सन्तोष कुमार चतुर्वेदी की कविताएँ

 

एक का पहाड़ा


बचपन में अक्सर सोचता था 

कि इनका नाम पहाड़े क्यों रखा गया

क्या इनका पहाड़ से कोई रिश्ता है

या पहाड़ सरीखे होते हैं 

हर बच्चे के लिए उसके बचपन में 

इसलिए रखा गया यह नाम


हम चाहें बचने की जितनी कोशिशें करें

पहाड़ों के बिना काम नहीं चलता था

पिता भी कहते

काम लायक तो सीख ही जाओ

कम से कम दस तक का पहाड़ा

याद कर लो

मैं रट्टा लगाने में एकदम फिसड्डी

भागता भरसक कोशिश लगा कर

लेकिन हमेशा पकड़ लिया जाता


दो एक्कम दो 

दो दूनी चार

दो तिहाई छः 


पहाड़े लगातार आगे बढ़ते चले जाते

और बढ़ती जाती उनकी क्लिष्टता भी

सात, नौ, तेरह, सत्रह, उन्नीस के पहाड़े में अक्सर अंटक जाता

सही बात तो यह 

कि मुझे सारे पहाड़े एक सरीखे दिखाई पड़ते


तमाम व्यस्तताएं होते हुए भी 

उन दिनों घर पर पिता ही पढ़ाते थे 

दस का पहाड़ा सिखाते हुए पिता ने सुझाया

एक से ले कर दस तक गिनती लिख लो

और सबके आगे लगा दो शून्य


एक का पहाड़ा तो याद ही होगा तुम्हें

डांटते हुए पिता ने पूछा हमसे

अब तक किसी ने भी नहीं बताया था 

कि एक का भी पहाड़ा होता है 

सो मैंने इनकार में सिर हिला दिया 

पिता थोड़ा और कड़क आवाज में बोले

एक से दस तक की गिनती तो याद है न

वही है एक का पहाड़ा


पहाड़े की किताब से 

अक्सर नदारद रहता एक का पहाड़ा

सहजता की मजबूरी जानलेवा होती है 

यह उस घटना के बरक्स

बाद के दिनों में महसूस किया था 

हालांकि तब मुझे लगा था

कि जरूरी नहीं कि 

हर अंक का पहाड़ा पहाड़ सरीखा ही हो

और अगर मन में संकल्प हो तो पार किया जा सकता है पहाड़ को भी


किताबें भी सहजता को दर्ज करने से बचती हैं 

लेकिन इससे फर्क क्या पड़ता है 

यह मजबूती थी एक की

कि एक ही साथ वह गिनती होने के साथ साथ पहाड़ा भी था

सहजता जब किसी की मजबूती बन जाती है 

तब कोई रोक नहीं सकता 

उसे आगे बढ़ने से


हँसना मनुष्यता की विरासत है 


सुना है कि दुनिया में इंसान ही ऐसा जीव है जो हँस सकता है 

तो फिर ऐसा क्या हुआ

जो एक सुल्तान ने रोक लगा दिया 

अपने दरबार में हँसने पर ही


हालांकि कहीं लिखा नहीं था यह

कि दरबार में हँसना मना है 

फिर भी दरबारी इस नियम का पालन

इतनी तत्परता के साथ करते

कि ताज्जुब होता यह अनुशासन देख कर


मुझे याद नहीं आ रहा

कि किसी सुल्तान ने कभी

रोने पर रोक लगाई हो

लेकिन हँसने पर रोक लगाने के तमाम सबूत मौजूद हैं 


बार बार यह ख्याल आ रहा है 

कि सारे दरबारी अगर एकबारगी हँस ही देते

तो क्या बिगाड़ लेता बलबन

कितनों का सिर कलम करता


हमने देखा है जानवरों की आँखों में ऑंसू 

परन्तु उन्हें हँसते हुए कभी नहीं देखा

लेकिन मनुष्य का क्या

पागल हो जाने पर भी वह हँसता है

फांसी के फंदे पर चढ़ते हुए भी वह हँसता है

दुःख के समय भी वह हँसता है

जैसे अपनी हँसी से वह 

हथेलियों में लोक लेना चाहता हो 

सारे दुःख, सारी तकलीफें


लखनऊ जाने पर लिखा देखा था यह 

हँसिए कि आप लखनऊ में हैं 

हँसिए कि संक्रामक होती है हँसी

ऐसे समय जब लोगों के चेहरे से गायब होती जा रही हँसी

इस वाक्य को सभी गाँवों, कस्बों और शहरों की दीवालों पर 

अंकित करा दिया जाना चाहिए


दुःख में हँसना प्रायः मुश्किल होता है 

लेकिन कोशिश तो करो

हँसो, कि हँसता हुआ मनुष्य सुन्दर लगता है

हँसो, कि हँसता हुआ मनुष्य विश्वास से भरा होता है


हँसो, कि हँसना मनुष्यता की विरासत है

जिसे विकास का तूफान तबाह कर देना चाहता है 

लेकिन यह जिम्मेदारी अब तुम्हारे कन्धों पर है 

 

तुम्हें आगे बढ़ना है, बढ़ो 

लेकिन जितना मुमकिन हो सके, हँसो



सेकेंडहैंड किताबों का इलाहाबादी बाजार 


ये सेकेंडहैंड किताबें हैं

जो इलाहाबाद में सड़क किनारे 

धैर्य से इंतजार करती रहती हैं अपने खरीददार का

कुछ किताबें बिक जाती हैं हाथों हाथ 

तो सालों लम्बा चलता रहता है 

कुछ किताबों का यह इंतजार 


विक्रेताओं को यकीन होता है 

कि आखिर नजर पड़ेगी 

एक न एक दिन किसी जौहरी की 

और तब पहुंच ही जाएगी वह 

अपने मुनासिब जगह तक

लेकिन कोई भी जगह इतनी मुनासिब कहां होती है 

कि वह आखिरी साबित हो

कई बार जिसे हम आखिरी समझते हैं 

वह दरअसल आरम्भ हुआ करता है 


कई लोग शौक से खरीदते हैं किताबें

फिर वे डूब जाते हैं किताबों के समंदर में 

नशा बन जाती हैं एक समय के बाद किताबें

और एक बार जो अभ्यस्त हो जाते हैं इस नशे के 

इसकी गिरफ्त में पड़े रहते हैं वे आजीवन


कुछ आलमारियों में जतन से सजा देते हैं किताबों को

उन्हें नहीं पता कि सजा कर रखना ही 

किताबों के लिए सजा बन जाती है 


कुछ ऐसे भी होते हैं 

जो पढ़ने के बाद बाँट देते हैं

किसी और पढ़निहार को

और इस तरह एक हाथ से दूसरे हाथ 

किताबें करती रहती हैं बातें

और इस तरह

आगे बढ़ती रहती है ज्ञान की यह रोशनी

हालांकि इंसानों जैसी ही होती हैं किताबें 

उनमें छपा हुआ सब सच नहीं होता

किताबें भी महीन झूठ बोलती हैं 

और आसान नहीं होता 

इस महीन झूठ को पकड़ पाना 

कुछ किताबें इतनी गुरु गम्भीर होती हैं 

कि एक इशारा कर एकदम खामोश हो जाती हैं 


जिन किताबों को तलाशते तलाशते हम थक गए

बड़े दुकानदार जिनके बारे में बताते 

कि अनुपलब्ध है अब यह

इस किताब का मिल पाना मुश्किल है 

वही एक रोज बड़ी आत्मीयता से 

सहज ही मिल गई हमें 

इस सेकेंडहैंड बाजार में


हमने खरीदी कई दुर्लभ किताबें

इलाहाबाद के इस सेकेंड हैंड बाजार से ही 

कुछ किताबों के पन्ने बताते हैं 

इसे किसने और कब खरीदा था 

जिन किताबों पर कुछ लिखा नहीं होता

उनके पन्ने बताते हैं 

उसका इतिहास और उसका भूगोल

कई बार मनचाही किताबें मिलते ही 

खिल उठता है चेहरा

फिर कुछ समय बाद सोचता हूं 

क्यों बेच दी गई ये नायाब किताबें

इन्हें तो पढ़ने वाली मेज पर 

एक जरूरत की तरह 

मौजूद होना चाहिए था 

और फिर तरस आती

बेचने वाले की नासमझी पर


हमें पता है 

कि ये किताबें किलो पसेरी के भाव खरीदते हैं ये विक्रेता

जिसे यहां की भाषा में रद्दी के भाव कहा जाता है 

लेकिन कुछ जानमीन लोगों को

पता होता है यह

कि और कुछ तो रद्दी हो सकता है मगर किताबें रद्दी नहीं होतीं कतई

किसी ने इन्हें बेचा होगा 

तो किसी न किसी मजबूरी के चलते ही


जो किताबें जुड़ी होती हैं अंतरतम से

उन्हें हटाने का फैसला 

आसान नहीं रहा होगा उस व्यक्ति के लिए

मन ही मन वह रोया होगा

कई रातों को वह अनसोया होगा

हो सकता है कि उसने यह सोचा हो

इस तरह बेचने से

किसी जरूरतमंद के हाथों में 

एक न एक दिन 

पहुँच ही जाएगी यह किताब


खुले आसमान तले सुकून की सांस लेती 

दिख रही हैं ये किताबें 

वे चुपचाप भांपती रहती हैं 

खरीददार की मुख मुद्रा

वे देखती रहती हैं किताबों की मोल तोल

वे देखती रहती हैं कि किस तरह पट जाता है सौदा आखिरकार

और चल देती हैं किताबें खुशी खुशी

अपने नए घर की तरफ


किताबों का यह सेकेंड हैंड बाजार न होता

तो किताबों की गिरफ्त में 

इतनी आसानी से कभी नहीं आए होते हम

और जहां तक सेकेंड हैंड की बात है 

हमारे हाथ आते ही बदल जाता है वह फर्स्ट हैंड में

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