नवनीत नीरव की कहानी 'राम झरोखे बैठ के!'
नवनीत नीरव युवा कथाकार नवनीत नीरव की कहानी 'राम झरोखे बैठ के' समाज के उस व्यक्ति का रेखांकन है जो जिन्दगी के हर मोर्चे पर अपने को थका-हारा और पराजित महसूस करता है. उसके बारे में कभी भी, कुछ भी कहा जा सकता है. कोई तोहमत लगाई जा सकती है. ऐसे लोग सोझबक कहे जाते हैं. दिल के साफ़ सुथरे. कहीं कोई मलीनता नहीं. लेकिन अपना समाज ऐसे लोगों को स्वीकार भी तो नहीं कर पाता. बदलते समय के साथ हर छल छद्म अपनाने वाले ही हर जगह सफल दिखायी पड़ते हैं. नवनीत ने ऐसे उपेक्षित पात्र को अपने कहानी का नायक बना कर साहित्य की उस धारा को सार्थक साबित किया है जो खुद को उपेक्षित लोगों के साथ खड़े करने में तनिक भी नहीं हिचकता. आज पहली बार पर प्रस्तुत है नवनीत नीरव की नया ज्ञानोदय के हालिया अंक में प्रकाशित कहानी 'राम झरोखे बैठ के!' राम झरोखे बैठ के! नवनीत नीरव साँझ ढल रही थी. दिन भर रह-रह कर पानी बरसता. फिर रुक जाता. बारिश रुकते ही उमस परेशान करने लगी थी. मैं छत पर चला आया. नीले आवरण में लिपटा ...