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उद्भ्रांत की आत्मकथा 'काली रात का मुसाफ़िर' की अरुण आदित्य द्वारा की गई समीक्षा 'काली रात और जगमगाते जुगनुओं की बात'

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जब अन्य रचनाकार अपना कविता संग्रह लाने की फिक्र में पड़े होते हैं उद्भ्रांत जी उस समय 'रुद्रावतार' और 'स्वयंप्रभा' जैसे महाकाव्यों का सृजन कर रहे होते हैं। उनकी खासियत यह है कि वे हार नहीं मानते और लगातार अपनी तरह से अपनी राह पर आगे बढ़ते रहते हैं। आजकल उद्भ्रांत जी अपनी आत्मकथा 'मैंने जो जिया' लिख रहे हैं। इसमें वे अपने जीवन संघर्षों के साथ साथ रचनात्मक यात्रा और रचनात्मक अनुभवों को शिद्दत के साथ लेखनीबद्ध कर रहे हैं। हाल ही में उनकी आत्मकथा का तीसरा खण्ड 'काली रात का मुसाफ़िर' प्रकाशित हुआ है। इसकी समीक्षा करते हुए कवि अरुण आदित्य लिखते हैं "विडंबना देखिए कि साहित्य में जहाँ वे तेजी से कदम बढ़ा रहे थे, वहीं नौकरी के क्षेत्र में लगातार अवरोधों और टकराहटों का सामना करना पड़ रहा था। लेखक के लिए इन टकराहटों का रचनात्मक योगदान भी रहा। इन्हीं की वजह से पाठक को प्रसार भारती के भीतर की राजनीति, उठापटक और प्रशानिक कार्यशैली का असल चेहरा देखने को मिलता है। कश्मकश और उठापटक के बीच वे साहित्य के लिए हर संभव प्रयास करने के लिए तत्पर रहते थे।" आइए आज पहली ...