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कल्पना मनोरमा के कहानी संग्रह पर विनीता बाडमेरा द्वारा की गई समीक्षा

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आज समय चक्र भले ही इक्कीसवीं सदी में पहुँच चुका है, कुछ अपवादों को छोड़ कर स्त्रियों का जीवन आज भी त्रासद है। सम्पत्ति से बेदखली, हत्या, बलात्कार जैसी यंत्रणाएं उन्हें आज भी भुगतनी पड़ती है। स्त्रियों को अपना पूरा जीवन पिता, पति या पुत्र के देखरेख में बिताना पड़ता है। कल्पना मनोरमा ने स्त्रियों की आपबीती को ज्यों का त्यों अपनी कहानियों में दर्ज किया है। ये कहानियां अब एक संग्रह 'एक दिन का सफर' के रूप में प्रकाशित हुई हैं। इन कहानियों पर समीक्षा लिखी है विनीता बाडमेरा ने। विनीता खुद भी समर्थ रचनाकार हैं और उन्होंने इसी क्रम में रचना की कसौटी पर इस संग्रह की कहानियों को कसा और परखा है। कल्पना की कहानियों की तहकीकात करते हुए वे लिखती हैं "कल्पना मनोरमा की कहानियां 'थोड़ा है, थोड़े की जरुरत' को दिखाती समझाती कहानियां हैं। ये कहानियां स्त्री मन की उन परतों को आहिस्ता से उघाड़ती हैं जो उसने बरसों से छिपा कर रखी है इसलिए ये कहानियां किसी एक स्त्री की नहीं है उन सभी की है जो परिवार और रिश्तों को संभालने में खुद का अस्तित्व ही भुला बैठी है"। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते...

कल्पना मनोरमा की डायरी का अंश 'उत्तरहीन प्रश्नों के साथ'

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कल्पना मनोरमा मानव शरीर नश्वर है, यह बात सभी जानते हैं। इसके बावजूद सभी मनुष्यों की अपनी अपनी महत्वाकांक्षाएं होती हैं। किसी की ढंकी छुपी, किसी की खुली खुली। इसके लिए सब भरसक प्रयास भी करते हैं। वे भी जो यह कहते नहीं थकते कि उनकी कोई महत्वाकांक्षा ही नहीं है। जनसेवा की बात करने वाले तथाकथित समाजसेवी हों या जन नेता हों या फिर धर्मोपदेश देने वाले महात्मा, सबकी अपनी-अपनी हसरतें होती हैं। कल्पना मनोरमा अपनी डायरी में लिखती हैं "कभी-कभी सोचती हूँ कि इतिहास के बड़े नाम और हमारे समय के छोटे-बड़े नामों में मूल अंतर कितना है? पैमाना अलग है, मनोवृत्ति शायद नहीं। सिकंदर ने संसार जीतना चाहा था। तो क्या हम अपने-अपने छोटे संसार जीतना नहीं चाहते हैं? किसी को भूभाग चाहिए था, किसी को प्रतिष्ठा। किसी को साम्राज्य चाहिए था, किसी को अनुयायी। इच्छा का आकार बदल जाता है, उसकी प्रकृति नहीं।" डायरी लेखन साहित्य की ऐसी विधा है जिस पर आजकल कम बात होती है। लेकिन ये अंश अक्सर ही विचारोत्तेजक होते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कल्पना मनोरमा की डायरी का अंश  'उत्तरहीन प्रश्नों के साथ'।   डाय...

कल्पना मनोरमा का आलेख 'मुक्ति कोई अलंकार नहीं'

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  कल्पना मनोरमा स्त्री मुक्ति का सवाल आज एक अहम सवाल है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने स्त्री मुक्ति का अगर विरोध नहीं किया तो उसमें कोई रुचि भी नहीं दिखाई। पितृसत्तात्मक व्यवस्था की जकड़न कुछ इस तरह बनी रही कि स्त्री को उससे निकलने के लिए सोचने में ही शताब्दियों लग गए। आज बदले हुए समय की स्त्री अपनी मुक्ति के लिए सजग और सचेत है। लेकिन सवाल फिर वही है कि मुक्ति का वास्तविक मतलब क्या है? यह उच्छृंखल होना तो कतई नहीं है। कवयित्री कल्पना मनोरमा स्त्री मुक्ति के इन सवालों से टकराते हुए लिखती हैं 'मुक्ति देह के त्याग में नहीं, चेतना के विस्तार में है। वह बाहर से मुक्त दिखने में नहीं, भीतर से निर्भय होने में है। जब स्त्री अपने निर्णयों की ज़िम्मेदारी बिना संकोच के स्वयं उठाने लगेगी, जब वह दूसरों की आँखों से खुद को देखना बंद कर सकेगी और अपने अंत:प्रकाश में स्वयं को निहार सकेगी, तब वह किसी से मुक्त कहलाने की मुहताज नहीं रहेगी, वह स्वतः मुक्त हो जाएगी।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कल्पना मनोरमा का आलेख 'मुक्ति कोई अलंकार नहीं'। 'मुक्ति कोई अलंका...

कल्पना मनोरमा की कविताएं

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  कल्पना मनोरमा कल्पना मनोरमा का जन्म चार जून, 1972 को इटावा, उत्तर प्रदेश में हुआ। कानपुर विश्वविद्यालय से एम. ए, (संस्कृत-हिंदी) बी. एड. (हिंदी) से किया। माध्यमिक विद्यालय में बीस वर्षों तक हिंदी और संस्कृत विषय की अध्यापक रहीं। कुछ वर्षों तक अकादमिक पब्लिकेशन हाउस में बतौर सीनियर एडिटर  और हिन्दी हिन्दी काउंसलर का पद भार सम्हाला। फिलहाल पत्रकारिता एवं स्वतंत्र लेखन में संलग्न । 'कब तक सूरजमुखी बनें हम' नवगीत संग्रह, 'बाँस भर टोकरी', 'नदी सपने में थी' और 'अब लौटने दो' कविता संग्रह, कहानी संग्रह "एक दिन का सफ़र", साक्षात्कार "संवाद अनवरत" प्रकाशित। एक बालकथा संग्रह और दो कविता संग्रह प्रकाशनाधीन हैं। कल्पना मनोरमा ने पुरुष-पीड़ा जैसे विशेष संदर्भों पर आधारित दो कहानी संग्रह भी संपादित किए हैं। जिनके नाम हैं-'काँपती हुईं लकीरें' और 'सहमी हुईं धड़कनें' उनकी कहानियों का अनुवाद पंजाबी, उर्दू और उड़िया भाषा में प्रकाशित हुए हैं। संत गाडगेबाबा अमरावती विश्वविद्यालय के बी. कॉम प्रथम वर्ष में नयी शिक्षा नीति (NEP) के तहत उनका...