राकेश कुमार गुप्ता का आलेख 'आरक्षण को नई वैचारिकी नहीं, संवैधानिक ईमानदारी चाहिए'
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| राकेश कुमार गुप्ता |
आज पहली बार पर हमने शिवदयाल जी का लेख “आरक्षण : नई वैचारिकी की जरूरत” प्रकाशित किया था। इस आलेख के संदर्भ में राकेश कुमार गुप्ता ने अपना यह आलेख भेजा है। वस्तुतः आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक न्याय प्रदान करना है न कि आर्थिक सहायता प्रदान करना।।समाज के भेदभाव का सामना कर रहे वर्ग को वह सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदान करना है जो सामान्य तौर पर उसे उपलब्ध नहीं हो पाई है। इसे उपलब्ध करने के लिए जिस संवैधानिक ईमानदारी की जरूरत थी उसका निर्वहन शासन प्रशासन द्वारा नहीं किया गया। राकेश अपने लेख में लिखते हैं 'आरक्षण का मूल उद्देश्य गरीबी हटाना नहीं है। गरीबी दूर करने के लिए छात्रवृत्ति, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, आवास, खाद्य सुरक्षा, कौशल विकास और प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता जैसी अनेक नीतियाँ हो सकती हैं। आरक्षण का संवैधानिक उद्देश्य अलग है—राज्य की संस्थाओं में उन सामाजिक समूहों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना, जो ऐतिहासिक और संरचनात्मक कारणों से वहाँ पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं कर सके हैं। यही अंतर आरक्षण और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के बीच बुनियादी अंतर है।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं राकेश कुमार गुप्ता का आलेख 'आरक्षण को नई वैचारिकी नहीं, संवैधानिक ईमानदारी चाहिए'।
'आरक्षण को नई वैचारिकी नहीं, संवैधानिक ईमानदारी चाहिए'
राकेश कुमार गुप्ता
आरक्षण पर बहस होनी चाहिए—और पूरी गंभीरता से होनी चाहिए। आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था की समीक्षा भी होनी चाहिए, उसके भीतर मौजूद असमानताओं पर प्रश्न भी उठने चाहिए और यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्या आरक्षण का लाभ समाज के सबसे वंचित लोगों तक समान रूप से पहुँच रहा है। लेकिन समीक्षा और पुनर्संरचना की आवश्यकता को आधार बना कर संविधान की मूल आरक्षण-वैचारिकी को ही अधूरा, पुराना या अप्रासंगिक मान लेना एक अलग बात है।
शिवदयाल जी के लेख की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह स्वयं आरक्षण के भीतर मौजूद एक वास्तविक समस्या की ओर संकेत करता है। लेख में कहा गया है कि आरक्षित वर्गों के भीतर भी कुछ प्रभावशाली जातियाँ और सम्पन्न परिवार बार-बार आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं और अनेक छोटी, अत्यंत वंचित जातियाँ पीछे छूट रही हैं।
इस प्रश्न से असहमति का कोई कारण नहीं है। लेकिन इस निष्कर्ष से यह सिद्ध नहीं होता कि आरक्षण की संवैधानिक वैचारिकी गलत है। इससे अधिक से अधिक यह सिद्ध होता है कि आरक्षण के भीतर लाभों के वितरण की समीक्षा और उसके बेहतर लक्ष्यीकरण की आवश्यकता है।
यही वह बिंदु है जहाँ बहस को “आरक्षण बनाम गैर-आरक्षण” से निकाल कर “आरक्षण को अधिक न्यायपूर्ण कैसे बनाया जाए” की दिशा में ले जाना चाहिए।
सबसे पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि आरक्षण का मूल उद्देश्य गरीबी हटाना नहीं है। गरीबी दूर करने के लिए छात्रवृत्ति, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, आवास, खाद्य सुरक्षा, कौशल विकास और प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता जैसी अनेक नीतियाँ हो सकती हैं। आरक्षण का संवैधानिक उद्देश्य अलग है—राज्य की संस्थाओं में उन सामाजिक समूहों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना, जो ऐतिहासिक और संरचनात्मक कारणों से वहाँ पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं कर सके हैं। यही अंतर आरक्षण और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के बीच बुनियादी अंतर है।
लेख में यह तर्क दिया गया है कि आज गरीबी केवल किसी विशेष जाति की समस्या नहीं है और यह भी पूछा गया है कि जिन देशों में जाति व्यवस्था नहीं है, वहाँ गरीब क्यों हैं।
यह तर्क पहली दृष्टि में आकर्षक लग सकता है, लेकिन संवैधानिक प्रश्न का उत्तर नहीं देता। दुनिया के दूसरे समाजों में गरीबी का होना इस तथ्य को समाप्त नहीं करता कि भारत में जाति एक विशिष्ट सामाजिक संस्था रही है और उसने अवसर, सम्मान, शिक्षा, पेशे तथा सामाजिक गतिशीलता के वितरण को गहराई से प्रभावित किया है।
गरीबी और जातिगत वंचना एक ही चीज नहीं हैं।
एक गरीब व्यक्ति आर्थिक रूप से वंचित हो सकता है, लेकिन उसके बच्चे को सामाजिक सम्मान, जातिगत पहचान और संस्थागत पहुँच के मामले में ऐसी बाधाओं का सामना आवश्यक रूप से नहीं करना पड़ सकता, जैसी किसी ऐतिहासिक रूप से बहिष्कृत समुदाय के व्यक्ति को करनी पड़ती है। इसी प्रकार कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से सक्षम हो जाने के बाद भी सामाजिक पूर्वाग्रहों से पूरी तरह मुक्त हो जाए—यह भी स्वतः सिद्ध नहीं है। इसलिए आर्थिक पिछड़ापन और सामाजिक पिछड़ापन एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं।
यहीं लेख का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष—“आर्थिक आधार को आरक्षण का आधार बना देना”—संवैधानिक दृष्टि से पुनर्विचार की मांग करता है। लेख स्वयं स्वीकार करता है कि आर्थिक आधार पर दस प्रतिशत आरक्षण लागू किया जा चुका है, लेकिन साथ ही इसे “तुष्टिकरण” भी कहता है।
यदि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान तुष्टिकरण है, तो फिर उसी तर्क को समस्त आरक्षण व्यवस्था पर लागू क्यों न किया जाए? और यदि आर्थिक कमजोरी विशेष अवसर की पात्रता पैदा करती है, जैसा कि लेख के अंतिम हिस्से में कहा गया है, तो फिर यह स्वीकार करना पड़ेगा कि आर्थिक अभाव भी राज्य की सकारात्मक कार्रवाई का वैध आधार हो सकता है। लेकिन यहीं संविधान ने अलग-अलग समस्याओं के लिए अलग-अलग रास्ते बनाए हैं।
अनुच्छेद 16(4) का केंद्र है—सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन तथा लोक सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व। दूसरी ओर 103वें संविधान संशोधन के बाद अनुच्छेद 16(6) के माध्यम से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए अलग संवैधानिक आधार बनाया गया।
इसलिए EWS को SC/ST/OBC आरक्षण का विकल्प मानना संवैधानिक संरचना को सरल बना कर देखने जैसा होगा। EWS का अस्तित्व सामाजिक पिछड़ेपन पर आधारित आरक्षण को अप्रासंगिक नहीं करता।
अब आते हैं लेख के उस हिस्से पर जहाँ कहा गया है कि यदि आरक्षित वर्गों के कुछ परिवार बार-बार आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं तो आरक्षण परिवार आधारित कर दिया जाए और एक परिवार को एक पीढ़ी में केवल एक बार इसका लाभ मिले। लेख में इस प्रस्ताव को “नई, सार्थक बहस” की शुरुआत बताया गया है।
यह प्रस्ताव चर्चा योग्य अवश्य है, लेकिन पहली दृष्टि में जितना सरल दिखाई देता है, व्यवहार में उतना ही जटिल है।
क्या आरक्षण का लाभ लेने वाले व्यक्ति के बच्चे को केवल इसलिए आरक्षण से वंचित कर दिया जाना चाहिए कि उसके माता-पिता को एक बार आरक्षण मिला था? यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आरक्षण किसी परिवार को स्थायी आर्थिक सहायता देने की योजना नहीं है। यह व्यक्ति को शिक्षा और रोजगार में प्रतिस्पर्धा के लिए अवसर उपलब्ध कराने की संवैधानिक व्यवस्था है। यदि किसी परिवार की एक पीढ़ी में किसी व्यक्ति को आरक्षण के माध्यम से नौकरी मिल गई, तो इससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि अगली पीढ़ी सामाजिक रूप से उस वर्ग की ऐतिहासिक वंचना से पूरी तरह बाहर निकल गई है।
हाँ, यदि कोई वर्ग या उप-वर्ग आरक्षण का अत्यधिक लाभ उठा रहा है और उसी आरक्षित श्रेणी के दूसरे समूह लगातार बाहर रह जा रहे हैं, तो प्रश्न उठना बिल्कुल उचित है कि क्या आरक्षण के भीतर अधिक सूक्ष्म वर्गीकरण, उप-वर्गीकरण या अन्य सुधार की आवश्यकता है।
लेकिन “एक परिवार, एक बार आरक्षण” जैसा सार्वभौमिक नियम लगाने से पहले यह तय करना होगा कि सामाजिक पिछड़ेपन का निर्धारण परिवार से होगा, व्यक्ति से, जाति से, समुदाय से या पीढ़ीगत सामाजिक स्थिति से।
इसके अतिरिक्त, क्या एक ही परिवार के दो बच्चों की सामाजिक परिस्थितियाँ हमेशा एक जैसी होती हैं? क्या माता-पिता के आरक्षण से नौकरी प्राप्त कर लेने मात्र से अगली पीढ़ी के सभी सामाजिक अवरोध समाप्त हो जाते हैं? और क्या आरक्षण प्राप्त व्यक्ति का बच्चा उसी सामाजिक वातावरण में बड़ा होता है जिसमें सदियों से प्रभुत्वशाली सामाजिक समूहों के बच्चे बड़े होते आए हैं? इन प्रश्नों का उत्तर केवल आर्थिक आय देख कर नहीं दिया जा सकता।
लेख में UPSC में आरक्षित वर्ग के कुछ अभ्यर्थियों द्वारा सामान्य श्रेणी के कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त करने को आरक्षण की सफलता का प्रमाण बताया गया है। लेकिन यहाँ भी एक बुनियादी संवैधानिक अंतर समझना होगा। यदि आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार अपनी योग्यता से सामान्य श्रेणी की सीट पर चयनित होने की स्थिति में है, तो वह आरक्षण की विफलता नहीं, बल्कि आरक्षण और योग्यता के बीच कृत्रिम विरोध को तोड़ने वाला तथ्य है।
आरक्षण का अर्थ यह नहीं है कि आरक्षित वर्ग का हर व्यक्ति कम योग्य है। आरक्षण का उद्देश्य प्रतिस्पर्धा से अयोग्य व्यक्ति को निकाल कर नौकरी देना नहीं है; इसका उद्देश्य उन समूहों की प्रतिनिधित्व संबंधी कमी को दूर करना है जिनकी संस्थागत उपस्थिति ऐतिहासिक रूप से अपर्याप्त रही है। इसलिए “आरक्षित उम्मीदवार ने सामान्य उम्मीदवार से अधिक अंक प्राप्त किए” को आरक्षण के विरुद्ध तर्क बनाना उसी पूर्वाग्रह को पुष्ट करता है जिसे आरक्षण की बहस समाप्त करना चाहती है।
वास्तव में तो ऐसे परिणाम से यह प्रश्न उठना चाहिए कि जब आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी समान परिस्थितियों में पहुँचने पर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकते हैं, तो क्या समस्या उनकी “मेधा” में थी या अवसरों की असमानता में?
अब उस तर्क पर आएँ कि आरक्षण से केवल कुछ जातियाँ लाभान्वित हो रही हैं। यह आलोचना गंभीर है। यदि किसी आरक्षित श्रेणी में अनेक समुदाय लगातार प्रतिनिधित्व से बाहर हैं, तो केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं होगा कि “आरक्षण है, इसलिए न्याय हो रहा है।” सामाजिक न्याय का अर्थ केवल आरक्षण की उपलब्धता नहीं, बल्कि आरक्षण के भीतर न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व भी है। लेकिन इसका समाधान आरक्षण समाप्त करना नहीं हो सकता। यदि किसी अस्पताल में दवा का वितरण गलत हो रहा हो, तो दवा बंद नहीं की जाती; वितरण व्यवस्था सुधारी जाती है।
इसी प्रकार यदि आरक्षण के लाभों का वितरण असमान है तो समाधान होना चाहिए—बेहतर डेटा, जाति/समुदायवार प्रतिनिधित्व का अध्ययन, पारदर्शी रोस्टर, बैकलॉग की गणना, नियमित समीक्षा और जहाँ संवैधानिक रूप से उचित हो वहाँ आरक्षित श्रेणियों के भीतर अधिक न्यायपूर्ण वितरण की व्यवस्था। यही वह क्षेत्र है जहाँ संसद की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है।
दुर्भाग्य यह है कि भारत में आरक्षण को ले कर हमारी राजनीति ने इसे मुख्यतः चुनावी प्रश्न बना दिया, जबकि संसद ने आरक्षण के क्रियान्वयन के लिए एक व्यापक, स्पष्ट और समग्र केंद्रीय कानून बनाने की दिशा में पर्याप्त पहल नहीं की। परिणाम यह है कि आरक्षण के अनेक महत्वपूर्ण प्रश्न प्रशासनिक आदेशों और न्यायिक निर्णयों पर निर्भर करते हैं।
इससे दो समस्याएँ पैदा होती हैं। पहली—नीति में स्थायित्व और पारदर्शिता का अभाव। दूसरी—आरक्षण से जुड़े अत्यधिक महत्वपूर्ण नीतिगत प्रश्न न्यायिक व्याख्या के माध्यम से तय होने लगते हैं।
यहीं लेख में प्रस्तावित “नई वैचारिकी” से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—क्या संसद अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाएगी? आरक्षण के लिए एक व्यापक कानून होना चाहिए जिसमें यह स्पष्ट हो कि “पर्याप्त प्रतिनिधित्व” का निर्धारण किस आधार पर होगा; किस अवधि में प्रतिनिधित्व का सामाजिक ऑडिट होगा; बैकलॉग कैसे भरा जाएगा; रोस्टर कैसे संचालित होगा; लाभों के अत्यधिक संकेंद्रण को कैसे पहचाना जाएगा; और किन परिस्थितियों में आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की जाएगी। ऐसा कानून आरक्षण को राजनीतिक नारों और न्यायिक विवादों से निकाल कर एक संस्थागत नीति में बदल सकता है।
लेख में यह भी कहा गया है कि आरक्षण के नाम पर “मनुवाद”, “ब्राह्मणवाद” और “सामंतवाद” की बहस खड़ी कर दी जाती है तथा पिछले डेढ़-दो सौ वर्षों में अनेक गैर-ब्राह्मण व्यक्तियों ने भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया और ब्राह्मणों ने भी उन्हें स्वीकार किया।
इस तथ्य से कोई असहमति नहीं हो सकती कि भारत का निर्माण अनेक जातियों, समुदायों और विचारधाराओं के लोगों ने मिलकर किया है। लेकिन कुछ महान व्यक्तियों के व्यक्तिगत योगदान को जातिगत संरचनाओं के ऐतिहासिक प्रभाव का खंडन मान लेना भी उचित नहीं होगा।
इतिहास व्यक्तियों के योगदान से बनता है, लेकिन सामाजिक संरचनाएँ केवल व्यक्तियों के व्यवहार से समाप्त नहीं होतीं। इसलिए आरक्षण की बहस में न तो किसी जाति को सामूहिक अपराधी बनाना चाहिए और न किसी जाति की ऐतिहासिक सामाजिक स्थिति को नकारना चाहिए। असल सवाल यह है कि आज राज्य की संस्थाओं में कौन कितना प्रतिनिधित्व रखता है और क्यों? और इस प्रश्न का उत्तर भावनाओं से नहीं, आँकड़ों से मिलना चाहिए।
यही कारण है कि आरक्षण की व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी आज उसकी वैचारिकी का अभाव नहीं, बल्कि पर्याप्त और नियमित सामाजिक-प्रतिनिधित्व संबंधी डेटा का अभाव है। यदि सरकार के पास प्रत्येक संवर्ग, सेवा और पद के स्तर पर सामाजिक प्रतिनिधित्व का विश्वसनीय आँकड़ा हो, तो यह बहस कहीं अधिक वैज्ञानिक हो सकती है।
तब हम यह भी देख सकते हैं कि आरक्षण का लाभ किन समुदायों तक पहुँचा, कौन पीछे रह गया, किन सेवाओं में कौन-सा समूह पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त कर चुका है और किन क्षेत्रों में अब भी भारी कमी है।
इसलिए आरक्षण की समीक्षा का विरोध नहीं होना चाहिए। लेकिन समीक्षा का अर्थ यह नहीं कि संविधान की मूल अवधारणा को ही समाप्त कर दिया जाए। समीक्षा का अर्थ है—संविधान के लक्ष्य को अधिक प्रभावी ढंग से प्राप्त करने के लिए व्यवस्था को बेहतर बनाना। यही अंतर “आरक्षण विरोध” और “आरक्षण सुधार” के बीच है।
परिवार आधारित आरक्षण पर भी बहस हो सकती है। आरक्षित वर्गों के भीतर लाभों के असमान वितरण पर भी बहस होनी चाहिए। क्रीमी लेयर, उप-वर्गीकरण, प्रतिनिधित्व के आँकड़े और पीढ़ीगत लाभ जैसे प्रश्नों पर भी गंभीर संवैधानिक विमर्श आवश्यक है। लेकिन इस पूरी बहस का आधार यह नहीं हो सकता कि जातिगत वंचना और आर्थिक गरीबी एक ही समस्या हैं।
गरीबी का समाधान आर्थिक नीति है; सामाजिक बहिष्करण का समाधान सामाजिक न्याय की नीति है; और प्रतिनिधित्व की कमी का समाधान प्रतिनिधित्व की नीति है। तीनों को एक ही डिब्बे में रख देना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि समस्या को सरल बनाना है।
इसलिए “आरक्षण : नई वैचारिकी की जरूरत” के बजाय शायद आज का अधिक उपयुक्त प्रश्न होना चाहिए—
“आरक्षण : संवैधानिक वैचारिकी को लागू करने के लिए नई संस्थागत व्यवस्था की जरूरत।” नई वैचारिकी की आवश्यकता तब होती जब संविधान ने समस्या की पहचान ही न की होती।लेकिन संविधान ने समस्या को पहचाना है। उसने समानता का सिद्धांत दिया है। उसने विशेष अवसर का सिद्धांत दिया है। उसने सामाजिक न्याय को संवैधानिक उद्देश्य बनाया है। उसने लोक सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व को आरक्षण के संवैधानिक आधार के रूप में स्वीकार किया है। समस्या यह है कि हमने इन सिद्धांतों को लागू करने के लिए पर्याप्त संस्थागत ईमानदारी नहीं दिखाई। इसलिए आज की सबसे जरूरी मांग यह नहीं होनी चाहिए कि आरक्षण को छोड़ कर कोई नई वैचारिकी खोजी जाए।
सबसे जरूरी मांग यह होनी चाहिए कि संसद संविधान की आरक्षण संबंधी वैचारिकी को एक स्पष्ट, पारदर्शी, वैज्ञानिक और जवाबदेह कानून में बदले। आरक्षण की कमियों को दूर कीजिए।आरक्षण के लाभों के संकेंद्रण की जाँच कीजिए।जो समुदाय पीछे छूट गए हैं, उन्हें पहचानिए। प्रतिनिधित्व का नियमित सामाजिक ऑडिट कीजिए। आँकड़े सार्वजनिक कीजिए। जरूरत हो तो संवैधानिक सीमाओं के भीतर उप-वर्गीकरण और अन्य सुधार कीजिए। लेकिन यह सब करते हुए उस मूल प्रश्न को मत भूलिए जिसके कारण आरक्षण की आवश्यकता पैदा हुई थी— क्या भारत की राज्य-संस्थाएँ वास्तव में भारत के सभी सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व करती हैं? जब तक इस प्रश्न का उत्तर सकारात्मक नहीं हो जाता, तब तक आरक्षण को समस्या कहना संविधान के उस वादे को भूल जाना होगा जिसके केंद्र में केवल समानता नहीं, बल्कि वास्तविक और प्रतिनिधित्वपरक समानता है।
और अंततः आरक्षण पर सबसे गंभीर बहस यही होनी चाहिए—
आरक्षण को समाप्त करने की नहीं, उसे अधिक न्यायपूर्ण, अधिक पारदर्शी और अधिक संवैधानिक बनाने की।
क्योंकि समस्या यह नहीं है कि संविधान ने आरक्षण की वैचारिकी क्यों दी।
समस्या यह है कि संविधान ने जो कहा, उसे हमने अब तक कितनी ईमानदारी से लागू किया।
सम्पर्क
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