अंशु मालवीय की लम्बी कविता 'जीतू मुण्डा बनाम जादुई यथार्थवाद, अतियथार्थवाद और ज़िन्दगी के दीगर चूतियापे... ... '
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| अंशु मालवीय |
कवि परिचय
अंशु मालवीय
जन्म : 12 जुलाई 1971, इलाहाबाद
पिछले 38 वर्षों से सामाजिक साँस्कृतिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय. विभिन्न जन पक्षधर संगठनों- आंदोलनों से जुड़ाव
प्रकाशित कृतियाँ -
कविता संग्रह
दक्खिन टोला, तिनगोड़वा, ये दुःख नहीं है तथागत, नार्को टेस्ट ( लंबी कविता)
* शहर और सपना ( शहरी गरीबी का एक अध्ययन)
* इसके अतिरिक्त शहरी गरीबी और असंगठित कामगारों पर 10 पुस्तिकाएं
लोकतन्त्र की व्यवस्था की गई थी लोक के हित के लिए लेकिन वह तन्त्र के जाल में इस कदर उलझ गया है कि लोक की साँसे आज घुटती हुई दिख रही हैं। लोक नाच रहा है और तन्त्र उसे नचा रहा है। यह व्यवस्था उस निर्मम व्यवस्था में तब्दील हो गई है जिसमें मनुष्यता के लिए कोई जगह ही नहीं है। विडम्बना यह है कि यह सब कुछ मनुष्यता के नाम पर ही किया जा रहा है। जीतू मुण्डा के प्रकरण ने हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। जीतू मुण्डा को अपने मृत बहन की खाता से धनराशि निकालने के लिए कब्र से खोद कर उसकी कंकाल ले कर बैंक जाना पड़ा। इसने न केवल जीतू मुण्डा की विवशता को उजागर किया बल्कि उस अमानवीयता को भी जगजाहिर कर दिया जो हमारी इस व्यवस्था में नीचे से ले कर ऊपर तक पसरी हुई है। क्या एक आदिवासी, क्या एक अनपढ़ को अपने हक के साथ इस व्यवस्था में जीने का अधिकार नहीं है। अंशु मालवीय एक एक्टिविस्ट कवि हैं जो जन सरोकारों से निरन्तर जुड़े हुए हैं। वे हाशिए के लोगों की आवाज हमेशा उठाते रहे हैं। उन्हें इस तन्त्र की निशृंशता के बारे में बखूबी पता है। वे अपनी इस मार्मिक कविता में जीतू के कंकाल ले कर बैंक जाने की घटना को शिव के उस मिथकीय तांडव से जोड़ कर देखते हैं जिसमें शिव सती के शव को ले कर तांडव करने लगते हैं और पूरी सृष्टि के लिए प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। जीतू के प्रसंग ने हमारी व्यवस्था की चूलें हिला दी हैं। इस नवीनतम कविता को अंशु ने अपने चिर परिचित अंदाज में इस तरह प्रस्तुत किया है कि कविता पढ़ते हुए एक सिहरन सी होती है। श्रीकान्त वर्मा की एक पंक्ति है जो सोचेगा, वह सिहरेगा। यह कविता सोचने और सिहरने दोनों के लिए बाध्य करती है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं अंशु मालवीय की नई लम्बी कविता 'जीतू मुण्डा बनाम जादुई यथार्थवाद, अतियथार्थवाद और ज़िन्दगी के दीगर चूतियापे... ... '।
लम्बी कविता
'जीतू मुण्डा बनाम
जादुई यथार्थवाद, अतियथार्थवाद और ज़िन्दगी के दीगर चूतियापे... ... '
अंशु मालवीय
क्योझर आज़ाद हो गया....?
1947 की गर्मियों में खुदकुशी कर चुका इन्सान ... जागा
सुन कर
धरती की धमक
डमरू की आवाज़
और कंकालों की किलकारी......
चला जा रहा है जीतू मुण्डा
एक ठठरी काँधे पर लादे
पीछे चल रही है भीड
इन्सान, भूत, प्रेत, कंकाल
बैल, साँप और शेरों की भीड़
एक दूसरे से पूछते हुए-
'क्योझर आजाद हो गया?'
'क्योझर आज़ाद हो गया?'
'क्योझर क्या सचमुच आज़ाद हो गया?'
देश के सबसे बड़े बैंक की छोटी सी शाखा के बाहर
जीतू मुण्डा नाच रहा है
...काँधे पर ठठरी उठाये
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डर्मवयं
जटाएँ खुल कर बिखर गई हैं दिग दिगन्त
जटाओं में उलझ कर विलाप कर रही है रक्त गंगा
जटाओं का चाँद पीला है
तम्बाकू से ज़र्द दाँतों सा
नीलवर्णी गर्दन से झूलता साँप विष वमन कर रहा है
विष से झुलस रही है धरती
जीतू मुण्डा के बदन से भभूत झर रहा है
हाथों की लाठी कड़कड़ाती है
रीढ़ की तरह
कंधे की ठठरी.... सूखे हुए जंगल की तरह तड़कती है
झंझावात्...... झंझावात्........ झंझावात्
चकारचंद तांडवं
जीतू मुण्डा..... देश के सबसे बड़े बैंक की छोटी सी शाखा के सामने
के.वाई.सी. ताण्डव कर रहा है.......।
वर्गास ल्योसा भाई!
ये तुम्हारी आदिवासी दन्तकथाओं से बिल्कुल अलग है-
बिल्कुल अलहदा
किसी आदिम रोमान्टिसिज्म से.......
सच्चाई किसी भी फैन्टेसी से ज्यादा
फैन्टास्टिक होती है......तब तो और भी
जब वह खुद के सच्चाई होने का
दावा भी न पेश करे
डाली भईया
ये स्मृतियों की निरन्तरता नहीं
ये दुख की निरन्तरता है
जहाँ पिघल कर नहीं बह रही घड़ियाँ
खौल रही हैं
वक्त के अदहन पर
और सच पूछो
मुझ जैसे अर्द्धकवि से तो
ये जादुई यथार्थ है न अतियथार्थ
ये चूतियापा है,
ज़िन्दगी का अपार चूतियापा
कफन पर काढ़ी गई कढ़ाई जैसा
अश्लील चूतियापा
जीतू मुण्डा नाचता है
देश के एक बड़े बैंक की छोटी सी शाखा के सामने
विराट
विकल
वीभत्स तांडव
कॉपती है धरती....... डोलते हैं महासागर
टूटी है उल्काएं
और विषाक्त हो जाती हैं आकाशगंगाएं
सृष्टि अब नष्ट होने को है देवताओ!
डोल रहा है इन्द्रासन
डोल रहा है ब्रम्हा का पद्मासन
मार्केट क्रैश होने को है परब्रम्ह!
देवता इकट्ठे होते हैं
दुनिया के फेडरल रिज़र्व के सामने
त्राहिमाम! त्राहिमाम्!!
सृष्टि को बचाओ जीतू मुण्डा के कोप से......
फेडरल रिज़र्व का सुदर्शन चक्र चल पड़ता है
जीतू मुण्डा की ओर..
पब्लिक फाइनेन्स का चक्र
जिसके आरे बने हैं
मुद्रा स्फीति से
मँहगाई से
महामारी से
कर्ज से
झरनों की प्यास से
जंगलों की कटाई से
जीतू मुण्डा की बेदखली से
और हिरनों के संहार से..........
अपनी पहचान की ठठरी काँधे पर लादे
बेखबर
जीतू मुण्डा नाच रहा है
एक बड़े से बैंक की छोटी सी शाखा के सामने
तपती धरती पर
अकाल तांडव.......
सुदर्शन चक्र काटता है
उसके अस्तित्व की लाश को टुकड़ा ब टुकड़ा
तुम्हारे आधार कार्ड की फोटो
हम ए.आई. से बना देंगे
तुम्हारा राशन ढोर खा लेंगे भाई
तुम्हारा काम मशीने कर देंगी
और तुम्हारा वोट पार्टी दे देगी जीतू मुण्डा
सच सुनो तो तुम
बेशी आबादी हो जीतू मुण्डा अतिरिक्त मानवता वेस्टीजियल ऑर्गन
जिसका इस शरीर में
अब कोई काम नहीं
उत्पादन और उपभोग के मिथक में
त्रिशंकु की तरह,
मृत्युलोक जिसका नहीं
स्वर्ग जिसे मिल नहीं सकता
नर्क में वैकेन्सी नहीं है
अप्रासंगिक
अकृतार्थ
जीतू मुण्डा!
जहाँ-जहाँ सुदर्शन चक्र काटता है
ठठरी को......
गिरते हैं टुकड़े
उगते हैं शक्तिपीठ
बनते हैं पॉवर प्लान्ट
नदियों की देह रौंदते
दैवीय बाँध
अजदहों की तरह रेंगते
स्पेशल इकनॉमिक ज़ोन
खेतों में खर्राटे भरते
अघाये फ्लाई ओवर
जीतू मुण्डा के कंधे पर पड़ी
मानवीय गरिमा की लाश के टुकड़े
गिरते हैं देश भर में बैंकों के सामने
प्रतिभूतियां बन कर
बान्ड्स बन कर
शेयर बन कर
कोलैटरल गारण्टी बन कर
एम. ओ. यू. बन कर
नॉन परफार्मिंग एसेट्स बन कर.......
सिर्फ तुम ही नहीं
तुम्हारे जंगल भी अप्रासंगिक है जीतू मुण्डा
अब जंगल
सेठ खोलते हैं
जहाँ भर्ती किये जाते हैं बनावटी जानवर
बेदखल किये जाते हैं बेशी इन्सान.......
ठठरी चुक गई है
सुदर्शन चक्र अट्टहास कर रहा है
भंग तांडव
भग्न स्वप्न
जीतू मुण्डा
के. वाई. सी. लिये खड़ा है
तुम्हारे पास Coffers हैं सेठ
जीतू मुण्डा के पास Coffin है
सम्पर्क
A 111, मेंहदौरी कॉलोनी,
तेलियरगंज, इलाहाबाद 211004
मोबाइल 9170911718
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