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सुजाता की कविताएँ

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सुजाता स्त्रियों को देखने का हमारे समाज का नजरिया एक अरसे से रुढ़िवादी ही रहा है। इसके प्रतिपक्ष में आवाजें पहले भी उठती रही हैं। आज यह आवाज और पुख्तगी के साथ सामने आ रही है। बदलाव की लहर को रोक पाना अब संभव नहीं। सुजाता ने अपनी कविताओं में प्रायः ही स्त्री की इस पीड़ा को उस आवाज की पुख्तगी के साथ-साथ व्यक्त किया है। सुजाता की काव्य पंक्तियों का ही सहारा ले कर कहें तो ‘ नदियां रास्ता बदलने से पहले तुम्हे पूछेंगी भी नहीं/ वे भूलेंगी जब अपना नदी होना ... ।’ तो आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं युवा स्वर सुजाता की कुछ नवीनतम कविताएँ। सुजाता की कविताएँ दिन के अंत तक ऊबी हुई सांस आने - जाने से उकताई हुई जैसे वृद्धा साँझ!                  मैं कुछ नहीं कमाती दिन के अंत तक कूपन भरती हूँ -   मुझे मिलता है एक वृत्ताकार समय! जो जाना है वही आना भी है कहीं से   जाती हूँ कल में ठीक वैसे जैसे जाऊंगी कल में... जो मुझ में भरते हैं नफरत और क्षोभ उन्हें दूर से द...