सुमन शेखर द्वारा की गई फिल्म समीक्षा "अभी कई 'मैं वापस आऊँगा' की ज़रूरत है"




"अभी कई 'मैं वापस आऊँगा' की ज़रूरत है"


सुमन शेखर


एक कमरे में बैठा रेडक्लिफ़ फ़ोन पर माउंटबेटेन से बात कर रहा है। सामने बड़े देश का नक्शा रखा है, जिस पर एक लकीर खींची जानी है। एक लकीर से देश के तीन टुकड़े होने हैं। जिसके दो हिस्से पाकिस्तान के पास और एक हिस्सा भारत के पास आना है।

याद आती है एक फ़िल्म की कविता, जिसे गुलज़ार ने लिखा था। फ़िल्म भारत और पाकिस्तान के बॉर्डर के केंद्र-बिंदु पर है—

लकीरें हैं तो रहने दो

किसी ने रूठ कर गुस्से में शायद खींच दी थी

इन्हीं को बनाओ पाला, और आओ कबड्डी खेलते हैं।

“इसका मतलब है, भारत और पाकिस्तान अपनी आज़ादी के दिन अपना बॉर्डर नहीं जान पाएँगे!”

“बिल्कुल, आज़ादी के कुछ दिन बाद उनको पता चलेगा कि वे जहाँ हैं, वह असल में भारत है या पाकिस्तान।”

“लेकिन इससे खून की नदियाँ बहेंगी, दंगे होंगे, सब बर्बाद हो जाएगा। किस आज़ादी का वे जश्न मनाएँगे!”

“अब दोनों देश खुद तय करेंगे कि बँटवारे को कैसे काबू में पाना है। वैसे भी भारत लंबे समय से हमें भगाना चाहता था, अब उनको खुद करने दो। हम चले।”

“यह बँटवारा ज़रूरी है?”

“रणनीतिक हित के लिए यह सही है। चर्चिल ने माना है— बँटवारे के बाद पाकिस्तान के निर्माण में इंग्लैंड को कराची के बंदरगाह पर ज़रूरी नियंत्रण मिल जाएगा, भले ही पूरा भारत अब हमारे पास नहीं है। क्योंकि भारत का रूस से संबंध बढ़िया है, हम पाकिस्तान के साथ होंगे।”

“विभाजन का मुख्य कारण क्या है?”

“हा हा।”

“जहाँ तक मुझे पता है, हिंदू और मुस्लिम का आपस में नफ़रत करना इसका कारण है! नफ़रत की वजह से ही दोनों अलग देश चाहते हैं! यह हमारी ‘फूट डालो, शासन करो’ वाली नीति ज़्यादा लग रही है।”

“हमने पंद्रह अगस्त को आज़ादी का दिन तय किया है। यह वही तारीख़ है, जब जापान ने मित्र राष्ट्रों के सामने आत्मसमर्पण किया था। यह तिथि मेरे लिए भाग्यशाली रही है।”

और फिर रेडक्लिफ़ के सामने नक्शे पर खींची लाल रेखा दिखी, जो उसने ही खींची थी और अब वह खूनी नदी की तरह दिख रही थी। उसे नहीं मालूम था कि उसके हाथों काग़ज़ पर खींची गई छोटी-सी रेखा दस लाख मौतों का कारण बनेगी। चौदह मिलियन लोगों को शरणार्थी बनाएगी। यह रेखा आने वाली नस्लों के भीतर एक सवाल और दबा हुआ घाव होगी, जिसे जब-जब कुरेदा जाएगा, मवाद निकलेगा और केवल छटपटाने के अलावा कोई कुछ नहीं कर पाएगा।

और रेडक्लिफ़ के हाथों कागज़ पर खींची एक लकीर जिया के सीने से गुज़र गई।


***


प्यार हर इंसान के भीतर होता है। वह किसी-न-किसी रूप में बाहर निकलता है, किसी काम के ज़रिए, पैशन और शौक़ के ज़रिए, या किसी से प्यार कर के। जब तक यह बाहर नहीं निकलता, अंदर एक बेचैनी बनी रहती है। इंसान तब तक चैन से नहीं सो सकता, जब तक बूँद-बूँद प्यार निचोड़ कर बाहर न निकाल दे।

कुछ कहानियाँ लिखी जाती हैं, कुछ कहानियाँ लिखवाई जाती हैं। लिखी गई कहानियों से ज़्यादा प्रभाव लिखवाई हुई कहानी का होता है।

लिखवाता कौन है?

किसी ने कहा है— जब मैं लिखता हूँ, कोई मेरे कान में रास्ता बताता है, मैं उसी रास्ते पर चलता जाता हूँ।

रूमी कहते हैं— जिसने तुम्हें आगे बढ़ाया, वही रास्ता भी बताएगा।

“मैं वापस आऊँगा” लिखवाई गई फ़िल्म है। हालाँकि निःसंकोच कहना होगा— इम्तियाज़ के हिस्से ज़्यादातर लिखवाई गई फ़िल्में ही हैं।

आज जब दुनिया युद्ध, हिंसा और उन्माद में उन्मत्त है, पगलायी हुई है, इसी दुनिया में एक कहानी पल रही है, चल रही है प्यार की। जो बताती है कि दुनिया को युद्ध और हिंसा की ज़रूरत नहीं है, प्यार की है।

फ़िल्म अंत में “क्या कमाल है” गाने में दुनिया भर में हो रहे युद्ध, बँटवारे और त्रासदी को ट्रिब्यूट देती है। स्क्रीन पर टूटते हुए घर, काँधे पर बोझा उठा कर पलायन करते बच्चे, रोती-बिलखती आँखें लिए चलते जीवंत लोग हैं। यह सब इसी समय की बात है। इसी समय दुनिया में कहीं बम गिर रहा है, कहीं बस्तियाँ बम से ख़ाक हुई जा रही हैं, बच्चों के सामने घना अँधेरा लिए खड़ा विकराल भविष्य है— जिसे चाट गया है वर्तमान।

कुछ समय पहले एक फ़िल्म फेस्टिवल में डॉक्यूमेंट्री देख रहा था। डॉक्यूमेंट्री रियल टाइम में शूट की हुई थी। थोड़ी ही देर में पूरा सिनेमा घर सिसकियों में डूबा हुआ था। सब शांत। पास ही बैठे विशाल भारद्वाज और उनकी पत्नी, उनको भी रुआँसा पाया। उम्मीद थी, विशाल शायद इस तरह की युद्ध और क्रूरता पर कोई मार्मिक फ़िल्म बनाएँगे। उन्होंने भी साथी फ़िल्मकारों की तरह बीते सालों में हद निराश किया। बीते समय में हिंसा और क्रूरता की फ़िल्मों के ज़रिए ही बाज़ार गर्म हुआ है। हिंसा की फ़िल्मों का बाज़ार क्या बताता है? क्या हम वाकई हिंसा पसंद करने लगे हैं?

बॉक्स ऑफ़िस और केवल बॉक्स ऑफ़िस के डर से अच्छी और ज़रूरी फ़िल्म को बनाने से ख़ुद को रोकना कहाँ तक सही है?

एक व्यक्ति ने इसका बीड़ा उठाया, और ऐसा उठाया कि सिनेमा ख़त्म होने के बाद भी कुर्सी छोड़ने की इच्छा नहीं होती। मन भारी रहता है। जैसे कुछ टूटा हो भीतर, जैसे कोई रास्ता बना हो भीतर। जैसे फूटकर रोने का मन उठे। कोई कोना ढूँढ़ने को देह थाह माँगे।

एक मित्र ने कहा कि फ़िल्म बहुत स्लो है। इतनी अच्छी भी नहीं है। लोगों में से बहुत लोगों को फ़िल्म पसंद नहीं आ रही है।

मैंने कहा— हम जिस दौर में रह रहे हैं, जिस तेज़ी से भाग रहे हैं, इसमें वापसी इतनी आसान नहीं है। इसके लिए धीमा प्यार और बहुत धीमा ज़हर ही ज़हर को काट सकता है। प्यार वही ज़हर है, जो हिंसा को हटा सकता है। बंजर ज़मीन को अधिक पानी की ज़रूरत होती है।

उस डॉक्यूमेंट्री का नाम है “ट्वेंटी डेज़ इन मारियुपोल।” उसे देखते हुए मैं कामना कर रहा था— काश युद्ध में पगलाए देश और लोगों का हुजूम इसे देखे और ख़ुद को धिक्कारे, दुत्कारे। ख़ुद के इंसान होने और गुमान के साथ इंसान मानने पर शर्म करे।

धरती ने बीते लाखों साल में उतनी तबाही नहीं देखी, जितनी पिछले सौ साल में देख ली। दो विश्व युद्ध और इसके बाद भी लगातार चले आ रहे युद्ध! कितना लड़ लेंगे कि “और लड़ना है” का बुखार उतर जाएगा!

“मैं वापस आऊँगा” उस प्यार की कहानी है, जहाँ आज का निर्वैर, कल के ईशर पर पहले हँसता है। फिर उसके प्रभाव में पड़ता है। प्रभाव मज़बूत है। इतना मज़बूत कि वह अब भागना नहीं चाहता। रुकना चाहता है। सामना करना चाहता है। ईशर के सहारे ख़ुद को जानना चाहता है। अब अपने प्यार का सामना करना चाहता है। निर्णय लेना चाहता है। उसके साथ-साथ चलना चाहता है। देश वापस लौटना चाहता है। घर वापसी चाहता है।

यह कहानी जितना प्यार की कहानी कहती है, उससे ज़्यादा टूटन की कहानी है। यह उस वादे की कहानी है, जो पूरा नहीं हुआ और अब जब तक पूरा नहीं होगा, ईशर अपनी देह को और अधिक कष्ट देता रहेगा, देह त्यागेगा नहीं।

“किए गए वादे पूरे करना”— फ़िल्म इस वाक्य पर एक राह में चलती है। बिना हिले-डुले। एकदम फोकस्ड। फ़िल्म रास्ते में उससे जुड़े विषय भी समेटती-छूती चलती है।

टूटने की सीमा का अंदाज़ा टूटे हुए से ज़्यादा कौन जान सकता है!

इम्तियाज़ ने उस टूटन का एक-एक सिरा हर तरफ़ से छू कर दिखाया, महसूस कराया। अब भी अगर फ़िल्म धीमी और अनछुई-सी लगे, तो रुकना, सोचना, सवाल करना ख़ुद पर। क्या प्यार इतना मुश्किल है महसूस कर पाना!

हिंसा से भरे समाज में रहते हुए हम किस हद तक जानवर होते गए हैं। हमारे साथ रहने वाले कब-कब हमारे ही ख़ून के प्यासे हो गए! और यह किसी ज़माने की बात नहीं है। इसी ज़माने की बात है।

“मैं वापस आऊँगा” को अपना रास्ता बहुत बारीक-बारीक पता है। यह फ़िल्म जितना तब की बात कहती है, उतना ही अब की बात कहती है। अब भी आधी दुनिया युद्ध में फँसी है। एक देश ने दूसरे देश पर हमला कर दिया, सैकड़ों बच्चे स्कूल में पढ़ते-पढ़ते बम से चिथड़े हो गए। दुनिया उन मासूम बच्चों के सवाल का क्या जवाब देगी— “मेरा क्या दोष था!”

क्या पलायन से जूझने वालों के सवालों का जवाब कभी मिलेगा— “मुझे ही क्यों मिला विस्थापन!”

बशीर साहब का हाल में इंतक़ाल हुआ। एक शेर खोज-खोजकर पढ़ा जाने लगा—

“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,

 तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।”

मेरठ के दंगे में उनका घर जला, शहर बदलने को मजबूर हुए।

उन लोगों का क्या, जिनके पास न भाषा थी, न रोने का समय! उनके सवालों का जवाब कब मिलेगा!

फ़िल्म देखने के बाद एक सिंधी बुज़ुर्ग सिनेमा हॉल के बाहर मिले। अकेले थे। फ़ोन पर किसी से बात कर रहे थे— “यार, ये कहानी मेरी है, हमारी है।”

लंबे वक़्त तक रहे किराए का मकान छोड़ते वक़्त भी मन उदास हो जाता है, छूटता हुआ समाज बार-बार याद आता है। लेकिन जब एक दिन अचानक पता चले— “आप जहाँ हैं, जहाँ बरसों रहे, वह अब आपका एकदम से नहीं है। भूगोल में किसी भी जगह जाएँ, फिर से अपना देखें।”

पलायन हुए सारे लोग एक ही जीवन में दो बार मरते हैं।

पलायन घर से, समाज से, शहर से, लोगों से, अपनों से, अपनी यादों से… इसकी लंबी सूची बन सकती है। पलायन केवल एक शब्द नहीं है।

कैपरनाउम (इसका शाब्दिक अर्थ है— अराजकता) नाम की एक फ़िल्म है। इसका मुख्य पात्र एक बच्चा है, जो शरणार्थी रहा है और अब जेल में है। जेल में वह अपने माँ-बाप पर केस करता है।

जज पूछता है: “तुम अपने माता-पिता पर मुक़दमा क्यों करना चाहते हो?”

ज़ैन (वही बच्चा) जवाब देता है: “क्योंकि उन्होंने मुझे जन्म दिया।”

पलायन में सीमा पार आए बच्चों के भीतर भी क्या ऐसा सवाल उठा होगा!

“मुझे जन्म क्यों दिया इस दुनिया में मरने के लिए!”

शरणार्थियों में से क्या किसी ने किसी पर केस किया? क्या उनका अधिकार नहीं था? क्या वे भेड़ थे, जो चरा दिए गए? उनका जीवन नहीं था? उनका रोना किसने देखा? क्या कभी वे जीवन भर ख़ुद को ख़ाली कर पाए? दिल्ली का एक इलाक़ा उन शरणार्थियों से भरा हुआ है। उन्होंने अपने भीतर प्यार की बूँद को कैसे ख़र्च किया? उन्होंने ज़मीन, घर, परिवार बनाया, क्या वह उनकी ज़िद थी? अपने ऊपर अत्याचार था? ख़ुद को थका-थका कर मारने के सिवाय उनके पास क्या चारा रहा?

युद्ध और शरणार्थियों के विषय को केंद्र में रखकर कई-कई फ़िल्में बनीं।

‘पिंजर’ हालिया उदाहरण है।

‘धीपान’— श्रीलंका से भागा एक तमिल लड़का फ़्रांस में शरणार्थी बन कर रहता है। भागने के बाद भी युद्ध उसका पीछा नहीं छोड़ता।

देखने और पढ़ने को सब भरा हुआ है।

सवाल है— फ़िल्म देखने के बाद की भावुकता का असर लंबा क्यों नहीं होता! वही लोग, जो “मैं वापस आऊँगा” को देख कर रील्स डालते हैं, रोते हैं, ज़रा-सी बात पर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं! ज़रा-सी बात पर सामने वाले के साथ शाब्दिक हिंसा!


***


फिर भी...

“पार्टनर, आपकी पॉलिटिक्स क्या है!”

यह सवाल फ़िल्म देखने के दौरान भी आया। इम्तियाज़ की यह फ़िल्म बँटवारे की है, लेकिन यह बहुत संयम और बचते-बचाते बनाई गई फ़िल्म है। कुछ दृश्य बेहद दर्दनाक हैं।

इम्तियाज़ ने इस फ़िल्म को प्रेम कहानी की तरह पेश किया। एक व्यक्ति है, जिसका एक काम अधूरा है और वह उसे पूरा करना चाहता है।

लेकिन कहानी में जिया कहाँ है! उसका दर्द कहाँ है! फ़िल्म में अचानक से जिया गायब क्यों हो जाती है! प्यार दो तरफ़ा था, तो दर्द भी दोनों के ही हिस्से आया होगा न! उस तरफ़ महिलाओं की जो हालत थी, उसमें जिया के लिए भी कितना मुश्किल रहा होगा उस पार रहना, इसे कौन बताएगा! हम केवल एक पात्र की कहानी सुनकर उसके दर्द को बड़ा नहीं मान सकते। उस औरत का क्या, जिससे ईशर ने शादी की, उसका ज़िक्र कहाँ गया! क्या उसके लिए आसान रहा होगा ऐसे व्यक्ति के साथ जीवन बिताना, जो जीवन भर उसके हिस्से ‘बचा हुआ’ ही आया।

इम्तियाज़ की फ़िल्मों में कई बार जिस पात्र को हम अपने दैनिक जीवन में पसंद नहीं कर सकते हैं, उससे आकर्षण हो जाता है। यह इम्तियाज़ का हुनर है। यहाँ भी ईशर को अचानक सालों बाद आई जिया की याद, ऐसा ही है। इसके पहले कभी क्यों नहीं आई याद! अगर अपने बेटे को शादी करने के लिए मना किया, उसको अपराधी बताया, तो खुद कैसे बचे रहे!

ऐसे कुछ सवाल हैं, जिनसे बचा नहीं जा सकता।

इम्तियाज़ के पास आँखें हैं और वह दृश्य पर यक़ीन करते हैं। उनके फ्रेम में नया और अलग बहुत ज़्यादा नहीं है। उनकी फ़िल्मों के पात्र कई बार अलग-अलग फ़िल्मों में खुद को दुहराते भी दिखते हैं। फिर भी इम्तियाज़ एक दृश्य को बार-बार अलग-अलग दृष्टि से देखने में माहिर हैं। इम्तियाज़ का घर-वापसी वाला बिंदु उनकी अमूमन सारी फ़िल्मों में आता है। इसमें लव आज कल जैसा भी महसूस होता है, जब निर्वैर और ईशर बात करते हैं। 

फिर भी बचते हुए ही सही, फ़िल्म महसूस होती है। कला में जब सवालों की गुंजाइश हो, तब संवाद बनता ही है। यह सही भी है। 

याद आता है अपने ही एक गुरु का कहा- जिसके प्रशंसक बनो, उससे सबसे ज़्यादा सवाल करना अपना अधिकार मानना। 

आज अंदर की ज़मीन इतनी कसी हुई है कि प्यार का बीज उगाने के लिए कई “मैं वापस आऊँगा” की ज़रूरत है।

सुमन शेखर


संक्षिप्त परिचय:-


नाम- सुमन शेखर 

शिक्षा- मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर, दिल्ली से।

फ़िल्मों के लिए पटकथा लेखन, निर्देशन के साथ ही अभिनय।  

देश-विदेश के बड़े फ़िल्म फेस्टिवल्स में फ़िल्में प्रदर्शित, अभिनीत फ़िल्म “ख़्वाबिदा” को एनएफ़डीसी द्वारा बेस्ट रोमांटिक फ़िल्म का अवार्ड, 

‘The Saddist” फिल्म की भी खूब तारीफ। 

फ़ीचर फ़िल्म “लाइफ टाइम डेथ” के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता।

दशक भर से रंगमंच में सक्रिय लेखन, निर्देशन।

कथादेश ‘कथा-समाख्या’ में कहानी चयनित। 

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ और लेख प्रकाशित। 

वर्तमान पता-अंधेरी वेस्ट, मुम्बई में ठिकाना।



सम्पर्क


मोबाइल - 8877225078

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