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यशपाल का यात्रावृत्त 'काबुल'

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  यात्राएं हमें जीवन का सबक देती हैं। अनुभव के साथ साथ तमाम परिप्रेक्ष्य भी सामने आते हैं। यात्राएं स्वयं में एक महाकाव्य सरीखी होती हैं पन्ने दर पन्ने कई कड़वे मीठे सबक भी मिलते हैं। वैसे भी मनुष्य यायाबरी कर ही मनुष्य बन पाया और इस समूची पृथिवी पर अपना वर्चस्व कायम कर पाया। मशहूर घुमक्कड़ राहुल सांकृत्यायन तो अक्सर इन पंक्तियों को उद्धृत किया करते थे। सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहां। जिंदगानी गर रही, तो नौजवानी फिर कहां।। बाबा नागार्जुन भी राहुल जी की परम्परा के ही थे। उनके यात्री उपनाम से हिन्दी जगत में भला कौन परिचित न होगा। मशहूर कहानीकार यशपाल ने भी कई रोचक यात्राएं कीं और अपने यात्रा वृत्तान्त को शब्दबद्ध भी किया। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं यशपाल का  यात्रावृत्त 'काबुल'। काबुल यशपाल प्राहा में लेखक कांग्रेस के समय जर्मन कवि जिमरिंग से परिचय हुआ था। प्रसंग में बात चली कि मैं कुछ समय के लिए जर्मनी जा सकूँगा या नहीं। बर्लिन देखने की उत्‍सुकता मुझे स्‍वयं थी। तीसरे-चौथे दिन ही प्राहा में पूर्वी जर्मनी के राजदूतावास के एक सज्‍जन ने आ कर बात की - 'प्राहा से ...