पीयूष कुमार का आलेख 'नौ कहानियों में नौ दिनों की नौ रातें'
![]() |
| पीयूष कुमार |
जैसे जैसे हम विकास की राह पर आगे बढ़ रहे हैं वैसे वैसे दिक्कतें बढ़ती जा रही हैं। साहित्य अपने समय के सरोकारों को बारीकी से दर्ज करने का काम करता है और इस क्रम में इन दिक्कतों को भी हमारे समय के कहानीकार दर्ज कर रहे हैं। विधा के अन्तर्गत देखें तो कहानियों में यह अभिव्यक्ति और सार्थक रूप में दिखाई पड़ती है। बया के हालिया प्रकाशित कहानी केंद्रित अंक ने एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। इस अंक में कुल सत्ताइस कहानियाँ शामिल है। पीयूष कुमार ने इन कहानियों में से नौ कहानियों को आधार बनाते हुए यह आलोचनात्मक आलेख लिखा है। ये नौ कहानीकार हैं : मधु काँकरिया, महेश दर्पण, रत्न कुमार सांभरिया, रामजी यादव, अंजलि देशपांडे, धनेश दत्त पांडेय, समीना खान, ममता शर्मा और सुमन शेखर। खुद पीयूष कुमार लिखते हैं "यह कहानियाँ जीवन सरोकार की कहानियों के लिहाज से चयनित की गई हैं जिनमें जीवन की कथा निराशा, टूटन, कायरता, जानलेवा संघर्ष, भय और सामाजिक-आर्थिक पराजय के रूप में नजर आती है। यह इस समय की प्रतिनिधि कहानियाँ हैं ऐसे में क्या यह मान लेना चाहिये कि उम्मीद और सुखांत का जीवन अब समाप्त हो गया है? यदि ऐसा है तो मनुष्य और प्रकृति बेहद गहरे संकट में प्रवेश कर चुके हैं जिन्हें यह कहानियाँ आगत संकट की पूर्व पीठिका के रूप में दर्ज कर रही हैं।" आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं पीयूष कुमार का आलेख 'नौ कहानियों में नौ दिनों की नौ रातें'।
'बया' पत्रिका के (जनवरी 2025 से मार्च 2026) के कहानी केंद्रित दूसरे अंक में संबंध सरोकार, सामुदायिक सरोकार और जीवन सरोकार शीर्षकों के अंतर्गत कुल 27 कहानियों का मूल्यांकन भी किया गया है। मुझे भी जीवन सरोकार के अंतर्गत नौ कहानियों के मूल्यांकन का अवसर मिला जो इस अंक में 'नौ कहानियों में नौ दिनों की नौ रातें' शीर्षक से संपादित रूप में प्रकाशित हुआ है। यह समीक्षा बिना संपादित अपने पूर्ण रूप में 'पहली बार' में आप पढ़ रहे हैं. -
पीयूष कुमार
'नौ कहानियों में नौ दिनों की नौ रातें'
पीयूष कुमार
देश में लिखने-पढने की रुचि ने आजादी के बाद तेज राह पकडी थी। तब पढने लिखने का अर्थ वही था जो है। तब इस मामले में सबसे ज्यादा पढी जाने वाली विधा कहानी और उपन्यास रहे हैं। पढने का यह दौर लम्बा चला और दो पीढियों ने वह चेतना हासिल की जो एक विकसित समाज की पहचान है। इस पहचान को गहरी चोट पहुँचाई है विगत कुछ सालों में तकनीकी और राजनीतिक परिवर्तनों ने। इसी समय सोशल मीडिया के आगमन से जहाँ लिखने छपने का लोकतांत्रिकीकरण हुआ, वहीं ‘व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी’ की गैरजिम्मेदाराना बातों ने इसके समानांतर और बड़ी सत्ता खडी कर ली। हालांकि साहित्य और व्हाट्अप यूनिवर्सिटी में उतना ही अंतर है जितना अंतर ‘सत्य के प्रयोग’ और ‘असत्य के प्रयोग’ में है। समकालीन मीडिया और उसके अनुषंगों ने जहां आम आदमी की बुद्धि की वैचारिक नसबंदी कर दी है, वहीं सोशल मीडिया पर भी संगठित प्रयासों ने भ्रामक, मिथ्या, एकांगी और सुनियोजित सूचनाओं के द्वारा चेतनापूर्ण आवाजों को नक्कारखाने की तूती बना दिया है। उधर गोएबल्स के पुनर्जन्म लेकर बुलडोजर की तरह बेधडक चलने के इस समय में अपने समय की चिंताओं को दर्ज कर पाने का स्पेस सिमटता जा रहा है वहीं इधर कागज और डाक की मँहगाई के कारण पुस्तक-पत्रिकाओं के प्रकाशन का काम मंद पड़ गया है और साहित्य समाज के दर्पण से मुंह चुरा रहा है। ऐसे लिखने पढने के विपरीत समय में कुछेक प्रकाशन ही हैं जो साहित्य के मशाल होने को सार्थक किये हुए हैं। इन मशालों में ‘बया’ पत्रिका का नाम प्रमुख है जो अपने साहित्यिक दायित्व को जिम्मेदारी से पूरा कर रही है। इसका ताजा उदारण है, ‘बया’ का सितंबर का कहानी केंद्रित अंक जिसमें सत्ताइस कहानियाँ शामिल है जो क्रमशः सामुदायिक सरोकार, सम्बन्ध सरोकार और जीवन सरोकार खण्डों में प्रस्तुत हुई हैं।
कहानी वह विधा है जो जिससे पाठक अपना जुडाव तत्काल और सघनता से महसूस कर पाता है ऐसे में समाज को साहित्य में सरोकारों वाली कहानियों के रूप में इस तरह दर्ज किया जाना महत्वपूर्ण उद्यम है। जैसा कि बताया गया है कि इस अंक के लिये 250 कहानियाँ आईं थीं जिनमें से इन सत्ताईस को अंक के लिये चुना गया। इतनी कहानियों को एक साथ लाना श्रमसाध्य तो है ही, चयन कर सकने की क्षमता का भी परिणाम है। इन कहानियों को उनकी प्रवृत्तियों के आधार पर वर्गीकृत किया गया है जिनमें एक खण्ड है, जीवन सरोकार। साहित्य का सब कुछ जीवन सरोकारों से ही सम्बन्धित होता है तो जाहिर है, समकालीन हिंदी कथा साहित्य में यह कहानियां अपने विषय और कहन में अपने वक्त को मजबूती से दर्ज कर रही हैं।
![]() |
| मधु काँकरिया |
मधु काँकरिया
इस खण्ड की नौ कहानियों में से पहली कहानी है, ‘कुत्ता नॉनवेजेटेरियन था’ जिसे लिखा है, मधु काँकरिया ने। मधु काँकरिया समकालीन हिन्दी की प्रमुख कहानीकार हैं। उनकी कहानियाँ सामाजिक सरोकारों, हाशिए के जीवन, स्त्री विमर्श और मानवीय संवेदनाओं को गहराई से उकेरती हैं। वे एक एक्टिविस्ट कथाकार हैं और उनकी कहानियों में सामाजिक यथार्थवाद खुलकर आता है। प्रस्तुत कहानी ‘कुत्ता नॉनवेजेटेरियन था’ अपने शीर्षक से सहज ही अपनी ओर आकर्षित करती है। इस कहानी के केंद्र में एक जीव जो कि मोती नाम का कुत्ता है और दो बुजुर्ग हैं जो एक जैन दंपति हैं। हिन्दी कहानियों में प्रेमचंद ने सौ साल पहले मनुष्य और जीवों के साहचर्य पर लिखी हैं जिनमें प्राकृतिक सहअस्तित्व और स्नेहिल सम्बन्धों का भाव है जबकि इधर भौतिक सभ्यता के विकास और पूंजीवादी मॉडल के समकाल में यह नये किस्म की आवश्यकता बन गया है। यह कहानी इसी आधुनिक और महानगरीय जीवन को प्रतिबिंबित करती है। ‘कुत्ता नॉनवेजेटेरियन था’ कहानी वृद्ध और जीव विमर्श दोनों को एक साथ प्रस्तुत करती है। इस कहानी में पूंजीवादी प्रभाव का मारा एकमात्र पुत्र नौकरी के लिये विदेश चला जाता है और इधर उसके माता पिता अकेले रह जाते हैं। इस एकाकीपन को दूर करने पुत्र की सलाह पर ही एक कुत्ते को पाला जाता है और उसका प्यार से नाम ‘मोती’ रखा जाता है। मोती के आने पर जैन दंपति की भावना कहानी में देखिये - ‘सुभान अल्लाह! असली मोती सा दमकता, दूध सा धवल, मक्खन से भी ज्यादा मुलायम मोती को देखा दोनों ने। शरीर के रोम रोम से देखा। मन मथुरा हुआ।’ यह मनुष्य का सहज भाव है पर मोती का क्या ? यहां पर युवा कवि ऐश्वर्य राज की एक कविता ‘मेरे गांव के कुत्ते’ श्रृंखला की एक कविता याद आती है -
कुछ लड़के जो ट्यूशन पढ़ने
शहर जाते थे
उन्होंने दिया कुत्ते को
एक अँग्रेज़ी नाम - ‘हनी’
हनी की सात पुश्त पीछे
और लड़कों की सात पुश्त पीछे
किसी को नहीं मिला था कभी
अँग्रेज़ी का/से कुछ भी
हनी अगर इंसान होता
तो फूला न समाता!
जैन दंपति द्वारा जन्म दिये गये पुत्र की दैहिक अनुपस्थिति को मोती नाम के कुत्ते से भरे जाने की यह कथा सामाजिक प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करती है। गौरतलब है कि यहां किसी मनुष्य के बच्चे को गोद लिये जाने और पालन पोषण का विचार दूर - दूर तक नहीं है। मोती का सस्नेह पालन पोषण किया जाता है और उससे सहज ही लगाव भी हो जाता है। यह लगाव इतना हो जाता है कि वे उसे एक जैन गुरु से प्रेरित होकर शाकाहारी कुत्ता बनाने में लग जाते हैं ताकि शाकाहार की जैन परंपरा कायम रहे। ऐसा करते मोती बडा हो जाता है। यह सब विवरण मधु कांकरिया ने विस्तार और रोचकता से लिखा है। कहानी के अंत में जैन दंपति एक दिन एक पिकनिक पर उसे जब लेकर जाते हैं तो वह एक कबूतर को मुंह में दबा लेता है! जैन दंपति के लिये अप्रत्याशित पर पाठकों के लिये प्रत्याशित यह अंत मनुष्य की अप्राकृतिक सोच को सरल पर सशक्त रूप में व्यक्त कर पाती है। यह कहानी अपनी सतह के भीतर समकालीन पूंजीवाद और उससे उपजे पारिवारिक विघटन और संत्रास को व्यक्त करती है। सुविधा की इस भौतिकवादी मरीचिका पर विजय बहादुर सिंह अपनी पुस्तक ‘उपन्यास, समय और संवेदना’ में लिखते हैं, - ‘विश्व बाजारवाद के पीछे अपने खतरनाक मंसूबे के लिये अंतरराष्ट्रीय अपराधी सरगना की तरह खडा उत्तर पूंजीवाद तमाम प्राचीन सभ्यताओं को हांक कर ले जाता है।’ कहानी के जैन दंपति का पुत्र इसी हांके जा रहे झुण्ड में एक भेड का प्रतीक है। यहां पर फिर ऐेश्वर्य राज की एक दूसरी कविता का ध्यान आता है -
कुत्ते के हिस्से की रोटी
आज नहीं बनी है
कुत्ते के लिए रोटियाँ
कभी नहीं बनतीं
उसे मिल जाता है खाना
उसके हिस्से का
जो महीनों पहले चला गया परदेश
मजूरी करने
मधु कांकरिया की यह कहानी मनुष्य की उस जातीय श्रेष्ठता और शुद्धतावादी मानसिकता पर प्रहार करती है जो अव्यवहारिक और अप्राकृतिक तो है ही, असामाजिक भी है। प्राकृतिक नियमों को परे रखकर एक जीव पर अपने विचार थोपने का प्रयास और उसके नाम के साथ अपना सरनेम रखने का शौक समाज में देखा भी जाता है। इस प्रवृत्ति का यदि सूक्ष्मता से आकलन करें तो यह भी दिखाई देता है कि यह प्रवृत्ति किस सामाजिक - आर्थिक वर्ग में अधिक दिखाई देती है। अपने प्राकृतिक सहअस्तित्व को भूलकर स्वयं को प्रकृति से अलग और नियंता समझने और कट्टर धार्मिकता, राष्ट्रवाद और विकास आदि को टूल्स के रूप में इस्तेमाल कर अपनी सोच के हिसाब से अपने आसपास को प्रभावित करने की यह प्रवृत्ति अधुनातन जटिल समाज का विशेष गुण है। यह कहानी समकालीन अव्यवहारिक प्रवृत्तियों, पूंजीवादी यथार्थ और प्राकृतिक नियम को रोचकता और सरलता से जाहिर करती है।
![]() |
| महेश दर्पण |
महेश दर्पण
इस खंड की अगली कहानी है, ‘हंसता हुआ अतीत’। यह वरिष्ठ कथाकार महेश दर्पण ने लिखी है। महेश दर्पण समकालीन प्रमुख कथाकारों में से एक हैं। वे सरल, आत्मीय और यथार्थवादी शैली के लिये जाने जाते हैं जिनकी कहानियाँ सामाजिक मुद्दों, मानवीय सम्बन्धों और आधुनिक जीवन की जटिलताओं को जाहिर करती हैं। प्रस्तुत कहानी भी इन्हीं विशेषताओं की प्रतिनिधि कहानी है। ‘हँसता हुआ अतीत’ पढकर प्रतीत होता है कि कहानी उनकी अपनी है। अल्मोड़ा को छोड़े हुए लेखक की पचास बरसों बाद लौटने और अपने दोस्त से मिलने की यह कहानी एक स्मृतिलेख है। कहानी का आरंभ अल्मोडा के एक चौक पर दो उम्रदराज लोगों के मिलने से होता है और उस दृश्य को स्थिर कर कहानी फ़्लैश बैक में चलने लगती है किसी फिल्म की तरह। यह कहन की बहुत प्रभावशाली विधि है, टाइम मशीन में बैठकर अतीत की यात्रा जैसी अनुभूति की तरह। कहानी में दोस्तों के साथ बिताए पल, उनके परिवारों के लोग, उनके मिजाज, जीवन की सरलता और जटिलताओं का सहज चित्रण है। यह कहानी अपने उद्देश्य को लेखक के मित्र जीवन के माध्यम से जाहिर करती है। पूरी कहानी पचास साल के एक दीर्घ अवकाश के बाद दोस्त से मुलाकात के दृश्य में रोककर के साथ पुराने दिनों को नॉस्टेल्जिया में जाहिर करती है। बकौल कैफ भोपाली - एक नया जख्म मिला, एक नई उम्र मिली, जब किसी शहर में कुछ यार पुराने मिले’ के एहसास की तरह यह दृश्य लेखक ने खींचा है। यह दृश्य संज्ञानात्मक मनोविज्ञान के स्मृति पुनःस्मरण का उम्दा उदाहरण है। इस कहानी के पात्रों में अल्मोड़ा कस्बा स्वयं भी एक पात्र की तरह प्रस्तुत हुआ है। शहर के एक हिस्से का यह विवरण इतना स्पष्ट है कि अल्मोडा में लेखक के मित्र जीवन के रहनेवाली जगह को इस कहानी का पाठक यदि यहां स्वयं जाये तो उसे किसी से जीवन का घर पूछने की आवश्कता नहीं पडेगी। इस विवरण से हिमांशु जोशी के रूमानी उपन्यास ‘तुम्हारे लिए’ के नैनीताल की याद आती है जिसमें नैनीताल एक जीवंत पात्र के रूप में प्रस्तुत हुआ है। कहानी में काल और परिवेश को अपने कहन में इस तरह प्रस्तुत किया जाना तथ्यों की प्रामाणिकता को स्थापित करता है। कहानी के संवाद छोटे हैं और सहज हैं। पूरी कहानी प्रथम पुरुष में कही गई है।
‘हंसता हुआ अतीत’ कहानी दो पीढ़ियों के बहुस्तरीय अंतरों को बताती है। पहाड़ छोड़ देने के बाद महानगरीय जीवन में ढलने और फिर बचपन वाले गांव में जाने की मनःस्थिति और प्रक्रियाओं का वास्तविक चित्रण इस इसमें हुआ है। पचास सालों के इस लम्बे दरमियान में आये बदलावों को सूक्ष्मता से व्यक्त किया गया है। कहानीकार ने एक स्थान पर लिखा है, ‘मैं परेशान था इस बात को लेकर कि कैसे देखते देखते एक खूबसूरत वर्तमान अतीत हो जाता है और भविष्य की फिक्र मे हम नए वर्तमान को भी कायदे से जी नहीं पाते! क्या कोई अंतराल हमारी स्मृतियाँ बिला देता है या हम खुद में इतने रम जाते हैं कि फिर सब कुछ भुला बैठते हैं।’ यह कहन स्वयं के बारे में बनी हुई धारणा और पहचान को मनोवैज्ञानिक रूप में जाहिर करता है। अपने इस कहन के ढंग के कारण यह कहानी अरैखित ढंग से प्रस्तुत हुई है जिसके कारण पाठक स्वयं वर्तमान और अतीत में लगातार आना-जाना करता रहता है और साथ ही भविष्य अर्थात कहानी के अंत को जानने के लिये भी उत्सुक रहता है।
कहानी में कहानीकार चूंकि एक साहित्यिक कार्यक्रम में शामिल होने अल्मोडा गया है, इसलिये कहानी के क्लाइमेक्स में उसका मित्र शाम को खुशी से उसके कार्यक्रम में पहुंचता है बशीर बद्र के इस शे’र की तरह - ‘ना उदास हो ना मलाल कर, किसी बात का ना ख्याल कर। कई साल बाद मिले हैं हम, तेरे नाम आज की शाम है।’ इस लिहाज से कहानी का अंत यथार्थपूर्ण और सुखद है जो कि लगाव और सामाजिक कसावट को महसूस कर पाने की प्रक्रिया से उपजा है। यह कहानी दीर्घ अंतराल के बाद पुराने मित्र से मिलने पर सहज होने की असहजता और फिर कुछ अंतराल बाद दूसरी मुलाकात में उस असहजता से उबरकर सहज हो जाने को सरल रूप में व्यक्त कर पाने में सफल होती है। यह मस्तिष्क की उस थ्योरी को समझने की क्षमता को व्यक्त करता है जिसमें स्मृतियाँ आवाजाही करती हैं। यह कहानी कथानक की मजबूती, पात्रों के चित्रण की गहराई, समकालीन पहाडी कस्बे के जीवन और विषय की प्रासंगिकता को बेहतर प्रस्तुत करती है।
![]() |
| रत्नकुमार सांभरिया |
रत्न कुमार सांभरिया
‘बया’ के कहानी अंक के जीवन सरोकार खण्ड से सम्बन्धित तीसरी कहानी है, ‘मुखबिर’। यह कहानी एक पीरियड कहानी है जो समकालीन कहानियों में अनोखी है जिसे लिखा है, रत्न कुमार सांभरिया ने। रत्न कुमार सांभरिया हिंदी साहित्य के उन सशक्त हस्ताक्षरों में से एक हैं, जो अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक असमानता, जातिगत शोषण और औपनिवेशिक दमन की परतों को उजागर करते हैं। उनकी कहानी ‘मुखबिर’ एक ऐसी कृति है, जो अंग्रेजी हुकूमत के दौर के नैतिक पतन को गहराई से चित्रित करती है। यह कहानी मात्र एक ऐतिहासिक कथा ही नहीं, बल्कि आज के संदर्भ में भी प्रासंगिक है जहाँ शक्ति, विश्वासघात और पहचान के सवाल बार-बार उठते हैं। ‘मुखबिर’ की कहानी 1945 के आसपास की है जब आजादी की लडाई के लिये देशभक्ति और विद्रोह की आग पूरे देश में फैल रही थी। कथा का केंद्र बिंदु सरदार सिंह है जो एक युवा है और आजादी के संघर्ष के लिए दो और उससे भी कम उम्र के युवाओं के साथ लाठी लेकर थाने के सामने इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाता है। वह जोश में यह हिमाकत कर तो लेता है पर पुलिस के कोड़े और दमन के आगे टूट जाता है। थानेदार के दबाव से घबरा कर वह माफीनामा लिखता है और पुलिस का मुखबिर बनने को मजबूर हो जाता है। इसके बाद आसपास के उन आजादी के दीवानों की शामत आने लगती है क्योंकि सरदार सिंह मुखबिरी का अपने हित में उपयोग करने लगता है और अकूत संपत्ति बना लेता है। यह संपत्ति उसने अपने भाईयों रिश्तेदारों और गाँव वालों को झूठे मुकदमों में फँसाकर हथियाया था। कहानी का दूसरा भाग सरदार सिंह की शानदार हवेली में घटित होता है जहाँ उसकी शान-शौकत और संपत्ति थानेदार की नजरों में चढ़ती है। थानेदार हवेली की भव्यता देखकर ईर्ष्या और लालच से भर जाता है। इस दौरान सरदार सिंह दरोगा के सामने हुकुम का गुलाम बना पेश आता है। कहानी के अंतिम दृश्य में दरोगा घूम घूम कर हवेली को देखता हुआ सरदार सिंह की पत्नी शमादेवी के शयनकक्ष में घुस जाता है और कमरे में दरोगा और पत्नी को छोडकर कायर सरदार सिंह हट जाता है। लेकिन आखिर के अत्यंत संक्षिप्त पर अप्रत्याशित दृश्य के रूप में दरोगा पिटकर घायल होकर कक्ष से निकलता है और सरदार सिंह देश समाज के साथ पत्नी से भी गद्दारी के बोझ तले दबा रह जाता है।
इस कहानी की संरचना रैखिक है और दो खंडों में विभाजित है। प्रथम खंड में सरदार सिंह का विद्रोही से मुखबिर बनना और द्वितीय खंड में उसके पतन का चित्रण है। सरदार सिंह कथा का केंद्रीय पात्र है, जिसका चित्रण रत्न कुमार सांभरिया ने जटिल और बहुआयामी बनाया है। एक साहसी युवा से कायर और फिर गद्दार बन जाने का एक ऐसा चरित्र बन जाता है जिनकी चर्चा इतिहास में कम की जाती है। हवेली की शान में उसका गर्व और थानेदार के सामने उसकी दासता विरोधाभासी है जो उसकी दोहरी नियति को उजागर करता है। इस कहानी में सरदार सिंह की प्रतीकात्मकता उल्लेखनीय है। वीर से कायर बना सरदार सिंह उन तमाम लोगों का प्रतिनिधि है जो आजादी की लडाई में पीछे रहे और अपनी कायरता का पेंशन पाते रहे हैं। कहानी का दूसरा मुख्य चरित्र थानेदार है जो क्रूर और शातिर है। वह यहाँ अंग्रेजी हुकूमत का प्रतीक है। नैतिकता विहीन थानेदार का लालच और शमादेवी के प्रति कामुकता उसकी बहुआयामी शोषक प्रवृत्ति को जाहिर करती है। इस कहानी में सबसे अद्भुत चरित्र शमादेवी का है जो अत्यंत संक्षिप्त है लेकिन इतना प्रभावशाली है कि हिन्दी कहानियों में सबसे सशक्त स्त्रियों में उसे शामिल किया जा सकता है। कहानी के आखिरी दृश्य में अपने कमरे में घुसे थानेदार को जिसके सामने उसका पति अपने नैतिक पतन को निम्नतम स्तर तक ले जा चुका था, प्रतिरोध करते हुए नोच लेती है और थानेदार उससे पिटकर भाग जाता है। आमतौर पर इतनी प्रतिरोधी स्त्री हिन्दी कहानी में यदि प्रस्तुत हुई है तो वह कहानी में प्रमुख पात्र के रूप में प्रस्तुत हुई है पर इस कहानी में शमादेवी को पाठक अपने शयन कक्ष में आराम करते और फिर थानेदार के घुसने पर लाज से कोने में जाकर खडे होते भर देख पाता है। इतने संक्षिप्त स्त्री चरित्र ने अपनी अस्मिता के लिये प्रतिरोध का जो मेयार रचा है, वह हिन्दी कहानी में विरल है।
यह कहानी अतीत में जा कर कही गई है। ऐसी कहानियों में कथानक और परिवेश की स्थापना में कठिन कात है भाषा को साधना। रत्नकुमार सांभरिया ने पात्र और देशकाल के अनुरूप उपयुक्त भाषा का उपयोग कर कहानी की प्रामाणिकता और रोचकता को बनाये रखा है। कहानी बिल्कुल ठेठ और तत्कालीन बोलचाल वाली है। संवादों में यह स्थानीयता कहानी की तात्कालिकता को बेहतर प्रस्तुत करती है। कहानी की शैली वर्णनात्मक है जो हवेली के विस्तृत चित्रण में दिखाई देता है। हवेली की नक्काशियों और बनावट का यह चित्रण कथाकार की वास्तुशिल्प की बेहतर समझ को जाहिर करता है। हालांकि हवेली का यह विवरण कहानी को सुंदर बनाता तो है लेकिन घटनाओं की गति को कुछ धीमा कर देता है। कहानी के अंत में शमादेवी का दृश्य अप्रत्याशित और नाटकीय अवश्य है पर वही एक दृश्य है जो बहुस्तरीय गुलामी में जी रहे कहानी के पात्रों सहित सभी मानसिक गुलामों को शर्मिंदा तो करता ही है, गुलामी से उबरने प्रेरणा भी देता है। कहानी में सरदार सिंह का मुखबिर बनना अंग्रेजी हुकूमत की नीति का हिस्सा है जहाँ उन्होंने जमींदारों को अपने नियंत्रण में उन्होंने रखा, वहीं कमजोर किस्म के लोगों को सस्ते जासूस के रूप में इस्तेमाल किया। ऐसे लोगों के लिए इतिहासकार सुमित सरकार अपनी पुस्तक ‘आधुनिक भारत’ (1885 -1947) में लिखते हैं, ‘आजादी के आंदोलन में यह दरअसल भारतीय सहयोगी ब्रिटिशों के लिए विशाल देश के दैनिक संचालन के लिए अपरिहार्य थे। इससे ब्रिटिशों को ऐसी निर्भरता मिली जो उनके आत्मविश्वास को बढाती चली गई।’ यह कहानी ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के संदर्भ में अवश्य है पर वर्तमान में भी घट रहे पुलिसिया दुरुपयोग के सवाल उठाती है। यह कहानी व्यवस्था के प्रति जागरुकता और प्रतिरोध की मांग करती है। ‘मुखबिर’ कहानी औपनिवेशिक इतिहास में गद्दारों और माफीवीरों की भूमिका का साहित्यिक दस्तावेज है।
![]() |
| रामजी यादव |
रामजी यादव
अंक में सम्मिलित इस खण्ड की चौथी कहानी ‘अवसर’ हास्यबोध की शैली में कही गई वह कथा है जो महामारी के दौर में मानवीय लालच, अवसरवाद और सामाजिक विडंबनाओं को उजागर करती है। इसे लिखा है वरिष्ठ कथाकार रामजी यादव ने। रामजी यादव विमर्शकारी कहानियों के दौर के प्रमुख कहानीकारों में से हैं जिन्होंने देशज विडंबनाओं को बारीकी से अपनी कहानियों में दर्ज किया है। उनकी प्रस्तुत कहानी 2020 के कोविड-19 महामारी के प्रारंभिक दौर में सेट है जब दुनिया भर में मृत्यु दर बढ़ रही थी। ऐसे में बब्बनदास पंचोखा, एक कपड़ा व्यापारी अपनी असफल दुकान को बचाने के लिये ‘आपदा में अवसर’ देखता है। वह इस महामारी से बड़ी संख्या में मौतों का अनुमान लगा कर कमाई का सुनहरा अवसर देखते हुए अंतिम संस्कार के सामान में पांच लाख रुपये का निवेश करता है। लेकिन लॉकडाउन और मृत्यु दर में अपेक्षित वृद्धि न होने से उसका व्यापार डूब जाता है। अंत में, आर्थिक संकट और सामाजिक अपमान के बाद वह अपनी गलती स्वीकार कर व्यवसायी से ‘आम जनता’ बनने की ओर बढ़ता है।
बब्बनदास पंचोखा ‘अवसर’ कहानी का केंद्रीय पात्र है जिसका चित्रण व्यंग्यात्मक और मनोवैज्ञानिक रूप से समृद्ध है। उसकी ‘क्खु-क्खु’ आदत उसे एक विशिष्ट पहचान देती है। उसका चरित्र एक दूरदर्शी या कहंे तो ओवरस्मार्ट बनिया के रूप में शुरू होता है लेकिन लालच और गलत अनुमान उसे विनाश की ओर ले जाते हैं जिससे उसका सामाजिक अपमान और पारिवारिक संकट उजागर होता है और वह आत्म-चिंतन की ओर जाता है। उसकी पत्नी श्रीमती सरूपा गुप्ता एक मजबूत सहायक पात्र है जो पारिवारिक जिम्मेदारियों और पति की विफलताओं के बीच संतुलन बनाए रखती है। वह प्रधानमंत्री पर आस्था रखने वाली स्त्री है। कहानी में उनके बच्चे (सिंटू, प्रीति, मिंटू आदि) सामाजिक संदर्भ में अगली पीढ़ी की असुरक्षा और जिम्मेदारी को प्रतिबिंबित करते हैं। अन्य पात्र जैसे लक्ष्मी साव और ढकेलू साव के पोते समाज के अवसरवादी और संवेदनहीन पक्ष को उजागर करते हैं। पात्र चित्रण यथार्थवादी है लेकिन कुछ स्थानों पर (जैसे बच्चों की लड़ाई) अतिश्योक्ति दिखती है।
इस व्यंग्यात्मक कहानी की भाषा बोलचाल वाली हिंदी है जिसमें पूर्वांचल का पुट है। रामजी यादव की मुहावरेदार भाषा कमाल की है जिसके कारण कहानी पढते सहज हास्य का प्रवाह चलता रहता है। इस कहानी में राजनीतिक व्यंग्य भाषा का प्रमुख हथियार है, जैसे- ‘प्रधानमंत्री जी जिंदों की कब परवाह करते हैं, वे मुरदों की चिंता ज्यादा करते हैं’, ‘कोरोना को साँप कहकर केंचुए को बेच दिया’, ‘धान बाइस पसेरी’ या ‘झूठी सरकार’ प्रधानमंत्री और सरकार से जनता की निराशा और विश्वास की कमी को दर्शाता है। यह व्यंग्य प्रासंगिक है और व्यवस्था पर सवाल खडा करती है। कहानी की शैली में वर्णनात्मकता और संवादों का संतुलन है जो कथा को हल्का-फुल्का बनाए रखता है। आरंभ में पंचोखा का विवरण शब्द चित्र की तरह प्रस्तुत हुआ है। कहानी में घरेलू विवरणों कुछ लम्बा हो गया है जिसे कम किया जा सकता था। पंचोखा के सपने का दृश्य नाटकीय है हालांकि यह प्रतीकात्मक है जो लूटपाट, भय और असफलता का प्रतीक है लेकिन इसका अर्थ अस्पष्ट रहता है। भाषा में स्थानीय रंग के साथ-साथ कुछ स्थानों पर असंगति (जैसे इटली-चीन के संदर्भों में अचानक बदलाव) दिखती है। कहानी के अंत में बब्बनदास का ‘जनता’ बनना दार्शनिक भाव तो है लेकिन कथा को संतुलित निष्कर्ष से वंचित रखता है।
‘अवसर’ एक मार्मिक और व्यंग्यात्मक कथा है जो पंचोखा के माध्यम से कोविड-19 महामारी के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों को दर्शाती है। यह कहानी न केवल व्यक्तिगत पतन की गाथा है, बल्कि सामूहिक संकट की भी कथा है, जो आज भी प्रासंगिक है। कहानी में फ्लो है और यह कोविड पर प्रधानमंत्री की असफल प्रबंधन क्षमता को जाहिर करती है। ‘अवसर’ व्यंग्य और यथार्थवाद का मिश्रण है जहाँ राजनैतिक कुप्रबंधन के कारण उपजी आर्थिक संकट और मानवीय कमजोरियाँ व्यक्त हुई हैं जिसे रामजी यादव ने इसे आधुनिक संदर्भ (महामारी) से जोड़ा है जिसे प्रसंगवश ऋतेश कुमार की एक कविता ‘आपदा में अवसर’ इस कथा को काव्यरूप में इस तरह देखा जा सकता है -
मँगरू काका कहते हैं
बबुआ,
अजब चाल है जग का
सब रहता है मौक़ा का तलास में
जैसे किसी पर आता है विपद
आँख में सियार मुस्कराने लगता है इनके
बताओ भला जन कहाँ जाए बचके
यह कहानी अपने अंत की ओर जाते समय जब पंचोखा कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण कर्ज लेने जाता है और अपमानित होता है, यशपाल की ‘परदा’ की याद दिलाती है। कहानी में उत्सुकता लगातार बनी रहती है और यथार्थ पर खत्म होती है। यह कहानी जहाँ ‘आपदा में अवसर’ के अर्थ का जहाँ प्रत्यक्षीकरण है वहीं व्यक्तिकेंद्रित अंधभक्ति की सच्चाई से अवगत करानेवाली भी है जिसे बकोैल डॉ. मुबश्शिरा सदफ़ की ग़ज़ल की इन पंक्तियों में देख सकते हैं
हम आपदाओं में अवसर तलाश करते हुए
शिकारी खेत में तीतर तलाश करते हुए
तुम्हारे शहर के लोगों के हाथ आया ख़ुदा
हमारे वास्ते पत्थर तलाश करते हुए!
![]() |
| अंजलि देशपांडे |
अंजलि देशपांडे
जीवन सरोकार खंड के अंतर्गत पाँचवी कहानी ‘दोराहा’ समकालीन तकनीकी और ऑनलाइन कार्यसंस्कृति के नकारात्मक यथार्थ को बेहतर प्रस्तुत करती है। यह कहानी लिखी है, अंजली देशपांडे ने। अंजली देशपांडे पेशे से पत्रकार हैं और नारी मुक्ति आंदोलनों से जुडी रही हैं। उनका एक्टिविस्ट लेखन और जीवन उनकी रचनाओं की पहचान है। उनकी यह कहानी ‘दोराहा’ उत्तर आधुनिक युग की एक प्रतिनिधि कहानी है। कहानी का कथानक जंतर-मंतर पर एक प्रदर्शन के इर्द-गिर्द सेट है जहाँ तातुषी और अन्य ड्राइवर सूर्यांश गोयल की कंपनी द्वारा धोखा दिए जाने के खिलाफ आवाज उठाते हैं। कंपनी के द्वारा रातों-रात 47 कारें गायब कर ली जाती हैं और एप्प बंद कर दिया जाता है जिससे ड्राइवर बेरोजगार हो जाते हैं। इन्हीं में से कैब ड्राइवर तातुषी, जो ड्राइविंग को अपनी आजादी और आत्मनिर्भरता का प्रतीक मानती थी, इस आघात से टूट जाती है। उनके जंतर मंतर पर प्रदर्शन में पत्रकारों की मौजूदगी उम्मीद जगाती है, लेकिन समाधान दूर दिखता है। अंत में, तातुषी और उसकी दोस्त नूर बीयर पीने और बालों की लट हाईलाइट करवाने की योजना बनाकर जीवन से समझौता करने की ओर बढ़ती हैं। कहानी केे इस अंत की अनुभूति को प्रयाग शुक्ल की कविता ‘नौकरी’ के इस अंश से महसूस किया जा सकता है -
भटकते हैं जो न जाने कहाँ-कहाँ
तलाश में नौकरी की
दरअसल, वे होते नहीं
इतने दिलचस्प
और उनके ज़िक्र से
तो चुप्पी छा जाती है
जो छोड़ देते हैं नौकरी
सचमुच यह जानते-बूझते-बहस करते
कि उन्हें जल्दी से
मिलने वाली नहीं
है फिर नौकरी!
इस कहानी में तातुषी कथा का केंद्र है जिसका चित्रण बहुआयामी है। वह एक मजबूत महिला है जो ड्राइविंग से अपनी पहचान और आर्थिक स्वतंत्रता बनाती है लेकिन कंपनी के धोखे से भावनात्मक रूप से टूट जाती है। उसका शुभम के प्रति मोह और पिता के प्रति सम्मान उसे मानवीय बनाता है। नूर, तातुषी की सहेली है जो एक साहसी और व्यावहारिक पात्र है। नूर घरेलू हिंसा से निकलकर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ती स्त्री का प्रतीक है जिसका सहजबोध और समर्थन तातुषी को बल देता है। एक और पात्र कांता सैनी जो कैब ड्राइवरों के संघर्ष संगठन की अध्यक्ष है, नेतृत्व और आक्रोश का प्रतीक है। एक खास और प्रतीकात्मक चरित्र अंग्रेेजी पत्रकार नीली लट वाली आर. विजयन का भी है जो समाज के उदासीन और विश्लेषणात्मक पक्ष को दर्शाते हैं।
कहानी में संवादों की भाषा हिंग्लिश है जो महानगरीय और डिजिटल जीवन को प्रतिबिंबित करती है। भाषा का यह मिश्रण समकालीन युवाओं की बहुभाषिकता को दर्शाता है। कहानी संवाद शैली में अधिक कही गई है जो पात्रों के भावों और संघर्ष को जीवंत बनाता है। तातुषी के आंतरिक संवाद भावनात्मक गहराई लाते हैं जबकि नूर का हास्यबोध कथा को मूड को हल्का करता है। कहानी की संरचना रैखिक है जिसे आंतरिक संवादों और फ्लैशबैक (तातुषी का बचपन, ड्राइविंग सीखना) के माध्यम से जोड़ी गई है। पांच खंडों में विभाजित यह कहानी तातुषी की आजादी फिर हताशा और पुनरुत्थान को दर्शाती है। यह तकनीक से उत्पन्न आसन्न खतरे मसलन, गिग अर्थव्यवस्था, महिला सशक्तिकरण और आर्थिक असुरक्षा के जटिल अंतर्विरोधों को व्यक्त करती है। यह कहानी सरकारी तौर तरीकों की पोल खोलती है और जंतर मंतर पर प्रदर्शनों को व्यवस्था द्वारा बेमानी साबित करती है। सूर्यांश गोयल का भागना पूंजीवादी शोषण का प्रतीक है जबकि सरकार की उदासीनता जनता की असहायता को दर्शाती है। सूर्यांश गोयल भारत में पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक गडबडी और नुकसान कर विदेश भागे हुए लोगों प्रतीक है। यह महिला ड्राइवरों की वह कहानी है जिसमें नूर का घरेलू हिंसा से भाग कर आत्मनिर्भर होना और तातुषी का शुभम के साथ रिश्ता लैंगिक स्वतंत्रता और सामाजिक बंधनों के टकराव को उजागर करती है। प्रदर्शन में कम भीड़ और पत्रकारों की सीमित रुचि समाज की उदासीनता को दिखाती है। इस कहानी के माध्यम से अंजली देशपांडे ने ‘गिग अर्थव्यवस्था’ और महिला ड्राइवरों के संघर्ष को प्रभावी ढंग से उकेरा है जो पाठक को भावनात्मक और बौद्धिक स्तर पर प्रभावित करती है।
कहानी ‘दोराहा’ का अंत तातुषी द्वारा नूर से बालों को हाईलाइट करने और बीयर पीने का प्रस्ताव कथा को हल्का बनाता है क्योंकि बेरोजगार हो जाने की स्थिति के बाद इस तरह ‘चिल’ कर सकना सहज जीवन में इतना आसान नहीं है। कहानी में पत्रकारों का चित्रण कुछ सतही है और शुभम का किरदार अधूरा प्रतीत होता है। फिर भी यह कथा तकनीकी युग में रोजगार असुरक्षा और संघर्ष के कटु यथार्थ से परिचय कराती है और भविष्य में रोजगार के स्वरूप और अस्थाईत्व के प्रति चिंता करने को बाध्य करती है।
![]() |
| धनेश दत्त पाण्डेय |
धनेश दत्त पांडेय
कहानी अंक के इस खंड की अगली कहानी ‘जंगल राज’ एक अत्यंत मार्मिक कहानी है जो नेपाल से भारत आये बेहद गरीब परिवार के जंगल मे जीवन संघर्ष को वास्तविक रूप में जाहिर कर पाती है। यह लिखा है, वरिष्ठ कथाकार धनेश दत्त पाण्डेय ने। धनेश दत्त देशज परिवेश की जटिल सामाजिक आर्थिक संरचना में मनुष्य की जिजीविषा और अक्सर हार जाने के यथार्थ की कहानी कहते हैं। इस संसार में हाशिये पर जी रहे तमाम लोगों की स्थानीयता को अपनी भाषा और चित्र में वास्तविक रूप में प्रस्तुत कर सकने में वे समाकालीन कहानीकारों में अग्रणी है। प्रस्तुत कहानी ‘जंगल राग’ उनकी लेखन शैली और चिंतन का एक अच्छा उदाहरण है।
कहानी एक नेपाली परिवार के परदेस (उत्तराखंड) जाने की उम्मीद और वहाँ की कठिनाइयों से लडते हुये बिला जाने के इर्द-गिर्द बुना गया है। इस कहानी का कथावाचक जो कि एक बच्चा है, उसके माध्यम से गरीबी, आशा और विनाश की यात्रा को दर्शाती है। इसमें बाबू अपनी पत्नी माई और बच्चों के साथ बेहतर जीवन की तलाश में नेपाल से सुनरकोट पहुँचते हैं जहाँ जंगल-आधारित आजीविका (पिरूल और लासा बटोरना) पर निर्भरता उनकी नियति बन जाती है। जंगल में आग की बार-बार लगने वाली घटनाएँ होती रहती हैं और पेट भर सकने के कठोर संघर्ष से जूझते एक दिन और एक भीषण अग्निकांड में उस बच्चे के माई-बाबू की मृत्यु हो जाती है। कहानी के अंत में प्रस्तुत प्रतीकात्मकता बहुत गहरी और हृदय विदारक है जिसमें अपने तिल तिल कर जिये, कमाये और जलकर प्राण दिये माता-पिता को माटी की गलती मूरतों के सामने बच गया बच्चा याद करता है।
कहानी में अनेक पात्र हैं जिनमें कथावाचक (बच्चा) कथा का केंद्रीय पात्र है और जिसकी नजर से घटनाएँ देखी जाती हैं। बच्चे की मासूमियत, माता-पिता के प्रति प्रेम और विस्मय (जंगल की आग, दीदी जी) उसे जीवंत बनाते हैं। उसका पिता बाबू एक मेहनती लेकिन हताश व्यक्ति है जो परदेस में सपनों के बावजूद असफलता का शिकार होता है। इसी तरह माई एक मजबूत नारी है जो पारिवारिक जिम्मेदारियों और जंगल की कठिनाइयों के बीच संतुलन बनाती है। यह दोनों ‘गोदान’ के होरी और धनिया की याद दिलाते हैं। कहानी के पुजारा काका और गजेंदर पाठक का चरित्र समाज के अवसरवादी और नेतृत्वकारी पक्ष को दर्शाते हैं। वे व्यवस्था में संगठित भ्रष्टाचार के जीवंत चरित्र हैं जो सामाजिक - आर्थिक भेदभाव को बनाये रखे रहने वाले कालजयी चरित्र हैं। ‘जंगल राग’ में पात्र यथार्थवादी है खासकर गरीब परिवारों की जीवनचर्या को दर्शाने में, लेकिन दीदीजी जैसे कुछ पात्र अधूरे रह जाते हैं।
कहानी की भाषा नेपाली-हिंदी का मिश्रण है, जो प्रवासी जीवन और पहाड़ी संस्कृति को जीवंत बनाती है, जैसे, ‘सुरुवाल’, ‘पिरूल’, ‘देसिया-मधेशिया’ आदि। कहानी की यह शब्दावली और भाषा कथा में अनुभूति की प्रामाणिकता को स्थापित करती है। कहानी की शैली में वर्णनात्मक है और संवादों में संतुलन है जो पात्रों के भावों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करता है। कहानी में जंगल श्मशान, आग, विनाश और मूर्तियाँ क्षणभंगुरता का प्रतीक हैं जो अंत आते तक हतोत्साहित करते हैं। विडंबना है कि यह समाज का यथार्थ है।
यह कहानी पाँच खंडों में विभाजित है जिसकी संरचना रैखिक है लेकिन फ्लैशबैक (नेपाल छोड़ने का दृश्य) और प्रतीकात्मक अंत कथा को गहराई देते हैं। कथा प्रवास की पीड़ा और गरीबी के चक्र को रेखांकित करती है। सरकार और ठेकेदार (बकौनी) का शोषण, रेट में मामूली बढ़ोतरी और बच्चों का बाग में रखना सामाजिक अन्याय को दर्शाता है। जंगल में आग की घटनाएँ प्रकृति के दोहन और वन विभाग की लापरवाही का परिणाम हैं, जो स्थानीय लोगों पर थोपी जाती हैं। महिला शोषण (माई की राख से भरी देह) और बच्चों की शिक्षा का अभाव (शाला की अनियमितता) गरीबी के व्यापक प्रभाव को दिखाते हैं। यह कथा प्रवासी संकट और पर्यावरणीय संकट से मेल खाती है और संसार में लगातार विभिन्न स्थानों से अपने वास्तविक उदाहरणों में दिखाई देती है जो आज भी प्रासंगिक है। कहानी अपने मध्यांतर तक का विवरण के कारण लम्बी लगने लगती है पर वहीं से कहानी अपने क्लाइमेक्स की ओर उठती है। यह कहानी प्रवास, बेरोजगारी, शोषण और पारिवारिक विखंडन की मार्मिक गवाही देती एक संवेदनशील और प्रभावी कथा है। कहानीकार धनेश दत्त पाण्डेय ने प्रवासी जीवन और पहाडी जंगल की त्रासदी को कुशलता से उकेरा है जो भावनात्मक और सामाजिक स्तर पर बहुत गहरे प्रभावित करती है। प्रसंगवश पहाड के जंगल की त्रासदी को इसी मार्मिकता से मंगलेश डबराल की कविता ‘पहाड पर लालटेन’ में समानान्तर देखा जा सकता है -
जंगल में औरतें हैं
लकड़ियों के गट्ठर के नीचे बेहोश
जंगल में बच्चे हैं
असमय दफ़नाए जाते हए
जंगल में नंगे पैर चलते बूढ़े हैं
डरते-खाँसते अंत में ग़ायब हो जाते हुए
जंगल में लगातार कुल्हाड़ियाँ चल रही हैं
जंगल में सोया है रक्त
देखो भूख से बाढ़ से महामारी से मरे हुए
सारे लोग उभर आए हैं चट्टानों से
दोनों हाथों से बेशुमार बर्फ़ झाड़कर
अपनी भूख को देखो
जो एक मुस्तैद पंजे में बदल रही है
जंगल से लगातार एक दहाड़ आ रही है
और इच्छाएँ दाँत पैने कर रही हैं
पत्थरों पर।
इस कहानी का शीर्षक ‘जंगल राग’ सुनने में रोमांटिक लगता है पर यह भयावह सत्य को जाहिर करनेवाली दारुण कथा है। इंसान का श्रमिक जीवन कितना दुधर्ष है यह कहानी अतियथार्थ के साथ जाहिर करती है। आज जंगल में जानवरों से अधिक खतरनाक मनुष्य निर्मित संगठित भ्रष्टाचार और कार्पोरेटी विकास है जो इंसानों का रोजगार के माध्यम से शोषण करता है और एक दिन निगल लेता है। इस कहानी से उपजी हताशा में डूबते - उतरते ईरान के एक मजदूर सबीर हका की एक कविता ‘शहतूत’ सहज ही याद आती है -
क्या आपने कभी शहतूत देखा है
जहाँ गिरता है, उतनी जमीन पर
उसके लाल रस का धब्बा पड जाता है
मैंने कितने मजदूरों को देखा है
इमारतों से गिरते हुए
गिर कर शहतूत बन जाते हुए!
![]() |
| समीना खान |
समीना खान
सरोकार खंड की अगली कहानी है, ‘पर्ची पर्चा पुलंदा’ जिसे समीना खान ने लिखा है। यह कहानी मुस्लिम परिवेश में रुखसाना के जीवन संघर्षों को विस्तार से बताती एक स्त्री के संघर्ष की कहानी है। लखनऊ की एक बस्ती में रहने वाली रुखसाना अपने पति राजा बाबू की नशे और बेरोजगारी की आदतों से जूझती है जबकि सास-ससुर का सहारा उसे स्थिरता देता है। सास की मृत्यु के बाद वह घर और बच्चों की जिम्मेदारी अकेले संभालती है और घरेलू कामों से लेकर बच्चों की पढ़ाई तक के लिए मेहनत करती है। कथा में एक मोड़ तब आता है जब राजा बाबू राशन दुकान पर नौकरी पाता है लेकिन भ्रष्टाचार में लिप्त होकर रुखसाना को फिर मुश्किलों में डाल देता है। अंत में, ग्रीन बेल्ट में आने के कारण मकान की नोटिस और उसके पति के द्वारा भ्रष्टाचार के द्वारा जमा की गई राशन की बरामदगी रुखसाना को फिर से हिम्मत जुटाने को मजबूर करती है।
कहानी के पात्रों में रुखसाना कथा का केंद्र है, जिसका चित्रण बहुआयामी है। उसकी फुर्ती, जबान की चतुराई, और विपरीत परिस्थितियों में हिम्मत उसकी ताकत है जबकि छुई-मुई भावनाएँ उसे मानवीय बनाती हैं। रुखसाना बहुत मेहनतकश है जो घरेलू काम से लेकर मुकेश डालने में सिद्धहस्त है। यह चरित्र समाज की ज्यादातर महिलाओं का प्रतिनिधित्व करता है। कहानी का दूसरा चरित्र उसका पति राजा बाबू एक लापरवाह और जटिल पात्र है जो नशे और भ्रष्टाचार में फँसकर परिवार को नुकसान पहुँचाता है। इसी तरह रुखसाना की सास (फूफी) एक मजबूत महिला है जिसकी बेकरी में मेहनत और पारिवारिक समर्पण रुखसाना को प्रेरणा देती है। सितारन चची, आमना और जुबैदा सहायक पात्र हैं जो रुखसाना को भावनात्मक और व्यावहारिक सहारा देते हैं। सभी पात्र यथार्थवादी हैं खासकर शहरी गरीब जीवन और लैंगिक भूमिकाओं को दर्शाने में लेकिन कुछ पात्र जैसे हाजी सत्तार अधूरे रह जाते हैं।
कहानी की भाषा अवधी-हिंदी है जो लखनऊ के शहरी गरीबों की बोलचाल को जीवंत बनाता है। भाषा में यह मिश्रण रुखसाना की बहुभाषिकता और क्षेत्रीय पहचान को दर्शाता है। शैली में संवादों का बोलबाला है जो रुखसाना की चंचलता और भावनाओं को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करता है। यह कथा शहरी गरीबों की आर्थिक असुरक्षा और लैंगिक असमानता को रेखांकित करती है। सरकारी कागजात (आधार कार्ड, राशन पर्चे) की अहमियत और उनकी हेराफेरी (राशन दुकान का भ्रष्टाचार) व्यवस्था की अव्यवस्था और सामाजिक अन्याय को दर्शाती है। रुखसाना को मिला ग्रीन बेल्ट का नोटिस और मकान की अनिश्चितता शहरी विकास के नाम पर गरीबों के विस्थापन को उजागर करती है। बच्चों की शिक्षा पर रुखसाना का जोर सामाजिक गतिशीलता की आकांक्षा को दिखाता है जो शिक्षा में पिछडे वर्गों के लिये जरूरी है। कहानी का शीर्षक ‘पर्ची पर्चा पुलिंदा’ सरकारी और भ्रष्ट व्यवस्था का वह प्रतीक है जिसमें रुखसाना जैसे मेहनतकशों का जीवन होम हो जाता है।
कथा की संरचना एक रेखीय है और अंत तक क्रम से चलती है। कहानी के अंत में नए मकान की अनिश्चितता पाठक को सोचने के लिए छोड़ देती है। यह कहानी अपनी लंबाई में कुछ अनावश्यक विस्तार लिए हुए है विशेषतौर पर आरंभ में ही रुखसाना का चरित्र चित्रण आवश्यकता से अधिक हो गया है। उसके बाद उसकी सास का चित्रण भी चरित्र के लिहाज से अधिक विस्तृत कर दिया गया है। इस विस्तार के कारण पाठक इन दोनों के चरित्र चित्रण को स्किप कर सकता है। यह कहानी अपने मध्यांतर के बाद सकारात्मक मोड़ ले पाती है पर उसका अंत फिर उसी अनिश्चितता में पाठक को धकेल देता है।
हिन्दी में साधारण मुस्लिम परिवेश पर कहानियों और उपन्यासों का क्रम गुलशेर अहमद ‘शानी’ के बाद लम्बे समय तक थमा हुआ था जिसे समकालीन साहित्यकार अनवर सुहैल ने बेहतर मकाम तक पहुँचाया है। प्रसंगवश हाल ही में उधर कन्नड में बानू मुमताज को बुकर पुरस्कार मिला है जिनकी कहानियों का कथानक और परिवेश भी आम मुस्लिम जीवन का है। समीना खान की यह कहानी भी उसी क्रम का हिस्सा है जिसे उन्होंने इस कहानी में बेहतर दर्ज किया है। निष्कर्षतः ‘पर्ची पर्चा पुलिंदा’ रुखसाना के माध्यम से शहरी गरीब महिला के संघर्ष और संकल्प को दर्शाती है। समीना खान ने इस कहानी के माध्यम से समाज में लैंगिक असमानता, सरकारी भ्रष्टाचार और शहरी विस्थापन को कुशलता से उकेरने में सफल हुई हैं।
![]() |
| ममता शर्मा |
ममता शर्मा
‘बया’ के इस कहानी विशेषांक के जीवन सरोकार खण्ड की आठवीं कहानी है, ‘दुलारी बाबा और हाथी’। यह कहानी लिखी है, ममता शर्मा ने। यह कहानी कॉलेज की शिक्षिका और कॉलेज कैन्टीन की सहायिका ‘दुलारी बाबा’ के बीच संवाद और परिचय की है जहाँ कहानीकार और दुलारी बाबा के बीच एक अप्रत्याशित दोस्ती पनपती है। गर्मियों की छुट्टियों में कैंटीन की शांति में, कथावाचक दुलारी बाबा से उसके जीवन के बारे में जानने की कोशिश करती है। दुलारी बाबा का अतीत, पैर पर पत्थर गिरने से हुई अक्षमता, विवाह न होना, और गाँव बिलसिरिंग छोड़ना, धीरे-धीरे सामने आता है। हाथी के गाँव में उत्पात मचाने की घटनाएँ उसकी जिंदगी का हिस्सा रही हैं और वह हाथियों को लेकर आम ग्रामीणों की तरह अनुकूलित हो गई है अर्थात उसे हाथी से भय नहीं लगता। पर कहानी एक बडा संदेश आखिर में दे जाती है कि अब दुलारी बाबा को शहर से लगे गाँव जाने में उसे डर लगने लगता है क्योंकि इस बार हाथी नहीं, आदमी राह रोक लेते हैं। मनुष्य और वन्य पशु में कितना अंतर है, पाठक यहां पर ठहर कर विचार करने लगता है। यह विचार करते वरिष्ठ कवि विनोद कुमार शुक्ल की कविता ‘बाजार का दिन है’ की यह पंक्तियां सहज ही याद आती हैं -
एक अकेली आदिवासी लड़की को
घने जंगल जाते हुए डर नहीं लगता
बाघ शेर से डर नहीं लगता
पर महुआ लेकर
गीदम के बाजार जाने से डर लगता है।
यह पंक्तियाँ मनुष्य के डर की सापेक्षता को दर्शाती है जहां स्त्री को प्राकृतिक वातावरण से ज्यादा सामाजिक और आर्थिक चिंताओं से डर लगता है, भले ही प्रकृति में खतरनाक जंगली जानवर मौजूद हों। ‘दुलारी बाबा और हाथी’ कहानी भी अपने अंत में इसी डर को जाहिर करती है।
कहानीकार इस कथा के केंद्र में है जिसकी जिज्ञासा और संवेदनशीलता उसे दुलारी बाबा के करीब लाती है। उसका चरित्र बौद्धिकता और सहानुभूति का मिश्रण है, जो दुलारी बाबा की कहानियों को संजोने की इच्छा रखता है। वहीं दुलारी बाबा एक जटिल पात्र है जिसका सपाट चेहरा और निर्विकार भावनाएँ उसके भीतर के दुख और दृढ़ता को छिपाते हैं। उसका अतीत (पैर की चोट और गाँव छोड़ना) और वर्तमान (भतीजों की देखभाल, चाय बनाना) उसे एक मजबूत लेकिन असहाय व्यक्तित्व बनाते हैं। भतीजे, जो होम्योपैथी सीख रहे हैं, दुलारी बाबा की आशा के प्रतीक हैं। कहानी में सामाजिक असमानता और ग्रामीण-शहरी जीवन के टकराव को दर्शाने में पात्र-चित्रण यथार्थवादी रूप में प्रस्तुत हुये हैं।
कहानी की भाषा सरल है जो झारखंड के ग्रामीण और शहरी संदर्भों को व्यक्त करती है। शैली में वर्णनात्मकता और संवादों का संतुलन है जो दुलारी बाबा की निर्विकारता और कथावाचक की जिज्ञासा को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करता है। कथावाचक के द्वारा दुलारी बाबा से संवाद, उससे परिचय की जिज्ञासा और उसका चित्रण महादेवी वर्मा के रेखाचित्रांे की याद दिलाती हैं। दुलारी बाबा का गाँव छोड़ना, जिसमें शिक्षा और सुविधाओं की कमी और हाथी का खतरा कारण हैं, शहरी पलायन की सच्चाई को दर्शाता है। उसकी मामूली आय और भतीजों की परवरिश के लिए निर्भरता गरीबी के चक्र को उजागर करती है। रात में अजनबियों का भय शहरी असुरक्षा को दिखाते हैं जो ग्रामीण जीवन के हाथी के खतरे से अलग लेकिन समान रूप से प्रभावी है। ‘दुलारी बाबा और हाथी’ यथार्थवाद और प्रतीकात्मकता का मिश्रण है।
कहानी एक सीध में चलती है पर बीच बीच में कहानीकार के विचारों और दुलारी बाबा की यादों के फ्लैशबैक भी आते रहते हैं। यह कहानी पाठक को जहाँ आरंभ में अपने नाम ‘दुलारी बाबा’ के कारण आकर्षित करती है वहीं इस नाम को स्त्री पात्र के रूप में अनुकूलित करने में कुछ देर लगाती है। इसी तरह दुलारी बाबा के बारे में परिचय कुछ विस्तृत हो गया है, इस विस्तार को कॉम्पेक्ट किया जा सकता था। कहानी केेेेेेेे अंत में दुलारी बाबा चाय बनाकर कथावाचक को भरोसा दिलाती है। यह दृश्य आशावाद और संबंधों की स्थिरता का संकेत देता है, हालांकि यह थोड़ा अधूरा लगता है। भाषा में स्थानीयता के साथ भतीजों का विवरण भी कुछ अस्पष्टता लिये हुए है। इसके अलावा कहानी में अन्य पात्रों (कॉलेज स्टाफ) की अनुपस्थिति कथा को सीमित करती है।
![]() |
| सुमन शेखर |
सुमन शेखर
‘मुस्की भाई’ इस खण्ड की आखिरी कहानी है जो युवा कथाकार सुमन शेखर ने लिखी है। सहज ही ध्यान खींचने वाले इस शीर्षक की कहानी अपने कहन में रहस्यमयी होने के साथ व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक जटिलता को भी जाहिर करती है। कहानी में मुस्की एक युवा है जो एक नये शहर में आता है और एक कमरा किराए पर लेता है। वह जल्दी ही अपनी मुस्कान और मिलनसारिता से लोगों का ध्यान आकर्षित करता है। निरुद्देश्य जीवन जीने वाले मुस्की भाई की दिनचर्या आम जीवन के विपरीत रहती है। उसे समंदर किनारे भटकना और दोस्तों के साथ चाय की दुकानों पर समय बिताना पसंद है। इस कथा में एक रहस्यमय पात्र है मुस्की का कटा हुआ बायाँ हाथ जो उसके साथ अलग से चलता है। वास्तव में यह हाथ उसकी नाकामयाबी और डर का प्रतीक है। हाथ मुस्की से शिकायत करता है कि वह अपने सपनों को साकार करने में असफल रहा और केवल दूसरों को प्रभावित करने में लगा है। अंत में हाथ शहर छोड़ देता है और मुस्की अपने सपनों में खोया हुआ अकेला रह जाता है।
कथा का मुख्य पात्र मुस्की है जिसका व्यक्तित्व विरोधाभासी है- मुस्कुराता हुआ, मिलनसार लेकिन भीतर से डरपोक और सपनों में खोया हुआ। उसकी मुस्कान एक ढाल है जो उसके असफल जीवन को छिपाती है। इस कहानी का रोचक चरित्र है मुस्की का बायाँ हाथ जो मुस्की की नाकामयाबी, अपराधबोध, और आत्म-विश्लेषण का प्रतीकात्मक रूप में प्रतिनिधित्व करता है। यह दरअसल एक शानदार रूपक पेश करता है। दूसरा पात्र शिवधर है जो उसका मकान मालिक है। वह एक यथार्थवादी पात्र है जो मुस्की के जीवन को कथा में जाहिर करता है और उसके रहस्य को जानता है। नए दोस्तों में डिम्पल वाली महिला और शांत दोस्त मुस्की के आसपास के लोग हैं जो उसके प्रशंसक हैं। कहानी के पात्र गहरे और प्रतीकात्मक हैं।
कहानी की भाषा बोलचाल की हिंदी में है जो स्थानीय रंग और शहरी जीवन की जीवंतता को दर्शाती है। शैली में संवादों का बोलबाला है जो मुस्की की मुस्कान और हाथ की सिसकी को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करता है। इस कहानी की सबसे विशेषता है, प्रतीकात्मकता जो मुस्की के कटे हाथ के रूप में कहानी में एक जीवंत पात्र की तरह उपस्थित है। यह कटा हाथ उसकी अधूरी महत्वाकांक्षाओं का प्रतीक है। कहानी में यह रूपक विक्रम और वेताल में वेताल के द्वारा प्रश्न पूछे जाने की याद दिलाता है। कथा शहरी जीवन की अस्थिरता और सामाजिक गतिशीलता की जटिलताओं को रेखांकित करती है। मुस्की का शहर में आना और किराए का कमरा लेना प्रवासी जीवन की कठिनाइयों को दर्शाता है। उसकी बेरोजगारी और दोस्तों पर निर्भरता आर्थिक असुरक्षा को उजागर करती है। मुस्की की मुस्कान और प्रभावशाली बातें शहरी जीवन में दिखावे की संस्कृति को प्रतिबिंबित करती हैं। हाथ का अलग होना मानसिक असुरक्षा और आत्म-संदेह का प्रतीक है जो आधुनिक जीवन की तेजी और उद्देश्यहीनता से मेल खाता है। पात्रों के भीतर के द्वंद्व केंद्रीय हैं लेकिन शेखर ने इसे शहरी संदर्भ और प्रतीकात्मकता से जोड़ा है। यह कथा शहर में एक अनजान व्यक्ति के जीवन, उसके सपनों, और उसके भीतर के डर की पड़ताल करती है।
कथा की संरचना रैखिक है, लेकिन फ्लैशबैक (हाथ की सिसकी, पुराने नोट्स) और प्रतीकात्मक दृश्य (समंदर, रेत) इसे गहराई देते हैं। कहानी के अंत की अस्पष्टता पाठक को चिंतन के लिए छोड़ देती है। कहानी केे अंत की अस्पष्टता और मुस्की के अतीत का अभाव कथा को संतुलित निष्कर्ष से वंचित रखते हैं। भाषा में स्थानीयता के साथ कुछ असंगतियाँ (हाथ की सिसकी) पाठक को भ्रमित कर सकती हैं। हालांकि, भाषा में कुछ पुनरावृत्तियाँ (मुस्कान, हाथ) और अस्पष्टता (हाथ की आवाज) कथा की सहजता को प्रभावित कर सकती हैं। कहानी में मुस्की भाई के कुछ पात्र (दोस्त) सतही रह जाते हैं। फिर भी, यह कथा शहरी जीवन की खोखलीपन और मानवीय संघर्ष की मार्मिक अभिव्यक्ति है। सुमन शेखर ने मानसिक असुरक्षा, दिखावे, और सपनों के टूटने को कुशलता से उकेरा है, जो पाठक को भावनात्मक और बौद्धिक स्तर पर प्रभावित करती है। यह कथा आधुनिक हिंदी कहानी में अपने विशेष रूपक के कारण एक अनूठा हस्तक्षेप है।
‘बया’ के इस कहानी विशेषांक की यह तमाम कहानियाँ प्रासंगिक हैं जिनमें हम देख पाते हैं कि छीजती जाती संवेदना के इस स्वर्णकाल में हर उपाय की परिणति प्रबल जीवटता और संघर्ष के बावजूद हार में बदल जाती है। विडंबना है कि जीवन की यह असफलता इस समय का यथार्थ है और यह कहानियाँ स्पष्ट संकेत देती हैं कि भविष्य भी इसी तरह का होगा। इन कहानियों में यह हार ‘अवसर’, जंगल राग’, और ‘पर्ची पर्चा पुलंदा’ जैसी कहानियों में जिनमें जीवन अपने कठोर यथार्थ के साथ बुनियादी आवश्यकताओं से भी वंचित है, देख सकते हैं। इससे इतर ‘कुत्ता नॉनवेजटेरियन था’ और ‘मुस्की भाई’ कहानियों में भौतिक जीवन सरल होेने के बावजूद नैतिक हार को जाहिर करता है। जीवन सरोकारों की इन कहानियों में व्यवस्था की नीतियों के कारण तबाह होती जिन्दगी से सम्बन्धित कहानियों में ‘दोराहा’ और कोविड 19 के कुप्रबंधन को ले कर व्यवस्था को आडे लेने वाली कहानी ‘अवसर’ का चयन महत्वपूर्ण है। यह कहानियाँ जीवन सरोकार की कहानियों के लिहाज से चयनित की गई हैं जिनमें जीवन की कथा निराशा, टूटन, कायरता, जानलेवा संघर्ष, भय और सामाजिक-आर्थिक पराजय के रूप में नजर आती है। यह इस समय की प्रतिनिधि कहानियाँ हैं ऐसे में क्या यह मान लेना चाहिये कि उम्मीद और सुखांत का जीवन अब समाप्त हो गया है? यदि ऐसा है तो मनुष्य और प्रकृति बेहद गहरे संकट में प्रवेश कर चुके हैं जिन्हें यह कहानियाँ आगत संकट की पूर्व पीठिका के रूप में दर्ज कर रही हैं।
लेखक परिचय :
पीयूष कुमार
बागबाहरा (छत्तीसगढ़) में रहते हैं. कविता, आलोचना, सिनेमा, लोक संस्कृति और साहित्य पर लिखने के अलावा फोटोग्राफी में रूचि रखते हैं. अभी छत्तीसगढ़ के शासकीय महाविद्यालय में हिंदी के सहायक प्राध्यापक हैं।
संपर्क
मोबाइल : 8839072306










टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें