परिचय दास का आलेख 'कृष्ण : जीवन के सबसे सुंदर अर्थ की तरह'
परिचय दास 'कृष्ण : जीवन के सबसे सुंदर अर्थ की तरह' परिचय दास कृष्ण को याद करते ही सबसे पहले कोई मंदिर नहीं खुलता, कोई शास्त्र नहीं खुलता, कोई दार्शनिक सूत्र सामने नहीं आता। सबसे पहले एक आँगन खुलता है। उस आँगन में धूप की एक पतली-सी रेखा पड़ी है, तुलसी के पास मिट्टी थोड़ी गीली है, किसी कोने में मटकी रखी है और दूर से किसी बच्चे की हँसी सुनाई दे रही है। कृष्ण शायद इसी हँसी से शुरू होते हैं। वे आकाश में जितने विराट हैं, मनुष्य की स्मृति में उतने ही छोटे, उतने ही अपने, जैसे अभी-अभी किसी माँ की गोद से उतरकर आँगन में भागे हों। कृष्ण का सबसे बड़ा आकर्षण यही है कि वे हमारे सामने किसी एक रूप में ठहरते ही नहीं। उन्हें पकड़ना चाहें तो वे बालक हो जाते हैं, बालक को पकड़ें तो माखनचोर निकलते हैं, माखनचोर को पकड़ें तो बाँसुरी बजाने लगते हैं, बाँसुरी के पीछे जाएँ तो राधा मिलती हैं, राधा से आगे बढ़ें तो वृंदावन, वृंदावन से आगे कुरुक्षेत्र और कुरुक्षेत्र से आगे एक ऐसा विराट मौन, जिसमें मनुष्य अपने सबसे कठिन प्रश्नों के साथ अकेला खड़ा है। कृष्ण की यही गति उन्हें केवल कथा का पात्र नहीं रहने देती। वे...