स्वप्निल श्रीवास्तव का आलेख 'मादक और इठलाती हुई आवाज का जादू'


आशा भोंसले 


आशा भोंसले के बिना हिन्दी फिल्मी गीतों की कोई भी कहानी अधूरी रहेगी। हालांकि आशा का जन्म संगीतकारों के परिवार में ही हुआ था। वे हृदय नाथ मंगेशकर की पुत्री थीं। लता मंगेशकर उनकी बड़ी बहन थीं लेकिन संगीत की दुनिया में पाँव जमाने के लिए उन्हें कड़ा संघर्ष करना पड़ा। अपने जीवन की राह खुद चुनने की कीमत उन्हें चुकानी पड़ी और इसी क्रम में लता मंगेशकर से गायन के लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ा। दो शादियां की। और ओ पी नैय्यर के साथ लिविंग रिलेशन में रहीं, हालांकि उनसे शादी नहीं की। ओ पी नैय्यर ने आशा भोंसले के गायन को एक नया आयाम प्रदान किया। इस क्रम में उन्होंने अपनी फिल्मों में लता मंगेशकर से कभी गाना नहीं गवाया। आशा भोंसले ने शास्त्रीय गीतों के साथ साथ पॉप, कैबरे जैसे तेज संगीत भी सिद्धहस्तता के साथ गाए। स्वप्निल श्रीवास्तव अपने आलेख में लिखते हैं 'आशा भोंसले और ओ. पी. नैयर ने हिन्दी सिनेमा के दर्शकों को एक नये रस से परिचय कराया, जिसमें नटखटपन और मादकता साथ–साथ थी। इस तरह के गाने में एक नशा जैसा था। नौजवान दर्शक इस तरह के गीतों के आशिक थे। मेरे सनम का गीत याद करे – ये है रेशमी जुल्फों का अंधेरा चले आइए/ जहां तक महक है मेरे गेसुओं की चले आइए। आशा भोसले की आवाज खिलंदड़ हीरोइनों पर खूब जमती थी जैसे मधुबाला, हेलन और जीनत अमान, इस गीत को वह जीवंत कर देती थी। इसी तरह – बरेली के बाजार में झुमका गिरा रे (हमसाया) गीत ने अपने जमाने में धूम मचा दी थी। इस तरह यह महसूस किया जाने लगा था कि इस तरह के चुनौतीपूर्ण गीत आशा भोंसले ही गा सकती हैं।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं स्वप्निल श्रीवास्तव का आलेख 'मादक और इठलाती हुई आवाज का जादू'।


'मादक और इठलाती हुई आवाज का जादू' 

    

स्वप्निल श्रीवास्तव 



आशा भोंसले की आवाज में एक बगावत है।उनकी बड़ी बहन जहां शास्त्रीयता की लीक पर चलती है, वहाँ आशा भोंसले कभी कभी संगीत के नियमों का अतिक्रमण कर जाती हैं। अपने  इस अतिक्रमण से वे अपने गायन से विशिष्ट बना देती हैं, पुरूष गायकों में यह काम किशोर कुमार भी करते हैं। फिल्मी संसार में इस दोनों गायकों का अंदाज ए बयां अलग है। लता की आवाज में एक तीक्ष्णता है, उनका तीर कलेजे को सीधे  लगता है, उनकी आवाज महीन है जब कि आशा भोंसले की आवाज कलेजे को फुलगेंदवा की तरह लगती है। आशा की आवाज उन्मुक्त है, उसमें  खिलदड़पन है। इसलिए उनके उदासी के गीत हमें पसंद नही आते। बगावत उनके जीवन का मुख्य भाव है, उन्होंने सोलह साल की बाली  उम्र  में लता मँगेशकर के सचिव गणपत राव से विवाह करके यह सिद्ध कर दिया था। गणपत राव भोसले उनसे पंद्रह साल बड़े थे। जाहिर है  उनके इस कारनामे से लता बहुत विचलित हुई थी और एक पारिवारिक संकट शुरू हो गया था, उसकी छाया उनके भीतर बनी रही। उन्होंने तीन बच्चों, हेमंत, आनंद और वर्षा को जन्म दिया। यह रिश्ता बहुत दिनों तक नही चला, दोनों एक दूसरे से अलग हो गए। बड़ी बहन लता के विरोध के बावजूद वे इस रिश्ते में बंधी थी। इस अलगाव के बाद उन्हें।अपना परिवार चलाने के लिये जीवन–संघर्ष में उतरना पड़ा। उनके पास गायन का हुनर था जिससे उनकी जिंदगी को गति मिली। 

   

संगीत की दुनिया में स्थापित होने के लिए लता–बहनों को काफी संघर्ष करना पड़ा। उनके  पिता दीनानाथ मंगेशकर खुद संगीतकार थे, जब लता नौ वर्ष की थी, उनके पिता का निधन हो गया था। उस समय फिल्मों में सुरैया और  नूरजहां ने अपनी जगह बना ली थी। उनके बीच जद्दोजहद करते हुए स्थान बनाना कितना कठिन काम रहा होगा। आशा भोंसले के सामने मुबारक बेगम, गीता दत्त, सुमन कल्याणपुर, शारदा जैसी  गायिकाएं थी जिसके बीच से उन्हें अपनी राह बनानी थी। उनकी असली प्रतियोगिता अपनी  बड़ी बहन लता मंगेशकर से थी। जब कोई अपना ही प्रतिद्वंदी हो तब उसे फूँक फूँक कर रास्ता चलना पड़ता है। इसके लिए जरूरी था कि वे अपनी आवाज का उपयोग कैसे करें। लता और आशा के बीच कवि प्रदीप के लिखे गीत – ए मेरे वतन के लोगों को ले कर विवाद रहा हैं, बताया जाता था कि यह गीत आशा भोंसले को गाना था लेकिन यह अवसर लता ने छीन लिया था। सई परांजपे द्वारा निर्देशित फिल्म साज लता मंगेशकर और आशा भोंसले की की व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा पर ही आधारित है, जिसमें शबाना आजमी और अरुणा ईरानी की मुख्य भूमिका है। यह भी बताया जाता है कि कवि प्रदीप का लिखा भारत और चीन युद्ध पर लिखा गीत – 


ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आँख में भर लो पानी।

जो शहीद हुए है उनकी याद करो कुर्बानी।। 


इस गीत को सुन कर नेहरू जी रो पड़े थे। फिल्मी दुनिया में इस तरह के कई प्रकरण प्रचलित हैं। इसे गुरूदत्त–गीता दत्त, अन्नपूर्णा–रविशंकर के रिश्तों में देखा जा सकता है अमिताभ बच्चन–जया भादुडी की फिल्म  'अभिमान' इसका उदाहरण है। प्रतियोगिता की रेखाएं इतनी अदृश्य होती है कि उसे खुली आँख से नहीं देखा जा सकता। महत्वाकांक्षाएं व्यक्ति को हिंसक बना देती हैं। फिल्म 'हमराज' की हीरोइन विमी के हश्र से हम सभी लोग परिचित हैं। परिवार के विरोध के बावजूद उन्होंने फिल्म में काम किया लेकिन एक दो फिल्मों के बाद उनका जादू नहीं चला। परिवार ने उसके बाद उन्हें स्वीकार नहीं किया और अनाम मौत मरी। अपने कैरियर में कौन किसको धोखा देता है, उसका पता अंत में मिलता है। दूर के नहीं नजदीक के संबंध इस राह में व्यवधान नही बनते हैं।


ओ पी नैय्यर 

   

आशा भोंसले के जीवन का श्रेष्ठ समय उस समय आया जब उन्हें संगीतकार ओ. पी. नैयर का सान्निध्य मिला। उनसे मिलने के बाद उनके गायन की भाषा बदल गयी। कुछ समय तक उन्हें लता मंगेशकर के त्याज्य गीत गाने को मिलते थे। यह जूठन उन्हें पसंद नहीं थी लेकिन जीवनयापन के लिए यह करना ही था। जीवन की समस्याएं थीं, तीन बच्चों का पालन पोषण करना था। ओ. पी. नैय्यर पहले संगीतकार थे जिन्होंने आशा भोसले के गायन की रेंज को पहचाना। केवल ओ. पी. नैयर का संगीत ही नहीं उनकी संगत ने मिल कर नये सुर संगीत को जन्म दिया। ओ. पी. नैयर से उनका प्रेम सर्वविदित हो चुका था और गीतों मे उसकी शोखी और अलबेलापन दिखाई देने लग गया था। परंपरागत गायिकाएं शास्त्रीय संगीत की सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर पाती थी लेकिन आशा भोंसले ने इस रूढ़ि को तोड़ कर गीतों में अनगिनत प्रयोग किए। उनके गीतों में अद्भुत खिलंदड़ापन है जिसे सुन कर लगता था इसे कोई किशोर और अल्हड़ उम्र की गायिका गा रही हो। दुनिया के अनुभव हमें बताते हैं कि प्रेम से जीवन बदल जाता हैं। आशा अपने पहले  विवाह  से  टूट गयी थी और चार  बच्चों के पिता ओ. पी. नैयर अपने दाम्पत्य जीवन की सीमा–रेखा को लांघ रहे थे। आशा भोंसले के प्रति अपनी दीवानगी का इजहार ओ. पी. नैयर ने  एक पत्रकार के सामने करते हुए कहा था कि मेरा प्रेम अंधा ही नहीं बहरा भी था। क्योंकि आशा की आवाज के अलावा मैं किसी अन्य आवाज को नही सुन पाता था।

  

उस दौर में आशा भोंसले द्वारा गाए गए गीतों को सुन कर आप इस उन्मुक्तता को प्रमाणित कर सकते है- गालिब ने कहा है – 'शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक'। दोनों शमाएं 1958 से 1972 तक हर रंग में जलती रही। यह वह दौर था जब भारतीय सिनेमा में कैबरे का प्रवेश हो चुका था। कैबरे के गीत गाना हर एक गायिका का काम नहीं था। इस शून्य को आशा भोंसले ने भरा। हावड़ा ब्रिज का वह गीत याद करिए – आइए मेहरबा ..। इशारों इशारों में जां लेने वाले .. अभी न जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं। अच्छा जी मैं हारी जैसे गीत जिस दिल से गाये गये हैं, उसका कोई जबाब नहीं है। लता निःसंदेह उनसे बड़ी गायिका हैं लेकिन आयाम सीमित हैं। वे शोखी भरे गीत नहीं गा सकती। यह भी याद रखना चाहिए कि नैय्यर ने अपनी फिल्मों में लता से कोई गीत नहीं गवाया – उनका विकल्प आशा भोंसले बनी रही।

  

आशा भोंसले और ओ. पी. नैयर ने हिन्दी सिनेमा के दर्शकों को एक नये रस से परिचय कराया, जिसमें नटखटपन और मादकता साथ–साथ थी। इस तरह के गाने में एक नशा जैसा था। नौजवान दर्शक इस तरह के गीतों के आशिक थे। मेरे सनम का गीत याद करे – ये है रेशमी जुल्फों का अंधेरा चले आइए/ जहां तक महक है मेरे गेसुओं की चले आइए। आशा भोसले की आवाज खिलंदड़ हीरोइनों पर खूब जमती थी जैसे मधुबाला, हेलन और जीनत अमान, इस गीत को वह जीवंत कर देती थी। इसी तरह – बरेली के बाजार में झुमका गिरा रे (हमसाया) गीत ने अपने जमाने में धूम मचा दी थी। इस तरह यह महसूस किया जाने लगा था कि इस तरह के चुनौतीपूर्ण गीत आशा भोंसले ही गा सकती हैं। उनकी आवाज इस तरह के गीतों के लिए बनी है। गायन में इस तरह की उन्मुक्तता सिर्फ  संगीत से नही सोहबत से भी आती है। आशा की सबसे बड़ी खासियत थी कि वे जिस हीरोइन के लिए गाती थी, उससे अपनी आवाज मिला देती थी। प्राण जाए पर वचन न जाए के गीत – चैन से हमको कभी आपने जीने न दिया, नायिका रेखा पर फिल्माया गया है। यह गीत नहीं, कई लोगों की आत्मकथा है। इस गीत की अंतर्कथा पर आगे बात होगी।

  

उनकी गायन प्रतिभा को किसी सीमा में कैद नहीं किया जा सकता है। उनके गायन में विविधता थी –जो कम गायिकाओ के यहाँ पायी जाती है। उन्होंने संजीदा गीत भी गाये है –फिल्म उमराव जान अदा के लिये गाये हुए गीत इसके उदाहरण हैं – दिल क्या चीज है आप मेरी जान लीजिए या इन आँखों की मस्ती के दीवाने हजारों हैं। अक्सर इस तरह के गीतों के लिये लता मँगेशकर का चुनाव किया जाता था लेकिन मुजफ्फर अली ने आशा का चयन किया। रेखा पर आशा भोंसले का गीत एकदम सटीक लगता था। आशा भोंसले की विविधता की तुलना हरफनमौला किशोर कुमार से की जा सकती है। ये दोनों गायक गीत को अपनी अदा से विशिष्ट बना देते थे। वे गीत के पहले जो आलाप भरते थे, उससे गीत का सौन्दर्य बढ़ जाता था। जैसे छोड़ दो आचल जमाना क्या कहेगा (पेइंग गेस्ट) ओ मेरे राजा (जानी मेरा नाम), नहीं नहीं अभी नहीं, अभी करो इंतजार (जवानी दीवानी) नींद चुरा के आँखों से (शरीफ बदमाश) जैसी फिल्मों में यह बानगी देखी जा सकती है।


 ***

   

ओ. पी. नैयर के संगीत निर्देशन में आशा भोंसले की आवाज निखर रही थी। उन्होंने आशा भोंसले को गीत गायन का जो मार्ग दिखाया, उसकी धज ही अलग थी। वे दार्शनिक गीतों को दक्षता के साथ गाती थी, उसमें प्राण फूँक देती थीं। फिल्म् वक्त के इस गीत को याद करिए- 


आगे भी जाने ना तू, पीछे भी जाने ना तू।

जो भी है, बस यही एक पल है। 


इसके विपरीत उन्होंने हेलेन के कैबरे और डिस्को डांस के  लिए जो  गीत गाए है – पिया तू अब तो आ जा (कारवां), या ऐ हसीना जुल्फों वाली गीत को याद करिए। फिल्म हरे रामा हरे  कृष्णा में हिप्पी गीत – 'दम मारो दम, मिट  जाए गम' तो बेमिसाल था। इसी तरह फिल्म जानी मेरा नाम का  वह गीत – 'हुस्न का कौन सा रंग देखोगे' यह गीत पद्मा खन्ना पर फिल्माया गया था। वह कम मादक और उत्तेजक नहीं था। आशा भोंसले ने बेहतरीन दो गाने मुहम्मद रफी और किशोर कुमार के साथ गाए हैं। रफी जहां आशा मे बेवलेन्थ तक पहुँच जाते थे और खुले गले से गाते थे, वहीं प्रयोगवादी किशोर कुमार के साथ उनकी जोड़ी खूब जमती थी। फिल्म अंदाज का गीत – जिंदगी इस सफर है सुहाना/ यहाँ कल क्या हो किसने जाना में अजीब सी मस्ती है। किशोर कुमार जब राजेश खन्ना के लिए गाते थे तो उनकी आवाज के सुर मिल जाते थे। मुझे फिल्म इजाजत का यह गीत याद आ रहा है – मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है/सावन के कुछ भीगे भीगे दिन रखे है/ और मेरे इस खत में लिपटी रात पड़ी है/ वह रात बुझा दो/ मेरा वह समान लौटा दो।

  

यह फिल्म के लिए लिखा हुआ कोई परंपरागत गीत नहीं था बल्कि एक कविता थी। इसे आर. डी. बर्मन ने अपनी धुनों में बाधा था। यह विरह का गीत था जिसे आशा भोंसले ने दिल से गाया था। इसे गुलजार ने लिखा था जो राखी से विलग हो चुके थे। इसी तरह का दर्द प्राण जाए पर बचन न जाये का गीत – चैन से मुझको कभी आपने जीने न दिया। यह गीत एस एच बिहारी ने आशा भोसले के लिये लिखा था। यह गीत नहीं दर्द की इबारत थी – इस गीत को सुनने के बाद स्वाभाविक रूप से वे प्रेमी याद आते हैं जो अलगाव का दुख उठा रहे होते हैं।

    

वह इश्क क्या जिसका जादू न उतरे। इस रिश्ते में कहीं समाज बाधित होता है तो कही दो लोगों के बीच अंह की भूमिका दिखाई देती है। जिंदगी एक जैसी नही चलती। उसमे चढ़ाव–उतार आते रहते हैं। कोई हमेशा शीर्ष पर नही रहता। वहाँ से उतरना पड़ता है। शीर्ष पर पहुँचने के लिये बहुत संघर्ष करना पड़ता है। वह स्थायी जगह नहीं है। आशा भोंसले और ओ. पी. नय्यर का संग–साथ 1958 से 1972 तक था। यह आशा भोंसले के जीवन का स्वर्णकाल था। अलग होने का तर्क विशिष्ट नहीं होता –लोग मामूली वजह से भी अलग हो जाते हैं।  इतिहास बताता है कि अधूरे प्रेम ही अमर होते हैं वरना हम उन्हें कहां याद करते। धीरे–धीरे ओ. पी. नैयर के संगीत का जादू उतर रहा था। फिल्मी जीवन का संगीत बदल रहा था, उसमें शास्त्रीयता की कोई जगह नही रह गई थी। संगीत में मेलोडी नहीं शोर सुनाई देने लगा था। आशा भोंसले के साथ संबंध में रहने के कारण, वे अपने घर से बेघर हो गए थे और किसी मुरीद के यहाँ पेइंग गेस्ट की तरह रहे। आशा भोसले  ने एक अद्भुत गीत – 


चैन से हमको  कभी आपने जीने न दिया 

जहर जो चाहा पीना मगर पीने न दिया। 


यह गीत फिल्म प्राण जाए पर वचन न जाये, के लिये गाया गया था लेकिन इसे फिल्म में शामिल नहीं किया गया। यह गीत बहुत मकबूल हुआ, इस गीत में जो दर्द था, उसे लोगों ने शिद्दत के साथ महसूस किया। इस गीत पर फिल्मफेयर एवार्ड मिला लेकिन आशा उस सम्मान को लेने के लिए स्टेज पर नहीं आयी। उनकी गैरहाजिरी मे यह पुरस्कार संगीतकार ओ. पी. नैयर और एच एस बिहारी ने ग्रहण किया। इस घटना से नैयर इतने आहत हुए कि कार से यह ट्राफी बाहर फेंक दी। इस तरह नैयर और आशा के रिश्तों का त्रासद अंत हुआ। नैयर इस घटना के बाद अवसाद में चले गए, परिवार तो पहले ही छूट गया था, इसके साथ वह संगी भी छूट गया  जिसके लिए ओ. पी. नैय्यर ने परिवार को छोड़ा था – उसी ने परिवार के लिए उन्हें छोड़ दिया था। उन्होंने अपनी सारी संपत्ति छोड़ दी थी और थाणे के अपने एक फैन राणी नखवा के साथ रहे। ओ. पी. नैय्यर ने जिस शान और ग्लैमर के साथ जिंदगी जी थी, वह कायम नहीं रह गयी थी। वह सादा जीवन जीते रहे। वे अर्श से फर्श तक पहुँच चुके थे। फिल्मी दुनिया में इस तरह की दारुण कथाएं कम नहीं हैं। फिल्मी दुनिया ऐसी जगह है जहां भरोसे और आपसी संबंधों की बेहद कमी है। वहाँ न खुदा मिलता है न बिसाल–ए–यार की तलब पूरी होती है। नैयर ने गुमनामी का जीवन जीते हुए 28 जनवरी  2007 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया  और अपने पीछे प्रेम की अधूरी कथा छोड़ गए । प्रेम की यह दारूण कहानी सार्वजनिक हो चुकी है।


आर डी वर्मन 

    

आशा भोसले के  जीवन का दूसरा दौर तब शुरू हुआ जब उन्होंने 1980 में आर. डी. बर्मन से  विवाह कर लिया जो आशा भोंसले से छ: साल छोटे थे। उनका यह दाम्पत्य जीवन सुखद नहीं था। परिवार ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। आर डी बर्मन ने संगीत में अभिनव प्रयोग किए। उन्होंने पश्चिमी वाद्य यंत्रों को अपने संगीत में जगह दी और उसे भारतीय बनाया। आर. डी. बर्मन ने अपने पिता एस. डी. बर्मन से संगीत की शिक्षा ली थी लेकिन उन्होंने अपनी अलग राह बनाई। आर डी बर्मन ने जिन फिल्मों में  संगीत दिया, उसमें  आशा भोंसले अनिवार्य गायिका थी। फिल्मकार गुलजार आर डी बर्मन के प्रिय मित्र संगीतकार थे। वे टूटे हुए दिल के स्वामी थे और अपनी शायरी में अपने प्रेम के अतीत को जगह देते थे। उन्होंने फिल्म 'आंधी', 'मौसम' तथा 'इजाजत' फिल्म मे अद्भुत संगीत दिया है। आर डी बर्मन की मृत्यु 4 जनवरी 1994 को हुई। आशा भोसले नैय्यर के देहान्त से उन्नीस साल बाद इस दुनिया से रुखसत हुई। ये तीनों नायक इस दुनिया में नही हैं लेकिन उनके गीत–संगीत अमर हो गये हैं – इतिहास में उनका नाम दर्ज हो गया है। संगीत और कला के क्षेत्र में काम करने वाले लोग कोई आदर्श जीवन नहीं जीते, उनके जीवन में अंतर्विरोध और विडम्बनाएं होती हैं। उनका जीवन सरल रेखा की तरह नहीं होता। इसी के बीच वे जो भी रचते हैं, वह इस कायनात का हिस्सा बन जाता है।

  

12 अप्रैल 2026 आशा भोंसले के जीवन की आखिरी तारीख थी। उन्होंने 92 वर्ष का सक्रिय जीवन जिया और गीत संगीत की दुनिया को समृद्ध किया। वे अब हमारे बीच नहीं है लेकिन उनके गीतों की दुनिया हमारे पास है। उसमें हमारे जीवन के अनेक रंग दिखाई देते हैं। उनके गीतों में उनकी छवियाँ–प्रतिछवियाँ दिखाई देती हैं। गीतों के भीतर धुन नहीं जीवन की कहानियाँ छिपी रहती हैं। आजकल गीतों का मिजाज बदल चुका है। नयी पीढ़ी  के लोग फास्ट गीतों को पसंद करते हैं, लेकिन ये गीत कुछ दिनों तक चलते हैं और फिर खो जाते हैं। लेकिन आशा और लता जैसी सिद्ध गायिकाओं के गीत सदियों तक जीवित रहते हैं।


स्वप्निल श्रीवास्तव 


सम्पर्क


स्वप्निल श्रीवास्तव 

510 – अवधपुरी कालोनी

अमानीगंज 

फैजाबाद – 224001 


मोबाइल – 9415332326

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