हेरम्ब चतुर्वेदी का आलेख 'विजयदेव नारायण साही और परिमल'


विजय देव नारायण साही



तीसरे सप्तक के कवियों में शामिल विजयदेव नारायण साही नयी कविता दौर के प्रसिद्ध कवि एवं आलोचक थे। 'परिमल' के गठन में उनकी अग्रणी भूमिका थी। इलाहाबाद की साहित्यिक बहसों को  परिमल ने एक नया आयाम प्रदान किया। प्रगतिशील लेखक संगठन के समानांतर परिमल इन बहस मुबाहिसों में लगातार सक्रिय रहा। परिमल में सक्रियता के अतिरिक्त मूल फारसी में 'पद्मावत' की विभिन्न पांडुलिपियों के विश्लेषणात्मक तथा शोधपरक दृष्टि से 'जायसी' जैसी अमूल्य रचना देने में भी साही जी कामयाब भी रहे। जायसी पर केन्द्रित उनका व्यवस्थित अध्ययन एवं नयी कविता के अतिरिक्त विभिन्न साहित्यिक तथा समसामयिक मुद्दों पर केन्द्रित उनके आलेख उनकी प्रखर आलोचकीय क्षमता के परिचायक हैं। साखी ने अपना हालिया अंक विजय देव नारायण साही पर केन्द्रित किया है। इस अंक में एक आलेख हेरम्ब चतुर्वेदी का है। हेरम्ब चतुर्वेदी ने उस इलाहाबाद को अपनी आंखों देखा है जिसे सचमुच साहित्य की राजधानी होने का श्रेय प्राप्त था। हिन्दी साहित्य के स्थापित साहित्यकारों का गढ़ इलाहाबाद में हुआ करता था। हेरम्ब जी ने अपने इस आलेख में परिमल की स्थापना के साथ-साथ संस्था के साथ साही जी के जुड़ाव और उनके लेखन को आधार बना कर कुछ महत्वपूर्ण बातें की हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं हेरंब चतुर्वेदी का आलेख  'विजयदेव नारायण साही और परिमल'।


'विजय देव नारायण साही और परिमल'


हेरम्ब चतुर्वेदी


दिसम्बर 10, 1944 को 'परिमल' के गठन के सन्दर्भ में पहली बैठक नया कटरा मोहल्ले में हुई थी। इसमें मुख्यतः इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रायः स्नातक कक्षाओं के उत्साही छात्र थे। ये नए छात्र दो-तीन कारणों से कुछ अलग करने की प्रबल भावना से प्रेरित थे। पहला प्रभावी तत्व तो 'पुनर्जागरण' था जिसने इलाहाबाद को एक महत्वपूर्ण भूमिका में स्थापित किया था। विशेष रूप से 1857 के पश्चात जब वह प्रान्तीय (पश्चिमोत्तर प्रान्त, बाद में संयुक्त प्रान्त) राजधानी हो गया था। दूसरा तत्त्व इसी से सम्बद्ध है, प्रांतीय राजधानी होने के चलते प्रत्यक्ष ब्रिटिश प्रशासन से यहाँ के लोगों का वास्ता पड़ा। प्रत्यक्षतः प्रशासनिक एकता और संचार माध्यमों के चलते एकता के भाव की चेतना का विकास संभव हुआ तो दूसरी तरफ औपनिवेशिक उत्पीड़न ने राष्ट्रीय जागृति के उत्प्रेरक के रूप में भी अपनी भूमिका निभाई। तीसरा कारण इलाहाबाद में विश्वविद्यालय की स्थापना ने नवीन विचारों के लिए एक सशक्त मंच प्रदान कर दिया था-एक उच्च बौद्धिक वातावरण की निर्मिती के माध्यम से! अतः कुछ नवीन तो होना अवश्यंभावी हो गया था!


ये दौर भारतीय इतिहास में संक्रमणकालीन दौर था, जब भारत शीघ्र अवश्यंभावी स्वतंत्रता की ओर अग्रसर था। जैसे बुझने से पूर्व दिए की बाती एक आखिरी बार पूरी तेज के साथ प्रदीप्त होती है, वैसे ही ब्रिटिश औपनिवेशिक उत्पीडन और दमन चक्र अपने शीर्ष पर था। भारत छोडो आन्दोलन अगस्त 1942 में शुरू क्या हुआ कि अगस्त 9 की भोर में ही गांधी जी सहित कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व गिरफ्तार हो चुका था। अतः आम जन की एक स्वतःस्फूर्त क्रान्ति ने नेतृत्व संभाल लिया था। उधर विश्व युद्ध के चलते अमेरिका का दबाव भी ब्रिटिश हुक्मरानों पर भारत को आजाद करने के लिए बढने लगा था ! इसके साथ ही 1920 के आस पास जिस साम्प्रदायिकता ने जोर पकड़ना शुरू किया था, अब वह विस्फोटक स्थिति को प्राप्त हो चुका था।


औपनिवेशिक सत्ता इस साम्प्रदायिकता की अग्नि में घृत डालने लगी। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी के बाद एक तरफ यही सांप्रदायिक (हिन्दू तथा मुस्लिम) शक्तियाँ राजनीतिक मैदान में शेष रह गयी थीं तो दूसरी ओर पुराने क्रन्तिकारी जो 1932 के बाद भूमिगत हो गए थे, सक्रिय हो कर क्रांति की ज्वाला को जीवित रखने और दहकाने का काम करने लगे।



1944 के आखिरी माह में जब 'परिमल' का गठन हो रहा था तब 'वैवेल योजना' के तहत यह निश्चित हो गया था कि गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में प्रधान सेनापति को छोड़ कर शेष सभी सदस्य भारतीय होंगे; हरिजनों को पृथक प्रतिनिधित्व दिया जायेगा; कार्यकारिणी परिषद् में सभी सदस्यों को समान प्रतिनिधित्व दिया जायेगा; प्रान्तों में उत्तरदायी सरकारों का गठन किया जायेगा; तथा सभी बिन्दुओं पर विचार-विमर्श हेतु शिमला में सम्मलेन आहूत किया जायेगा। 1946 आते-आते 'कैबिनेट मिशन योजना' अस्तित्व में आ गयी थी जिसने पाकिस्तान की मांग को ठुकरा दिया; एक लचीले संघ की रचना की गई जिसमें प्रान्तों को अधिक अधिकार प्रदान किये गए। अप्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा 389 सदस्यों वाले संविधान सभा के गठन की व्यवस्था की गई; एक ऐसी अंतरिम सरकार का गठन जिसमें सभी वर्गों के प्रतिनिधि सम्मिलित थे; भारत के लिए राष्ट्रमंडल की सदस्यता ऐच्छिक की गई; यह योजना या तो इसी रूप में स्वीकार्य होनी थी या पूर्णरूपेण अस्वीकृत। यानि यह निश्चित ही संक्रमण के साथ भारी उहापोह का दौर था ।


ऐसे माहौल में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ये युवा समकालीन लेखन और साहित्यिक स्वतंत्रता के प्रखर भाव से उद्वेलित 'परिमल' जैसी एक संस्था के निर्माण के लिए कृत-संकल्प थे। विजय देव नारायण साही इंटर की पढ़ाई के दौरान ही बनारस से इलाहाबाद आ गए थे। वे समाजवादी आन्दोलन से न केवल जुड़े हुए थे अपितु वे उसके कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी भी करते थे। वे शीघ्र ही 1944 में ही 'परिमल' से जुड़ गए। साही जी के विषय में उनके अभिन्न मित्र रहे केशव चन्द्र वर्मा जी ने लिखा है- "उनकी कविताओं, उनकी कहानियों तथा अन्य विधाओं में जो भी उनका रचनात्मक कृतित्व सामने आया उसमें परिमल का कोई भी योगदान या निषेधात्मक अथवा योगात्मक प्रभाव नहीं रहा।" (परिमल, पृ. 16) राम स्वरूप चतुर्वेदी उनके सहपाठी थे। उनका विभाग हिंदी था और साही जी का अंग्रेजी, किन्तु कार्य क्षेत्र दोनों का हिंदी साहित्य ही रहा। वे दोनों बैंक रोड पर ही एक तरह से मोहल्ले वाले रहे और 'परिमल' के साथी होने के साथ ही कॉफी हाउस के भी साथी रहे। दोनों ही अच्छे आलोचक भी थे, किन्तु साही जी के प्रारम्भिक आलोचनात्मक लेख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे और राम स्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार साही अपने लेखों को एक पुस्तक रूप में संकलित करने में असफल रहे थे? (देखें, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, पृष्ठ. 263)


संभवतः विश्वविद्यालय के दायित्वों, समाजवादी आन्दोलन में सक्रियता के साथ 'परिमल' के कार्यक्रमों के चलते उनको इसके लिए अवकाश ही नहीं मिला? वाकई 'परिमल' के कार्यक्रमों में अति व्यस्तता ही उनके ठोस कार्य में बाधा डालती रही। केशव चन्द्र वर्मा ने लिखा भी है- "मैं अधिकांश 'परिमल' के आयोजनों की रूपरेखा बनाता और साही के ना-नुकुर करने के बावजूद उन्हें मजबूर करता कि वे मेरे साथ आयोजन के लिए चंदा माँगने चलें, हॉल का प्रबंध करें और हमारी बातचीत के आधार पर उन आयोजनों में मुख्य परचा भी पढ़े...।" (परिमल, पृ. 45)। अतः वे परिमल से किस हद तक सम्बद्ध थे, यह उपरोक्त उद्धरण से जगजाहिर हो चुका है। इसीलिए संभवतः "साही ने अपने अंतिम दिनों से कुछ पूर्व ही यह बात कही थी कि अब हमें 'परिमल' संस्था को भंग कर देना चाहिए क्योंकि अब उसमें नयी प्राणवत्ता आने की गुंजाइश नहीं रही।" (परिमल, पृ. 46)



वैसे 'परिमल' और 'परिमल' के मुख्य किरदारों के साथ साही जी का कैसा लगाव था, यह उनकी अप्रकाशित व्यक्तिगत डायरी से स्पष्ट हो जाता है। यह उद्धरण बृहस्पतिवार जनवरी 22, 1948 का है। जब इन सबका विद्यार्थी जीवन समाप्त था और सबका अलग-अलग दिशा में बिखर जाना अपरिहार्य था। 'परिमल' हम लोगों के पारस्परिक जीवन में कुछ आश्चर्यजनक रूप से घुल मिल गया है। इस 'परिमल' की मध्यस्थता से हम लोग एक-दूसरे के कितना निकट आ सके हैं, और किस निष्कपट भाव से एक-दूसरे को समझ सके हैं। अब हममें से अधिकतर का संभवतः विद्यार्थी जीवन अंत को आ गया है। अगले वर्ष हम सब कहाँ बिखर जायेंगे यह कौन जानता है? आतंरिक आशा और अभिलाषा है कि इसमें से प्रत्येक अपने व्योम का उज्जवल नक्षत्र हो, परन्तु बहुत दिनों पश्चात भी इस स्वर्णिम संबंधों की स्नेहमयता में क्षीणता नहीं आएगी, यह मेरा विश्वास है। कोई कितना बड़ा भी क्यों न हो जाए, यह तो याद रहेगा कि यह अपना 'परिमली' मित्र था..." (साही जी की सुपुत्री सुश्री सुस्मिता श्रीवास्तव के सौजन्य से प्राप्त डायरी का यह उद्धरण)


इसीलिए जब काशी विद्यापीठ में अध्यापन के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में वे अध्यापन करने लगे तब 'परिमल' में ऐसा डूबे कि अपनी अध्ययनशीलता और मौलिकता के चलते उसकी हर गोष्ठी में लगभग केन्द्रीय भूमिका में ही रहे। अपने पैनेपन की विशेषता वाले उनके अनेक लेख 'छठवाँ दशक' में संग्रहित हैं। 'छठवाँ दशक' भी अपने आपमें साही जी की व्यस्तता की कहानी ही बयाँ करता है। यह 1966 में प्रकाशनार्थ तैयार था और भूमिका भी साही जी लिख रहे थे। नवम्बर 5, 1982 तक साही जी अपने पार्थिव शरीर में थे। फिर इन सोलह वर्षों तक 'छठवाँ दशक' अप्रकाशित क्यों रहा, इसे समझने के लिए साही जी का स्वभाव जानना जरूरी है। अपनी प्रथम और जीवन काल में प्रकाशित एकमात्र पुस्तक 'मछलीघर' (1966) की भूमिका..."” (छठवाँ दशक, हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद, 1987, भूमिका, कंचनलता साही, 1987)


साही जी को जब अवकाश मिला तब वे समस्त अध्ययनशीलता से मूल फारसी में पद्मावत की विभिन्न पांडुलिपियों के विश्लेषणात्मक तथा शोधपरक दृष्टि से 'जायसी' जैसी अमूल्य रचना देने में कामयाब भी हुए। 'बडे शौक से सुन रहा था जमाना, तुम्हीं सो गए दास्ताँ कहते-कहते'। इसीलिए हमको तो ऐसा प्रतीत होता है कि शायद समय मिलता और जीवन-लीला यूँ समाप्त न हो जाती तो वे निश्चित ही न केवल अपने लेखों का संपादन और संकलन करते। जिस तरह से वे शोधपूर्ण अध्ययन और वैज्ञानिक नजरिए से तर्कपूर्ण विश्लेषणात्मक अध्ययन करते थे, वह न केवल श्रम साध्य था, अपितु एक नितांत सुकून वाले वातावरण की माँग करता था, जो उनके अनेक दायित्वों और सरोकारों के चलते सहज संभव नहीं था।


'जायसी' पर उनका शोधपरक आलोचनात्मक अध्ययन, उनको आलोचना के मील के पत्थर की तरह ही स्थापित करने में सफल हुआ। हम इसे 'लघुमानव के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस: छायावाद से अज्ञेय तक।' (नयी कविता, संयुक्तांक 5-6) की परिणति ही मानते हैं, जब अनेक कवियों की चर्चा के बाद वे एक खास कवि पर केन्द्रित आलोचनात्मक रचना तैयार करते हैं। साही जी इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त पात्र भी थे, क्योंकि अंग्रेजी के प्रोफेसर होते हुए भी वे अरबी-फारसी-उर्दू में निष्णात थे। ऐसा नहीं कि 'लघु मानव के बहाने' से पूर्व उन्होंने आलोचनात्मक लेख नहीं लिखे। बल्कि इसका उल्टा ही सच है। उन्होंने 'परिमल' के अलावा अनेक गोष्ठियों में आलोचना के पर्चे लिखे और पढे, किन्तु संकलन करने का अवसर उनसे मृत्यु ने छीन लिया था। राम स्वरूप चतुर्वेदी 'जायसी' को उन (साही) के व्यवस्थित अध्ययन-क्रम की पहली और अंतिम रचना मानते हैं। इतना ही नहीं उनके शब्दों में विद्वता और सहृदयता का मणिकांचन योग इस अध्ययन में दिखता है। मध्यकालीन हिंदी की अकेली ट्रेजेडी के रूप में साही द्वारा 'प‌द्मावत' की व्याख्या सर्जनात्मक आलोचना का बहुत अच्छा उदाहरण है।" (हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, पृ. 263)


श्रीपाल सिंह 'क्षेम' के मतानुसार तो "... 'परिमल' का साहित्यिक प्रांगण उस रचनात्मक मानसिकता का आत्मीय अजिर था जहाँ से अपने संस्कारों की पुष्टि कर 'भारती', विजयदेव नारायण साही, सर्वेश्वर, डॉ. जगदीश गुप्त आदि से ले कर अनेकानेक परवर्ती रचनाकारों ने अपना समग्र व्यक्तित्व उपलब्ध किया है। उच्च लेखन केवल वातावरण का उत्पाद नहीं होता, पर अच्छे बीज के लिए जिस प्रकार अच्छी ऋतु, अच्छी भूमि और अच्छे उर्वरक की अपेक्षा होती है, उसी तरह प्रत्येक कलाकार और रचनाकार के लिए एक उपयुक्त और प्रेरक संस्कार भूमि भी आवश्यक होती है।" (परिमल, पृ. 99) वे मानते हैं कि 'परिमल' ने ही अपने सदस्यों को सह-अस्तित्व का बोध कराया और उन्हें रचनात्मक दृष्टिबोध भी प्रदान किया ! उनके मतानुसार यह दृष्टिबोध तत्कालीन संक्रांतिपूर्ण परिस्थिति में रचनाकार को अपने लेखनीय-कर्म के लिए न केवल सचेत करती थी, अपितु, उसे निजी रचनात्मक आत्मोपलब्धि के लिए भी निर्भान्त होने का एक दृढ़ संकेत देती थी।” (परिमल, पृ. 100)



1952 में जब 'परिमल पर्व' पर विशेष आयोजन हुआ था तब सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने संयोजक के रूप में एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। उसी में हमें साही जी के सक्रिय रचनात्मक योगदान के विषय में भी ज्ञात होता है। इन्हीं गोष्ठियों में वे 'आधुनिक हिंदी कविता का स्वरुप' शीर्षक का निबंध पढ रहे हैं: तो 'प्रहरी' कहानी का भी पाठ कर रहे हैं। कहानियों के साथ उनकी कवितायें भी धूम मचाने में सफल रहीं-खासतौर से 'प्रभाती का गीत'। इसी प्रकार एकांकी नाटकों में उनका नाटक, 'अधूरा चित्र' बहुत प्रसिद्ध हुआ था; लेकिन साही जी ने सिर्फ नाटक ही नहीं लिखे, अपित वे एक कुशल अभिनेता और निर्देशक भी थे। इसी कारण उनके नाटक मंच के नजरिए से ही लिखे गए लगते थे और उनका सफलतापूर्वक मंचन भी संभव हुआ। (परिमल, पृ. 121-137)


'परिमल परिगोष्ठी-1957' शीर्षक वाले अपने लेख में लक्ष्मीकांत वर्मा ने काव्य गोष्ठियों की चर्चा करते हुए साही जी के विषय में कुछ यूँ बयाँ किया है- "श्री विजय देव नारायण साही की अनुशासनपूर्ण, नयी अभिव्यक्ति, लघु मानव की आत्मवेदना में सराबोर एक नयी अनुभूति प्रदान करती है।” (परिमल, पृ. 147-148) इतना ही नहीं, वे आगे दर्ज करते हैं- “परिमल के प्रायः प्रमुख कवि श्री विजय देव नारायण साही हैं, जिनकी रचनाओं में एक दृढ़ शिल्पी और दृष्टि की समवेत झलक हमें मिलती है। नयी कविता की शिल्पगत स्वतंत्रता के प्रति जो आरोप लगाया जाता है, निस्संदेह साही की कवितायें इन सबका खंडन कर के नयी कविता की शिल्प-विशेषता का परिचय देती हैं। साही के साथ जीवन एक विशेष आवेग के साथ चलता है, जिसमें अभिव्यक्ति के ताप के साथ समस्त विष को अपने में समेट लेने की भी क्षमता है।" (परिमल, पृ. 149)


चाहे बिशन नारायण टंडन हो या केशव चन्द्र वर्मा या लक्ष्मीकान्त वर्मा या सर्वेश्वर दयाल सक्सेना-इन वृत्तांतों का लब्बो-लबाब यही है कि साही न केवल 'परिमल' की स्थापना से सम्बंधित प्रथम बैठक से ले कर मृत्यु तक इसके सिर्फ सक्रिय सदस्य ही नहीं रहे, अपितु उसकी आत्मा और उसके सिद्धांतों के लिए बहसों में उलझते हुए एक सजग प्रहरी भी थे। इस दृष्टिकोण से वे अपने संगठन के लिए जीवित मिसाल ही नहीं पग-प्रदर्शक ज्योति-पुंज या मशाल थे। उसके आयोजन के प्रबंधन से लेकर उसके अंतर्गत गोष्ठियों और बहसों में अपने मौलिक चिंतन से उन्हें ज्वलंत कर देने का बीड़ा उठाये रहते थे। कहानी, आलोचना, कविता, नाटक और उनका मंचन सभी आयामों में उनके योगदान को आजतक समावेशी ढंग से न संजोया गया है और न ही संकलित किया गया है।


आइये, संक्षेप में, 'परिमल' के किसी एक आयोजन की झलकी के माध्यम से साही जी के अकादमिक योगदान पर कुछ प्रकाश डालें! 'परिमल' ने एक त्रि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 'लेखक और राज्य' का आयोजन मई 3, 4 एवं 5, 1957 का आयोजन किया था। इसी के अंतर्गत दूसरे दिन, प्रथम सत्र में 'लेखक और राज्य संरक्षण' शीर्षक से साही जी ने विषय प्रवर्तन किया था। वे बौद्धिक वर्ग की उदासीनता के साथ ही अफसरशाही के हस्तक्षेपीय स्वार्थ को भी इसके लिए जिम्मेदार मानते हैं। चूंकि शासक-प्रशासक वर्ग अपनी नीतियों के प्रचार-प्रसार के लिए साहित्य और कला जैसे रचना कर्म को अपरिहार्य मानता है, जो सही भी है। वे इसी कारण से उस पर नियंत्रण करने के लिए इच्छुक ही नहीं, उत्साहपूर्वक सक्रिय भी रहते हैं!


उन्हीं के शब्दों में कहें तो- "इस प्रकार, मर्यादा का स्थिरीकरण, योग्यता की प्रतिष्ठा, कला एवं संस्कृति का प्रोत्साहन, ग्रंथों का प्रकाशन पुनर्जागरण का व्यवस्थित उत्पादन, राष्ट्रीय एकता और विदेशी-सांस्कृतिक संपर्क- ये सब नारे हैं, जिनके पीछे साहित्य और कला के क्षेत्र में राज्याश्रय (जिसको राज्य हस्तक्षेप कहना अधिक उचित होगा) आज हमारे समक्ष एक सुविचारित योजना के रूप में उभर कर आ रहा है। या तो हमारे साहित्यकार या कलाकार बौने हैं, जिन्हें आत्मनिर्णय का खतरनाक अधिकार नहीं दिया जा सकता है या हमारे सचिव-गण के आध्यात्मिक स्वास्थ्य में कहीं कोई असंतुलन विद्यमान है।" (परिमल, प्र. 179) वे तो लगभग चेतावनी देते हए लेखकों, रचनाकर्मियों के समक्ष चुनौतियों को पूरे पैनेपन के साथ कबीर की भांति एक ललकार के साथ उदघोष करते हैं- "राज्याश्रय के विस्तार वाले सांस्कृतिक सम्मिश्रण में राजधानी ने एक गतिरोध उत्पन्न कर दिया है। सभी धाराओं को उसी केंद्र की ओर मोड़ा जा रहा है। सिद्धांत रूप से जब कभी भी राज्य, कला और साहित्य के क्षेत्र में हस्तक्षेप करेगा, चाहे वह कल्याणकारी उदात्ततम घोषणाओं के साथ ही क्यों न हो, दोहरी मान्यताओं का पैदा होना अनिवार्य है। एक ओर वैचारिक प्रवृत्तिवाद की माँग और दूसरी ओर वस्तुपरक कलात्मक स्तर की आवश्यकता में संघर्ष होना आवश्यक हो जाता है। इससे सारी मान्यताओं में विपर्यय उपस्थित हो जाता है। इसका परिणाम होता है-अराजकता, कुंठा और विनाश। यदि हमें साहित्य को बौना होने से बचाना है तो इस खतरे से गंभीर हो कर अपनी रक्षा करनी होगी। साहित्य की बाहरी सीमा पर जो सत्तानीतिज्ञ साहित्यिक (संस्कृति-प्रचारक) होते हैं उनका काम प्रचार के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता। हिंदी में आजकल जो हर ओर अराजकता और विघटन की शिकायत है-उसमें भी राज्य की निश्चयात्मक सक्रियता का हाथ है। यह सोचना कि साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में राज्य कभी भी सीधे स्थायित्व की स्थापना कर सकता है, भ्रामक है।” (परिमल, पृ. 179-180)



दिसम्बर 1944 को गठित हुई 'परिमल' संस्था का रजत-पर्व एक त्रिदिवसीय (फरवरी 8, 9, 10, 1970) आयोजन था। जाहिर सी बात है, पहली बैठक से ले कर तब तक की अवधि के एकमात्र सक्रिय सदस्य प्रोफेसर विजय देव नारायण साही ही थे। वैसे भी अपनी अध्ययनशीलता और सक्रिय राजनीतिक (समाजवादी) कार्यकर्ता के साथ-साथ अध्यापन के लम्बे अनुभव के चलते वे 'परिमल' में प्रमुख कवि, कहानीकार, नाटककार, आलोचक के अलावा एक मौलिक चिन्तक के रूप में भी उभरते हैं। अपने अध्ययन के आधार पर तार्किक ढंग से न केवल अपनी बात रखते, अपितु उतनी ही वाक्पटु शैली में प्रतिपक्षियों को उत्तर भी देते थे। अतः वे एक तरह से 'परिमल' के प्रखर वक्ता और प्रवक्ता के रूप में भी प्रतिष्ठित हो गए थे।


इसी के चलते वे सुमित्रा नंदन पन्त की कृति 'लोकायतन' के लिए सार्वजनिक रूप से उनकी उपस्थिति में ही विवेचना की गोष्ठी में उद्घोष कर गए कि न उन्होंने इसे पढ़ा है और न ही वे इसे पढ़ेंगे। इसका सीधा अभिप्राय यही था कि यह पढ़ने योग्य कृति ही नहीं है। तो आखिर कौन-सा साहित्य पढ़ने योग्य है और आखिर साहित्य-रचना होती ही क्यों है? इसी प्रश्न को रजत-पर्व में प्रथम दिवस का केन्द्रीय प्रकरण बनाया गया था और जाहिर ही है कि साही जी को ही विषय-प्रवर्तन करने के सर्वथा योग्य माना गया था। उन्होंने साहित्य की प्रकृति की चर्चा से बात शुरू करके उसमें होने वाले अंतर के कारणों पर प्रश्नचिन्ह अंकित करते हुए उन कारणों पर भी ध्यान देने के लिए कहा- जिसके चलते साहित्य में अंतर दृष्टिगोचर होने लगता है। उन्होंने बुलबुल के गायन को तो नैसर्गिक मानते हुए साहित्य या रचना-कर्म से उसकी तुलना करते हुए उस प्रकार का नैसर्गिक कर्म नहीं माना। एक तरह से वे साहित्य और अ-साहित्य के अंतर की ओर ध्यानाकर्षण करते हुए उसमें परिवर्तन और फिर साहित्य की मूल प्रकृति को अनुरेखित करते हैं। (परिमल, पृ. 247-248 तथा 263-271)


साही जी 'समसामयिक कविता : सार्थकता और समझ' में भी अपनी कविताओं और आलोचना के कारण इस गोष्ठी के प्रमुख वक्ताओं में से एक थे। अपनी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि "कविता कुछ बोलती है, यह अच्छा लगा अथवा कविता एक अर्थवान संप्रेषण का जरिया है, यह महत्वपूर्ण तथ्य है। उनके मतानुसार इसीलिए कविता के माध्यम से 'मानवीयता से ही संवाद संभव (होता) है'। वे 'संत्रास, विकृति और भय' को कविता के समक्ष भय का कारक न मानते हुए उसे कर्म का उत्प्रेरक मानते थे। उनके शब्दों में- "कविता की सार्थकता संत्रास को सह्य बनाने में (निहित होती) है।" (देखें, परिमल, पृ. 254)


चूंकि, इस रजत-पर्व के बाद गोष्ठियाँ आयोजित होती रहीं, किन्तु अनेकानेक कारणों के चलते प्रगतिशील लोग इससे पूरी तरह से असम्बद्ध हो गए और इसका प्रभाव पूर्ववत नहीं रहा। हालांकि विशेष आयोजन भी हुए तथा अर्थवान चर्चाएँ, कहानी, कविता पाठ आदि होते रहे, किन्तु पहले वाली बात और उत्साह नहीं रहा? बच्चन जी के शब्दों में "कर देती है अब तो केवल फर्ज अदाई मधुशाला!” बस परम्परा के नाम पर खाना-पूरी अधिक हुई। सभी सदस्य बिखर भी गए और अपने-अपने कार्य-संपादन में शिद्दत से जुट गए-यह भी एक कारण रहा होगा? इसीलिए अपनी मृत्यु से पूर्व ही साही जी ने यह इच्छा प्रकट की थी कि अब 'परिमल' को आधिकारिक रूप से भंग कर देना चाहिए, “क्योंकि उसमें नई प्राणवत्ता आने की गुंजाईश नहीं रही।" (परिमल, पृ. 46)


 हेरम्ब चतुर्वेदी 



सम्पर्क 


मोबाइल : 9140632327

टिप्पणियाँ

  1. परिमल और साही के बहाने यह चर्चा एक दस्तावेजी सृजन है। सीधे तौर पर साहित्य का विद्यार्थी न होते हुए भी श्री हेरंब चतुर्वेदी ने उस दौर को प्रतिबिंबित किया है जो साहित्य के विद्यार्थियों के लिए बहुत बहुत काम का है।

    - सुधीर सिंह

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