मोहन लाल यादव का आलेख 'सत्यकामी नीलकांत, बहुआयामी नीलकांत'


नीलकांत 

साहित्य का भी अपना एक प्रतिपक्ष होता है। इस प्रतिपक्ष में वे होते हैं जिनका स्वभाव विद्रोही का होता है। इस प्रतिपक्ष का चयन स्वयं करना पड़ता है। नीलकांत ऐसे ही रचनाकार थे जो आजीवन 'साहित्य का प्रतिपक्ष' रचते रहे। उन्हें 'हिन्दी साहित्य का आउटसाइडर' भी कहा गया। आउटसाइडर इसलिए कि वे बने बनाए खांचे में फिट नहीं हो पाते थे। कह सकते हैं उनका स्वभाव ही इस तरह का था। वे अपने ही जीवन को नष्ट करने की हद तक अराजक थे। इस अराजकता के वे स्वयंभू नायक थे। इसीलिए उनके इस अराजकता का शिकार खुद उनके परिवार को भी होना पड़ा। कथाकार मार्कण्डेय जी उनके सगे बड़े भाई थे। एक बार उन्होंने मुझसे कहा 'नीलकांत एक असाधारण कथाकार हो सकते थे। उनके अन्दर इसकी योग्यता भी थी। लेकिन उन्होंने अपनी ही अराजकता से खुद की प्रतिभा को नष्ट कर लिया।' रामचन्द्र शुक्ल पर लीक से अलग हट कर जो काम उन्होंने किया वह उनकी प्रतिभा को प्रदर्शित करता है। जोखिम उठाते हुए भी उन्होंने इस काम को अंजाम दिया। मार्कण्डेय जी कहते थे जिस साहित्यकार का वध करना हो उसकी किताब नीलकांत को थमा दो। बाकी का काम नीलकांत कर देंगे। दरअसल रचना की पड़ताल करते समय वे रचनाकार को नहीं बल्कि रचना को देखते थे। हम सब इस तथ्य से बखूबी वाकिफ हैं कि बचपन में उन्होंने निम्न जाति के लोगों के एक जुलूस का नेतृत्व किया जो खुद उन्होंने अपने पिता के खिलाफ निकाला था। मुझसे निजी बातचीत में वे कहा करते थे विज्ञापन के चक्कर में मार्कण्डेय कथा में कमजोर रचनाएँ भी छाप देते हैं। अगर ऐसे मामले आएं तो तुम उनकी बात को मानने से इंकार कर दो। आज से ठीक एक साल पहले 14 जून 2025 को सुबह ही अचानक नीलकांत जी के न रहने की मनहूस खबर आई। उनके परिवार जनों के मुताबिक दिल्ली के रोहिणी के एक अस्पताल में इलाज के दौरान ही उनका निधन हो गया। इसे त्रासदी ही कहा जा सकता है कि निधन के समय भी वे निपट अकेले थे। आज पहली पुण्यतिथि पर हम उनकी स्मृतियों को याद करते हुए उन्हें नमन करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं मोहन लाल यादव का आलेख 'सत्यकामी नीलकांत, बहुआयामी नीलकांत'। मोहन लाल यादव नीलकांत के अंतिम दिनों में उनके घनिष्ठ हुआ करते थे। मोहन जी का यह संस्मरण हम कथा के हालिया अंक से साभार प्रस्तुत कर रहे हैं। 



'सत्यकामी नीलकांत, बहुआयामी नीलकांत'


मोहन लाल यादव


नीलकांत जी को मैंने कई रूपों में देखा, सुना और पढ़ा है। साहित्यकार से इतर उनकी अनेकों छवियां घुमड़ती-घुमड़ती रहती हैं मेरे मानस पटल पर। बचपन में किसी के खेत से बैगन तोड़ने वाले शरारती नीलकांत, अपने घर के ही मजदूरों को लामबंद कर के अपने ही परिवार के खिलाफ आवाज उठाने वाले एक विद्रोही नीलकांत, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र के टॉपर विद्यार्थी नीलकांत, अमेरिका एवं वियतनाम के युद्ध में अमेरिकी दादागिरी के खिलाफ इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के सीनेट हाल में तोड़-फोड़ करने वाले क्रांतिकारी नीलकांत, आचार्य रामचंद्र शुक्ल को 'मृत सौंदर्य का मसीहा' कहने वाले साहसी आलोचक नीलकांत, किसानों मजदूरों को वामपंथी विचारधारा पढ़ाने वाले अध्यापक नीलकांत, खुश हो जाए तो सर्वस्व निछावर करने वाले सहृदयी नीलकांत, रुष्ट होने पर पल भर में किसी के छद्म महल को धूल धूसरित करने वाले क्रोधी नीलकांत, एकाकी जीवन व्यतीत करने वाले फक्कड़ नीलकांत, पाश्चात्य दर्शन के अध्येता नीलकांत। सत्यकामी नीलकांत, बहुआयामी नीलकांत। मोची नीलकांत, बधाई नीलकांत। और न जाने कितने रूप अंकित नीलकांत के।

नीलकांत जी को मैं सन् 1980 से जानने लगा था। तब वह मुझको नहीं जानते थे। वह समय उनके साहित्यिक अवदान का शिखर काल था। उस दौर में हमेशा उनकी कहानियाँ, उपन्यास और आलोचनाएं आदि पत्र पत्रिकाओं में पढ़ा करता था। सन् 2000 के आस-पास जब वह झूँसी में रहने लगे तब मैंने उनके यहाँ आना जाना शुरू कर दिया। जैसे-जैसे समय गुजरता गया मेरे प्रति उनकी आत्मीयता गहराती गई। वह मुझको हमेशा लिखने और पढ़ने के लिए प्रेरित करते रहते थे।

सन् 1990 से 2020 तक का समय झूँसी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक रूप से काफी समृद्ध हो गया था। यहाँ नीलकांत सर के अलावा प्रसिद्ध नाटककार कथाकार अजित पुष्कल जी, कथाकार उपन्यासकार दूधनाथ जी, वरिष्ठ साहित्यकार विभूति नारायण राय, जगन्नाथ पाठक, जनवादी कवि सीताराम विद्रोही, अविनाश मिश्रा, हरेन्द्र प्रसाद जैसे तमाम साहित्यकार झूँसी में आ कर बस गए तो झूसी का साहित्य कुलांचे मारने लगा। लगातार गोष्ठियां आयोजित की जाने लगी। कवि सम्मेलन एवं कवि गोष्ठियां आयोजित होने लगी। उन गोष्ठियों में जब नीलकांत जी का वक्तव्य होता तो उपस्थित लोग बहुत दत्तचित्त हो कर उनके एक-एक शब्द को पीते थे। नीलकांत जी अपनी झूठी वाहवाही को कभी स्वीकार नहीं करते थे, क्योंकि उनको ठकुरसुहाती कतई पसंद न थी। न तो वह किसी की चाटुकारिता करते थे, न हीं किसी से चाटुकारिता करवाने की अपेक्षा करते थे। उनका फंडा बिल्कुल क्लियर था-मोहि कपट छल छिद्र न भावा। इस प्रवृत्ति के साहित्यकार उनसे आँखें चुराते थे। नीलकांत की झिड़की सुने बिना गोष्ठी के सकुशल संपन्न होने की खैर मनाया करते थे।

नीलकांत जी माटी के मानुष थे। इनका जन्म जौनपुर के बराई गाँव में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा भी गाँव में ही हुई। गाँव के रीति-रिवाज, रिश्ते-नाते, आचार-व्यवहार उनके खून में ऐसे रच बस गए कि वह आजीवन शहराती नहीं बन सके। गाँव की माटी की जिस खुशबू को ले कर वह जौनपुर से इलाहाबाद आए, उसे अपने रचनाओं में बिखरते रहे। उनकी अधिकतर रचनाओं खासकर कहानियों एवं उपन्यासों में उनके खाटी गवईंपन का सहज रूप बिम्बित होता है। नीलकांत जी ठाकुर परिवार में जन्मे। मगर उनकी मित्रता हमेशा मुसहरों, हरिजनों एवं अन्य छोटी जातियों से ही हुआ करती थी, जौनपुर में भी और इलाहाबाद में भी। वह उनके दुख-सुख में हिस्सेदारी करते थे। इनके आफत-बिपत में हमेशा इन्हीं के साथ खड़े भी जाते थे। नीलकांत के लिए यह कोई मायने नहीं रखता था कि इन गरीबों का उत्पीड़़क गाँव का है अथवा उनके परिवार का। उनके बहुत प्रिय साथी रहे कामरेड विंध्यवासिनी शुक्ला जी ने मुझे एक बहुत रोचक संस्मरण सुनाया। उन्होंने जो संस्मरण बताया उन्हीं के शब्दों में यहाँ प्रस्तुत करना चाहूँगा।

"जब नीलकांत भैया का उपन्यास 'एक बीघा गोइंड़' जिसका शीर्षक बदल कर बाद में 'एक बीघा जमीन' रख दिया गया, प्रकाशित हुआ तो उन्होंने एक प्रति मुझको भी पढ़ने के लिए दिया। उपन्यास पाते ही मै बैठ कर इसे पढ़ने लगा। इस बीच उनके चाचा जमींदार सिंह आ गए। उन्होंने पूछा, 'का बचवा, तूं का पढ़त हउवा'?

"चाचा, राजेन्दर भइया एक ठू उपन्यास लिखले हउवै। उहै पढ़त बाटी।" मैंने जवाब दिया। तब जमींदार चाचा ने इसे शुरू से दोबारा पढ़ने के लिए मुझसे कहा। मैं करीब डेढ़ घंटे में इसे पूरा पढ़ दिया। तब तक कई लोग और आ गए और बैठ कर उपन्यास का श्रवण करने लग गए। जब उपन्यास खत्म हो गया तो जमींदार चाचा ने कहा, "का हो, राजेंदर एह में त सब कुछ हमरेन बारे में लिखे हउवैं। मगर ई जानि लेव, राजेन्दर केतनौ उपन्यास लिक्खैं, मुला हमरे बारे में अब्बै चारौ आना नाहीं जनतेन।" वास्तव में 'एक बीघा जमींन' का कथानक जमींदार चाचा के ही परितः घूमता था। आशय यह कि नीलकांत जी को अपने उपन्यासों एवं कहानियों के पात्र खोजने नहीं पड़ते थे। ये पात्र उनके गाँवों में, घर में एवं परिवार में यत्र तत्र सर्वत्र बिखरे पड़े रहते थे, जिन्हें नीलकांत बड़े सलीके से सहेज लेते थे।


              

मुझे उनकी कहानियों के कई संग्रह पढ़ने का सौभाग्य मिला है। हालांकि मैं शुरू से ही बहुत मंदगति का पाठक रहा हूँ। लगातार बहुत ज्यादा नहीं पढ़ता हूँ। लेकिन जब नीलकांत जी के कहानी संग्रह को पढ़ना शुरू करता था तो कई-कई कहानियाँ एक बैठक में पढ़ जाता था। 'मटखन्ना' और 'बंधुआ रामदास' तो मैंने चार-पाँच बार पढ़ी। यहाँ 'मटखन्ना' की थोड़ी सी चर्चा करना चाहूँगा।

'मटखन्ना' उनकी बहुत मार्मिक एवं कालजयी कहानी है। गाँव में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं उत्पादन संबंधों के बदलते स्वरूप के कारण गाँव के सामाजिक एवं भौगोलिक ढांचे में आयी कुरूपता का बहुत ही यथार्थ वर्णन इस कहानी में मिलता है। 'मटखन्ना' के कथानक को अगर आज के संदर्भ में देखा जाए तो यह कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी लिखते समय। बस अंतर है तो शोषण की शैली और उसके हथियारों में। 'मटखन्ना' का मुख्य पात्र गोपीचंद उस समय जिस गति को प्राप्त हुआ, गाँव के सरपंच के द्वारा उसके मटखन्ने को जिस बेहयाई और निर्ममतापूर्वक हड़पा गया, वह प्रक्रिया आज हू ब हू कायम है। आज 'मटखन्ना' के सरपंच की हैसियत बहुत अधिक बढ़ गई है। उसका आतंक गाँव से बढ़ कर पूरे देश के पैमाने पर स्थापित हो चुका है। अब वह पूरे देश को ही 'मटखन्ना' बनाने की हैसियत में पहुँच चुका है। आज का हर किसान गोपीचंद है, उसके खेत सिवान 'मटखन्ना' की गति को प्राप्त हो रहे हैं। शोषण के नित नए-नए कानून पास हो रहे हैं। गोपीचंदों के मटखन्ने को हड़पने के सुनियोजित एवं संस्थागत कुचक्र रचे जा रहे हैं। विरोध करने वाला गोपीचंद का 'टिगड़ा' बना दिया गया और उसकी जुबान काटी जा रही है। उस पर देशद्रोह के मुकदमे कायम किये जा रहे हैं और अंत में उसकी हत्या कर के उसकी जुबान हमेशा के लिए बंद कर दी जा रही है।

'अनसुनी चीख' नीलकांत जी की कहानी संग्रह 'अजगर और बूढ़ा बूढ़ई' की एक हृदयविदारक कहानी है। यह कहानी ऐसे तथाकथित सभ्य समाज की एक नग्न तस्वीर है, जिसमें मनुष्य की हैवानियत को देख कर पशु भी शर्मिंदा हो जाए। इस कहानी की मुख्य पात्र सोनबरसा गाँव की एक भूमिहीन विधवा है, जिसे गाँव का प्रधान अपनी पुश्तैनी जमीन समझता है। जब चाहता है जोतता है और बोता है। मात्र 25 डिसमिल जमीन के टुकड़े का प्रलोभन दे कर उसे अपना रखैल तो बनाया ही है। इसके अलावा वह अपने निजी स्वार्थ के लिए सोनबरसा को तहसीलदार, नायब, कानूनगो, पटवारी और चपरासी तक को परोसने में कोई संकोच नहीं करता। बेचारी निरीह सोनबरसा जमीन के एक टुकड़े के प्रलोभनवश उनके सामने बिछ जाने को मजबूर होती है। फिर कुकृत्य की ऐसी चक्की में पिसती है सोनबरसा, जिसमें उसकी अनसुनी चीखें घुट कर हमेशा के लिए शांत हो जाती है। इस कहानी में नीलकांत जी ने सरकारी तंत्र को भी नग्न करने में तनिक कोताही नहीं बरतते। गरीबों के उत्थान के लिए सरकार की योजनाएं गरीबों के लिए नहीं अपितु अधिकारियों, कर्मचारियों एवं नेताओं के लिए होती है। "सरकार ने हमारे लिए सौगात भेजी है।" तहसीलदार का यह कथन पूरे तंत्र की असलियत समझने के लिए पर्याप्त है।

अब मैं साहित्यिक मूल्यों से इतर उनके मानवीय एवं सांस्कृतिक पक्ष को संदर्भित करने वाले कुछ संस्मरणों से जोड़ना चाँहूगा। नीलकांत जी मानव प्रेमी के अतिरिक्त पशु प्रेमी भी थे। नीलकांत जी के आवास से मुख्य मार्ग करीब एक किलोमीटर दूर था। कभी-कभी मैं और नीलकांत जी पैदल ही टहलते-टहलते सड़क पर पहुँचते थे। इस बीच रास्ते में जितने भी कुत्ते मिलते, वे सभी नीलकांत जी का पूछ हिला कर अभिवादन जरूर करते थे और नीलकांत जी भी उनके अभिवादन का जवाब उनको पुचकार कर दिया करते थे। अगर उनके झोले में कुछ है तो उसे दे भी दिया करते थे। 

जब मैं उनके पशु प्रेम का चर्चा करने लगा हूँ तो मेरे मानस पटल पर एक किरदार बार-बार आ कर दस्तक दे रहा है। लगता है कि वह किरदार अपने ऊपर बिना दो शब्द लिखवाए लेखन क्रम को आगे नहीं बढ़ने देगा। इसलिए मित्रों मै 'छमियां' की थोड़ी सी जिक्र कर ही देता हूँ। बहुत रोचक घटना है। एक दिन मै और कामरेड धर्मेंद्र उनके आवास पर बैठे थे। तभी एक सुंदर कुतिया, जिसके अगले पैरों में घुंघरू बंधे थे, किसी प्रेम कथा की कमसिन नायिका की भाँति छम-छम करती दस्तक देती है। नीलकांत जी कहते हैं- 'का छमियां, कहाँ गइ रहलू।' उसने दुम हिला कर जवाब दे दिया। मैंने पूछा कि 'सर, ई मोनालिसा जइसे सुन्नर छमियां कहाँ से आइल बा'? नीलकांत जी मुस्कुराते हुए धर्मेंद्र से कहा, 'धर्मेंद्र तोहईं बतावा छमियां की कथा।' फिर धर्मेंद्र और नीलकांत जी मिल कर छमिया की यह कथा बतायी-

"एक दिन नीलकांत जी और उनका एक शिष्य दरवाजे के सामने बैठे थे, तभी एक छोटा सा खरगोश दिखाई दिया। नीलकांत जी ने कहा, चलो इसको पकड़ा जाए। गुरू और चेला मिल कर लगे उसको दौड़ाने। खेत-खेत, मेंड़-मेंड़ बहुत देर तक दोनों लोग नन्हें से जीव के पीछे दौड़ते रहे। दौड़ते-दौड़ते वह खरगोश एक अरहर के खेत में थक हार कर बैठ गया। जब नजदीक जा कर देखा तो यह खरगोश नहीं बल्कि एक कुत्तिया थी। शिष्य ने कहा, छोड़िए सर, यह तो कुत्तिया निकल गई। तब नीलकांत जी बोले - जब यह कुत्तिया हो कर खरगोश का भ्रम पैदा कर सकती है तो निश्चित ही यह सामान्य कुतिया नहीं हो सकती। फिर नीलकांत उस कुतिया को घर ले आए और उसे पाल लिया। इसका नामकरण कर दिया-छमियां। उसे खाना खिलाते, अपने हिस्से का थोड़े मांस के टुकड़े भी देते और थोड़ी दारु भी। उसके पांवों में घुंघरू बांध दिया। जब वह डंडे से इशारा करके कहते थे कि नाच मेरी छमिया तुझे पैसा मिलेगा। फिर छमिया दोनों पिछले पैरों पर खड़ी हो कर नाचने लगती थी। जब छमिया जवान हो गई तो एक स्वभावगत गलती कर दी। वह दिन भर घर से गायब रही। शाम के वक्त जब लौट कर आयी तो नीलकांत सर ने डाटते हुए कहा छंमियां, तूने आज बहुत गलती की। बिना मेरी अनुमति के तुमने बहुत बड़ा फैसला ले लिया, इसलिए आज से तुम्हारा घर में प्रवेश वर्जित। उसी दिन से छमिया घर के भीतर नहीं आई। मगर दरवाजा भी नहीं छोड़ा। घर के बाहर नाली पर लगी पटिया पर रहने लगी। हालांकि सर खाना तो उसे अब दे दिया करते थे। कुछ समय बाद उससे कई बच्चे भी हुए। जिस दिन छमियां ने जीवन लीला समाप्त किया, उस दिन नीलकांत बहुत दुखी थे।



नीलकांत जी पाश्चात्य दर्शन के बहुत बड़े अध्येता एवं मर्मज्ञ थे। उन्होंने बहुत सारी कहानियाँ, उपन्यास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल पर आलोचना और गालिब पर भी लेख लिखे। वह चर्चा के केंद्र में आए। उनके कृतित्व पर आयोजित कई गोष्ठियाँ में मैं शामिल भी हुआ। उन पर कई विशेषांक भी छपे। मगर मुझे ऐसा लगता कि इन सारे विमर्श में उनके लोकपक्ष पर चर्चा नहीं की गई है। उनके लोकपक्ष पर अब भी पर्याप्त विमर्श आवश्यकता है। जब इलाहाबाद से शिक्षा पूरी कर के अपने गाँव गए तो वह किसान सभा के मोर्चे पर काम करने लगे। उस समय उन्होंने ढेर सारे लोकगीत रचे, जिन्हें वह और उनके साथी तमाम मौकों पर गाया करते थे। इस बाबत जब मेरी कामरेड विंध्यवासिनी शुक्ल से बात हुई तो उन्होंने मुझको नीलकांत जी द्वारा लिखी कई लोकगीत भेजा। उन लोकगीतों की भी मैं चर्चा करना चाहूँगा।

जैसा कि मैंने कहा नीलकांत जी माटी के मानुष थे। उनके लोकगीतों में माटी की गंध, माटी के मानुष का हर्ष, उनकी पीड़ा का यथार्थ दृश्य अवलोकित होता है। उनके एक कहरवा गीत में किसान अपनी जीवन की कठिनाइयों को कैसे व्यक्त करता है, देखिए-

     झूर भइली नदिया, जरि गइली बिरई

                        चिरई नाहीं बिसरै ना।

तोहरी सांवरी सुरतिया, चिरई नाहीं बिसरै ना। झूर..

         रिनवा करजवा में डूबल परिवरवा

         हरवा जोतत की बुढ़इली मोर बपवा

गरवा नाहीं छूटल ना। टूटि गइली ठठरी

                         करजा नाहीं टूटै ना। झूर...

नीलकांत जी किसानों को जीवन के यथार्थ को समझने एवं कल्पना लोक से मुक्त होने की बात करते हैं। उनका एक गीत है- होई विहान मितऊ। इसमें वह कहते हैं-

 निसदिन बदलत बा जमाना सुना किसान मितऊ

  गीता रामायन के तज द ज्ञान पुरान मितऊ

और आगे कहते हैं-

       खेत खलिहाने से आयल घर में तोहरे दाना,

          कुल के कुल सहुआ तउलेस करबै कवन ठिकाना।

           वेद त वेद न जानै मरम इह भगवान मितऊ

'धरती मइया' शीर्षक गीत मे किसानों की बदहाली का सुंदर चित्रण करते हैं। गीत का यह अंश पढ़े-

       देहियां में नाहीं भइया चाम तोहरे बाटै

         हड्डी पसली नोच नोच हरामी सब बाटै

         दुखवै मे रात दिन किसान सब काटैं

         करत करत छतिया गरीबवन के फाटै

         कुछ उपइया तू करा

         डूबल जाला बोझिल नइया। कुछ उपइया...



नीलकांत अपने गीतों में ग्राम्य जीवन का अद्भुत परिदृश्य रचते है, जो किसी किताबी साहित्यकार के लिए मुमकिन है। जिसने गाँव को जिया है और गांव के दर्द को भोगा है, उसी की कलम ऐसे गीतों को रच सकती है। एक बहुत ही मार्मिक एवं हृदय विदारक गीत है - किसान की नारी'। इसमें एक किसान की पत्नी अपने पति से अपने जीवन के दुखड़े किस तरह से कहती है, आप जीत के इस टुकड़े में देखें-

      जब से अइली हम गवनवां, 

       दुखवा नाहीं छोड़ेस संगवां,

       नाहीं जनली बालमा

       जरि ग हमरौ करमवां, नाहीं जनली बालमा।

एक गरीब किसान के लिए बेटी का जनमना कितना पीड़ादायक होता है, इसी गीत के इस भाग में देखें-

      पहिले पहिले कोखिया मे अइली भवानी

        पोरे पोरे बाढ़ै लगली भइली सयानी

        वर खोजत घिसि गइली पनही पुरानी

         झुकि गयल तोहरौ गरदनवां गुमानी

               नाहीं जनली बालमा

                तजली हाथे के कगंनवां

                नाहीं जनली बालमा

नीलकांत हमेशा शोषित पीड़ित सर्वहारा की क्रांति का सपना देखते थे। ऐसी क्रांति जिसमें शोषक वर्ग का समूल नाश हो जाए। जब वह लोकगीत रचते हैं, तब वह लोक प्रचलित शब्दावलियों का ही प्रयोग करते थे। उस पर अनावश्यक बौद्धिकता का बोझ नहीं लादते थे। क्रांति का अलख जगाती हुई उनकी यह रचना देखें-

अहैं क्रांति के दिनवां, जागत रह्या किसनवां ना

जेहिं दिन हुमकि के उठबा, ओहिं दिन कांपै लगी जहान,

रावण कांपी, कंसा कांपी, कांपी पूजीपती बेईमान 

लगा द बाजी जनवां ना, येह जियले से नीक मरनवां। जागत....

इस तरह गाँव के किसानों, मजदूरों को ले कर उन्होंने ढेर सारे लोकगीतों को रचा। लोकगीतों का यह संकलन किताब रूप में भी आया था। नीलकांत जी के इस लोकपक्ष पर भी काम करने की जरूरत है।

और अंत में नीलकंठ को लाल सलाम पेश करते हुए तथा उनके कृतित्व को आलोकित करते हुए एक लोकगीत पढ़ लें-

कवने देशवा गयौ हेराई, देव बताई मितऊ

सोनबरसा अब केकरे आगे आपन दुखड़ा रोई

मटखन्ना गोपी के छिनि ग कवन सहइया होई

टेगड़ा कइसे देइ गवाही, देव बताई मितऊ

अब के धनकेसरा के एक बीघा जमींन दिलवाई

बीच खेत धनकेसरा मरिग अब के खबर बताई

छोटू के दुख सहा न जाई, देव बताई मितऊ

बंधुआ रामदास के मूड़े नाहक करजा चढ़िग

रामदास के साथी कबरा जीप से दबि के मरिग

वोहिके जेहल से कवन छोड़ाई, देव बताई मितऊ


मोहन लाल यादव 



संपर्क  

तुलापुर, झूँसी, इलाहाबाद


मोबाइल : 9956724342

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