष साबित नहीं कर पाया तो आजीवन कैद। उस पूरे दिन मेरे भाई और भांजा थाने के एक तरफ खड़े थे और दूसरी तरफ प्रमिला और उसके परिवार के लोग पूरे लाव-लश्कर के साथ खड़े थे। कुछ बिल्डिंग के लोग भी थे जो बीच-बचाव की कोशिश भी कर रहे थे। एक प्रस्ताव पुलिस अफसर की तरफ से यह भी आया कि यदि हम पांच लाख दें दे तो मामला रफा-दफा हो जाएगा।दो समृद्ध मारवाड़ी लड़ रहे थे तो पुलिस की चांदी होनी ही थी। भांजे ने फोन पर इसकी जानकारी दी तो मैंने एकदम मना कर दिया। एक प्रस्ताव यह भी आया कि हम यह फ्लैट छोड़ कर कहीं ओर चले जाएं, मैं खुद भी चाहता था कि रागिनी को इस प्रकार सृष्टि के अतिरेकपूर्ण प्रभाव से दूर कर पाऊंगा, पर अब जब मुझ पर यह कलंक लग ही चुका था तो इस वक़्त अपना ठीहा छोड़ने का मतलब था कि मैंने सचमुच अपराध किया है जिसके लिए अब मैं किसी भी कीमत पर तैयार नहीं था।

मेरे पक्ष में एक बात यह भी गयी कि बड़तल्ला पुलिस का ओसी (ऑफिसर इनचार्ज) मुझे जानता था, तीस वर्षों से वे उस मुहल्ले में रह रहे थे। इस कारण एक बार उन्होंने मुझ पर एफ आई आर करने से भी इंकार कर दिया था। उस समय कुणाल का तगड़ा रसूख काम आया। अनिल धानुका की पुलिस हेड क्वार्टर लाल बाजार में अच्छी जान पहचान थी। उन्हें सचमुच लगा था कि मैंने यह जघन्य अपराध किया है इसलिए सामाजिक दायित्व निभाते हुए उन्होंने लालबाजार के ओ सी से दवाब डलवाया कि यदि बड़तल्ला थाना यह एफ आई आर  दर्ज नहीं करेगा तो यह केस लाल बाजार अपने हाथ में ले लेगी।

करीब बारह बजे प्रमिला के घर वाले थाने पहुँच गए थे। पुलिस हमारे यहाँ कभी भी आ सकती थी इस कारण भांजे की सलाह पर मैं एक बार घर से बाहर अपने दोस्त के यहाँ चला गया। करीब एक बजे बड़ी बहन राजश्री के बेटे शेखर  ने फोन कर कहा - आप थाना आ जाइये। मैं समझ गया अब अटकल ख़त्म हुई अब जहाज पानी में उतर चुका है। धड़कते दिल से मैं तुरंत पहले घर और फिर थाना आ गया। तब तक पुलिस घर में आ कर मुझे खोज चुकी थी। मैं  जैसे ही थाना पहुंचा, किसी सब इंस्पेक्टर के ओंठों पर अश्लील हंसी तैर गयी उसने मुझ पर तंज कसा - घर से क्यों भाग गया था?

मैंने कहा - मैं भागा नहीं था, मन को शांत करने और ध्यान करने किसी एकांत जगह चला गया था। आपको जो करना हो करिये। 

एफ आई आर के तुरंत पहले इन्वेस्टिंग अफसर ने सृष्टि से बयान लिया, सृष्टि ने मुझ पर आरोप लगाया कि दादा मेरे सू सू की जगह को छूते हैं और मुझे दर्द देते रहते हैं। अब तक यह आरोप  था कि मैंने तीन दिन पहले सृष्टि को दर्द दिया था अब एफ आई आर में यह भी जोड़ दिया गया था कि मैं जाने कब से उसके साथ यह दुष्कर्म करता रहा हूँ। 

जो बात मेरे दिमाग में एकदम साफ़ थी वह यह थी कि उन्होंने तो मुझे जो सिद्ध करना था कर दिया था। अब मुझे अपना होना सिद्ध करना है। अब मुझे इंसानो से नहीं, कई जीभें और कई फनों वाले जहरीले नागों से भिड़ना है। अब अर्जुन की आँख की तरह मेरा ध्यान सिर्फ अपने केस पर!


***

हर गुजरते लम्हे के साथ तनाव बढ़ता जा रहा था। मारवाड़ी को अणुबम से ज्यादा डर इज्जत का होता है। मेहनत से कमाए नाम की धज्जियां उड़ते देखना जीते जी अंगारे पर चलने जैसा था। कुणाल ने हमारे इस डर का भरपूर मजा लिया। मिसाइल की तरह यह मनहूस खबर धुंआ फैलाती जा रही थी जिसे झेलना परिवार के लिए भारी पड़ रहा था। मेरी गिफ्तारी की खबर कुणाल की मेहरबानी से (उसके व्यापारिक संबंध थे मेरे ममेरे भाई से) जैसे ही मेरे ननिहाल पहुंची, वहां खलबली मच गयी। तुरंत मेरी मौसी का फोन मेरी माँ के पास आया। संक्षिप्त बातचीत के बाद मौसी ने कहा - तुरंत अभिमन्यु की कुंडली भेजो। घबड़ायी हुई मौसी ने तुरंत शांति के लिए मंदिर में शांति पूजा रख दी। अब जो बात घर की चारदीवारी में थी वह अब कोलकाता से जयपुर तक उजागर हो चुकी थी। मौसी ने विघ्न निवारण हेतु कई पंडितों से भी सम्पर्क किये। मेरी माँ को कई जाप और माला जपने की सलाह दी। यहाँ तक तो फिर भी गनीमत थी लेकिन एक विधि उनके पंडित ने दुश्मन के विनाश की चाल बताई जिसमें जहाँ तक मुझे याद है, कुणाल के घर के बाहर की चुटकी भर धूल में सरसों दाने और मुट्ठी भर चावल और सात लाल मिर्च डाल कर उसे एक मिटटी की हांडी में रख कर आधी रात को उनके घर से सौ मीटर की दूरी पर रख कर फोड़ दिया जाय जिससे दुश्मन कमजोर पड़ जाएगा। मैंने यह सब सुना तो मेरे होश फाख्ता हो गए, मैंने अपना माथा पीट लिया। मैंने समझाया रागिनी को - यदि मेरी निर्दोषिता में तनिक भी विश्वास है तो भूल कर भी इस रास्ते मत जाना।  

रागिनी ने मेरी भावना का सम्मान किया। मेरी माँ को भी हांडी फोड़ने की बात रास नहीं आयी।  

****

घर में आवाज़ें इकट्ठी हो रही थीं। माँ और रागिनी की तो रोते-रोते हिचकियाँ बंध गयी थी।  गिफ्तारी के वक़्त मेरे दोस्त ने हिम्मत बंधाते हुए कहा - अभी हम समझ नहीं पा रहे हैं पर शायद इस संकट में भी ईश्वर का कोई रहस्य हो, वो जो भी करता है अच्छे के लिए ही करता है। मैं सोचने लगा - इसमें हमारा क्या भला हो सकता है भला! इसमें तो सिवाय चौतरफा तबाही ही तबाही के सिवाय कुछ नहीं है। 

समय ने हिलना-डुलना छोड़ दिया था। सभी निहत्थी लड़ाइयां सो चुकी थी उस रात। वह रात मेरी जिंदगी की सबसे गहरी काली रात थी जो कलंक की स्याही से लिखी गयी थी। उस रात की अंतरात्मा खून में डूबी हुई थी। घर का कोना कोना, घर के सामने खड़ा नीम का पेड़, पेड़ पर बैठे परिंदे… सब जैसे गहन उदासी में डूबे इस अनहोनी को देख रहे थे। हुगली नदी का सारा जल मेरी आँखों में समा गया था। वह ऐसी रात थी जिससे ज्यादा काली रात हमारी जिंदगी में न कभी आयी न आ सकती थी। करीब 150  स्क्वायर फ़ीट की कोठरी में मुझे धकेल दिया गया जिसमे एक खिड़की थी जो पूरी तरह से मकड़ी के जालों से भरी हुई थी। दो कम्बल मुझे दिए गए थे -  एक बिछाने के लिए, एक ओढ़ने के लिए। हंगना-मूतना, खाना-पीना सब उसी कोठरी में। भीतर के बियावान से रह रह कर सारी रात एक हुक सी उठती - यह क्या हुआ? क्यों हुआ? कहाँ हुई चूक मुझसे?

 

घर में भूचाल आ गया था। एफ. आई. आर.  फाइल हो चुकी थी। मुझे अचानक एक सन्न कर देनेवाला आत्मदर्शन हुआ कि आसाराम बाबू और मुझ पर एक ही आरोप थे। हम दोनों ही पॉक्सो एक्ट के अंतर्गत अपराधी थे। मेरे बड़े भाई का छोटा पुत्र इंग्लैंड में था। तुरंत अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे कर वह कोलकाता पहुँच गया क्योंकि उसकी नौकरी में उसे लम्बी छुट्टियां मिल नहीं सकती थीं और मेरे मामले में सब कुछ अनिश्चित था। मेरे बड़े भाई का बड़ा पुत्र भारतीय सेना में मेजर था वह भी तुरंत कोलकाता पहुँच गया। मेरी बहन का पुत्र जो किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी में मैनेजर था, वह तो एफ.आई.आर. की सम्भावना सुन कर ही आ गया था।  

यह जानकर पहला धक्का लगा कि इसमें जो आरोप लगाने वाला पक्ष है (Plaintiff) उसे कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ेगा, सरकारी वकील जिसे पब्लिक प्रासीक्यूटर (PP) कहा जाता है वह उनकी तरफ से लड़ेगा। यानि यह केस स्टेट वर्सेस अभिमन्यु लड़ा जाएगा।     

दूसरे दिन हिंदी अखबार सन्मार्ग और एक बंगाली अखबार में भी मेरे केस की खबर छप गयी थी। 


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


सम्पर्क


मोबाइल : 9167735950

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हरिवंशराय बच्चन की नव वर्ष पर कविताएँ

मार्कण्डेय की कहानी 'दूध और दवा'

प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन (1936) में प्रेमचंद द्वारा दिया गया अध्यक्षीय भाषण