शिवदयाल का आलेख 'मिट्टी और मनुष्य से प्रेम का मूल्य रचता मैला आंचल'


फणीश्वर नाथ रेणु 


भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम समवेत भारतीय जन के संघर्ष की कहानी रही है। इस संग्राम में सभी वर्गों ने अपनी भूमिका अपने अंदाज में निभाई। मजदूरों किसानों की भी इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका थी। इन सबको मिला कर ही भारत माता की वास्तविक तस्वीर साकार होती है। फणीश्वर नाथ रेणु अपने उपन्यास मैला आंचल में भारत माता के उस तस्वीर को सामने रखते हैं जिसके बारे में हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने सोचा तक नहीं था। शिवदयाल लिखते हैं कि "रेणु के कथा साहित्य के मूल में भूमि है। मैला आंचल में भी रेणु जी भूमि की अवस्थिति, भूगोल, उसकी जैविक संपन्नता और मनुज समाज का ऐसा समग्र चित्र खींचते हैं कि मानो उसका भी मानवीकरण कर देते हैं। कहीं-कहीं इस कोशिश में मनोहरी भू-दृश्य भी उपस्थित करते हैं। ऐसी धरती के प्रति अगाध प्रेम उपजता है जिसका मोह छुड़ाए नहीं छूटता।" मिट्टी से मनुष्य का प्रेम पुरातन है जिसे रेणु जी अपने इस उपन्यास में पुनर्रचित करते हैं। आज रेणु जी की पुण्य तिथि पर हम उनकी स्मृति को हम नमन करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शिवदयाल का आलेख 'मिट्टी और मनुष्य से प्रेम का मूल्य रचता मैला आंचल'।



'मिट्टी और मनुष्य से प्रेम का मूल्य रचता मैला आंचल'


शिवदयाल


भारत माता

ग्रामवासिनी।

खेतों में फैला है श्यामल

धूल भरा मैला सा आँचल,

गंगा यमुना में आँसू जल,

मिट्टी की प्रतिमा

उदासिनी।


दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन,

अधरों में चिर नीरव रोदन,

युग युग के तम से विषण्ण मन,

वह अपने घर में

प्रवासिनी।


तीस कोटि संतान नग्न तन,

अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्त्र जन,

मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन,

नत मस्तक

तरु तल निवासिनी!...


कविवर सुमित्रा नंदन पंत की प्रसिद्ध कविता 'भारत माता' से फणीश्वर नाथ रेणु ने अपने पहले उपन्यास का शीर्षक लिया। उनका कालजयी उपन्यास मानो कविता के मूल भाव का एक कथात्मक विस्तार है। मेरीगंज में इसी ग्रामवासिनी भारतमाता के ही तो दर्शन होते हैं।


उपन्यास की छोटी-सी भूमिका में रेणु ने स्वयं मैला आंचल को एक आंचलिक उपन्यास कहा है। वैसे विषय वस्तु की दृष्टि से यह हिंदी की मुख्यधारा का उपन्यास है। भारत के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण चरण को यह उपन्यास पकड़ता है, आवरित करता है। डेढ़ सौ वर्षो की औपनिवेशिक पराधीनता के खिलाफ दीर्घकाल तक चले स्वतंत्रता आंदोलन का यह अंतिम चरण है। स्वतंत्रता की आहट सुनाई दे रही है। भारत में नव विहान होने को है। रेणु के शब्द में 'भुरुकवा' अर्थात भोर का तारा प्रभा समान हो रहा है क्षितिज में, मुक्ति का हरकारा बन कर। सन् 1946 में कांग्रेस की अंतरिम सरकार बनी है लेकिन अभी अंग्रेजों का आधिपत्य, उनकी हनक बनी हुई है। यह कमोवेश पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में समान रूप से अनुभव किया जाने वाला प्रसंग है। कथा-काल में 1946 से ले कर 1948 तक का समय समाहित है। कथा का क्षेत्र या अवस्थिति कोई और भी शहर, गांव, कस्बा या स्थान हो सकता था। रेणु ने पूर्णिया जिले के मेरीगंज को कथा भूमि के रूप में चुना। इसकी दूरस्थ भौगोलिक और सांस्कृतिक अवस्थिति के कारण रेणु ने स्वयं अपने इस उपन्यास को आंचलिक उपन्यास कहा।


एक अत्यंत पिछड़ा इलाका कैसे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ता है और इसका कैसा प्रभाव समाज जीवन पर पड़ता है, कैसे एकदम निर्धन विपन्न जन समुदाय स्वातंत्र्य चेतना से अनुप्राणित होता है, इसका रेणु जी ने बड़ा हृदयग्राही चित्र 'मैला आंचल' में उपस्थित किया है। मेरीगंज में ऐसे लोग हैं जो दो दशक पहले ही कांग्रेस के कार्यक्रमों से जुड़ गए थे और सुराजी बन गए थे। गांधी जी उनके लिए अवतार पुरुष थे, उनके नैतिक अभिभावक! बाद में कुछ और राजनीतिक विचारधारा के लोग भी क्षेत्र में सक्रिय होते हैं। कथा 1946 से शुरू होती है। गांव में मलेरिया केंद्र खुलने वाला है। उसी की तैयारी में फोर्स के साथ सरकारी लोग गांव में आते हैं। गांव के लोगों की स्मृति में सन् 42 की घटनाएं अभी ताजा हैं। कैसे ढोलबाजा में पूरे गांव को घेर कर आग लगा दी गई थी, एक बच्चा भी नहीं बच पाया था। चार साल बाद मिलिट्री को देख कर लोग इतना डर जाते हैं कि अपने ही गांव के कांग्रेसी कार्यकर्ता बालदेव को बांध कर सब लोगों के सामने पेश कर देते हैं। कांग्रेस की अंतरिम सरकारें बन चुकी हैं लेकिन लोगों के मन में अभी भी अंग्रेजों का भय कितना है, यह इस घटना से दर्शाया गया है। दूसरी और सत्ता मिलते ही कांग्रेस के नेताओं का कैसे नैतिक पतन हो रहा है इसके भी दृष्टांत उपन्यास में दिए गए हैं। सच्चे कांग्रेसी या कहें कि सुराजी इस प्रवृत्ति से बहुत विचलित हैं। सोशलिस्ट आते हैं, कम्युनिस्ट आते हैं और उनकी ओर लोग आकृष्ट होते हैं। उपन्यास में गांधी जी अपने आप में एक पात्र के रूप में उपस्थित हैं। समाज के अंतिम जन को जिस प्रकार उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन और भारतीय राष्ट्रवाद से जोड़ा यह उपन्यास इसकी तस्दीक करता है।


मैला आंचल एक राजनीतिक उपन्यास है। इसमें मुक्ति की राजनीति, स्वतंत्रता संघर्ष की राजनीति भी है और क्षुद्र स्वार्थ की राजनीति भी जो स्थानीय स्तर पर विभिन्न प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच चलती है। मुक्तिकामियों अथवा स्वतंत्रता सेनानियों के घोषित तौर पर चार दल हैं जिनके अलग-अलग लक्ष्य हैं और राजनीति भी - कांग्रेस, सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी तथा संगठन के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। मेरीगंज में सोशलिस्ट निडर हैं, पहलकदमी करते हैं और समाजवाद की स्थापना के लिए कटिबद्ध हैं। उनका स्थानीय नेता कालीचरण कांग्रेस के सर्वमान्य नेता बालदेव को निस्तेज कर देता है। कम्युनिस्टों के प्रतिनिधि के रूप में चलित्तर कर्मकार (जो वास्तविक जीवन में नक्षत्र मालाकार हैं) है जिसके ऊपर पंद्रह हजार का इनाम है। संथाल एक अलग सामाजिक समूह है जो गांव के बाहर रहता है और गांव के लोगों के साथ खास मेलजोल नहीं रखता। भूमि अधिकार को ले कर संथाल तहसीलदार की जमीन पर कब्जे की कोशिश करते हैं। खूनी संघर्ष में कुछ संथाल मारे जाते हैं, उनकी महिलाओं का मानमर्दन होता है और उन्हीं में से कुछ को काला पानी की सजा भी होती है। लेकिन उनके यहां जीवन फिर से पटरी पर लौटता है, नगाड़ों पर छाप पड़ती है और स्त्री-पुरुष नृत्य करते हैं। आजादी के जश्न में वे भी शामिल होते हैं, नाचते-गाते हैं।


सबसे कड़ी प्रतिद्वंद्विता कांग्रेस और सोशलिस्ट पार्टी के बीच है जिसमें सोशलिस्ट बीस पड़ते दिखते हैं। गरीब-गुरबे उनके साथ जुड़ते हैं, उनका बराबरी का नारा उन्हें खींचता है। सोशलिस्ट बनते लोगों को कांग्रेसी हताश हो कर देखते हैं। उनमें उग्रता है, रेडिकलिज्म है और अन्याय का प्रतिकार करने में वे आगे रहते हैं। कबीर मठ पर लरसिंह दास जैसे लफंगे के कब्जे को वही निर्णायक रूप से रोकते हैं, जबकि कांग्रेसी बालदेव ढुलमुल रवैया अपनाते हैं। तब भी मठ की कोठारिन लक्ष्मी दासिन बालदेव के साथ रागात्मक संबंध में पड़ती है। एक समय आता है जब बालदेव को कोई नहीं पूछता तो लक्ष्मी उन्हें कंठी धारण करा कर मठ में ही आश्रय देती है। बाद में नया महंत 'माया' के वशीभूत हो कर काम संतुष्टि के लिए रमपियरिया को दासी बना लेता है तो बालदेव और लक्ष्मी दोनों मठ छोड़ कर चले जाते हैं और अपना अलग आश्रम बनाते हैं।


कहने की बात नहीं कि उपन्यासकार रेणु स्वयं सोशलिस्ट पार्टी में रहे। जिस कांग्रेस के नैतिक पतन का विरोध वे इस उपन्यास में अपनी पार्टी के माध्यम से करते हैं, क्या संयोग है कि उपन्यास छपने के तीस साल बाद वे 1974 में जयप्रकाश नारायण के साथ कांग्रेस के कुशासन और दमन के खिलाफ सड़क पर उतरते हैं। 1946 की कांग्रेस सरकार उस समय तक भी लगातार दिल्ली में काबिज रहती है।


उपन्यास में कुछ राष्ट्रीय नेताओं के नाम बार-बार आते हैं। गांधी जी तो भगवान की तरह मौके-बेमौके याद किए जाते हैं। इनके अलावा जमाहिर लाल यानी जवाहर लाल, रजिन्दर बाबू यानी राजेंद्र प्रसाद, भगत सिंह, मजहरूल हक तथा जैपरगास बाबू यानी जय प्रकाश नारायण के नाम आते हैं। गांधीजी की हत्या के पश्चात कुछ लोगों का आशंका होती है कि जैपरगास  की भी हत्या हो जाएगी।


गांधी जी के परम भक्त और समर्पित कार्यकर्ता ढाई हाथ के बावन दास का कमाल का चरित्र रेणु ने गढ़ा है। ऐन गांधी जी के श्राद्ध के दिन वह व्यापारियों की कालाबाजारी की कोशिश को रोकने के क्रम में मार दिया जाता है। उसके क्षत-विक्षत शव को कलीमुद्दीपुर ('यानी पाकिस्तान') के लोग नदी में बहा देते हैं। उसका झोला एक पेड़ पर टंगा रह जाता है और उस निशानी को भी हटा दिया जाता है। तब भी एक चीथड़ा पेड़ पर टंगा रह जाता है जिस पर एक महिला की निगाह पड़ती है। वह इसे किसी पीर-फकीर की निशानी मान कर उसके पास ही एक धागा बांध कर मन्नत मांगती है। इस प्रकार इस रूपक के द्वारा रेणु ने बावन दास को अमरत्व का मार्ग दिखाया है।


एक महत्वपूर्ण बात यह भी कि उपन्यास में राजनीति विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक समूहों को जोड़ने का भी काम करती है। उन्हें एक चटाई या सफरे पर बैठाती है। इसे जन भागीदारी आधारित स्वतंत्रता आंदोलन की लोकतांत्रिक राजनीति ने संभव बनाया है। यह राजनीति जाति से वर्ग की ओर ले जाने वाली राजनीति भी है। सोशलिस्ट कालीचरण ने गरीबों और भूमिहीन मजदूरों की आंखें खोल दी हैं। वह चमरटोली में भात खा लेता है, वह स्वयं यादव है। पूछने पर प्रतिप्रश्न करता है - 'जात क्या है? जात दो ही हैं - एक गरीब और दूसरी अमीर। खेलावन (यादव) को देखा? यादवों की ही जमीन हड़प रहा है।' एक स्थान पर कालीचरण अनुभव करता है कि गांव में फूट रहने से तो संघर्ष नहीं होगा, नेताओं को बुलाना पड़ेगा। फिर वह राजनीतिक प्रक्रिया, जन कार्यवाही और संगठन को ले कर एक महत्वपूर्ण बात करता है - 'बहुत दिन से सभा नहीं हुई है। खेत में कोड़-कमान नहीं करने से जिस तरह जंगल-झाड़ हो जाता है, उसी तरह इलाके में सभा-मीटिंग नहीं करने से इलाका भी खराब हो जाता है।' यह कथन आज भी किसी लोकतांत्रिक समाज और राजनीति के लिए एक सीख है।


स्वराज आंदोलन का जुआ किस प्रकार छोटे किसानों ने अपने कंधे पर उठाया था, यह उपन्यास इस तथ्य को भी सामने ले आता है। बावनदास, चुन्नी गोसाईं और बालदेव - इन तीनों ने एक ही दिन 'संसार के माया-मोह को त्याग कर' सुराजी में नाम लिखाया था। तीनों कांग्रेस कार्यकर्त्ता। चुन्नी गोसाईं नमक कानून के भी पहले विदेशी कपड़ा बहिष्कार आंदोलन से ले कर 1942 के भारत छोड़ो तक दस बार जेल जा चुका है, और स्वतंत्रता जब लभ्य हो रही है तब सोशलिस्ट पार्टी के साथ हो जाता है। ढाई हाथ के बावन दास के कुल-गोत्र का पता नहीं।  रामकिशन बाबू की स्त्री उसे देखते ही चिल्ला उठती है - बावन भगवान! सत्याग्रह में पुलिस उसे हुलका कर भागना चाहती है लेकिन वह भागता नहीं। डंडे खाने को तैयार रहता है। उस पर हुए वार को आभा रानी अपने ऊपर ले लेती है और कहती है - मेरे बावन भगवान को मारो नहीं। यहां 'पूर्व जन्म का फल अथवा सिरजनहार की मर्जी से' मात्र ढाई हाथ के अदमनीय बावन दास में वामन अवतार की छवि देखती आभा रानी उसे नायकत्व प्रदान करती है। आगे चल।कर वह अपने बलिदान से स्वयं को सच्चा, समर्पित सुराजी, गांधीवादी सिद्ध करता है, वह भी गांधी जी के श्राद्ध के दिन। इसके पहले उसे गांधी जी को छोड़ कर किसी पर विश्वास नहीं रह जाता। सच्चे गांधीवादी की ऐसी ही स्थिति हो आई है।


मैला आंचल हिन्दी उपन्यास के लिए अनेक प्रस्थान बिन्दु प्रस्तुत करता है, लेकिन वास्तव में यह अपने उद्देश्य के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाएगा। एक अत्यंत पिछड़े, हाशिये पर स्थित इलाके में स्वतन्त्रता आंदोलन पहुंचा है। उसका कैसा प्रभाव है, और अलग-अलग कोटि के लोगों में इसकी क्या प्रतिक्रिया हो रही है, कैसा प्रभाव हो रहा है, आसन्न स्वतन्त्रता को ले कर उनकी क्या उम्मीदें और आकांक्षाएं हैं, इस प्रकार लगभग हर जाति समूह एक राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल है - उपन्यास इन सबका बड़ा प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करता है, वह भी पूरी रोचकता के साथ।  इन सब की भागीदारी का महत्व इस बात में है कि विभाजित भारतीय समुदाय आखिरकार उपनिवेशवाद के खिलाफ खड़ा होता है। यह भारत का किसान है जो जागा है, गाँव-टोले हैं जो स्वतन्त्रता की वेला में आलोड़ित हो रहे हैं ।


जहां 'कौवा को भी मलेरिया हो जाता है', ऐसे इलाके में मलेरिया और कालाअजार पर शोध करने आया अज्ञातकुलशील डॉक्टर प्रशांत मेरीगंज की मिट्टी के मोह में पड़ गया है। वह तमाम प्रयोग करता तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद की बेटी कमली से प्यार करने लगा है।  दरअसल उसे तो यहां के लोगों से भी लगाव हो गया है, उसका घर या कि अस्पताल सबके लिए खुला है। वह अपने वास्तविक माता-पिता को नहीं जानता। एक मुखर्जी परिवार में उसका लालन-पालन होता है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से आई.एस-सी. पास करने के बाद डाक्टरी की पढ़ाई वह पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में करता है। उसकी मां की अभिलाषा थी कि वह डॉक्टर बने। सो वह डॉक्टर बन गया, हालांकि मां उसे डॉक्टर बनता देख नहीं सकी। वह 1946 में कांग्रेसी मंत्री द्वारा आगे विदेश में पढ़ाई के लिए भेजे जाने का प्रस्ताव ठुकरा कर पूर्णिया जिले में मलेरिया और कालाअजार पर शोध करने का निश्चय करता है। ममता श्रीवास्तव उसकी मित्र है जो पटना में रहती है, जिससे वह मन की बात करता है।


प्रशांत को यहां की हर चीज में विशेषता नजर आती है - यहां की मिट्टी, पेड़-पौधे फूल-पत्ते, और इंसान। ऐसे इंसान भी जिन्हें 'आमों की गुठलियों के सूखे गूदे की रोटी पर जिंदा रहना है'। वह सोचता है, भूखे अतृप्त इंसानों की आत्मा कभी भ्रष्ट नहीं हो, या कभी विद्रोह नहीं करे, ऐसी आशा करना बेवकूफी है। डॉक्टर यहां की गरीबी और बेबसी देख कर दु:खी होता है, चकित होता है - 'वह संतोष कितना महान है जिसके सहारे यह वर्ग जी रहा है? आखिर वह कौन-सा कठोर विधान है जिसने हजारों-हजार क्षुधितों को अनुशासन में बांध रखा है?' धरती के धनी रेणु लिखते हैं - 'खेतों में फैली हुई काली मिट्टी की संजीवनी इन्हें जिलाए रखती है। शस्य श्यामला, सुजला-सुफला इनकी मां नहीं ...?' यानी मां ही तो है। नई बंदोबस्ती का डर काश्तकारों और मजदूरों को घेरे है। अब तो शायद धरती पर पैर रखने का भी अधिकार उन्हें नहीं होगा। 'जिनके पास हजारों बीघे जमीन है, वे पांच बीघे जमीन की भूख से छटपटा रहे हैं। बेजमीन आदमी आदमी नहीं, वह तो जानवर है!'


और डाक्टर प्रशांत आदमी का डाक्टर है, जानवर का नहीं। ' क्या करेगा वह संजीवनी बूटी खोज कर? भूख और बेबसी से छटपटा कर मरने से अच्छा है मैलेगनेंट मलेरिया से बेहोश हो कर मर जाना।... वह नए संसार के लिए इंसान को स्वच्छ और सुंदर बनाना चाहता था। यहां इंसान है कहां?' डॉक्टर को अपने अकादमिक शोध की निरर्थकता का एहसास होता है। वह स्वीकार करता है कि उसका रिसर्च पूरा हो गया। उसने रोग की जड़ पकड़ ली है। 'गरीबी और जहालत इस रोग के दो कीटाणु हैं।' यह भी ध्यान देने की बात है कि ऐसे निपट देहात में डॉक्टर आधुनिकता का प्रतिनिधि बन कर आया है, उसकी आधुनिकता पस्त हो रही है।


इसी डाक्टर प्रशांत को गांव में बलवा होने पर और चलित्तर कर्मकार से उसके संबंध होने के संदेह में गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया जाता है। इधर कमली उसके बच्चे की मां बनने वाली है। पूरा परिवार गंभीर यंत्रणा झेल रहा है- लोक लाज का भय! लेकिन कमली एक बच्चे को जन्म देती है। यह साहसिक फैसला है। इसके कुछ ही दिन बाद प्रशांत छूट कर आ जाता है और धूमधाम से बच्चे का जन्मोत्सव मनाया जाता है। गांव भर में यह चर्चा फैला दी जाती है कि प्रशांत और कमली का गंधर्व विवाह पहले ही हो चुका है। इस प्रकार प्रशांत मेरीगंज की मिट्टी से सदा के लिए जुड़ जाता है। तहसीलदार, हजारों बीघे के भूस्वामी विश्वनाथ प्रसाद अपनी सैकड़ों एकड़ जमीन भूमिहीनों और सीमांत किसानों में बांट देते हैं अपने नाती (जिसे वे राजा कहते हैं) की तरफ से। उन्हें भूपति होने की निरर्थकता का एहसास होता है। स्वातंत्र्य वेला में उनके बहाने उपन्यासकार भूस्वामियों के लिए एक नया आदर्श उपस्थित करते हैं। जमीन आदमी को आदमी बनाती है। छोटी-सी जमीन की मिल्कियत से भी उपजा आत्मविश्वास एक व्यक्ति में मनुष्यत्व का गौरव और दर्प भर देता है।





भूमि रेणु के कथा-साहित्य के मूल में है, कह सकते हैं उसका केंद्रीय तत्व है। वे भूमि की अवस्थिति, भूगोल, उसकी जैविक संपन्नता और मनुज समाज का ऐसा समग्र चित्र खींचते हैं कि मानो उसका भी मानवीकरण कर देते हैं। कहीं-कहीं इस कोशिश में मनोहरी भू-दृश्य भी उपस्थित करते हैं। ऐसी धरती के प्रति अगाध प्रेम उपजता है जिसका मोह छुड़ाए नहीं छूटता - 'मैला आंचल! लेकिन धरती माता अभी स्वर्णांचला है। गेहूं की सुनहरी बालियों से भरे हुए खेतों में पुरवैया हवा लहरें पैदा करती है। सारे गांव के लोग खेतों में हैं। मानो सोने की नदी में कमर भर सुनहले पानी में सारे गांव के लोग क्रीड़ा कर रहे हैं। सुनहरी लहरें! ताड़ के पेड़ों की पंक्तियां, झरबेरी का जंगल, कोठी का बाग, कमल के पत्तों से भरे हुए कमला नदी के गड्ढे!... आम के बागों में कोयल-कोयली, दहियल और बुलबुल ने सम्मिलित सुर में मंगल गीत गए! खेतों से गीत की कड़ियां पुरवैया के सहारे उड़ती आती हैं और डॉक्टर के दिल में हलचल मचा जाती हैं।... गेहूं की कटनी हो रही है। झुनाई हुई रब्बी की फसल की सोंधी सुगंध चारों ओर फैल रही है।'


भूमि पर इतना जोर होने के कारण पूरे विस्तार में रेणु भूमि संबंध, भूमि अधिकार और संघर्ष, बंदोबस्ती जैसे जटिल विषयों को कथा में ऐसे पिरोते हैं कि यह सब कथानक के बाहर के तत्व नहीं हो कर स्वाभाविक रूप से आनुषंगिक अंश और प्रसंग प्रतीत होते हैं। मैला आंचल में आरंभ से ले कर अंत तक, सच पूछिए तो भूमि संबंधों की बात ही ऊपर रहती है। यहां तक कि जल जमींदारी की प्रथा की चर्चा करना भी रेणु नहीं भूलते। भू-स्वामियों के आपसी संबंध, भू-स्वामियों और रैयतों/किसानों के संबंध, भू-स्वामियों और भूमिहीन मजदूरों के संबंध, अलग-अलग काश्तकारों टोलों के बीच के संबंध -  इन सबको मैला आंचल में मूलभूत प्राकृतिक संसाधन के रूप में जमीन के महत्व और उसके न्यायपूर्ण वितरण के महत्व को रेखांकित करने के लिए नियोजित किया गया है। इन अर्थों में मैला आंचल उपन्यास बदलते भूमि संबंधों का आख्यान भी है -  ऐसा आख्यान जो पहले कभी हिन्दी कथा-साहित्य में शायद ही देखा-सुना गया हो।


हमारे यहां राष्ट्र के तीन तत्व या आधार माने गए हैं - भूमि, जन और संस्कृति। मैला आंचल को ध्यान से देखें, पढ़ें तो कोसी अंचल के इस क्षेत्र में रेणु इन्हीं तीनों तत्वों की अपने ढंग से व्याख्या कर रहे हैं। भूमि के बाद जन की बात आती है। जन यहां जातियों में विभाजित है। 1926 में प्रकाशित आचार्य शिवपूजन सहाय के प्रसिद्ध उपन्यास 'देहाती दुनिया' जिसे पहला आंचलिक उपन्यास उचित ही कहा जाता है, में जातियों, जातिग्रस्तता और उससे उपजी विसंगतियों और विडंबनाओं की चर्चा है, लेकिन इतनी खुल कर नहीं। रेणु ने संभवतः पहली बार जातीय विभाजन, पदानुक्रम, जातीय शोषण, सामाजिक दूरी, विभिन्न जातियों को ले कर प्रचलित संज्ञा-विशेषणों और लोकोक्तियों की इतने खुले रूप में, और यह भी कहना होगा कि अकुंठ भाव से चर्चा की है। यों गांव में राजपूत, कायस्थ और यादव प्रभावी जातियां हैं जिनके पास भूमि संपदा है, लेकिन साथ ही ब्राह्मण के अलावा कोइरी, कुर्मी, बनिया, धानुक, तेली, कहार आदि मध्य और पिछड़ी जातियां हैं। फिर चमार आदि दलित (हरिजन) जातियां भी हैं। इनके टोले हैं - अमात्य ब्राह्मण टोली, पोलिया टोली, तंत्रिमा छत्री टोली, यदुवंशी छत्री टोली, गहलोत छत्री टोली, कुर्म छत्री टोली, धनुर्धारी छत्री टोली, कुशवाहा छत्री टोली और रविदास टोली। गांव से कुछ हट कर संथालों की बस्ती या टोला है जिसकी बसावट का इतिहास भी उपन्यासकार प्रस्तुत करता है। लोग उन्हें बाहरी मानते हैं और वे भी गांव के लोगों से दूरी बना कर रखते हैं। जमीन और जोत को ले कर संघर्ष की नौबत भी आती रहती है। ऐसी स्थिति में पूरा गांव एकजुट रहता है। तहसीलदार की जमीन पर संथाल कब्जे की कोशिश करते हैं। खूनी संघर्ष होता है जिसमें हर प्रकार से संथालों की ही हानि होती है। यह भी अजब संयोग है कि बिहार में नरसंहार की पहली घटना 1971 में पूर्णिया के ही रूपसपुर चंदवा में घटी थी जिसमें चौदह संथालों की हत्या हुई थी। यह उस समय की एक भयंकर घटना थी जिस पर स्वाभाविक तौर पर बहुत हंगामा मचा था। इसका आशय यह भी निकाला जा सकता है, बल्कि निकाला जाना चाहिए कि संथालों और ग्रामीणों के रिश्ते को ले कर रेणु का आकलन सही था। उन्होंने अतीत में हुए एक संघर्ष के बारे में लिखा है - 'अंग्रेज कलेक्टर की तुरंत बदली हो गई। बहुत से संथाल सरकारी गोली से घायल हुए और सैकड़ों ने बिहार के विभिन्न जिलों में सफैया कमान (मेहतर कमान) में काम करते-करते सारी उम्र बिता दी। लेकिन मानर और डिग्गा की आवाज कभी मंद नहीं हुई, बांसुरी कभी मंद नहीं हुई और न ही उनके तीरों में ही जंग लगी।' संथालों का यह हश्र बहुत-से पाठकों के लिए नया, सिहरन पैदा करने वाला तथ्य होगा।


जाति, जाति-व्यवहार को ले कर उपन्यास में रेणु ने ऐसा व्यंजक परिहास प्रस्तुत किया है कि पाठक गुदगुदी से भर जाता है। पढ़ी-लिखी जाति कायस्थ के बारे में कोई कहता है - 'मरा हुआ कायस्त भी बिसाता है।' यानी विषैला होता है। बालदेव जी (अहीर) भैंस का ताजा दूध पी कर अनशन तोड़ते हैं! रेणु जातियों में संस्कृतिकरण (एम. एन. श्रीनिवास, 1952) की प्रवृत्ति को भी रेखांकित करते हैं जिसमें अधिकांश जातियों में अपना क्षत्रिय मूल बताने की प्रवृत्ति है। जातियों के बीच परस्पर निर्भरता है भले ही पदानुक्रम आधारित, जैसे - 'यादव टोली में बारह मास शाम को अखाड़ा जमता है। चार बजे दिन से ही शोभन मोची ढोल पीटता रहता है - ढाक ढिन्ना.. ढाक ढिन्ना!' जातीय समीकरण भी बनाए जाते हैं और जातीय गोलबंदियां भी होती हैं। सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात कि लगभग सभी जातियां एक राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल हैं, और उसके दो आयाम हैं - भूमि और राष्ट्रीय स्वाधीनता।


उपन्यास में स्त्रियों की अच्छी और प्रभावी उपस्थिति है। वे स्थानीय संस्कृति में केवल रंग नहीं भरतीं बल्कि स्थानीय राजनीति में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अहम भूमिका निभाती हैं। इनमें कुछ बांग्लाभाषी सत्याग्रही स्त्रियों के संदर्भ आते हैं। गांधी जी के आंदोलन का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि दूर-दराज के गाँवों की स्त्रियां भी इससे जुड़ीं, परिवार जुड़े और आंदोलन को व्यापकता मिली। इससे सामाजिक मान्यताएं बदलीं और जमीनी स्तर पर स्त्रीपक्षीय परिवर्तन सम्भव हुए। ये परिवर्तन मेरीगंज में भी दृष्टिगोचर होते हैं।  यहां पहले से ही कबीर पंथ का प्रभाव है। कबीर मठ है जिसके पास सैकड़ों बीघा जमीन है, लेकिन इसका शायद ही कोई आध्यात्मिक प्रभाव है। इस मठ से कम से कम दो स्त्रियों के शोषण की कथाएं जुड़ी हैं।


सभी प्रकार के संबंधों के मूल में, संस्कृति की नींव में स्त्री-पुरुष संबंध है। मैला आंचल में प्रेम तो है, दांपत्य नहीं है। प्रेम भी वर्जित कोटि का। प्रशांत और कमली के बीच जरूर प्रेम प्रस्फुटित होता है लेकिन अनब्याही स्त्री पुत्र को जन्म दे, यह सामाजिक नैतिक नैतिकता के खिलाफ चला जाता है। उपन्यास में अनेक प्रेम संबंध हैं लेकिन जिनका निर्वाह लुके-छिपे ही संभव हो पाता है। शुद्ध कामासक्ति और भोग की लालसा वाले प्रेम संबंध भी हैं जो झगड़ा-झंझट का कारण भी बनते हैं। सहदेव मिसिर और फुलिया, खलासी जी और फुलिया, कबीर मठ के नए महंत और रमपियरिया... दूसरी ओर यह कथन - 'तहसीलदार साहब की बेटी शाम से ही, आधे पहर रात तक डागडर बाबू के घर में बैठी रहती है; चांदनी रात में कोठी के बगीचे में डॉक्टर के हाथ में हाथ डाल कर घूमती है। तहसीलदार साहब को कोई कहने की हिम्मत कर सकता है कि उनकी बेटी का चाल चलन बिगड़ गया है?... तहसीलदार हरगौरी सिंह अपनी खास मौसेरी बहन से फंसा हुआ है। बालदेव जी कोठारिन से लटपटा गए हैं। कालीचरण ने चरखा स्कूल की मास्टरनी जी को अपने घर में रख लिया है। उन लोगों को कोई कुछ कहे तो? जितना कानून और पंचायत है सब गरीबों के लिए ही? हूं!'


गांव की अधिकांश महिलाओं के लिए 'असली पीतल का बुलाकी' भी एक अलभ्य आभूषण है। कहीं-कहीं तो 'असल गिलट' की भी बात है। कुछ भूमिहीन परिवारों में महिलाओं के तन पर  एक ही कपड़ा है। रेणु ने स्त्रियों की स्थिति पर अपनी व्यंजनापूर्ण शैली में मार्मिक और कहीं-कहीं बेधक टिप्पणी की है। स्त्री-शोषण के कितने ही दारुण रूप देखने को मिलते हैं। लक्ष्मी कोठारिन कबीर मठ से तब जुड़ती है तब वह बचपन में अनाथ हो जाती है। अपने अभिभावक, महंत की वासना का शिकार बनती है। वह मरता है तो नया महंत भी उसे अपने वश में करने की हरचंद कोशिश करता है। चरखा सेंटर की मास्टरनी मंगला की कहानी भी कमोबेश यही है। वह भी कहां जाए, उसका कोई घर नहीं है। वह कालीचरण के आंगन में रहती है। लेकिन मंगला साहसी और दबंग है। यह साहस उसे राजनीति ने दिया है। 'नहीं तो आदमी के अंदर के पशु को उसने बहुत करीब से देखा है। अबला नारी हर जगह अबला ही है। रूप और जवानी?.. नहीं, यह भी गलत। औरत होना चाहिए, रूप और उम्र की कोई कैद नहीं। एक असहाय औरत देवता के संरक्षण में भी सुखचैन से नहीं सो सकती।'


स्त्री प्रश्न पर उपन्यासकार की यह टिप्पणी भी झकझोर देने वाली है -  'लड़की की जात बिना दवा-दारू के ही आराम हो जाती है! (एक बूढ़े का कथन अपनी बेटी की बीमारी को ले कर) लेकिन बेचारे बूढ़े का इसमें कोई दोष नहीं। सभ्य कहलाने वाले समाज में भी लड़कियां बला की पैदाइश समझी जाती हैं - जंगल-झाड़!' इसी प्रकार देहाती महिलाओं के कामकाज और आपसी व्यवहार पर भी उपन्यासकार की नजदीकी नजर है। कैसे दो महिलाओं के बीच झगड़ा शुरू होता है और कैसे उसमें तमाम और महिलाएं शामिल हो जाती हैं। एक तूफान खड़ा हो जाता है। एक-दूसरे को कोसा और सरापा जाता है और एक-दो घंटे के बाद ही सफाई! मेल-विलाप हो गया। एक-दूसरे के हाथ से हुक्का लेकर गुड़गुड़ाने लगीं। साग मांग कर ले गईं और शकरकंद भेज दिया।' महिलाओं की इसी आपसदारी से समाज चलता है।


तो जो यह मैला आंचल है - पूर्णिया जिले का मेरीगंज, जोकि एक बड़ा गाँव है जहां बारहों बरन के लोग रहते हैं, वहां की जमीन, भू-पटल, उस पर बसने वाले लोगों और उनके रहन-सहन, जीवन स्थितियों, आस्थाओं-विश्वासों, चुनौतियों-संघर्षों, ढोंग-पाखंडों, अज्ञानता-अंधविश्वासों तथा आशाओं-आकांक्षाओं का सरस आख्यान है जो उन्हीं की भाषा में रचा गया है। रेणु ने मेरीगंज के जीवन को अपने उपन्यास में मानो जस का तस उतार दिया है। मैला आंचल में लोक अपने समग्र रूप में संपूर्ण वैभव के साथ उपस्थित है - अपनी भाषा-बोली, लोकगीतों-लोकनाट्यों, पदों और बानियों, तीज-त्यौहारों, मुहावरों-लोकोक्तियों, लोक गाथाओं,  नृत्य-गान, अपने रस-गंध-गुंजारों के साथ इतने नैसर्गिक और जीवंत रूप में कि मानो पाठक भी उसका ही अंग हो जाता है। ऐसा साफ, पारदर्शी यथार्थ हिंदी उपन्यास में पहली बार आया -  ऐक्स-रे की तरह, जिसमें इसकी तमाम परतें खुल जाती हैं। यथार्थ को, और एक विशेष कालखंड को इस प्रकार प्रस्तुत करने में इस भाषा की सबसे बड़ी भूमिका है। यह भाषा केवल मनुष्यों की बोली जाने वाली भाषा नहीं है। यह भाषा परिवेश में व्याप्त और गुंजायमान तमाम गंधों और ध्वनियों से मिलकर बनी है। मूक मनुज जिसके मुंह पर बैलों की तरह 'जाब' लगी हो, वह क्या बोलेगा, उसकी भाषा कैसी होगी। उसके मन के भाव को व्यक्त करने के लिए शब्द अधिक नहीं हैं। उसे संकेतों से काम चलाना है। यहां केवल बोल कर नहीं, गा कर, रो कर, बजा कर, अभिनय कर, नाच कर अपने को अभिव्यक्त करना है। यह कथन और वर्णन से अधिक संवाद की भाषा है। लगभग पूरा उपन्यास संवाद में है जहां अखाड़ा का ढोल भी बोलता है; गाय, बैल, कुत्ते, चिरई-चुरुंग देख सुन कर बोलते हैं, इशारे करते हैं। इस भाषा में लोकोक्तियां और मुहावरे भरे पड़े हैं। इसमें शास्त्रों का ज्ञान भी छन कर आता है। सीधी चाल में चली आती आधुनिकता मेरीगंज में लड़खड़ाने लगती है। यहां इंकलाब जिंदाबाद 'इनकिलास जिंदाबाघ' हो जाता है, महात्मा गांधी 'गंधी महात्मा' हो जाते हैं, जय हिंद 'जाय हिंद' हो जाता है। इस भाषा में अनुपम उपमाएं और सादृश्यताएं हैं। यहां 'रामकिशन बाबू भाखन देते थे, जैसे बाघ गरजे।.. जब वकालत करते थे तो बहस करने के समय पुरानी कचहरी की छत से पलस्तर झड़ने लगता था।' यहां डॉक्टर का 'खस्सी-बकरी की अंतरी का भीतरी हिस्सा जैसा रोयांदार होता है वैसा ही गमछा है।'


यह भाषा व्यंजना, खांटी व्यंजना की भाषा है। दूसरों की ही नहीं, खुद की हंसी उड़ाने वाली भाषा है। विडंबना को व्यंजना में उजागर करने का हुनर कोई रेणु से सीखे। हिंदी की रिश्तेदारिन, दूर की रिश्तेदारिन इस भाषा को हिंदी पाठकों ने पहली बार देखा-पढ़ा-समझा है। यह साफ दिलों की मैली-सी भाषा है जो अपनी परिहासपूर्ण व्यंजकता से पाठक को हंसा-हंसा कर दोहरा कर देती है, तो कभी गहरे उदास भी कर देती है। रेणु ऐसा 'विट' पैदा करते हैं कि आत्मा छलनी हो रही हो तब भी होठों पर हंसी आ जाए।


द्वंद्व, द्वैध मैला आंचल की एक और बड़ी विशेषता है। द्वंद उपन्यास का प्रमुख तत्व होता है। यह कथा को आगे बढ़ाता है, नए अर्थ खोलता है, चरित्र का विकास करता है, संघर्षों और विषम परिस्थितियों में संवेदना का उद्रेक करता है, भावों को उद्दीप्त करता है। द्वंद कथा रस की सृष्टि करता है। मैला आंचल का आरंभ ही द्वंद और संघर्ष से होता है जिसमें खबर फैलती है कि मलेटरी ने बहरा चेथरू को गिरफ्फ कर लिया है और लोबिन लाल के कुएं से बाल्टी खोल कर ले गए हैं। फिर तो 'मिट्टी और मनुष्य से मोहब्बत' में द्वंद्व की स्थितियां आती ही रहती हैं। एक ओर तो यह द्वंद्व मेरीगंज के अंतेवासियों के बीच में है दूसरी ओर प्रकृतिजनित परिस्थितियों से भी है। द्वंद्व का वितान व्यापक तब हो जाता है जबकि मेरीगंज का बारहों बरन वाला समुदाय विदेशी शासन के खिलाफ खड़ा होता है। उपन्यास में द्वंद्व का स्वरूप सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक है, और वास्तव में मुक्तिकामी है। 


मैला आंचल उपन्यास नायक-नायिका या कुछ पात्रों की कथा नहीं है। यह एक पूरे समुदाय की कथा कहता है। कथा या उपन्यास में ऐसी बहुवचनता एक नयी, अपूर्व घटना है। गहन लोकतांत्रिक चेतना से आप्यायित हो कर इस उपन्यास की रचना की गई है। इसमें उपन्यासकार अभिजात्य आग्रहों से अपने को मुक्त रखता है - दृष्टि के स्तर पर, भाषा के स्तर पर और निर्वाह के स्तर पर भी। मिट्टी और मनुष्य से प्रेम का मूल्य स्थापित करता यह रससिक्त उपन्यास कहीं ना कहीं स्वतंत्र भारत का एजेंडा तय करता है - मिट्टी और मनुष्य, यानी गांव और किसान के जीवन में स्वतंत्रता कैसा अंतर लाने वाली है। उपनिवेशवाद ने गांव और किसानों को ही सबसे ज्यादा पीसा। कितनी आशा और उम्मीद और कहीं विकल स्वर में यह आह्वान है  -


'भारत में आयल सुराज

चलु सखि देखन को..

हाथी चढ़ल आवे भारथमाता

डोली में बैठल सुराज! चलु सखि देखन को..'

लेकिन स्वराज तो तभी आएगा जब

'जो जोतेगा सो बोएगा

जो बोएगा सो काटेगा

जो काटेगा सो बांटेगा..'


कैसी विडम्बना है कि स्वतंत्रता पश्चात ग्रामवासिनी भारत माता की उपेक्षा की गई।  मेरीगंज जैसे ग्रामीण क्षेत्र जो स्थानीय भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व करते थे, उन्हें संविधान ने भी छोड़ा और सरकार ने भी छोड़ दिया। भारत के किसानों के साथ धोखा हुआ जबकि यदि वे खड़े न हुए होते तो स्वतंत्रता लभ्य नहीं हो सकती थी।


शिव दयाल


शिवदयाल 

सृजनात्मक एवं वैचारिक लेखन के क्षेत्र में चार दशकों से सक्रिय। ‘एक और दुनिया होती’,  ‘छिनते पल छिन’(उपन्यास), मुन्ना बैंडवाले उस्ताद (कहानी संग्रह), ताक पर दुनिया (कविता संग्रह), स्वतंत्र हुए स्वाधीन होना है( निबंध संग्रह), भारत का लोकतंत्र, जयप्रकाश : परिवर्तन की वैचारिकी; बिहार में आंदोलन, राजनीति और विकास आदि पुस्तकों समेत दर्जनों वैचारिक निबंध, आलोचनात्मक लेख और समीक्षाएं प्रकाशित। विकास सहयात्री, बाल किलकारी सहित अनेक पत्रिकाओं का संपादन।

उ. प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा साहित्य भूषण सम्मान, श्रीब्रजकिशोर स्मारक प्रतिष्ठान द्वारा ब्रजकिशोर सम्मान, बिहार निर्माण मंच द्वारा रचनाकार सम्मान आदि।



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