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उमाशंकर परमार की किताब ‘प्रतिपक्ष का पक्ष’ पर प्रेम नंदन की लिखी समीक्षा

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उमाशंकर सिंह परमार आलोचना के क्षेत्र में अपना लोहा मनवा चुके युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार की आलोचना की एक महत्वपूर्ण किताब प्रकाशित हुई है – ‘प्रतिपक्ष का पक्ष’। इस किताब का नाम ही सब कुछ बयां कर देता है। लोक को ले कर परस्पर विवाद की स्थिति रही है। इसके बावजूद जोखिम लेते हुए उमाशंकर ने लोक के सन्दर्भ में अपना जो पक्ष रखा है उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। हाँ, उस पर बहस जरुर हो सकती है। और साहित्य की यही मजबूती भी तो है जहाँ प्रतिपक्ष आज भी अत्यंत अहम् भूमिका निभाता है। उमाशंकर परमार को इस किताब की बधाई देते हुए हम प्रस्तुत कर रहे हैं इस किताब की एक समीक्षा जिसे लिखा है युवा कवि प्रेम नंदन ने। तो आइए पढ़ते हैं यह समीक्षा।      ‘प्रतिपक्ष का पक्ष’ – लोकधर्मिता के नये प्रतिमान प्रेम नंदन आलोचना महज प्रशंसा या कमियाँ तलाशने का उपक्रम नहीं है; बल्कि किसी भी रचना या रचनाकार को समग्रता से समझने का एक साहित्यिक उपादान है। आज जब आलोचना अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही है और मात्र ठकुरसुहाती में तब्दील होती जा रही है, ऐसे में आलोचना के क्षेत्र में भी त...

सोनी पाण्डेय के कविता संग्रह पर राहुल देव की समीक्षा

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सोनी पाण्डेय युवा कवयित्री सोनी की कविताएँ लोक संवेदनाओं से जुड़ी हुईं हैं । उनकी कविताओं में अनुभवजनित जीवन दिखायी पड़ता है । यही नहीं सोनी समकालीन समय के विडम्बनाओं से रु-ब-रु होते हुए उसे अपनी कविता का विषय बनाने का साहस भी करती हैं । 'बदनाम औरतें' इसी तरह की कविता है जो इस समय के तमाम सवालों से टकराने का साहस करती है । सोनी पाण्डेय का पहला कविता संग्रह 'स्त्री मन की खुलती गिरहें' पिछले वर्ष ही प्रकाशित हुआ है । इस संग्रह पर एक समीक्षा लिखी है युवा कवि राहुल देव ने । तो आइए पढ़ते हैं राहुल देव की यह समीक्षा ।             स्त्री मन की खुलती गिरहें राहुल देव समकालीन कविता समय में कई सारे स्त्री स्वर एक साथ सृजनरत हैं। डॉ सोनी पाण्डेय भी उनमें शामिल हो रही हैं। वह एक सक्रिय युवा कवयित्री और संपादक हैं। ‘मन की खुलती गिरहें’ उनके पहला कविता संग्रह का नाम है जिसमें उनकी कुल 61 कविताएँ संग्रहित हैं। संग्रह की पहली कविता से ही कवयित्री अपने पक्ष को स्पष्ट कर देती है। चार भागों में लिखित ‘बदनाम औरतें’ शीर्षक यह कविता अपने तेवरों मे...

अजय कुमार पाण्डेय के कविता संग्रह की उमाशंकर सिंह परमार द्वारा की गयी समीक्षा

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अजय कुमार पाण्डेय कवि अजय कुमार पाण्डेय का एक कविता संग्रह “यही दुनियां है” पिछले वर्ष प्रकाशित हुआ । अजय पाण्डेय अधिकतर छोटी कविताएँ लिखते हैं । छोटी होने के बावजूद उनकी कविताएं अधिक मारक या कह लें प्रभावकारी होती हैं । इस संग्रह की जो और जितनी चर्चा होनी चाहिए थी वह नहीं हो पायी क्योंकि अजय लिखने में विश्वास करते हैं, समीक्षाएं लिखने-लिखवाने में नहीं । आज साहित्य भी जोड़-जुगाड़ की जगह बन गया है । अजय इन सबसे विरत हैं । उनके संग्रह पर एक समीक्षा लिखी है उमाशंकर परमार ने । तो आइए पढ़ते हैं अजय कुमार पाण्डेय के कविता संग्रह पर उमाशंकर सिंह परमार द्वारा लिखी गयी समीक्षा ।               अस्मिता के सवालों से मुठभेड़ करती कविताएँ  उमाशंकर सिंह परमार   हाल के कुछ वर्षों में विश्वव्यापी पूँजीगत परिवर्तनों द्वारा अनेक विमर्श सुझाए गए हैं। ये तमाम विमर्श जनवादी चिन्तन के विपरीत अपनी पहचान बनाते हुए तमाम अस्मिताओं व अवधारणाओं को बाजार के साथ जोडने का काम कर रहे हैं। जनवादी चिन्तन सामूहिकता की अवधारणा पर समय और वस्तु की परख करता ...