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चन्दन पाण्डेय की कहानी 'शुभ विवाह'

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चन्दन पाण्डेय  उत्तर भारतीय परिप्रेक्ष्य में लड़की का विवाह पिता की एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। विवाह के बाद लड़कियों का घर ही नहीं गोत्र भी बदल जाता है। शादी को ले कर वे जितनी सपने बुनती हैं, उससे कहीं ज्यादा इस बात को ले कर भयाक्रांत रहती हैं कि न जाने पति का व्यवहार कैसा होगा। ससुराल के अन्य लोग कैसे होंगे। उनका रवैया क्या होगा? शादी के बाद लड़की का घर ही अब उसके मायके में तब्दील हो जाता है। अगर लड़की को ससुराल में दिक्कत होती है तो उसकी माँ, पिता, भाई, बहन सभी यही समझाते हैं कि वह वहाँ की स्थिति के अनुरूप एडजस्ट करें। धीरे धीरे लड़की की ससुराल ही उसका  वास्तविक घर बन जाता है जबकि वह घर जहाँ वह पली बढ़ी होती है, लगातार बेगाना होता चला जाता है। जिस घर में बाकायदा एक कमरे पर उसका कब्जा होता था, उसी घर में उसके लिए अब कोई जगह ही नहीं रह जाती। लड़की की विदाई तो अवश्यंभावी होती है। लेकिन विदाई इस मायने में मारक होती है कि यह महज  शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक विदाई भी बन जाती है। शादियों के समय महिलाओं द्वारा ही गाए जाने वाले पारम्परिक गीतों में यह व्यथा सहज ही महसूस की जा स...

चन्दन पाण्डेय के उपन्यास वैधानिक गल्प पर जैनेन्द्र कुमार पाण्डेय की समीक्षा वैधानिक गल्प : गल्प की शक्ल में सत्य कथा

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  चन्दन पाण्डेय             साहित्य उस मनोरचना का नाम है जो जीवन और समाज की वास्तविकता को कल्पना के सहारे गढ़ता है। यह गढ़ाव कुछ इस तरह का होता है कि समाज का एक बड़ा वर्ग उससे खुद को समीकृत कर सकता है। चन्दन पाण्डेय हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं। अभी हाल ही में उनका एक उपन्यास प्रकाशित हुआ है 'वैधानिक गल्प'। इस उपन्यास की एक समीक्षा लिखी है आलोचक जैनेन्द्र पाण्डेय ने। 'सृजन संकल्प' के हालिया अंक में यह समीक्षा प्रकाशित हुई है जिसे हमने साभार लिया है।  आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं जैनेन्द्र पाण्डेय की समीक्षा 'वैधानिक गल्प : गल्प की शक्ल में सत्य कथा'।                                                               वैधानिक गल्प : गल्प की शक्ल में सत्य कथा                    ...