हरियश राय के उपन्यास पर चंद्रकला सिंह की समीक्षा



दूब धरती से लगी हुई होती है। वह ऊँची नहीं होती लेकिन उसकी जिजीविषा अदम्य होती है। आंधी तूफान बड़े बड़े वृक्षों को उखाड़ फेंकते हैं लेकिन वह दूब का बाल बाँका भी नहीं कर पाते। बरसात में यह दूब मिट्टी को बचाने का काम करती है। आमतौर पर साहित्य उनकी बात करता है जिनकी बात कोई और नहीं करता। वह दबे कुचले हुए लोगों की बात करता है। प्रतिष्ठित रचनाकार हरियश राय अपनी कहानियों और उपन्यासों में इन दबे कुचले लोगों के मुद्दों को उठाते हैं। उनके हालिया प्रकाशित उपन्यास का नाम ही है दूब। नायिका दूर्वा अपने प्रयासों से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन जाती है लेकिन उसे अहसास होता है कि आर्थिक आत्मनिर्भरता ही सब कुछ नहीं होता। हरेक व्यक्ति के कुछ और भी वैयक्तिक और सामाजिक सरोकार होते हैं। हरियश राय के इस उपन्यास पर अपनी समीक्षा में चन्द्रकला सिंह लिखती हैं 'यह उपन्यास स्त्री की गरिमा के साथ-साथ प्रकृति और पहाड़ की गरिमा का भी प्रश्न उठाता है। दूर्वा जिस तरह अपने जीवन के लिए लड़ती है, उसी तरह वह अपने पहाड़ों, जंगलों, जलस्रोतों और वहाँ के लोगों के जीवन के लिए भी चिंतित दिखाई देती है।' यही इस उपन्यास का प्राप्य है। जब लोग अपने में ही सिमटते जा रहे हैं ऐसे में चिन्ताओं और सरोकारों की बात करना महत्वपूर्ण है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं हरियश राय के उपन्यास पर चंद्रकला सिंह की समीक्षा ‘दूब’ : स्त्री-अस्मिता, और विकास से दरकते पहाड़’।


समीक्षा 

‘दूब’ : स्त्री-अस्मिता, और विकास से दरकते पहाड़’


डॉ चंद्रकला सिंह   

 

हरियश राय वर्तमान समय में लगातार अपने लेखन से सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर लिख रहे हैं, चाहे वह उनकी कहानियां हो या उपन्यास धार्मिक उन्माद (दहन), किसान की त्रासदी (माटी राग), या अन्योन्य नागफनी के जंगल, मुट्ठी में बादल हो सभी में यथार्थ की गहरी परतों को उभार कर अंतल से जमीनी सतह पर ला कर इन कृतियों में विचार को विमर्श में बदल दिया है।

समकालीन हिंदी उपन्यास का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह आज के मनुष्य के जीवन को केवल व्यक्तिगत या पारिवारिक संदर्भों में नहीं देखता, बल्कि उसके सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और पर्यावरणीय संदर्भों को भी अपनी कथा का हिस्सा बनाता है। आज मनुष्य जिस तरह विकास, बाजार और उपभोक्तावाद के बीच अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, वह संघर्ष साहित्य में भी निरंतर अभिव्यक्त हो रहा है। विशेष रूप से स्त्री के जीवन में यह संघर्ष कई स्तरों पर दिखाई देता है। उसे एक ओर परिवार और समाज की रूढ़ धारणाओं से जूझना पड़ता है तो दूसरी ओर अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व और निर्णय के अधिकार के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है।

आपका उपन्यास ‘दूब’ इसी व्यापक जीवन-संदर्भ को केंद्र में रख कर लिखा गया उपन्यास है। उपन्यास की नायिका ‘दूर्वा’ एक छोटे से पहाड़ी गाँव से निकल कर आधुनिक शिक्षा प्राप्त करती है, कॉरपोरेट संसार में प्रवेश करती है और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनती है। लेकिन आर्थिक स्वतंत्रता उसके जीवन की संपूर्ण मुक्ति नहीं बन पाती। उसके भीतर सम्मान, आत्मीयता और अपने अस्तित्व को ले कर जो प्रश्न हैं, वे लगातार उसे परेशान करते हैं।

यही कारण है कि ‘दूब’ को केवल स्त्री-केंद्रित उपन्यास कह देना उसके व्यापक सरोकारों को सीमित कर देना होगा। यह उपन्यास स्त्री की गरिमा के साथ-साथ प्रकृति और पहाड़ की गरिमा का भी प्रश्न उठाता है। दूर्वा जिस तरह अपने जीवन के लिए लड़ती है, उसी तरह वह अपने पहाड़ों, जंगलों, जलस्रोतों और वहाँ के लोगों के जीवन के लिए भी चिंतित दिखाई देती है।

उपन्यास की कथा का केंद्र दूर्वा है। वह हिमाचल के एक छोटे गाँव से निकल कर मैनेजमेंट की पढ़ाई करती है और कॉरपोरेट क्षेत्र में नौकरी प्राप्त करती है। उसके जीवन की यह यात्रा सामान्य अर्थों में सफलता की यात्रा दिखाई देती है, लेकिन लेखक इसी सफलता के भीतर छिपी हुई असंतुष्टि को सामने लाते हैं।

दूर्वा के पास नौकरी है, पैसा है, आधुनिक जीवन की सुविधाएँ हैं, लेकिन उसके मन में एक प्रश्न बार-बार उठता है—क्या पैसा वास्तव में सुख दे सकता है? क्योंकि अपने घर में दो लालची इंसानों की पैसे बढ़ती भूख ने कैसे उसके जीवन में जहर घोल दिया था।

उपन्यास में दूर्वा के मन में उठने वाला यह प्रश्न अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि कॉरपोरेट दुनिया में काम करते हुए क्या वह स्वयं सुखी रह पाई है और क्या उसका पति तरुण वर्मा भी सुखी रह पाया है। उसे नौकरी से पैसा तो मिला, लेकिन वह सुख नहीं मिला जिसकी तलाश में मनुष्य जीवन भर भटकता रहता है।

यहाँ लेखक आधुनिक जीवन की उस विडंबना को पकड़ते हैं जिसमें मनुष्य आर्थिक रूप से समृद्ध होता जाता है, लेकिन भीतर से लगातार खाली होता जाता है। दूर्वा का संघर्ष इसलिए केवल बाहर की परिस्थितियों से नहीं है; वह अपने भीतर भी एक निरंतर संघर्ष से गुजर रही है।

उसका अपने परिवार से संघर्ष भी इसी स्तर पर जुड़ता है। वह परिवार में केवल एक ऐसी स्त्री बन कर नहीं रहना चाहती जिसकी भूमिका दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करने तक सीमित हो। वह सम्मानजनक और गरिमापूर्ण व्यवहार चाहती है। उसके लिए यह सम्मान कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व का आवश्यक हिस्सा है।

‘दूब’ का सबसे सशक्त पक्ष इसका स्त्री-विमर्श है। लेकिन यहाँ स्त्री-विमर्श केवल नारे या वैचारिक घोषणाओं के रूप में उपस्थित नहीं होता। दूर्वा के जीवन के अनुभवों से धीरे-धीरे विकसित होता है। “प्लेटफ़ॉर्म पर पैर रखते हुए उसके मन की ख़ुशी कई गुना बढ़ गयी। हिमाचल प्रदेश की सोलन जैसी छोटी जगह में रह कर जो सपना उसने देखा था, वह सच होने जा रहा था।” आज दूर्वा शिक्षित है, नौकरी करती है और आर्थिक रूप से स्वतंत्र है। इसके बावजूद उसे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। इससे लेखक यह स्थापित करते हैं कि आर्थिक स्वतंत्रता और मानसिक-सामाजिक स्वतंत्रता एक ही बात नहीं है। इसके बाद भी सामाजिक और पारिवारिक कठिनाइयाँ बाधक बनती हैं जिनसे लड़ने के अलग हथियार न गढ़ने पर कितनी बार हम लड़खड़ाते भी हैं दूर्वा को भी इसका सामना करना पड़ता है। तरुण के द्वारा बार-बार उस पर यह दवाब बनाना कि वह अपने पिता से अपना शेयर मांग कर उसके पिता की मदद करे। “पैसे कहाँ से आए? . मैंने दिए हैं अपनी एफडी का प्रो-पेमेंट ले कर’. ... जब इसके पास पैसे थे तब मुझसे क्यों मांग रहा था। क्यों मुझे अपने पिता से शेयर माँगने के लिए कह रहा था? क्यों इसके पिता हर महीने मुझसे चेक लेते हैं। ऐसे ढेरों सवाल दूर्वा की चेतना पर दस्तक देने लगे थे।”  

आज की शिक्षित और कामकाजी स्त्री के सामने यही एक बड़ी विडंबना है। वह घर से बाहर निकलती है, अपने पैरों पर खड़ी होती है, लेकिन घर के भीतर उससे आज भी कई बार वही पारंपरिक भूमिकाएँ निभाने की अपेक्षा की जाती है। दूर्वा इसी विरोधाभास की प्रतिनिधि है। उसकी लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष से अधिक उस मानसिकता से है जो स्त्री से उसके अधिकारों की कीमत पर पारिवारिक व्यवस्था को स्वीकार करने की अपेक्षा करती है।

इस संदर्भ में उपन्यास का स्त्री-विमर्श आक्रामक होने के बजाय अनुभवजन्य और मानवीय बन जाता है। दूर्वा विद्रोह केवल विद्रोह के लिए नहीं करती। वह अपने लिए एक ऐसा जीवन चाहती है जिसमें प्रेम हो, सम्मान हो, आत्मनिर्णय हो और अपने अस्तित्व के प्रति विश्वास हो। “मैं अपना सम्मान चाहती हूँ और सम्मानपूर्वक अपना जीवन जीना चाहती हूँ। किसी पुरुष के सामने झुक कर जीना मुझे कबूल नहीं। मैं किसी की आज़ादी को लांघना नहीं चाहती और न ही यह चाहती हूँ कि कोई मेरी आज़ादी को लांघे।”

उपन्यास में दूर्वा का पारिवारिक जीवन आधुनिक दांपत्य के उस संकट को सामने लाता है जहाँ साथ रहते हुए भी दो व्यक्ति मानसिक रूप से एक-दूसरे से दूर होते जाते हैं। प्रेम, ऊष्मा और विश्वास की जगह जब छल-छंद, व्यावसायिक दृष्टि, लगातार संबंधों की नींव को खोखला करने लगते हैं तो एक व्यक्ति की कोशिश नाकाम हो जाती है।

दूर्वा और तरुण वर्मा का संबंध इस बात का उदाहरण है कि विवाह केवल सामाजिक संस्था भर नहीं है। उसमें संवाद, सम्मान और आत्मीयता का होना भी आवश्यक है। जब इनमें से कोई एक चीज अनुपस्थित होती है तो संबंध धीरे-धीरे अपने अर्थ खोने लगता है। जो पहले मन मुटाव फिर मानसिक-आर्थिक शोषण, और अंत में बच्चा होने पर उससे अलग करने, तलाक और अंतत सब कुछ बिखरने की कगार तक आ जाता है। लेकिन नदी और दूब कब हर मानती है वो तो प्रवाह थमने के बाद फिर से अपनी जिजीविषा से जीवंत हो उठती हैं। “दूर्वा कर्नल बग्‍गा की संस्था ‘नवरचना’ को फोर लेन के दोनों तरफ़ कई पेड़ लगाने के कार्य में मदद करने लगी थी। यह उसके समर की नयी भूमि थी।”   

लेखक यहाँ दांपत्य को किसी आदर्शवादी दृष्टि से नहीं देखते। वे उसके भीतर मौजूद तनाव, असंतोष और अकेलेपन को भी सामने रखते हैं। दूर्वा के भीतर उठता हुआ सुख का प्रश्न इसी कारण व्यक्तिगत हो कर भी व्यापक सामाजिक प्रश्न बन जाता है।


हरियश राय


‘दूब’ की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक है कि इसमें प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं है। पहाड़ इस उपन्यास में स्वयं एक जीवंत उपस्थिति की तरह आते हैं। जंगलों का कटना, जल- स्रोतों का सूखना, बावड़ियों का नष्ट होना, चश्मों का तबाह होना और विकास के नाम पर पहाड़ों का लगातार बदलना—ये सब केवल पर्यावरणीय समस्याएँ नहीं हैं, बल्कि मनुष्य के जीवन से जुड़ी समस्याएँ हैं।

दूर्वा अपने पहाड़ों को केवल अपने बचपन की स्मृति के रूप में नहीं देखती। वह उनके वर्तमान और भविष्य को ले कर चिंतित है। विकास के नाम पर होने वाली विनाश लीला उसे बेचैन करती है। दूर्वा काटे गए पेड़ों, सूखी बावड़ियों और तबाह हुए चश्मों को ले कर व्यथित है और ऐसा विकास चाहती है जिसमें पहाड़ों का जीवन भी बचा रहे। यहीं उपन्यास अपने स्त्री-विमर्श से आगे बढ़ कर पर्यावरण-विमर्श का रूप ग्रहण करता है। क्योंकि उपन्यास का एक केंद्रीय प्रश्न यह भी है कि क्या विकास का अर्थ केवल सड़कें, भवन, उद्योग और आर्थिक विस्तार है? यदि विकास के लिए जंगल काट दिए जाएँ, जलस्रोत नष्ट कर दिए जाएँ, किसानों की जमीनें अधिग्रहित कर ली जाएँ और स्थानीय लोगों के जीवन का आधार ही छीन लिया जाए तो ऐसा विकास किसके लिए है? “सरकार ने भले ही हमारे खेत ले कर सड़कें बना दी हों, पर इलाके को तो उजाड़ दिया है। उस इलाके की लड़ाई लड़नी है। अपने जीवन को बचने के लिए लड़नी है।” यह प्रश्न आज के भारत के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है।

उपन्यासकार विकास के विरोध में खड़े दिखाई नहीं देते। बल्कि उनकी चिंता यह है कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। यही बात उपन्यास को एकांगी पर्यावरणवादी रचना बनने से बचाती है। दूर्वा भी चाहती है कि पहाड़ भी बचें और विकास की नई राह भी खुले। इस दृष्टि से उसका संघर्ष विनाश के विरुद्ध है, विकास के विरुद्ध नहीं।

उपन्यास का शीर्षक ‘दूब’ जितना आकर्षक है उतना ही महत्वपूर्ण व अत्यंत अर्थपूर्ण है। दूब साधारण दिखाई देती है। वह किसी विशाल वृक्ष की तरह ऊँची नहीं होती, उसका कोई भव्य आकार नहीं होता, लेकिन उसे जितनी बार कुचला जाए, वह उतनी ही जिजीविषा के साथ फिर उग आती है। दूर्वा का चरित्र भी इसी दूब की तरह है। वह जीवन में अनेक स्तरों पर चोट खाती है, टूटती है, अकेली पड़ती है, लेकिन समाप्त नहीं होती वह अपने लिए फिर खड़ी होती है। यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। उसकी यह शक्ति उसकी बहन-जीजा और माता-पिता के लगातार उसके साथ देने से और बढ़ जाती है।

‘दूब’ यहाँ स्त्री की जिजीविषा का प्रतीक बन जाती है। साथ ही यह पहाड़ की उस प्रकृति का भी प्रतीक है जो मनुष्य द्वारा लगातार क्षतिग्रस्त किए जाने के बावजूद जीवन को बचाए रखने का प्रयास करती है। इस प्रकार शीर्षक केवल सुंदर नहीं, बल्कि उपन्यास के केंद्रीय भाव को अपने भीतर समेटे हुए है।

उपन्यास का सबसे विकसित पात्र दूर्वा है। उसके माध्यम से लेखक ने आधुनिक शिक्षित स्त्री की जटिल मनःस्थिति को सामने रखा है। वह न तो केवल विद्रोही स्त्री है और न ही केवल संवेदनशील स्त्री। उसमें दोनों पक्षों का सुंदर संयोजन है।

वह अपने अधिकारों के लिए लड़ती है, लेकिन दूसरों के दुखों के प्रति भी संवेदनशील है। वह अपने व्यक्तिगत जीवन से बाहर निकल कर समाज और प्रकृति के प्रश्नों से जुड़ती है।

उसका पति तरुण वर्मा शादी से पहले एक अच्छे दोस्त की केंचुली उतार कर स्वार्थी, लालची और खुदगर्ज इंसान के रूप में जिस तरह आता है उसी से दूर्वा के जीवन के वह पक्ष भी सामने लाता है जहाँ आर्थिक सफलता के बावजूद दांपत्य जीवन में संतोष का अभाव है। कारपोरेट संस्कृति की स्पर्धा घर में किस तरह धीरे-धीरे पैठ बना कर सारी खुशियों में सेंध लगती है यह देख सकते है।

दूर्वा के जीवन में एक नई किरण और हवा के ताजे झोंके की तरह आए कर्नल बग्‍गा और नवरचना संस्था जैसे प्रसंग दूर्वा के पर्यावरणीय सरोकार को सामाजिक धरातल प्रदान करते हैं। दूर्वा का कालका से धर्मपुर तक सड़क के दोनों ओर नीम के पौधे लगाने के प्रयास से जुड़ना उसके भीतर के सामाजिक उत्तरदायित्व को व्यक्त करने के साथ ही बेटे कुश को उस परंपरा से जोड़ने में उसकी दूरंदेशी को भी दर्शाता है।

हरियश राय की भाषा की विशेषता उसकी सहजता और प्रवाह है। लेखक अनावश्यक रूप से जटिल शब्दावली का सहारा नहीं लेते। कथा का परिवेश जिस तरह बदलता है, भाषा भी उसी के अनुरूप अपना स्वर ग्रहण करती है। उनके अन्य उपन्यासों की तरह इसमें भी कॉरपोरेट जीवन की भाषा और पहाड़ी जीवन की संवेदना के बीच जो अंतर है, वह कथा में स्वाभाविक रूप से दिखाई देता है। यही कारण है कि उपन्यास का पाठ बोझिल नहीं होता।

लेखक का वर्णनात्मक पक्ष भी प्रभावशाली है। पहाड़, जंगल, सड़क, बारिश, सूखते जलस्रोत और बदलता हुआ प्राकृतिक परिवेश कथा के भीतर दृश्‍यात्‍मकता पैदा करते हैं। “काम करते-करते पिता का चेहरा पथरीला हो गया था। सीढ़ीदार खेतों में चढ़ते-उतरते हाथ-पैर मटमैले हो चुके थे। चेहरे पर झुर्रियां आ गयी थीं। साथ ही लेखक दूर्वा के मन की बेचैनी को भी बाहरी परिवेश से जोड़ते हैं। बाहर का उजड़ता हुआ पहाड़ और भीतर का उजड़ता हुआ मन—दोनों एक-दूसरे के प्रतीक बन जाते हैं।

किसी भी कृति का उद्देश्य उसकी संवेदना और मानवीय सरोकार से तय होता है। इस दृष्टि से ‘दूब’ का मूल स्वर अंततः मानवीय है। उपन्यास स्त्री की स्वतंत्रता की बात करता है, लेकिन पुरुष-विरोधी दृष्टि से नहीं। पर्यावरण की चिंता करता है, लेकिन विकास-विरोधी हो कर नहीं। परिवार की आलोचना करता है, लेकिन परिवार की महत्ता को नकार कर नहीं। सारे प्रयास के बाद भी जब छल से उसके बच्चे को ले कर घर में ताला लगा कर उसके अस्तित्व को ही नकार दिया जाए तो अंततः उसे लड़ना ही होगा यह भी एक सकारात्मक सन्देश ही है। यही संतुलन उपन्यास को अधिक विश्वसनीय बनाता है।

दूर्वा की चिंता केवल अपनी खुशी तक सीमित नहीं रहती। वह चाहती है कि उसके आस पास के लोगों के दुख कुछ कम हों और वे अपने अस्तित्व को महसूस कर सकें। वह ऐसा कुछ करना चाहती है जिसका कोई अर्थ हो और जिससे लोगों के दुख कम करने में सहायता मिले। यहीं दूर्वा व्यक्तिगत संघर्ष से ऊपर उठ कर सामूहिक जीवन की संवेदना का प्रतीक बन जाती है।

आज जब एक ओर महिलाएँ शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रही हैं और दूसरी ओर उन्हें पारिवारिक तथा सामाजिक स्तर पर अनेक प्रकार की असमानताओं का सामना करना पड़ रहा है, ‘दूब’ का स्त्री-केंद्रित कथ्य विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाता है। “एक दीवार पर मीरा, अक्क महादेवी की पेंटिग्स की ओर इशारा करते हुए गाईड ने जब... ‘अपनी शर्तों’ पर कहा तो दूर्वा के मन में एक नया उत्साह पैदा हुआ। इन स्त्रियों ने अपने बूते पर अँधेरे को दूर करने की कोशिश की।”  

इसी प्रकार हिमालयी क्षेत्रों में सड़क निर्माण, पर्यटन, जल विद्युत परियोजनाओं, भूमि-अधिग्रहण और अनियोजित विकास के कारण पर्यावरणीय संकट लगातार चर्चा में हैं। उपन्यास इसी व्यापक संकट को मानवीय धरातल पर देखने का प्रयास करता है। इस दृष्टि से ‘दूब’ केवल दूर्वा की कहानी नहीं रह जाती। यह उन सभी मनुष्यों की कहानी बन जाती है जो विकास चाहते हैं, लेकिन अपनी जड़ों की कीमत पर नहीं।

अंततः कह सकते हैं कि हरियश राय का ‘दूब’ समकालीन जीवन की अनेक परतों को एक साथ खोलने वाला संवेदनशील उपन्यास है। इसके केंद्र में दूर्वा है, लेकिन उसके माध्यम से लेखक ने स्त्री-अस्मिता, दांपत्य, परिवार, कॉरपोरेट संस्कृति, आर्थिक स्वतंत्रता, पर्यावरण, पहाड़, विकास और मनुष्य की गरिमा जैसे अनेक प्रश्नों को उठाया है।

इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि लेखक ने इन प्रश्नों को किसी वैचारिक घोषणापत्र की तरह नहीं, बल्कि एक जीती-जागती स्त्री के जीवन और अनुभवों के माध्यम से प्रस्तुत किया है।

दूर्वा का संघर्ष अंततः अपने होने की स्वीकृति का संघर्ष है। वह केवल यह नहीं चाहती कि लोग उसे एक सफल स्त्री के रूप में देखें; वह चाहती है कि उसे एक मनुष्य के रूप में सम्मान मिले. इसी तरह वह पहाड़ को केवल संसाधन के रूप में नहीं देखती; उसके लिए पहाड़ भी जीवन हैं, स्मृतियाँ हैं, रिश्ते हैं और भविष्य हैं।

इस अर्थ में ‘दूब’ का वास्तविक सौंदर्य उसके शीर्षक में छिपे प्रतीक में है। दूब छोटी होती है, लेकिन कमजोर नहीं। उसे कुचला जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता। दूर्वा भी जीवन की अनेक चोटों से गुजरते हुए उसी दूब की तरह अपने भीतर जीवन की हरियाली बचाए रखती है।

इसलिए ‘दूब’ को पढ़ते हुए लगता है कि हरियश राय ने केवल एक स्त्री की कथा नहीं लिखी है; उन्होंने उस मनुष्य की कथा लिखी है जो आधुनिक विकास की आपाधापी में भी अपने भीतर की मनुष्यता, अपनी जड़ों और अपने परिवेश को बचाए रखना चाहता है। यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी शक्ति और इसकी स्थायी प्रासंगिकता है।



पुस्तक-संदर्भ: 

दूब (उपन्यास)

लेखक : हरियश राय,

 सेतु प्रकाशन समूह, 2026


 पृष्ठ : 228, मूल्य : रु 325


चंद्रकला सिंह 

सम्पर्क 


डॉ चंद्रकला सिंह 

रामजस महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय  

10 ए ओ सी एस अपार्टमेंट 

मयूर विहार फेस 1, दिल्ली 91 


मोबाइल : 9868249466

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