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अनीता राकेश से प्रज्ञा की बातचीत

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  अनीता राकेश से बात करती हुईं प्रज्ञा  कोई भी लेखन दरअसल रचनाकार के अनुभवों से ही निःसृत होता है। इस लेखन में अनुभव के साथ साथ सूक्ष्म दृष्टि भी समाहित होती है। उस लेखन को पढ़ते हुए पाठक जब खुद को उसमें शामिल पाता है तब वह रचना अपनी सार्थकता को प्राप्त करती है।  हिंदी के चर्चित नाटककार, कहानीकार  मोहन राकेश ऐसे ही कहानीकार थे जिनकी रचनाएं आज भी पाठकों के बीच काफी लोकप्रिय हैं।  मोहन राकेश का यह जन्म शताब्दी वर्ष है। इस अवसर पर पत्र पत्रिकाएं विशेषांक निकाल रही हैं। कथादेश का मोहन राकेश पर केन्द्रित अंक हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इस अंक में एक महत्त्वपूर्ण बातचीत छपी है। कथाकार प्रज्ञा ने मोहन राकेश की पत्नी अनीता राकेश से बातचीत की हैं जिससे उनके जीवन के कई पहलुओं पर प्रकाश पड़ता है। बकौल प्रज्ञा  " अनीता राकेश जी से मेरी यह बातचीत जो आपके समक्ष प्रस्तुत है वह लंबी बातचीत के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ कर तैयार की गई है या ये कहूं कि मैंने बिखरे हिस्सों को एक मुकम्मल शक्ल देने की कोशिश की है। इसके पीछे दो कारण प्रमुख रहे। पहला, ये कि इस बातचीत में अनीता जी द्व...

प्रज्ञा की कहानी ‘मालूशाही! मेरा छलिया-बुरांश’।

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प्रज्ञा प्रेम अपने आप में बिल्कुल अनोखा होता है। एक बार हम जिससे प्रेम करने लगते हैं उससे आजीवन जुदा नहीं हो पाते। प्रेम अपनी कहानी अपने अंदाज़ में अपने तरह से ही लिखता है। हाल ही में नया ज्ञानोदय में प्रकाशित प्रज्ञा की लम्बी कहानी ‘मालूशाही! मेरा छलिया-बुरांश’ पढ़ते हुए हम प्रेम के उ स रूप से परिचित होते हैं, जो समस्त परम्परागत मान्यताओं से अब तलक लोहा लेता रहा है। प्रज्ञा की यह लम्बी कहानी है जि समें एक ऐसी प्रवहमानता है जो पाठक को अन्त तक अपने से बांधे रखती है। धरा अन्त तक हकीकत को भांपने में असमर्थ रहती है और जब हकीकत से दो-चार होती है तो स्तब्ध रह जाती है। आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं प्रज्ञा की कहानी ‘मालूशाही! मेरा छलिया-बुरांश’। मालूशाही! मेरा छलिया-बुरांश                            प्रज्ञा                      ...