प्रभा मुजुमदार के कविता संग्रह की कौशल किशोर द्वारा की गई समीक्षा 'तटस्थता के विरुद्ध पक्षधरता'
मनुष्य का एक सहज जुड़ाव अपनी मिट्टी के साथ होता है। परिस्थितियोंवश उसे निर्वासित होना पड़ता है। लेकिन जब निर्वासन किसी पर थोप दिया जाए तो यह त्रासद होता है। इस त्रासदी को हमारे समाज में प्रायः स्त्रियों के साथ जोड़ दिया जाता है। प्रभा मुजुमदार इस निर्वासन को दृढ़ता के साथ नकारती हैं। अपनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए इस संग्रह की भूमिका में वे लिखती हैं ‘एक सजग रचनाकार राजसत्ता, धर्मसत्ता, बाजार की सत्ता या और किसी भी सत्ता की निरंकुशता के विरोध में विद्रोह और प्रतिरोध की आवाज को अभिव्यक्ति देता है। वह अनिवार्य रूप से मनुष्यता का पक्षधर होता है।’ यह एक कवि का होना है जो हमेशा मनुष्यता के पक्ष में और निरंकुशता के विरोध में खड़ा रहता है। हाल ही में प्रभा मुजुमदार का पांचवा कविता संग्रह ‘नकारती हूँ निर्वासन’ प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह की समीक्षा लिखी है कौशल किशोर ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रभा मुजुमदार के कविता संग्रह की कौशल किशोर द्वारा की गई समीक्षा 'तटस्थता के विरुद्ध पक्षधरता'।
पुस्तक समीक्षा
'तटस्थता के विरुद्ध पक्षधरता'
कौशल किशोर
ऐसे कालखंड में जब पक्षधरता का विलोपीकरण हो रहा है, प्रभा मुजुमदार तटस्थता के विरुद्ध पक्षधरता के साथ खड़ी हैं, इसी भाव-विचार का काव्य रचती हैं और निर्वासन-विस्थापन को नकारती हैं। वे तटस्थता को मानवीय दुर्बलता मानती हैं। उनका नया संग्रह ‘नकारती हूँ निर्वासन’ ऐसी ही कविताओं का संकलन है। यह उनका पांचवा कविता संकलन है जिसमें उनकी 75 कविताएं शामिल हैं। आरंभ में ही वे रामधारी सिंह दिनकर की बहुचर्चित काव्य पंक्तियां उद्धृत करती हैंः
‘समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध’
आज हिंदी समाज में कितने कवि-साहित्यकार हैं जो तटस्थता को अपराध की श्रेणी में रखते हैं और इसके विरुद्ध आचरण करते हैं? वर्तमान समय में एक कवि की क्या पक्षधरता हो, इस बारे में प्रभा मुजुमदार के विचारों में दृढ़ता है। वे कहती हैं -
‘समय एक इतिहास रच रहा है
शहंशाहों के इतिहासकारों
दरबारियों के जयगान के परे
बहुत सारी आवाज़ें
कलमें और तूलिकाएं
रच रही हैं
अपने समय का सच।’
धर्म-वर्ग-वर्ण और जाति के नाम पर व्यक्ति को विभाजित करने वाली व्यवस्था में एक रचनाकार का दायित्व क्या हो? इस बारे में प्रभा मुजुमदार की समझ साफ है। किताब की भूमिका में वे कहती हैं ‘एक सजग रचनाकार राजसत्ता, धर्मसत्ता, बाजार की सत्ता या और किसी भी सत्ता की निरंकुशता के विरोध में विद्रोह और प्रतिरोध की आवाज को अभिव्यक्ति देता है। वह अनिवार्य रूप से मनुष्यता का पक्षधर होता है।’ यह पक्षधरता है जो दंभ, दर्प और दंश के विरुद्ध साहस, उम्मीद और प्रतिरोध के सृजन का कारण है। यहां विकृत मानसिकता व असंगत विचारों-मान्यताओं को नकारने का स्वर काफी प्रबल है। इसे हम प्रभा मुजुमदार की कविताओं के माध्यम से देखने और समझने की कोशिश करेंगे।
‘नकारती हूं निर्वासन’ संग्रह में बारह ऐसी कविताएं हैं जहां एक ही शीर्षक से दो कविताएं हैं। ‘कोरोना काल में’ शीर्षक से तीन तो ‘स्थानांतरण पर’ चार कविताएं हैं। इससे विषय के अनेक भाव-विचार को व्यक्त किया गया है। संग्रह की पहली कविता है ‘जिद’। जहां इस शीर्षक की पहली कविता में एक बीज को वृक्ष बनने का जद्दोजहद और संकल्प है, वहीं दूसरी कविता में उम्मीद की लौ को न बुझने देने की जिद है। एक बीज का वृक्ष में रूपांतरण कोई आसान क्रिया नहीं है। इसी तरह जिंदगी भी है। इसे आगे बढ़ाने के लिए ‘जिद’ जरूरी है। समझ है कि
‘बहुत कुछ
खत्म होने के बावजूद
बहुत सारा बाकी रहता है
जीवन के लंबे गलियारे में’
जीवन की डगर उबड़-खाबड़ है। पराजय का डर भी रहता है। लेकिन यह उम्मीद का दामन और संघर्ष की जिजीविषा है कि
‘आंखें नहीं कहतीं
सपनों को अलविदा
एक बार फिर
पराजित हो जाती है
पराजय’
प्रभा मुजुमदार का भरोसा शब्दों पर है। ये इसे हथियार के रूप में देखती हैं। कहती हैं कि
‘दुनिया के किसी भी शस्त्रागार में नहीं है
शब्दों से बड़ा मारक हथियार’।
‘शब्द’ शीर्षक से भी दो कविताएं हैं। यह शब्दों की शक्ति है कि कलमें तोड़ी जाती हैं, पुस्तक और पुस्तकालय जलाए जाते हैं और शब्दों के सिपाहियों यानी कलमकारों को झूठे इल्जामों में बंद किया जाता है। अर्थात सब कुछ नष्ट करने पर भी शब्द ही है जो अंधकार में रोशनी की तरह चमकते हैं। शब्दों का इतिहास मानव सभ्यता का इतिहास है जिसे सुदीर्घ संघर्ष से अर्जित किया गया है।
प्रभा मुजुमदार की चिंता और चिंतन में प्रकृति, उसके उपादान और क्रियाकलाप हैं। इनके नष्ट होने से क्या जीवन बचेगा? कैसा है बसंत? और किसका है बसंत?
‘सखि, वसंत आया
भरा हर्ष वन के मनु
नवोत्कर्ष छाया’
यह निराला के समय का नहीं बाजारवादी समय का बसंत है जिसे ‘माल और शॉपिंग केंद्रों में सायास बुलाया जाता’ है और जो ‘सुबह से शाम/दौड़ता हांफता है’। वह बाग-बगीचों, वन-उपवन से विलग हो कर बालकनी के गमलों में सिमट गया है। पूंजीवादी कारण ने उसकी सारी नमी सोख ली है। जिंदगी आपा-धापी और कश-म-कश से भर गई है।
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| प्रभा मुजुमदार |
प्रभा मुजुमदार इस पूंजीवादी कारण के विरुद्ध हैं और बसंत के भाव को कुछ यूं उकेरती हैंः
‘उत्सव, गुनगुनाहट
और खिलखिलाहट
उजास और ऊर्जा
सतरंगी सपने
आम का बौर
कोयल की कूक’
यानी जिंदगी के एहसास हों। वह कहती हैंः
‘इससे पहले कि सूरज के अंगारे
झुलसा दें
ओस-कण के एहसासों को
जिंदगी का
एक गीत तो गुनगुना दो बसंत’
जहां कविता में बसंत का भाव है, वहीं नदियों को बचाने की चिंता है। नदी एक संस्कृति है जिससे मानव सभ्यता का विकास हुआ है। ‘नदी’ शीर्षक से दो कविताएं हैं। दोनों कविता का आरंभ इस विचार से होता हैः
‘समंदर में
विसर्जित नहीं होती (एक अकेली) नदी’
प्रभा कहती हैंः
‘सभ्यताओं के उद्गम की साक्षी हैं नदियां
उनके उत्कर्ष और खात्मे की’
उत्कर्ष के साथ यहां खात्मे के द्वारा उन कारकों को प्रश्नांकित करना है जिनकी वजह से नदियां संकट में हैं। और सिर्फ नदिया ही क्यों? यह कथन हैः
‘नदी का खत्म होना
एक नदी का अंत नहीं होता’
सामान्य से इस कथन में असामान्य चिंता है कि नदियां नहीं बचेगी तो क्या जीवन बचेगा?
प्रभा मुजुमदार की कविता में कल्पना की उड़ान नहीं है बल्कि वे यथार्थ-स्थितियों के बीच से ही कविता की विषय-वस्तु का चयन करती हैं। इसकी रचनात्मकता स्थितियां निजी अनुभव के बीच तैयार होती हैं। खासियत यह है कि यह निजी हो कर भी निजी नहीं है, उसका सामाजिक पहलू है। उदाहरण के रूप में हम ‘स्थानांतरण पर’ लिखी चार कविताओं को देख सकते हैं। यहां वर्तमान और उसकी रगड़-झगड़ है तो वहीं स्मृतियों के लोप के दौर में स्मृतियों को सहेजना है। एक स्थिति रोजी-रोजगार के लिए अपने मूल स्थान को छोड़ना यानी अपनी जड़ से कट जाना है। दूसरी स्थिति सालों-साल बाहर रहने के बाद अपने घर-शहर लौटना और समय के साथ आए बदलाव के साथ सब अपरिचित तथा अनपहचाना हो जाना है। तीसरी स्थिति एक ही जगह लंबे समय से रहते-रहते वहां के माहौल में रच-बस जाना तथा उसके साथ भावनात्मक जुड़ाव का होना है और एक स्थिति ऐसी भी कि नए शहर में एडजस्ट होने के लिए जद्दोजहद करना है। प्रभा जी की कविता में मनःस्थिति की प्रमाणिक अभिव्यक्ति मिलती है जिसके मूल में विस्थापन से उत्पन्न समस्याएं हैं। यहां समय स्पेस और उसके द्वंद्व के साथ कविता में उपस्थित है।
प्रभा मुजुमदार की कविता ‘खिड़की’ से गुजरते ही मंगलेश डबराल की ‘खिड़की’ की याद हो आती है जिसमें वह कहते हैंः
‘मुझे यह खिड़की खोलनी चाहिए
जो तमाम खिड़कियों के खुलने की शुरुआत है’
प्रभा मुजुमदार के यहां ‘अंदर और बाहर की आवाजाही/सुनिश्चित करती हैं खिड़कियां’। वह जानती हैंः
‘एक खिड़की के खुलते ही जुड़ जाती है
बाहर की दुनिया’
कविता अंदर और बाहर की दुनिया से हमारा साक्षात्कार कराती है। प्रभा मुजुमदार के पास स्मृतियां हैं जो ‘बरसती हैं बूंद बूंद’ वह कांटों की तरह चुभती हैं लेकिन वही संबल भी देती हैंः
‘गुनगुनी धूप बन कर
अंतस के अंधेरे सीलन भरे कोने को
आलोकित कर देती है’
कविता में ‘मां’ से हमारी मुलाकात होती है जो बढ़ती उम्र के बावजूद अपने को अप्रासंगिक होते हुए नहीं देखना और महसूस करना चाहती हैं।
किसी भी रचनाकार का समकालीन होना इस बात पर निर्भर करता है कि समय उसकी रचनाओं में किस तरह से अभिव्यक्ति पाता है? इस संदर्भ में प्रभा जी की कविता अपने समय के सवालों से टकराती हैं और विसंगतियों व क्रूरताओं को सामने ले आती हैं। वे पुरुषवादी व वर्चस्ववादी सत्ता के विरुद्ध हैं। अन्याय की परंपरा है तो उसके विरुद्ध न्याय के लिए संघर्ष भी है। यह समय है जब अधर्म ने धर्म का रामनामी चादर ओढ़ रखा है। खूंखार दरिंदे भी संस्कारी और सदाचारी घोषित किए जाते हैं। पांचाली के साथ क्या हुआ? ‘कुरुसभा’ में उनका मान मर्दन किया गया। राज दरबार में ‘भद्दे संवाद, लांछन, ठहाके’ लगे। बुद्धिजीवियों की क्या हालत थी? सभी मौन और
‘सब कुछ जानते समझते हुए भी
कुछ ना समझने का अभिनय करता
एक अंधा राजा’
लेकिन दुःशासन को इस कृत्य के लिए फूल माला नहीं पहनाया गया। लेकिन आज अपराधियों और बलात्कारियों को हार-फूल, तिलक-मिठाई ले कर स्वागत किया जा रहा है। उन्हें सत्ता का संरक्षण मिल रहा है। वे उसकी शोभा बने हैं। बिलकिस बानो के बलात्कारियों का स्वागत किस तरह किया गया?
प्रभा मुजुमदार ‘महाभारत’ से ले कर कथित ‘अमृत काल’ तक जारी इस अन्याय की परंपरा को बेपर्दा करती हैं। इतिहास की घटनाओं, मिथकीय चरित्रों और प्रसंगों के द्वारा तर्कपूर्ण तरीके से वर्तमान को व्याख्यायित करती हैं। उसके द्वंद्व को उद्घाटित करती हैं। वह राम को भी कटघरे में खड़ा करती हैं जिन्होंने ‘अग्नि परीक्षा’ ली और सीता को ‘निर्वासन’ के लिए बाध्य किया। यह ‘निर्वासन’ स्थिति नहीं सांस्कृतिक व्यवस्था है जिसे भ्रूण की अवस्था से लेकर मृत्यु तक विधान बना कर स्त्रियों के जीवन पर थोप दिया गया है। प्रभा मुजुमदार इस विधान को नकारती हैं। उसके ‘लौह कवच’ में सूराख करती हैं। कविता में सवाल हैं कि आखिर ‘कब तक?’
‘प्रेमी का क्रूर वहशी चेहरा
पहचानने के बाद
एक अनिवार्य मौत की नियति ही क्यों है
हमारी बेटियों के पास?’
वे स्त्री जीवन के अनेक प्रसंगों, घटनाओं, सुबह से शाम तक की दिनचर्या आदि के माध्यम से स्त्रियों में आए/आ रहे है बदलाव को रेखांकित करती हैं और कहती हैं कि ‘चुप नहीं रहती औरतें’ अर्थात अब चुप नहीं रहेंगी औरतें। छल, छद्म, झूठ, पाखंड, दंभ, डर आदि उत्पीड़न के विभिन्न रूपों के विरुद्ध विद्रोह का भाव कविता में कुछ यूं व्यक्त होता हैः
‘लांघी जा सकती है
हर एक लक्ष्मण रेखा,
तोड़ा जा सकता है
कोई भी कवच को
भ्रमित और चकित किया जा सकता है
किसी भी व्यवस्था को
लौह गुंबद को चीर कर
बरसाए जा सकते हैं गोले।
धरती आकाश समुद्र में
कहीं भी ढूंढा जा सकता है सूराख....’
प्रभा मुजुमदार की कविता का फलक काफी विस्तृत है। वे स्त्री विमर्श से आगे समय विमर्श रचती हैं। कैसा है यह समय? मुक्तिबोध कहते हैं ‘सारे वस्त्र उतार रीछ नग्न हुआ’। उन्होंने साम्राज्यवाद पर निर्भर भारतीय पूंजीवाद के अंदर पनपते देश के खतरनाक भविष्य को देखा था और ‘नग्न फासीवाद’ कहा था। वह भले ही उस वक्त एक अंदेशा हो लेकिन ‘राजा का नंगा’ होना वर्तमान की पहचान है। हालत क्या है?
‘राजा ने कहा रात है’ तो
‘रात है, रात है गूंजाने के लिए
सड़कों गलियों चौराहों को पाट दिया गया
उन्मत्त भीड़ और तमाशाइयों ने
जो ऐन सूरज के नीचे तपते
नाच रहे थे
चीख रहे थे - रात है’
यही है अंधभक्ति और ऐसे ही अंधभक्तों की फौजी खड़ी कर दी गई है। मीडिया और प्रतिष्ठान बिक चुके हैं। फर्जी मुद्दे गढ़े गए हैं।
‘यह अपराधियों का स्वर्ण युग है
हत्यारों को अभय दान मिल चुका है
व्यवस्था समूची शक्ति और सामर्थ्य के साथ
उनके साथ खड़ी है’
असहमति के विचारों और विरोध करने वालों के लिए जेल है। तर्क और ज्ञान की धारा को अवरुद्ध कर दिया गया है। झूठ के पहाड़ के नीचे देश है। जनतंत्र नहीं यह लूटतंत्र है। झूठ और लूट दोनों की छूट है। इसकी क्रूरता और संवेदनहीनता कोरोना काल में खुल कर सामने आ गई। यह दौर है जब सड़े-गले मूल्यों-परंपराओं को पुनर्जीवित किया गया है। यही है एक दशक की सच्चाई कि कैसा रहा है देश और कैसा बन गया/बनाया जा रहा देश? इसे ही ‘न्यू इंडिया’ कहा जा रहा है। प्रभा मुजुमदार इसी से रूबरू हैं। वह कॉर्पाेरेटीरण, अंधराष्ट्रवाद, धर्मांधता, सांप्रदायिक विभाजन, जनतंत्र का क्षरण, तानाशाही का उभरना आदि के साथ वर्तमान की विभीषिका को अपनी कविता का विषय बनती हैं ।
सर्वेश्वर कहते हैं ‘देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता’। इसी का विस्तार प्रभा जी की कविता में मिलता है। उनकी समझ है-
‘कागज पर का नक्शा
जमीन का एक टुकड़ा,
एक झंडा,
एक गीत, एक प्रतीक
एक भाषा-परिभाषा
एक नारा-उद्घोषणा नहीं है
मेरा देश!’
औरः
‘इतिहास, वर्तमान
और भविष्य की निरंतरता है यह देश’
यह कहना कि ‘गिद्धों का उत्सव नहीं है मेरा देश’ उस देश के लिए संघर्ष है जो भारतीय संविधान के मूल में व्यक्त है। इसमें शहादतों से भरा सुदीर्घ संघर्ष का इतिहास है, तो वहीं एक सुंदर भविष्य की चाह है। गलत का विरोध और सत्य की पक्षधरता प्रभा मुजुमदार की कविता में एक जिद की तरह है। कविता में बापू प्रतिरोध के प्रेरक प्रतीक हैं जिन्हें मारने के लिए तरह-तरह के उपक्रम किए गए, साजिशें रची गईं पर यह बापू हैं कि मरते ही नहीं हैं क्योंकि ‘हत्यारे जान गए हैं अपनी सीमाओं को’। तभी तो
‘एक नार्सिसिस्ट शहंशाह
पल भर के लिए
कांप जाता है
निहत्थे लोगों के संबल से’
यह संबल ही बल है, संभावना और उम्मीद है। उन्हीं के शब्दों में :
‘इतना काफी है कि
मनुष्य की जिद,
जद्दोजहद और जिजीविषा
हमेशा थी, है और रहेगी भी।
आश्वस्त हूं
जीवन की संभावनाओं के प्रति
मौत के खौफनाक मंजर में भी।’
कृति: नकारती हूं निर्वासन
कवि: प्रभा मुजुमदार
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर -20
पृष्ठ संख्या: 163
कीमत: रुपए 275.00
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| कौशल किशोर |
संपर्क:
कौशल किशोर
एफ.- 3144, राजाजीपुरम,
लखनऊ - 226017
फोनः 08400208031



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