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प्रभा मुजुमदार के कविता संग्रह की कौशल किशोर द्वारा की गई समीक्षा 'तटस्थता के विरुद्ध पक्षधरता'

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मनुष्य का एक सहज जुड़ाव अपनी मिट्टी के साथ होता है। परिस्थितियोंवश उसे निर्वासित होना पड़ता है। लेकिन जब निर्वासन किसी पर थोप दिया जाए तो यह त्रासद होता है। इस त्रासदी को हमारे समाज में प्रायः स्त्रियों के साथ जोड़ दिया जाता है। प्रभा मुजुमदार इस निर्वासन को दृढ़ता के साथ नकारती हैं। अपनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए इस संग्रह की भूमिका में वे लिखती हैं ‘एक सजग रचनाकार राजसत्ता, धर्मसत्ता, बाजार की सत्ता या और किसी भी सत्ता की निरंकुशता के विरोध में विद्रोह और प्रतिरोध की आवाज को अभिव्यक्ति देता है। वह अनिवार्य रूप से मनुष्यता का पक्षधर होता है।’ यह एक कवि का होना है जो हमेशा मनुष्यता के पक्ष में और निरंकुशता के विरोध में खड़ा रहता है। हाल ही में प्रभा मुजुमदार का पांचवा कविता संग्रह ‘नकारती हूँ निर्वासन’ प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह की समीक्षा लिखी है कौशल किशोर ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रभा मुजुमदार के कविता संग्रह की कौशल किशोर द्वारा की गई समीक्षा 'तटस्थता के विरुद्ध पक्षधरता'। पुस्तक समीक्षा 'तटस्थता के विरुद्ध पक्षधरता' कौशल किशोर ऐसे कालखंड में जब पक्षधर...

कौशल किशोर का आलेख 'मुद्राराक्षस बदलाव की लड़ाई का सांस्कृतिक योद्धा'

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मुद्राराक्षस एक जमाना था जब हम राष्ट्रीय सहारा के हस्तक्षेप पृष्ठ का पूरे सप्ताह बेसब्री से इंतजार किया करते थे। यह पृष्ठ तमाम महत्वपूर्ण विद्वानों के वैचारिक आलेखों से भरा होता था जो प्रत्येक शनिवार को चार पेज के सप्लीमेंट के रूप में प्रकाशित होता था। इन नामों में से एक नाम जो हमें अलग से आकर्षित करता था वह नाम मुद्राराक्षस का हुआ करता था। मुद्राराक्षस का आलेख बिल्कुल अलग, मौलिकता और वैचारिकता से भरा होता था। मुद्राराक्षस लीक पर चलने की अपेक्षा खुद नई परम्परा बनाने में विश्वास रखते थे। यही नहीं पारम्परिक प्रगतिशील आलोचना के लिए भी उन्होंने कड़ी चुनौती पेश की। आज  मुद्राराक्षस की दसवीं पुण्यतिथि है। उनकी स्मृति को हम नमन करते हुए आज पहली बार प्रस्तुत कर रहे हैं  कौशल किशोर का आलेख 'मुद्राराक्षस बदलाव की लड़ाई का सांस्कृतिक योद्धा'। 'मुद्राराक्षस बदलाव की लड़ाई का सांस्कृतिक योद्धा' कौशल किशोर मुद्राराक्षस। उनका यही नाम था। पर हमारे लिए वे 'मुद्रा जी' थे और यही रहेंगे। 13 जून 2016 को उन्होंने हमारा साथ छोड़ा। याद आता है वह दिन। दोपहर का समय था जब उनके बड़े बेटे र...

कौशल किशोर का आलेख 'राजेन्द्र कुमार की कविता-यात्रा'

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राजेन्द्र कुमार  कई रचनाकार ऐसे होते हैं जो कई विधाओं में एक साथ समानांतर रचना करते हैं। कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना की धारा रचनाकार के यहां एक साथ बहती रहती है। यह आसान नहीं होता। विधाओं के बीच की यह आवाजाही दरअसल उस रचनाकार की एक रचना का ही विविधरूपी विस्तार होता है। राजेन्द्र कुमार की ख्याति एक आलोचक के रूप में थी लेकिन मूल रूप से वह अपने को एक कवि ही मानते थे। उनके चार कविता संग्रह प्रकाशित हैं जो कविता के प्रति उनके अनुराग को प्रदर्शित करते हैं। अभी भी उनके उनकी तमाम कविताएं अप्रकाशित हैं जिनको लेकर दो-तीन संग्रह और प्रकाशित हो सकते हैं। राजेंद्र कुमार की कविताएं कल्पना की उड़ान तो भरती हैं लेकिन उनमें हमेशा एक तर्कशीलता और वैज्ञानिक चेतना दिखाई पड़ती है। 'हर कोशिश है एक बगावत' कविता संग्रह को लेकर कौशल किशोर ने उनकी काव्य यात्रा को रेखांकित करने का प्रयास किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कौशल किशोर का आलेख राजेंद्र कुमार की काव्य यात्रा। 'राजेन्द्र कुमार की कविता-यात्रा'   ('हर कोशिश है एक बग़ावत')  कौशल किशोर राजेन्द्र कुमार हिन्दी के जाने-माने ...

कौशल किशोर का आलेख 'लघु पत्रिकाएं: कोशिश जारी है'

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  कौशल किशोर लघु पत्रिका आन्दोलन का विशिष्ट महत्त्व इसलिए भी है कि इसने नए नए रचनाकारों को परिदृश्य में आने का अवसर प्रदान किया। इस तरह हिन्दी साहित्य की अभिवृद्धि में प्रकारांतर से इनका अवदान मानीखेज है। छोटी छोटी जगहों से प्रकाशित होने वाली ये पत्रिकाएं स्थानीय रचनाकारों को सामने लाने का काम लगातार करती रहीं। हालांकि कई लघु पत्रिकाओं का सफर बहुत छोटा रहा लेकिन अत्यल्प अवधि में ही इन्होंने जो योगदान किया वह साहित्यिक पत्रकारिता की दुनिया में मील का पत्थर साबित हुआ। रेवांत पत्रिका के सम्पादक कौशल किशोर ने लघु पत्रिका आन्दोलन पर एक आलेख लिखा है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  कौशल किशोर का आलेख 'लघु पत्रिकाएं: कोशिश जारी है'। 'लघु पत्रिकाएं: कोशिश जारी है' कौशल किशोर साहित्य के क्षेत्र में पांच दशक से अधिक की यात्रा हो चुकी है। पीछे मुड़ कर देखता हूं तो स्मृतियां लघु पत्रिकाओं पर टिक जाती हैं। मेरी इस यात्रा में लघु पत्रिकाएं एक साथी के रूप में हमेशा मौजूद रही हैं। यह कहने में गुरेज नहीं कि यदि इनका संग-साथ न मिलता तो क्या यह यात्रा आगे बढ़ पाती। उसने मुझ जैसे नए रचनाक...