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रुचि उनियाल की कविताएं

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रुचि उनियाल जैसे जैसे हम समझदार होने की तरफ कदम बढ़ाते हैं वैसे-वैसे रूढ़ियां और परंपराएं हमें अपनी जकड़ में आबद्ध करने लगती हैं। मान्यताएं हमारी बौद्धिक चेतना से दो दो हाथ करने लगती हैं। कवि के सामने यह एक बड़ी चुनौती होती है। हिन्दू धर्म में पितरों को तर्पण देने की प्रथा ऐसी ही है। स्वाभाविक रूप से अपने पितरों के लिए हमारे मन में आदर और सम्मान होता है। हिन्दू परम्परा में पितृ पक्ष में पितरों को तर्पण देने का प्रचलन है। लेकिन हमारे पितर अब किस जीवधारी के रूप में होंगे, और उन्हें किस तरह तर्पण किया जाए, इसे ले कर कवयित्री रुचि उनियाल संशयग्रस्त हैं और अपने मनोभावों को कविता में इस तरह अभिव्यक्त करती हैं : "कैसे चीन्ह लूँ किसी कुत्ते में तुम्हारी छवि?/ कैसे करूँ विश्वास कि,/ तुम उसी कौवे के रूप लौटे हो/ जिसे तुम भी नहीं स्वीकारते थे/ काँव-काँव सुन कर/ और उड़ा देते थे छज्जे से उसे/ इस डर से कि,/ गौरैया के घोंसले से खा लेगा उसके अण्डे"। कविता के अन्त में वह एक सवाल खड़ा करती हैं जो मानीखेज है 'क्या तुम तृप्त हो जाओगे पिता?' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं रुचि उनियाल की ...

रुचि बहुगुणा उनियाल की कविताएं

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  रुचि बहुगुणा उनियाल रात का जिक्र आते ही खुद ब खुद हमारे मन मस्तिष्क में एक अमूर्त से भय का संचार होने लगता है। यह रात अंधेरा लाती है। अंधेरे को ले कर दुनिया भर के कवियों ने तमाम यादगार कविताएं लिखी हैं। अंधेरे के साथ जुड़ कर रात उस बुराई का प्रतिनिधित्व करने लगती है जिससे हम बचना चाहते हैं। रात को देखने की यह रूढ़ दृष्टि है। रात प्राकृतिक है। और इस प्रकृति में कुछ भी अतिरिक्त या दोषपूर्ण नहीं। इसे तो हम गढ़ लेते हैं। रुचि बहुगुणा उनियाल दृष्टिसम्पन्न कवयित्री हैं। रात को देखने का उनका नजरिया अलग ही है। रात का जिक्र करते हुए वे लिखती हैं - 'रातों ने दिया समय/ बंद फूलों को/ ताकि भर सकें मकरंद/ और जीवन फल-फूल सके।' रात अगले दिन की सम्भावना से भरी होती है। रात हमें नींद के रूप में वह सुकून देती है, जो अब जिन्दगी से गायब हो चला है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  रुचि बहुगुणा उनियाल की कुछ नई कविताएं। रुचि बहुगुणा उनियाल की कविताएं काश---- अगर जीवन में काश शब्द न होता तो जीवन कितना सुन्दर होता  हर पल प्यार शब्द अगर लोग रेवड़ी की तरह न बांटते तो इस शब्द क...

रुचि बहुगुणा उनियाल का सस्मरण 'तीमारदार की व्यथा-कथा, भाग-1'

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  आमतौर पर लोग बीमार की ही बात करते हैं। लेकिन वे उस तीमारदार को भूल जाते हैं जो बीमार के साथ हर वक्त मुस्तैदी के साथ मौजूद रहता है। यह तीमारदार सामान्यतया बीमार का संबंधी ही होता है जो उसकी सतर्कता के साथ केवल देख रेख ही नहीं करता बल्कि उसकी बीमारी से जुड़ी तमाम जांच और दवा वगैरह का भी तत्पर हो कर इंतजाम करता है। वह बीमार का उत्साह बढ़ाने का काम करता है जिससे बीमार निराशा के भंवर में उलझ कर न रह जाए। इस तरह तीमारदार की भूमिका अहम हो जाती है। लेकिन यह तीमारदार हमेशा नेपथ्य में ही रहता है। रुचि बहुगुणा उनियाल एक कवयित्री हैं। उन्होंने इस पहलू के उस अदृश्य पक्ष को सामने लाने का कार्य किया है जो प्रायः उपेक्षित रह जाता है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  रुचि बहुगुणा उनियाल का सस्मरण 'तीमारदार की व्यथा-कथा, भाग-1'। ' तीमारदार की व्यथा-कथा, भाग-1' रुचि बहुगुणा उनियाल गठिया के दर्द से लरज़ती कलाई पर सूजन देख कर नवनीत जी का दिल पिघल गया। बड़ी मुश्किल से अपनी आँखों की नमी छुपाते हुए बोले,  ‘तुम आराम से गर्म पानी से सिकाई कर लो, तब तक मैं होटल से खाना ले आता हूँ ‘!  यह मात्...

रुचि बहुगुणा उनियाल का संस्मरण 'जेठ के घाम में'

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  रुचि बहुगुणा उनियाल  आमतौर पर परिवार में बेटी का जनम भारतीय परिवारों के लिए खुशी नहीं, बल्कि विषाद का कारक बन जाता है। हालांकि परिस्थितियां बदली हैं इसके बावजूद दुर्भाग्यवश आज भी कहीं कहीं इस परम्परा के अवशेष मिल जाते हैं। राजस्थान के राजपूतों के परिवार में तो बेटियों को जनम लेते ही मार डालने की भयावह कुप्रथा लम्बे समय तक प्रचलन में रही। स्त्रियों के साथ भेदभाव और हिंसा तो हमारे समाज में आज भी देखी जा सकती है। पहाड़ दूर से जितने बेहतर लगते हैं, नजदीक जाने पर वहां की अंतहीन समस्याएं उसकी विडम्बना को उजागर कर देते हैं। स्त्रियों के साथ जुड़ी कुप्रथाएं और समस्याएं वहां के जीवन में भी लम्बे समय तक अंतर्निहित रहीं। आजकल पहली बार पर महीने के तीसरे रविवार को हम रुचि  बहुगुणा उनियाल के संस्मरण पढ़ रहे हैं। इसी कड़ी में आज प्रस्तुत है रुचि बहुगुणा उनियाल के संस्मरण की नई किश्त 'जेठ के घाम में'। 'जेठ के घाम में' रुचि बहुगुणा उनियाल   जून की शुरुआत हो गई है, इस महीने सुबह-सुबह ही पारा अपना रंग दिखाने लगता है। दोपहर के समय बाहर निकलना मतलब भयंकर गर्मी से लू की चपेट म...